देश को गर्व होगा कि हमारे जवान मारते-मारते मरे हैं: पीएम मोदी

नई दिल्ली।। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लद्दाख में भारत-चीन सीमा पर जान गंवाने वाले सैनिकों के बारे में कहा है कि जवानों की शहादत व्यर्थ नहीं जाएगी। पीएम ने कहा कि भारत शांति चाहता है लेकिन उकसाने पर जवाबी कार्रवाई करने में सक्षम है।

पीएम ने कहा, “हमने हमेशा ही प्रयास किया है कि मतभेद विवाद न बनें। हम कभी किसी को भी उकसाते नहीं हैं। लेकिन हम अपने देश की अखंडता और संप्रभुता के साथ समझौता भी नहीं करते हैं। जब भी समय आया है हमने देश की अखंडता और संप्रभुता की रक्षा करने में अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया है।”

लद्दाख में चीनी सैनिकों से संघर्ष में शहीद जवानों को लेकर प्रधानमंत्री ने तोड़ी चुप्पी, चीन का नाम लिए बगैर दी चेतावनी।

In Himachal ಅವರಿಂದ ಈ ದಿನದಂದು ಪೋಸ್ಟ್ ಮಾಡಲಾಗಿದೆ ಬುಧವಾರ, ಜೂನ್ 17, 2020

प्रधानमंत्री ने कहा, “शहीद वीर जवानों के विषय में देश को इस बात का गर्व होगा कि वे मारते-मारते शहीद हुए हैं।”

भारत-चीन सीमा के गलवान वैली में शहीद हुए सैनिकों के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और 15 राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों ने दो मिनट का मौन भी रखा।

लद्दाख में चीन के साथ हिंसक झड़प में हिमाचल का बेटा शहीद

लद्दाख में चीन के साथ हिंसक झड़प में हिमाचल का बेटा शहीद

हमीरपुर।। भारत और चीन के बीच पूर्वी लद्दाख में एलएसी पर हुए हिंसक संघर्ष में हमीरपुर का 21 वर्षीय जवान शहीद हुआ है। पूरा जिला यह खबर सुनकर गमगीन है। शहीद जवान अंकुश ठाकुर साल 2018 में पंजाब रेजीमेंट में भर्ती हुआ था। शहीद अंकुश ठाकुर उपमंडल भोरंज के गांव कड़होता का रहने वाला था।

अंकुश ठाकुर के पिता और दादा भी भारतीय सेना में सेवाएं दे चुके हैं। 10 माह पहले ही अंकुश ने ट्रेनिंग पूरी होने के बाद मिली छुट्टियां काटकर नौकरी ज्वाइन की थी। शहीद का छोटा भाई कक्षा छह में पढ़ाई कर रहा है।

ग्राम पंचायत कड़ोहता के वार्ड पंच विनोद कुमार ने पत्रकारों को बताया कि उन्हें सेना मुख्यालय से फोन पर सूचना मिली है कि पंचायत का रहने वाला सैनिक अंकुश ठाकुर भारत-चीन एलएसी झड़प के दौरान शहीद हो गया है।

लेडी कॉन्स्टेबल से नशे में दुर्व्यवहार करने वाले फौजी पर मामला दर्ज

बिलासपुर।। हिमाचल के बिलासपुर जिले के उपमंडल स्वारघाट में पंजाब-हिमाचल के बॉर्डर शैला घोड़ा नाके पर ड्यूटी पर तैनात एक लेडी कांस्टेबल के साथ कथित तौर पर नशे में धुत्त आर्मी जवान द्वारा दुर्व्यवहार करने और धमकाने का मामला सामने आया है।

मामले के संबंध में पुलिस थाना कोट कहलूर में लेडी कांस्टेबल की शिकायत के आधार पर आर्मी जवान के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है और आर्मी जवान को हिरासत में लेकर कार्रवाई शुरू कर दी गई है।

इस घटना का वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है। सेना के छवि को ठेस पहुंचाने के लोए लोग इस शख्स की कड़ी आलोचना कर रहे हैं।

नशे में धुत होकर स्वारघाट नाके पर महिला पुलिसकर्मियों से उलझा खुद को सैनिक बताने वाला शख्स। नाका तोड़ने की कोशिश का वीडियो वायरल।

In Himachal ಅವರಿಂದ ಈ ದಿನದಂದು ಪೋಸ್ಟ್ ಮಾಡಲಾಗಿದೆ ಬುಧವಾರ, ಜೂನ್ 17, 2020

क्या है मामला
आरोप लगाने वाली लेडी कांस्टेबल ने अपने बयान में कहा है कि वह आईआरबीएन 5वीं बटालियन बस्सी में तैनात हैं और कोविड-19 के चलते उसकी ड्यूटी शैला घोड़ा नाके पर लगी है। रविवार को जब वह स्टाफ के साथ ड्यूटी पर तैनात थी, तो पंजाब के गंगूवाल की तरफ से एक कार आई, जिसे नाके पर चैकिंग के लिए रोका गया।

कॉन्स्टेबल के अनुसार, कार चालक ने बताया कि उसके साथ एक आर्मी जवान बैठा है, जो कि समीपवर्ती गांव डोलां का रहने वाला है। इस पर लेडी कांस्टेबल ने जवान को लीव सर्टिफिकेट दिखाने और मेडिकल स्क्रीनिंग के लिए कहा, तो आर्मी जवान द्वारा दिखाया गया सर्टिफिकेट धुंधला और पढ़ने योग्य नहीं था।

इसके चलते लेडी कांस्टेबल ने आर्मी जवान को साफ दस्तावेज दिखाने को कहा। इस पर जवान बिफर गया और नशे में धुत्त आर्मी जवान ने लेडी कांस्टेबल को धक्का दिया और उसे धमकी देने लगा। महिला कांस्टेबल की शिकायत पर कोट थाना पुलिस ने विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज कर लिया है और आगामी कार्रवाई शुरू कर दी गई है।

कोरोना संकट का ऐसे फायदा उठाने की फिराक में है चीन

इन हिमाचल डेस्क।। जिस समय पूरी दुनिया कोरोना संकट से जूझ रही है, उसी समय चीन ने अपने विस्तारवादी कदम बढ़ाना शुरू कर दिया है। जिन मामलों को चीन अपने राष्ट्रीय हितों से जोड़ता है, उन्हें लेकर वह आक्रामक हो गया है। इसका एक नमूना भारत के साथ लद्दाख में देखने को मिला है।

विवादित सीमा को लेकर चीनी सैनिक अक्सर भारतीय सैनिकों के साथ उलझते रहे हैं मगर इस बार मामला भीषण हिंसा तक पहुंच गया। मगर चीन सिर्फ भारत के साथ नहीं उलझ रहा। वह दक्षिण चीन सागर में भी बहुत सक्रिय हो गया है। साथ ही, हॉन्ग कॉन्ग की स्वायत्तता को भी कम कर रहा है।

अप्रैल में इसने विवादित पैरासेल और स्प्रैटली द्वीपों में दो नए ज़िले घोषित कर दिए। इन द्वीपों पर कब्जा करके वो पहले ही सैन्य अड्डे बना चुका है। इसके अलावा इसने मलेशिया की ओर से समंदर में तेल खोजने के अभियान में जुटे जहाजों को भी रोक दिया। वियतनाम और मलेशिया की पुरानी शिकायत है कि चीन उन्हें तेल और गैस प्रोजेक्ट नहीं लगाने दे रहा।

ब्रिटेन ने अपने उपनिवेश रहे हॉन्ग कॉन्ग को कुछ शर्तों के साथ चीन को सौंपा था। इसके लिए चीन ने ‘वन नेशन, टू सिस्टम्स’ के सिद्धान्त के तहत हॉन्ग कॉन्ग को कई स्वायत्तताएं दी हैं। मगर चीन ने कोरोना संकट के बीच वहां नया सुरक्षा कानून लागू कर दिया। हॉन्ग कॉन्ग के लोग लगातार चीन की ओर से लगाई जा रही बंदिशों का विरोध कर रहे हैं।

एक्सपर्ट्स का कहना है कि इस समय पूरी दुनिया आर्थिक रूप से मुश्किलों का सामना कर रही है और देशों का ध्यान कोविड-19 से निपटने में है। ऐसे में चीन इसे मौके के तौर पर देख रहा है। उसे लगता है कि अगर वह अपने एजेंडे को आगे बढ़ाएगा तो कोई उसका विरोध नहीं कर पाएगा। चीन को ऐसा इसलिए भी लगता है क्योंकि बहुत सारे देश कोरोना टेस्टिंग किट्स और पीपीई वगैरह के लिए अभी भी चीन का मुंह ताक रहे हैं।

चीनी सैनिकों के साथ झड़प में भारत के 20 जवान शहीद

रात को विमानों की आवाज से गूंजा हिमाचल का आसमान

शिमला।। चीन के साथ पूर्वी लद्दाख में हिंसक झड़क और भारतीय जवानों के शहीद होने की खबर के बाद मंगलवार रात को हिमाचल प्रदेश के कई हिस्सों में आसमान में तेज गर्जना के साथ विमानों के उड़ने की आवाज आती रही। ये आवाजें हिमाचल के मैदानी इलाकों से लेकर पहाड़ी इलाक़ों तक सुनी गईं।

किन्नौर, लाहौल स्पीति, हमीरपुर, मंडी, कुल्लू और कांगड़ा जिले के लोगों ने इन आवाजों को सुना और कुछ लोगों ने फेसबुक पर भी इस बारे में लिखा। लोग अनुमान लगाते रहे कि ये भारतीय लड़ाकू विमानों की आवाजें हो सकती हैं।

वैसे तो हिमाचल प्रदेश के आसपास भारतीय वायुसेना के अलग-अलग एयरबेस हैं और उनसे विमानों का उड़ना भी असामान्य नहीं है। मगर रात के समय विमानों की आवाज आना भी कोई सामान्य बात नहीं है।

प्रतीकात्मक तस्वीर

चूंकि भारत और चीन के बीच तनाव बढ़ा हुआ है और हिमाचल प्रदेश की सीमा भी चीन के साथ लगती है, ऐसे में यहां पर सुरक्षा की दृष्टि से एयरफ़ोर्स का एक्टिव होना चौंकाता नहीं है।

इस नाजुक दौर में अभ्यास करने से लेकर लेह-लद्दाख व अन्य जगहों तक जरूरी साजो-सामान या सैनिक पहुंचाने में भी विमानों का इस्तेमाल किया जा सकता है। हालांकि, इस संबंध में किसी तरह की आधिकारिक सूचना नहीं मिल पाई है ऐसे में रात को आसमान गूंजने के बाद लोग अपने स्तर पर कयास लगाने में जुटे हैं।

चीनी सैनिकों के साथ झड़प में भारत के 20 जवान शहीद

चीन ने आपसी सहमति का सम्मान नहीं किया: भारत

नई दिल्ली।। पूर्वी लद्दाख में चीनी सेना के साथ भारतीय सैनिकों के हिंसक संघर्ष को लेकर भारतीय विदेश मंत्रालय की ओर से बयान आया है। इसमें कहा गया है कि चीन ने आपसी सहमति का सम्मान नहीं किया और जो कुछ हुआ, उसे टाला जा सकता था।

भारत का स्पष्ट कहना है लद्दाख में चीनी पक्ष की वजह से हिंसा हुई है जिसे टाला जा सकता था। भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने पत्रकारों के सवालों के जवाब देते हुए कहा, “छह जून को सीनियर कमांडरों की बैठक काफ़ी अच्छी रही थी और उसमें तनाव कम करने की प्रक्रिया पर सहमित बनी थी। इसके बाद मौक़े पर मौजूद कमांडरों की बैठकों का भी सिलसिला चला था ताकि उस सहमति को ग्राउंड लेवल पर लागू किया जा सके जो वरिष्ठ अधिकारियों के बीच बनी थी।”

श्रीवास्तव ने कहा, “इस सहमति के बाद हमें उम्मीद थी कि सब कुछ आसानी से हो जाएगा लेकिन चीनी पक्ष इस सहमति से हट गया कि गलवान घाटी में लाइन ऑफ़ एक्चुअल कंट्रोल (एलएसी) का सम्मान किया जाएगा। 15 जून की देर शाम और रात को एक हिंसक झड़प हुई, इसकी वजह ये थी कि चीनी पक्ष ने एकतरफ़ा तरीक़े से मौजूदा स्थिति को बदलने की कोशिश की।”

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा, “दोनों तरफ़ से लोग हताहत हुए हैं। अगर चीनी पक्ष ने उच्च स्तर पर बनी सहमति ठीक तरह से पालन किया होता तो इस स्थिति को टाला जा सकता था।”

चीनी सैनिकों के साथ झड़प में भारत के 20 जवान शहीद

चीनी सैनिकों के साथ झड़प में भारत के 20 जवान शहीद

नई दिल्ली।। पूर्वी लद्दाख में चीनी सैनिकों के साथ संघर्ष में भारत के 20 जवान शहीद हुए हैं। भारतीय सेना ने जानकारी दी है कि गलवान घाटी में हुए संघर्ष में गंभीर रूप से घायल हुए 17 सैनिकों की शून्य से कम तापमान वाले इलाक़े में मौत हो गई। इससे पहले सेना ने एक अधिकारी समेत तीन जवानों के शहीद होने की खबर दी थी।

भारतीय सेना की ओर से जारी बयान में बताया गया है कि इस संघर्ष में 17 सैनिक गंभीर रूप से घायल हुए थे और शून्य से कम तापमान वाले ऊंचाई पर स्थित गलवान इलाके में उनकी मौत हो गई। मंगलवार रात आधिकारिक बयान में सेना ने कहा कि गलवान इलाके में अब भारत और चीन दोनों ही देशों के सैनिकों के बीच संघर्ष बंद हो गया है। इससे पहले 15 और 16 जून की रात दोनों पक्षों के बीच हिंसक संघर्ष हुआ था। बयान में कहा गया है कि भारतीय सेना देश की एकता, अखंडता और संप्रभुता की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है।

इससे पहले समाचार एजेंसी एनएचआई ने सरकारी सूत्रों के हवाले से ख़बर दी थी कि पूर्वी लद्दाख में चीनी सैनिकों के साथ झड़प में भारत के 20 जवान शहीद हुए हैं। एजेंसी ने सूत्रों के हवाले से यह भी बताया था कि यह संख्या बढ़ सकती है। खबर के अनुसार, चीन को भी भारी क्षति पहुंची है। उसके 43 सैनिक हताहत हुए हैं। इसमें से कुछ की मौत हो गई है और कुछ बुरी तरह जख्मी हुए हैं।

पिछले कुछ दिनों से यहाँ पर एलएसी पर दोनों देशों के सैनिकों के बीच तनातनी बनी हुई थी।

बसें लौटाने के बाद स्पीति में लोगों ने अब अपने विधायक को लौटाया

स्पीति।। हिमाचल प्रदेश के जनजातीय ज़िले लाहौल स्पीति में कोरोना के सहमे लोगों ने अपने विधायक का रास्ता रोककर उन्हें लौटने पर मजबूर कर दिया। लोगों ने काजा पहुँचे कृषि एवं जनजातीय विकास मंत्री रामलाल मार्केंडय का भारी विरोध किया। विरोध करने वालों में अधिकतर महिलाएँ थीं। इस दौरान सोशल डिस्टैंसिंग की धज्जियाँ उड़ती दिखीं।

हाल ही में स्पीति के लोगों ने इलाक़े में बस सेवा शुरू करने का भी विरोध किया था। जो बसें आई थीं, उनसे लोगों को उतरने नहीं दिया गया था और वापस रिकॉन्गपिओ भेज दिया था

आज की घटना का वीडियो देखें-

हजारों की तादाद में सड़कों पर स्पीति की महिलायें, कोविड-१९..सुमदो-काजा-ग्राफ़ों सड़क और मज़दूरों के समर्थन पर किया जमकर प्रदर्शन…..कृषि मंत्री को होना पड़ा वापिस !!

Lahaul Spiti ಅವರಿಂದ ಈ ದಿನದಂದು ಪೋಸ್ಟ್ ಮಾಡಲಾಗಿದೆ ಮಂಗಳವಾರ, ಜೂನ್ 9, 2020

क्या है मामला
महिला मंडल काजा के नेतृत्व में आई महिलाओं का कहना था कि जब बाहर से आने वाले लोगों के लिए क्वॉरन्टीन किए जाने का नियम है तो विधायक एवं मंत्री ख़ुद क्यों इसका पालन नहीं कर रहे। उन्होंने कहा कि नियम सभी के लिए बराबर होते हैं।

महिलाओं ने गेट के पास ही गाड़ी रोक दी। वाहन से उतरे मंत्री ने लोगों से बात करनी चाही मगर सामने से ज़ोरदार नारेबाज़ी होती रही। इसके बाद उन्हें वापस लौटना पड़ा। ग़ुस्साए लोगों ने प्रशासन के ख़िलाफ़ भी नारेबाज़ी की।

सोशल डिस्टैंसिंग की धज्जियाँ
विरोध कर रही महिलाओं को चिंता थी कि मंत्री अगर संक्रमित हुए तो वे इलाक़े में कोरोना फैला सकते हैं। हालाँकि, मंत्री के नियमों का पालन न करने का आरोप लगाने वाली ये भीड़ ख़ुद सोशल डिस्टैंसिंग का पालन नहीं कर रही थी। बड़ी संख्या में आई महिलाएँ एक-दूसरे से सटकर खड़ी थीं और मास्क उतारकर नारेबाज़ी कर रही थीं।

आशंका जताई जा रही है कि अगर किसी भी कारण इनमें से कोई बिना लक्षण वाली संक्रमित हुई तो उसने बाकियों को भी संक्रमित कर दिया होगा।

कांगड़ा: क्वॉरन्टीन सेंटर में रखे गए युवक ने निगला हैंड सैनिटाइजर

कांगड़ा, एमबीएम न्यूज।। काँगड़ा में एक अजीब मामला सामने आया है। यहाँ इंस्टीट्यूशनल क्वॉरन्टीन किए गए एक युवक ने हैंड सैनिटाइज़र निगल लिया। घटना ज्वालामुखी की है।

अभी तक यह साफ नहीं हो पाया है कि युवक ने क्यों हैंड सैनिटाइज़र निगला। तबीयत बिगड़ने पर उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया। यहाँ पर साफ़ हुआ है कि उसने सैनिटाइजर का सेवन किया था।

अन्य राज्य से हिमाचल लौटे इस शख़्स को ज्वालामुखी में बनाए गए क्वॉरन्टीन सेंटर में रखा गया था। जैसे ही इसकी तबीयत बिगड़ी, स्वास्थ्य विभाग ने प्राथमिक उपचार के बाद टांडा रेफर कर दिया।

एमबीएम न्यूज़ नेटवर्क का फ़ेसबुक पेज लाइक करें

प्रशासन ने इस मामले की पुष्टि की है। युवक के ख़ून के नमूने में मिथाइल एल्कॉहल पाया गया है। सैनिटाइजर में यही इंडस्ट्रियल एल्कॉहल यूज होता है जबकि शराब आदि में जो एल्कॉहल होता है, वह इथाइल एल्कॉहल (एथनॉल) होता है।

(यह ख़बर सिंडिकेशन के तहत प्रकाशित की गई है)

फसलों के नाम पर इतने जानवर मारे, क्या मिला? ये है समाधान

आदर्श राठौर।। केरल में हथिनी की मौत का मामला न उठा होता तो हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर की पुलिस शायद ही गर्भवती गाय का मुंह बम से उड़ा देने के लिए जि़म्मेदार शख्स को गिरफ्तार करती। घटना हुई थी 25 मई को, केस दर्ज हुआ 26 मई को आरोपी को गिरफ्तार किया गया छह जून। 11 दिन बाद ये गिरफ्तारी तब हुई जो जख्मी गाय का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।

अच्छी खबर ये है कि गाय की जान बच गई है और उसने घटना के दो दिन बाद स्वस्थ बछड़े को जन्म दिया है। गाय की सर्जरी हुई है मगर पूरी तरह से ठीक होने की गारंटी नहीं। फिलहाल डॉक्टरों की टीम उसकी देखभाल कर रही है। इस तस्वीर को देख सुखद आश्चर्य हुआ कि जिन गाय के जबड़े गायब हो गए थे, आज वो अपने बछड़े को सहला पा रही है। इसके लिए डॉक्टर प्रशंसा के पात्र हैं।

गिरफ्तार किए गए आरोपी का कहना है कि उसने तो सुअरों के लिए आटे में बम मिलाकर रखा था मगर गाय ने खा लिया। बहुत सारे लोग इस व्यक्ति के प्रति सहानुभूति भी जता रहे हैं और कर रहे हैं गाय तो गलती से जख्मी हुई है। पिछले दिनों मेरे मित्र आशीष भरमौरिया ने लिखा था कि ‘जिस हिमाचल में बंदरों को जहर देकर मारा जाता है, वहां पर हथिनी की मौत पर केरल को क्यों कोसा जा रहा है?’ इस पर कुछ लोग उनपर सवाल उठाने लगे कि आप किसान नहीं है, इसलिए आपको किसानों का दर्द नहीं पता।

गाय का नीचे का जबड़ा फट चुका है, ऊपर भी चोट आई है। डॉक्टर इलाज मे ंजुटे हैं उम्मीद है जान बच जाएगी।

इतने जानवार मारे, हासिल क्या हुआ?
वे पूछ रहे थे कि अगर फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले जीवों को अगर मारा न जाए तो क्या किया जाए। उनके इस सवाल का जवाब बाद में, पहले मैं इन्हीं लोगों से सवाल करना चाहता हूं कि आप लोग इतने सालों से बंदरों और सुअरों को मार रहे हैं, आपने क्या हासिल कर लिया? क्या बंदरों या सुअरों की संख्या घट गई? क्या उन्होंने डर के मारे आपके खेतों या बागीचों में आना बंद कर दिया? अगर नहीं तो फिर क्यों आप लगातार जहर, करंट, कारतूस, बम, फाही (फंदा) और कड़ाकी इस्तेमाल करके इन जीवों को मारे जा रहे हैं? कहीं आपको इस काम में आनंद तो नहीं आने लग गया है?

मैं जानता हूं कि कड़ी मेहनत करके बच्चों की तरह पाले जा रहे खेतों और बागीचों को जब नुकसान पहुंचता है तो कितना गुस्सा आता है। मगर ये भी जानता हूं कि बंदरों या सुअरों को मारना स्थायी समाधान नहीं है। मैं ही क्या, सभी इस बात को जानते हैं और फिर भी इन्हें मारने के लिए तरह तरह के हथकंडे अपनाते हैं। किसलिए? सिर्फ संतुष्टि के लिए कि मैंने इन बंदरों से बदला ले लिया? शायद इसी कारण बहुत से लोग, जो खेती नहीं करते, वे भी जहर मिलाए जा रहे हैं।

एक और बात- बंदरों और सुअरों को मारने के लिए अलग-अलग तरीके अपनाए जाते हैं। जहर के गोले और रोटियां होती हैं सिर्फ बंदरों के लिए क्योंकि यहां उनका मीट नहीं खाया जाता। मगर जंगली सुअरों को मारने के लिए करंट, कड़ाकी, फंदा और बम जैसे तरीके अपनाए जाते हैं ताकि वे मरें तो उनके मीट का लुत्फ उठाया जा सके। अगर वे जहर खाकर मरेंगे तो दावत का इंतजाम नहीं होगा। मुझे यकीन है कि बिलासपुर में भी बम सुअर को भगाने के लिए नहीं, उसे मारने के लिए रखा गया ताकि वो उसे खाए, बम फटे, वो मरे और फिर पूरा गांव दावत उड़ाए। लेकिन बेचारी गाय ने उसे खा लिया और जख्मी हो गई।

प्रतीकात्मक तस्वीर

मेरे इलाके के गांवों में भी कुछ लोगों ने रोटी और आटे की गोली में जहर मिलाकर रखना शुरू कर दिया था। बंदरों के साथ-साथ कुछ बेसहारा कुत्ते जरूर उन्हें खाकर मर गए थे। बहुत सारे कुत्ते फंदों में फंसकर कट मरे। सुअरों के लिए लगाए गए करंट में पालतू पशु और यहां तक कि इंसानों के मारे जाने की भी खबरें आती रही हैं। फिर भी लोग बाज नहीं आ रहे।

मुझे लगता है कि लोगों को स्थायी समाधान चाहिए ही नहीं। उन्हें जानवरों से लड़ने और उन्हें मारकर खुश होने में मजा आने लगा है। अगर फसलों की चिंता होती तो वे अपने राजनेताओं से पूछते कि इतने सालों से आप इस मुद्दे पर चुनाव लड़ रहे हैं, जीत भी रहे हैं लेकिन समस्या को सुलझाने के लिए आपने किया क्या? इस समस्या को सिर्फ और सिर्फ सरकारें सुलझा सकती हैं, फिर भी हम उनसे कभी सवाल नहीं करते।

तीन दशकों में मैंने बंदरों की समस्या कम होती नहीं दिखी। हां, हर चुनाव में बंदरों का मुद्दा उछला जरूर। सरकारों ने बड़ी-बड़ी बातें कीं और तरह-तरह की योजनाएं लाईं। चुनाव के दौरान कुछ नेताओं ने तो एक-दूसरे को ही बंदर कह दिया। सरकारों ने इधर के बंदर उठाकर उधर छोड़े, नसबंदी के नाम पर पैसा बहाया, बंदरों को मारने पर इनाम घोषित किया और करोड़ों की रकम खर्च करने के बाद नतीजा- शून्य। हर पार्टी चुनाव से पहले अपने घोषणापत्र में जंगली जानवरों से फसलों की रक्षा की बात करती है मगर सत्ता में आते ही इसे भूल जाती है।

Wild animals add to Uttarakhand hill farmers' woes - dehradun ...

बंदरों और सुअरों से किसानों का संघर्ष
अगर आप हिमाचल प्रदेश के गांवों मे रहते हैं और आपने खेती छोड़ दी है, तब भी आप एकदम फिट रहेंगे। इसलिए, क्योंकि घर के आसपास कुछ बेलें, सब्जियां और धनिया वगैरह तो आपने लगाया ही होगा। एक आध फलदार पौधा भी होगा। दिन में एक-दो बार इन्हें बचाने के लिए आपको बंदरों की टोलियों को भगाने के लिए मशक्कत करनी ही पड़ेगी। हालांकि, कई लोग इस चक्कर में घुटने और दांत तुड़वा बैठते हैं।

परेशान होकर लोगों ने क्या नहीं किया। पहले वे कहते थे कि बंदर हनुमान जी की सेना होते हैं, इन्हें नहीं मारना चाहिए। फिर थक-हारकर उन्होंने बंदरों को मारना शुरू कर दिया। पहले वे बंदूक इस्तेमाल करते थे मगर फिर देखा कि इससे अपना ही नुकसान हो रहा है। कारतूस महंगे हैं और बंदर फिर लौटकर आ रहे हैं। उतने की तो फसल नहीं है जितना खर्च बंदरों से बचाने में हो जाएगा। फिर हुआ ये कि डिपो से मिल रहे सस्ते राशन को देखते हुए उन्होंने सोचा कि क्यों मेहनत भी की जाए और खून भी जलाया जाए। वे खेती से विमुख हो गए।

लेकिन हर कोई सक्षम नहीं कि बाजार से अनाज खरीदकर परिवार का पेट पाल ले। इसलिए उन्हें खेती तो करनी ही पड़ती है। लेकिन जब कुछ लोगों ने खेती छोड़ चुके हैं तो इन लोगों के खेत और खतरे में आ गए हैं। पहले ज्यादा खेती होती थी तो बंदरों से सभी लोगों को थोड़ा-थोड़ा नुकसान होता था। अब कम ही खेत बचे हैं तो बंदरों के निशाने पर वही रहते हैं। अब बंदर ही फसल खा जाएंगे तो वे खुद क्या खाएंगे? इसी डेस्परेशन में शायद कुछ लोग जहर देने जैसे काम उठाने लगे हैं। हालांकि ये कदम सिर्फ बदले की भावना से आत्मसंतुष्टि ही दे सकता है, बंदरों की समस्या से स्थायी निजात नहीं दिला सकता।

अब जो फसलें बंदरों से बचती हैं, वे सुअरों की भेंट चढ़ जाती हैं। सुअरों की टोलियां आती हैं। एक-साथ 10-20 बड़े-छोटे सुअर शाम या रात को फसलों को रौंदते हुए आते हैं और अपन नथुनों से पूरा खेत खोद डालते हैं। नई फसल की कोंपलों को चरते भी हैं। अब तो हमारे इलाके में हिरण प्रजाति के जीव भी फसलों को तबाह कर रहे हैं। यानी किसानों पर लगातार मार पड़ रही है।

Bovine, monkey scare everywhere

खेतों की ओर क्यों आ रहे जानवर?
सवाल ये है कि ये जीव जंगल छोड़कर खेतों में क्यों आने लगे? जब भी आप बड़े-बुजुर्गों से बात करें तो वे बताएंगे कि पहले ऐसी समस्या नहीं थी। बंदरों की टोलियां या जंगली सुअर कभी कभार ही नुकसान पहुंचाते थे। मगर पिछले 40 सालों में ये समस्या बढ़ी है। इसके लिए सीधे जिम्मेदार है- हिमाचल प्रदेश में जगह-जगह लगा दिए गए चीड़ के जंगल।

चीड़ ऐसा पेड़ है जो मैदानी इलाकों में भी उग जाता है। देखभाल भी कम मांगता है। एक बार लगा दो और भूल जाओ। कसैले स्वाद के कारण भेड़-बकरियां भी इन्हें नहीं चरतीं। इसलिए हिमाचल प्रदेश के गठन के बाद बड़े पैमाने पर चीड़ लगाने का अभियान छेड़ा गया। आप बड़े-बुजु़र्गों को पूछना कि आज जहां चीड़ के नए जंगल लगे हैं, पहले वहां क्या था। वहां खाली जमीन हुआ करती थी और अलग-अलग तरह के पेड़-पौधे और झाड़ियां हुआ करती थीं।

इन्हीं झाड़ियों में जंगली सुअरों का बसेरा होता था और बंदर ऊपरी इलाकों के घनघोर जंगलों में रहा करते थे। वे वहीं पर मस्ती करते, वहीं बेरियां और जंगली फल खाते और उछल-कूद करते रहते। यहीं पर विभिन्न जंगली जीव रहा करते थे जिनमें तेंदुए भी थे जो आहार शृंखला में सबसे ऊपर थे। ये बंदरों, सुअरों, हिरणों आदि का शिकार करके इनकी आबादी को भी नियंत्रित रखते थे।

मगर चीड़ के जंगल जैसे ही लगे, अन्य फलदार पेड़ और झाड़ियां खत्म हो गईं। आप देखेंगे कि चीड़ के जंगलों में बेकार सी झाड़ियों के अलावा और कुछ नहीं उगता। जमीन पर चलारू (पाइन नीडल्स, चीड़ की नुकीली पत्तियां) की परत बेहद ज्वलनशील होती है। जब इनमें आग लगती है तो पूरा का पूरा जंगल तबाह हो जाता है। कुछ भी नहीं बचता। न पौधे न जीव-जंतु। इन्हीं जगलों में लगी आग में तेंदुओं के शावक भी जल जाते हैं। इससे इनकी संख्या निश्चित तौर पर घटी है और नतीजा ये रहा कि सुअर और बंदरों की संख्या तेजी से बढ़ी है।

जब जंगल इनकी खाने की मांग पूरी नहीं करता तो ये आबादी का रुख करते हैं। सुअर, बंदर आदि खेतों पर धावा बोलते हैं और उनके पीछे आने वाले तेंदुए पालतू पशुओं और कुत्तों वगैरह पर। राहत की बात है कि वन विभाग ने इस समस्या को पहचानते हुए अब चीड़ की नई पौध लगाना बंद कर दिया है। मगर समस्या ये है कि जो पहले से मौजूद चीड़ के जंगल हैं, उनका क्या किया जाए?

Why cutting down Chirpine is not a solution to Uttarakhand forest ...

समाधान क्या है?
जवाब है- दीर्घकालिक योजना। हिमाचल प्रदेश निर्माता डॉक्टर यशवंत सिंह परमार का लक्ष्य था कि चीड़ के जंगलों से न सिर्फ हरियाली बढ़ेगी बल्कि कल को प्रदेश की आय के स्रोत भी बढ़ेंगे। चीड़ से निकाला जाने वाला बिरोजा कई जगह इस्तेमाल होता है और इसकी लकड़ी भी कीमती होती है। सोचिए, अगर चरणबद्ध तरीके से योजना बनाई जाए और एक सिरे से चीड़ के मैच्योर हो चुके जंगलों का कटान शुरू किया जाए तो कितना लाभ हो सकता है।

इस तरह से रोजगार के अवसर पैदा होंगे, प्रदेश को राजस्व मिलेगा और जो जगह खाली होगी वहां पर प्लान्ड तरीके से मिश्रित पेड़ लगाए जाएं। इमारती लकड़ी वाले वृक्ष भी हो, पर्यावरण के लिए लाभदायक पेड़ भी हों, फलदार पौधे भी हों और औषधीय पौधे भी हों। मगर ये काम बड़ी ही समझदारी के साथ प्रॉपर रिसर्च के साथ करना होगा, वैज्ञानिकों की निगरानी में। तभी ग्रीन ट्राइब्यूनल और कोर्टों को संतुष्ट किया जा सकेगा।

ऐसा नहीं होना चाहिए कि तुरंत बहुत बड़े हिस्से से पेड़ काट दिए और फिर उनकी भरपाई समय पर न हो पाए। एक वन सर्कल एक निश्चित क्षेत्रफल में पेड़ काटे और फिर उनकी जगह नए पौधे लगाए। अगले पांच साल विभाग का काम उन पौधों की देखरेख करना होगा। अगले पांच साल वहां और पेड़ नहीं कटेंगे। जैसे ही ये पौधे टिक जाएंगे और कटे हुए जंगल की जगह नया जंगल लहलहाने लगेगा, तब उसी वन सर्कल में नए जंगल में पेड़ों का कटान किया जाए।

इस तरह जब कम ऊंचाई वाले क्षेत्रों से चीड़ के जंगल हट जाएंगे तो नए जंगल वरदान साबित होंगे। वहां जीव-जंतु भी आराम से रहेंगे और फल-दवाएं मिलेंगी सो अलग।

यह सतत प्रक्रिया होगी। 50 साल लंबी या शायद इससे भी आगे की। इससे तुरंत बंदरों और जंगली जानवरों की समस्या से मुक्ति नहीं मिलेगी लेकिन लॉन्ग टर्म में जरूर फायदा होगा। इसलिए भी क्योंकि आज जो लोग खेती से विमुख हो चुके हैं, आने वाले समय में वे फिर खेती की और लौटेंगे। तब उन्हें हमारी तरह समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ेगा।

12 Places For Solo Trip To Himachal For A Great Travel Experience

तो फिलहाल क्या किया जाए?
आंकड़े कहते हैं कि 2006 के बाद हिमाचल में 14 लाख बंदरों की नसबंदी हुई और इससे उनकी संख्या घटी है। दावा है कि 2004 में ये 32 लाख थे मगर 2015 में 21 लाख रह गए। लेकिन जमीन पर यह फर्क दिखाई नहीं देता। सरकार को चाहिए कि जितना पैदा वो बंदरों की गणना में लगाती है, उसकी जगह ढंग से ट्रेन्ड लोगों से बंदरों की नसबंदी का अभियान चलाए। अब पुरुष बंदरों को इंजेक्शन के माध्यम से इन्फर्टल बनाया जा सकता है। ईमानदारी से अभियान चलाया जाए तो समस्या पर काबू पाया जा सकता है। ये तरीका प्रभावी भी होगा और अहिंसक भी। रही जंगली सुअरों की बात, उन्हें पर्याप्त वोल्टेज वाली फेंसिंग के माध्यम से फसलों से दूर रखा जा सकता है।

ये सब अस्थायी इंतजाम तब तक जारी रखे जा सकते हैं, जब तक कि हिमाचल में विविधता भरे जंगल न उगा दिए जाएं। इसके लिए चाहिए विजनरी नेतृत्व जिसपर जनता भी भरोसा करती हो और वो केंद्र से भी मंजूरी ले आए। समय लगेगा मगर हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने से बेहतर है शुरुआत कर देना।

हो सकता है मेरे सुझाव पर्यावरण या वन विज्ञानियों को हास्यास्पद लगें। मैं इस क्षेत्र का एक्सपर्ट नहीं हूं। मगर उनके पास कोई सुझाव हैं तो उनका स्वागत है।

(मंडी से संबंध रखने वाले पत्रकार आदर्श राठौर के फ़ेसबुक पेज पर डाले गए दो पोस्ट्स को मिलाकर तैयार किए गए इस लेख को उनकी अनुमति के साथ प्रकाशित किया गया है)