कुल्लू का नाम ‘कुल्लू’ कैसे पड़ा, वजह शायद वो नहीं जो आप मानते हैं

कुल्लू दशहरा

यतिन पण्डित।। हिन्दू पक्ष के अनुसार हमने बहुत सी किवदंतियां और बहुत से सन्दर्भ पढ़े हैं जिनमे कुलूत नाम का वर्णन अन्यान्य अपभ्रंशों के साथ जोड़ा जाता है।

विद्या चंद ठाकुर जी द्वारा कुल्लू नाम के विषय मे विस्तार से लिखा गया है, जिसके अनुसार वामन पुराण, महाभारत के कर्ण पर्व, कुलांतपीठ महात्म्य के अंतर्गत कुल्लू नाम से मिलते जुलते नामों का उल्लेख किया गया है। वहीं, कोलासुर, कुलौंउत राक्षस तथा कोली समुदाय से कुल्लू नाम के उध्दृत होने की संभावना भी प्रकट की गई है।

इसी प्रकार विद्या चंद ठाकुर जी के अलावा भी सभी देशी-विदेशी साहित्यकारों ने इन्हीं सन्दर्भों के आधार पर कुल्लू का नाम कुल्लू होने की संभावना व्यक्त करते हुए इस स्थान की कथा को आगे बढ़ाया है।

जहां तक सम्भावना और अनुमान की बात है, इस स्थान विशेष के लिए चीनी यात्री ह्वेन शांग द्वारा सम्बोधित नाम ‘क्लू-तो’ हमे इस नाम के एक अलग पक्ष को देखने पर मजबूर करता है। भोटी भाषा में ‘क्लू’ शब्द का अर्थ उस स्थान के विषय मे है जहां ‘snake gods’ रहते हों। ऐसे ‘snake gods’ जिनका जल पर अधिपत्य हो। अब यही नाम हिंदुकुश की काफ़िर प्रजाति के सम्बंध में देखिए। हिंदुकुश के प्रमुख पूर्व इस्लामिक देवताओं में से एक देवता हैं ― बागिष्त। बागिष्त देवता का दूसरा नाम ‘opkulu’ है। वहां भी ‘kulu’ शब्द जलधाराओं और नाग जाति की जलीय शक्तियों के लिए प्रयुक्त होता है।

वैसे भी, कुल्लू में ऐसा कौन सा जलाशय या झरना है जिसका सम्बन्ध किसी ना किसी रूप में नागों के साथ ना आता हो? बारिश के देवताओं में भी यही नाग जाति के देवता ही प्रमुख माने जाते हैं। नागणी सौर, बूढ़ी नागिन, किसी तालाब या झील के पास ―नागे रा डेहरा और ऐसे ही अन्य सैंकड़ों स्थान, जहां नागों का जल पर आधिपत्य है। क्या यह नाग और जल का सम्बंध काफ़ी नहीं, समझने के लिए कि कुल्लू का नाम इस संदर्भ में भी तो हो सकता है। हम लोगों को हमेशा पौराणिक सन्दर्भों का गौरव आयात करने की आवश्यकता क्यों पड़ जाती है।

पुराण और गौरव गाथाओं का अपना महत्व है। वे अपनी जगह हैं और स्थानों से संबंधित वास्तविकता अपनी जगह।

Kulu नाम के विषय मे जहां तक मेरा निजी मत है, यह नाम हिंदुकुश और भोट भाषाओं में स्पष्ट रूप से जल से सम्बंधित देव शक्तियों को प्रस्तुत करता है। बाकी मान्यताओं के अनुसार आप जो भी मानते हों, उसका भी पूरा सम्मान है। चाहे किसी पुराण के व्याख्यान को मान लीजिए, या महाभारत के किसी अंश में वर्णित कुलूत नाम को।

पिछले वर्ष तक मैं भी यही मानता था, बस मेरी जिज्ञासु प्रवृति मुझे इन पौराणिक किवदंतियों पर विश्वास करने नहीं दे रही थी।

आने वाले वर्षों में बहुत से लोगों के लिए तार्किक शोध के विषय के रूप में kullu के नाम का वास्तविक उद्गम आपके समक्ष रख दिया है। हो सकता है कोई इस विचार पर बेहतर तरीके से आगे बढ़कर सशक्त खोज कर सके। सबकुछ सबके पास तो नहीं हो सकता ना! बेशक, इस विषय पर ह्वेन शांग और अन्य लेखकों के सन्दर्भों को कोट किया जा सकता है। पर वे सन्दर्भ कभी और शेयर करना बेहतर रहेगा। फिलहाल मानना ना मानना आपकी सहज बुद्धि पर निर्भर करता है। बाकी ब्रह्मांड पुराण का कौलान्तक पीठ पर लिखा गया खंड वैसे ही अस्तित्व में आया है, जैसे आदि मनु के लिखे गए 600 के लगभग श्लोक आज 2400 हो चुके हैं। #अलख_निरंजन🙏

(लेखक यतिन पंडित कुल्लू से हैं और हिमाचल प्रदेश की संस्कृति व देव परंपराओं के इतिहास में दिलचस्पी रखते हैं।)

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