स्वतंत्रता सेनानी की विधवा के घर 15 दिन से पानी की बूंद नहीं आई

ऊना।। एक ओर हिमाचल के जल शक्ति मंत्री मंचों पर बयान देते नहीं थकते कि जल शक्ति विभाग के कर्मचारियों ने कोरोना काल में सबसे ज़्यादा काम किया। दूसरी ओर ऊना जिला में एक स्वतंत्रता सेनानी की विधवा को पानी की बूंद-बूंद के लिए तरसना पड़ रहा है।

ऊना जिला के अम्ब उपमंडल के अंतर्गत चौआर पंचायत के आवादी धंतुई में रहने वाली स्वतंत्रता सेनानी की विधवा परमेश्वरी देवी के घर में लगे नल से पिछले 15 दिनों में पानी की बूंद नहीं आई। 92 वर्षीय परमेश्वरी देवी ने पानी के लिए बार-बार गुहार लगाई। लेकिन वृद्धा की आवाज़ जल शक्ति विभाग के कर्मचारियों तक नहीं पहुंची। ऐसे में वीरवार को वृद्धा ने डीसी ऊना का दरवाज़ा खटखटाया है।

जब डीसी ने मामले में हस्तक्षेप किया तो अधिकारियों ने समस्या सुलझाने के लिए कदमताल शुरू किया। अब महिला को पानी मिलने की आस बंधी है।

92 वर्षीय वृद्धा ढंग से चल फिर भी नहीं सकती है। नल से पानी की बाल्टी तो भर लेती है। पर बाल्टी कमरे तक पहुंचाने के लिए दूसरों का सहारा लेना पड़ता है। लेकिन 2 हफ़्तों से तो नल में भी पानी नहीं आया। ऐसे में वृद्धा अब पानी के लिए भी आस-पड़ोस के लोगों पर ही आश्रित है।

डीसी ऊना राघव शर्मा ने बताया कि मुझे फ्रीडम फाइटर की विधवा का फोन आया था। जल शक्ति विभाग के अधिकारियों को आदेश दे दिए गए हैं। उनकी समस्या बहुत जल्द हल हो जाएगी।

वहीं जल शक्ति विभाग भरवाईं डिवीजन के एक्सईन होशियार सिंह ने कहा कि मुझे इस बारे में कोई जानकारी नहीं थी। डीसी ऊना की तरफ से निर्देश प्राप्त हुए हैं। मैं मौके पर जा रहा हूँ। बहुत जल्दी उनकी पानी की समस्या हल हो जाएगी।

वीरभद्र सिंह ने उठाया था डॉ. कविता की पढ़ाई का खर्च

सोलन।। पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह का जीवन किस्सों से भरा रहा है। उनका एक किस्सा अर्की विस क्षेत्र से भी जुड़ा है, जहां से वह अपने अंतिम समय तक विधायक रहे। यहाँ उन्होंने एक गरीब परिवार की बेटी की पढ़ाई का पूरा खर्चा उठाया और बेटी को डॉक्टर बनने में मदद की। अर्की की इस बेटी का नाम कविता है। डॉ. कविता इन दिनों अर्की ब्लॉक के घनागुघाट में बतौर चिकित्सक अपनी सेवाएं दे रही हैं।

वीरभद्र सिंह की के निधन के बाद डॉ. कविता भावुक हो गयी। उन्होंने कहा कि अगर वीरभद्र सिंह ने उस समय हमारे परिवार को अपना आशीर्वाद नहीं दिया होता तो मेरा डॉक्टर बनने का सपना अधूरा ही रह जाता। डॉ. कविता ने बताया कि वर्ष 2013 में वह एमबीबीएस में दाखिला लेना चाहती थी। लेकिन उस समय उनका परिवार मुश्किल दौर से गुज़र रहा था। वह बीपीएल परिवार से संबंध रखती थीं।

ऐसे में किसी ने कविता को किसी ने वीरभद्र सिंह से मिलने की सलाह दी। उसके अगले ही दिन कविता उनसे मिलने चली गई। हॉली लॉज पहुंचकर उनसे मिली और उन्हें आप बीती सुनाई। वीरभद्र सिंह भी कविता की बातें सुनकर भावुक हो गए। भावुक होकर बोले, बेटा आपकी पढ़ाई और हॉस्टल के खर्च का इंतजाम कर दिया जाएगा। आप केवल पढ़ाई पर ध्यान दो।

2013 का वह दिन डॉ. कविता के लिए यादगार दिन है। इन दिनों वह अर्की ब्लॉक के घनागुघाट में बतौर चिकित्सक तैनात हैं।

हिमाचल पुलिस की चेक पोस्टों पर लगा पशुओं का डेरा

चम्बा।। लाखों रुपये खर्च कर बनाई गई पुलिस चेक पोस्टें अब भैंसों के तबेलों में तबदील हो गई हैं। जम्मू-कश्मीर के साथ लगती हिमाचल प्रदेश के चंबा की सीमा पर सुरक्षा के लिए यह चेक पोस्टें बनाई गई हैं।

अमर उजाला की खबर के अनुसार, चंबा की सरहद पर खुंडी मराल में सरकार और विभाग द्वारा पुलिस के लिए दो हट और एक चेक पोस्ट बनाई है। सरहद पर पुलिस की चौकस व्यवस्था रहे इसके लिए इन चेक पोस्टों का निर्माण किया गया है। लेकिन इन चेक पोस्टों में पुलिस के जवान तैनात नहीं है। पुलिस जवान यहाँ के बजाय रिहायशी बस्ती के पास चेक पोस्ट लगाए बैठे हैं। जो कि यहाँ से करीब 10 किलोमीटर पीछे है।

सुरक्षा की दृष्टि से बात करें तो चेक पोस्ट खुंडी मराल में होनी चाहिए। भांदल व संघणी गांव के बाशिंदों का कहना है कि चेक पोस्ट नीचे होने की वजह से वहां से जम्मू के लिए पशु तस्करी हो रही है। इसलिए लोगों द्वारा प्रशासन से चेक पोस्ट को शिफ्ट करने की मांग की जा रही है। स्थानीय लोगों की मांग है कि पुलिस चेक पोस्ट को खुंडी मराल में शिफ्ट किया जाए ताकि सरहद पर पुलिस का पहरा रहे।

स्थानीय लोगों का कहना हैं कि इस बार गर्मियों में भी चेक पोस्ट को अपने मूल स्थान पर शिफ्ट नहीं किया गया। पहले सरहदों पर बनाई चेक पोस्टें गर्मियों में ऊपरी इलाकों में रहती थी और सर्दियों में निचले इलाकों में शिफ्ट किया जाता था। लेकिन इस बार गर्मियों में भी चेक पोस्ट को शिफ्ट नहीं किया गया है।

लोगों का यह भी कहना है जब तक वहां पर पक्के हट नहीं बने थे तब तक चेक पोस्ट उसी स्थान पर होती थी। लेकिन जब पक्के हट बनाने के बाद पुलिस विभाग ने चेक पोस्ट को ही दस किलोमीटर पीछे हटा लिया।

वहीं भांदल पंचायत के पूर्व प्रधान हेमराज चंदेल का कहना कि वह कई बार जिला प्रशासन से मांग कर चुके हैं कि खुंडी मराल चेक पोस्ट को नए हट में शिफ्ट किया जाए। सीमा पर चेक पोस्ट बनाने के लिए लाखों रुपये खर्च हुए है। लेकिन वहाँ अब मवेशियों को ठहराया जा रहा है।

इस बारे एसपी चंबा अरुल कुमार ने कहा कि जिले की सीमाओं पर पुलिस पूरी तरह मुस्तैद है और सरहदों पर रूटीन में गश्त भी की जा रही है। सुरक्षा को लेकर किसी भी तरह की लापरवाही नहीं बरती जाएगी। वहीं खुंडी मराल चेक पोस्ट के निचले क्षेत्र में शिफ्ट होने की जानकारी जुटाकर आवश्यक कार्यवाही की जाएगी। पुलिस चेक पोस्ट को खुंडी मराल में बनाए हट में शिफ्ट करने की व्यवस्था की जाएगी।

वीरभद्र सिंह ने जब सुजान सिंह पठानिया को झिड़क दिया था

शिमला।। पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के जीवन से जुड़े कई किस्से हैं। एक ऐसा ही किस्सा है जब उन्होंने अपनी ही कैबिनेट के मंत्री को झिड़क दिया था।

स्वर्गीय सुजान सिंह पठानिया उस समय वीरभद्र सरकार की कैबिनेट में ऊर्जा व कृषि मंत्री हुआ करते थे। अपने काम के सिलसिले में एक शख्स पठानिया के कार्यालय में कई बार चक्कर लगा चुका था। वहीं, मंत्री ने काम में देरी की वजह वजह बताकर उसे वापिस लौटा दिया।

व्यक्ति अपनी फरियाद लेकर कुछ समय पश्चात मुख्यमंत्री के कार्यालय जा पहुंचा। संयोगवश इसी दौरान सुजान सिंह पठानिया भी मुख्यमंत्री कार्यालय पहुंचे हुए थे। जब पठानिया ने उस व्यक्ति को वहां देखा तो उसे सीएम वीरभद्र सिंह के सामने ही डांट लगा दी।

पठानिया ने कहा कि तुम्हें बता तो दिया है कि तुम्हारा काम क्यों नहीं हो पा रहा है। फिर क्यों तुम बार-बार यहां के चक्कर काट रहे हो। वहां मौजूद वीरभद्र सिंह अपनी आंखों से सब देख रहे थे। उन्होंने उस व्यक्ति को अपने ऑफिस में बिठाया और चाय-पानी पिलाया।

फिर वीरभद्र सिंह ने पठानिया को झिड़क दिया। उन्होंने डांट लगाते हुए कहा कि अगर गुस्सा आता है तो राजनीति छोड़ दो। हालांकि पठानिया उस समय वीरभद्र सरकार की कैबिनेट के मंत्री थे।

पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह का 87 साल की उम्र में निधन

सड़क हादसे में दो शिक्षकों समेत चार की मौत, एक घायल

शिमला।।  जिला के चौपाल उपमंडल में एक सड़क हादसा पेश आया है। शिमला और सिरमौर जिला की सीमाओं से लगते कुपवी में एक कार सड़क दुघर्टना का शिकार हो गई। कर अचानक अनियंत्रित होकर खाई में गिर गई। हादसे में 4 लोग काल का ग्रास बन गए।

बताया जा रहा है कि कार में सभी लोग एक ही परिवार के सदस्य थे। इसमें चार लोगों की मौत हो गई और एक गंभीर रूप से घायल हो गया।

हादसे की सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची। पुलिस ने मृतकों के शवों को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है। मिली जानकारी के मुताबिक यह हादसा वीरवार दोपहर को पेश आया है। बतौर रिपोर्टस हादसे में दो मृतक शिक्षा विभाग में टीजीटी के पद पर कार्यरत थे।

मामले की पुष्टि करते हुए डीएसपी चौपाल राज कुमार ने की है। उन्होंने बताया कि मामला दर्ज कर दुर्घटना के कारणों की जांच की जा रही है।

मृतकों की पहचान 32 वर्षीय रोशन पुत्र धनीराम, 33 वर्षीय राजेंद्र पुत्र नैन सिंह, 70 वर्षीय जीवन सिंह व 42 वर्षीय विद्दा देवी पत्नी केदार सिंह निवासी मझोली गांव के रूप में हुई है। वहीं, कार में सवार रणबीर नामक व्यक्ति की हालत गंभीर बताई जा रही है।

सरकार के परीक्षाएं न करवाने के फैसले से विश्वविद्यालय को लाखों की चपत

शिमला।। बुधवार को हुई कैबिनेट बैठक में हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय यूजी के प्रथम व द्वितीय वर्ष के विद्यार्थियों को प्रोमोट करने का फैसला लिया गया। हालांकि इस फैसले ने सबको हैरान कर दिया। विश्वविद्यालय ने परीक्षाएं करवाने की पूरी तैयारी कर ली थी। द्वितीय वर्ष के विद्यार्थियों के लिए परीक्षा का शेड्यूल भी जारी कर दिया गया था।

ऐसे में कैबिनेट के परीक्षाएं न करवाने के फैसले से विश्वविद्यालय को 40 से 45 लाख की चपत लग गयी है। विश्वविद्यालय ने परीक्षाओं की तैयारी में 40 से 45 लाख खर्च कर दिए थे। इसमें प्रश्न पत्र सेटिंग, प्रिंटिंग, प्रश्न पत्र परीक्षा केंद्र तक पहुंचाने आदि खर्च शामिल हैं।

युवा कांग्रेस और एनएसयूआई पिछले कुछ समय से विद्यार्थियों को प्रोमोट करने की मांग को लेकर भूख-हड़ताल पर बैठी थी। ऐसे में सरकार के इस फैसले से प्रतीत होता है कि सरकार इस आंदोलन से झुक गयी गई है।

वीरभद्र सिंह को जब दो हफ्तों में छोड़ना पड़ा था मुख्यमंत्री पद

शिमला।। यह बात सभी जानते हैं कि वीरभद्र सिंह छह बार हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे हैं। लेकिन बहुत कम लोगों को यह जानकारी होगी कि वीरभद्र सिंह का एक मुख्यमंत्री कार्यकाल चंद दिनों का ही था। यह घटनाक्रम बिल्कुल वैसा ही था जैसा कुछ समय पहले महाराष्ट्र में देखने को मिला था। जिस तरह का सियासी उलटफेर 2019 में महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस के साथ देखने को मिला था। ठीक वैसा ही सियासी उलटफेर कुछ साल पहले हिमाचल प्रदेश में भी देखने को मिला था, जिसकी जानकारी बहुत कम लोगों को है।

इस लेख में हम आपको बताएंगे कि कब और कैसे वीरभद्र सिंह बने थे कुछ दिन के सीएम।

साल 1998 की बात है। हिमाचल प्रदेश में 65 सीटों के लिए विधानसभा चुनाव हुए। भाजपा, कांग्रेस के साथ हिमाचल विकास कांग्रेस भी मैदान में थी। कांग्रेस से बाहर निकाले गए पंडित सुखराम ने हिमाचल विकास कांग्रेस का गठन किया था। इसी हिमाचल विकास कांग्रेस ने हिमाचल की राजनीति को नया मोड़ देने के साथ-साथ कांग्रेस को भी सत्ता से दूर कर दिया।

इन चुनावों में भाजपा ने 29 और कांग्रेस ने 31 सीटों पर जीत हासिल की। 4 सीटों पर हिमाचल विकास कांग्रेस ने जीत हासिल की और 1 सीट पर निर्दलीय का दबदबा रहा। ये निर्दलीय थे रमेश धवाला। वही रमेश धवाला जो जीवन भर भाजपा के कार्यकर्ता रहे। जब ज्वालामुखी सीट से टिकट मांगा और पार्टी ने नहीं दिया तो निर्दलीय लड़ गए। 3 जनजातीय सीटों लाहौल-स्पीति, भरमौर और किन्नौर में चुनाव नहीं हुए थे। चुनाव नतीजे आने से पहले ही परागपुर से भाजपा के वीरेंद्र कुमार का निधन हो जाने से भाजपा के पास 28 विधायक ही बचे।

सरकार बनाने के लिए 33 विधायक चाहिए थे। कांग्रेस ने धवाला को अपने साथ लेकर 5 मार्च, 1998 को सरकार बनाने का दावा पेश किया। लेकिन धवाला ने पाला बदल दिया और भाजपा का दामन थाम लिया।

धवाला के पाला बदलते ही भाजपा ने हिमाचल विकास कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाने का दावा पेश किया। धवाला को मिलाकर भाजपा-हिविकां गठबंधन के 33 विधायक हो गए। वीरभद्र सिंह सदन पहुंचे, लेकिन बहुमत साबित नहीं कर पाए। नाटकीय घटनाक्रम में बहुमत साबित करने से पहले ही इस्तीफा दे दिया।

24 मार्च, 1998 को भाजपा की सरकार बन गई। प्रेम कुमार धूमल सीएम बने। ठाकुर गुलाब सिंह को विधानसभा अध्यक्ष बनाया गया। 1998 में गुलाब सिंह ने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा था। लेकिन विधानसभा अध्यक्ष के लिए ऐसा कोई नियम नहीं था कि अध्यक्ष सत्तारूढ़ पार्टी से ही होना चाहिए। इसलिए ठाकुर गुलाब सिंह को विधानसभा अध्यक्ष बना दिया गया। अगले चुनावों में ठाकुर गुलाब सिंह ने भी भाजपा का दामन थाम लिया और भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़े। इस तरह 1998 में वीरभद्र सिंह कुछ दिन के लिए मुख्यमंत्री बने थे।

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वीरभद्र सिंह: राजनीति के ‘वीर’ और जनता के ‘भद्र’ ऐसे बने हिमाचल के ‘सिंह’

इन हिमाचल डेस्क।। वीरभद्र सिंह- एक विवादित मगर निर्विवादित रूप से बेहद लोकप्रिय शख्सियत। हिमाचल प्रदेश में कई बड़े नेता हुए, उन्हें जनसमर्थन भी भरपूर मिला लेकिन उसकी तुलना वीरभद्र को मिले अथाह समर्थन और स्नेह से नहीं की जा सकती। अपने राजनीतिक करियर में वीरभद्र सिंह पर कई आरोप लगे, उनकी नीतियों और बातों के लिए उनकी आलोचना भी हुई मगर उन्हें किसी बात की परवाह किए बगैर वही किया, जो उनका दिल चाहा। वीरभद्र साढ़े तीन दशकों तक हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस का पर्याय रहे।

राजनीतिक सफलता और लोकप्रियता दोनों के शीर्ष पर वीरभद्र को जिस बात ने पहुंचाया, वो था चतुराई और भावुकता का मिश्रण। कूटनीतिक ढंग से राजनीतिक फैसले लेने की चतुराई के साथ-साथ वह आम जनता से भावनात्मक जुड़ाव भी रखते थे। जब वह सीएम नहीं भी होते, तब कोई बुजुर्ग अगर या जरूरतमंद दूरदराज के इलाके से शिमला में उनके आवास या कार्यालय पहुंचता और उनकी नजर उस पर पड़ती तो उसकी समस्या सुलझाने की कोशिश तो वह करते ही, उसके खाने-पीने और उसके आने-जाने के किराये का भी इंतजाम करवा देते।

वीरभद्र सिंह

वीरभद्र ने जिसे राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी माना या जो उनके हिसाब से नहीं चला, अपनी राजनीतिक कौशल से उन्होंने उस राजनेता को उभरने नहीं दिया। वहीं अपने वफादार नेताओं और समर्थकों के प्रति उन्होंने भी वफादारी निभाई और जिस तरीके से संभव हो सका, उन्हें आगे बढ़ाया। इन दोनों की बातों के प्रदेश में कई उदाहरण मिल जाएंगे।

दूसरी पार्टियों के लोग भी इस बात के उदाहरण देते हैं कि राजनेताओं को वीरभद्र सिंह से सीखना चाहिए कि कैसे अपने कार्यकर्ताओं को ख्याल रखना है। हालांकि क्षेत्रवाद के अलावा वीरभद्र पर अपनों को अडजस्ट करने के लिए चिट पर भर्तियां करने और बैकडोर भर्तियों की परंपरा शुरू करने जैसे आरोप भी लगते हैं, मगर कानूनी रूप से ये आरोप कभी साबित नहीं हो पाए।

इसी तरह जीवन के आखिरी दौर में उनपर आय से अधिक संपत्ति के जो मामले चले, वे भी उनके रहते साबित नहीं हो पाए। वीरभद्र पूरे आत्मविश्वास से कहते थे कि ये राजनीतिक दुर्भावना से बनाए मामले हैं और मैं अदालत से बेदाग होकर निकलूंगा। मगर ये मामले अदालत में लंबित रह गए।

बुजुर्ग हो जाने के बावजूद वह जितना सक्रिय रह सकते थे, राजनीति में उतने ही सक्रिय रहे। पिछले दिनों देखने में आया कि वह बार-बार भावुक हो जाते थे। कुछ कहते हुए अक्सर गला रुंध जाया करता। किसी पुराने परिचित से मिलते को पुरानी बातों को याद करके उनकी आंखों में आंसू आ जाते। कभी पत्रकारों के तीखे सवालों पर नाराज हो जाते, कभी समर्थकों की हंगामे पर गुस्सा हो जाते और उन्हें डांटते भी लेकिन लोग उनका बुरा नहीं मानते।

कई बार वे सार्वजनिक ऐसी बातें भी कह जाते जो उनके कद और पद के हिसाब से कहना उचित नहीं होतीं। ऐसे ही कई बयान उनके अंतिम मुख्यमंत्री कार्यकाल में विवादों का कारण बने। लेकिन उन्होंने कभी भी अचानक निकल गए ऐसे शब्दों यानी स्लिप ऑफ टंग को सही ठहराने की कोशिश नहीं की। कई बार उन्होंने ऐसी बातों पर खेद प्रकट किया। यह बात बाकी राजनेताओं को भी सीखनी चाहिए गलत बात को स्वीकार करने और उसमें सुधार करने में किसी तरह की शर्म या झिझक नहीं होनी चाहिए।

6 facts about Virbhadra Singh that you must know

देश में ऐसा कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलता जब कोई नेता इतने लंबे समय तक राजनीतिक बुलंदियों पर रहा हो। उनके समर्थकों को भले इस बात का मलाल रहा हो कि वीरभद्र लगातार अपनी सरकार रिपीट नहीं करवा पाए। मगर वीरभद्र को इस बात का कभी अफसोस नहीं रहा। वह कहते कि राजनीति रिकॉर्ड बनाने का विषय नहीं है। मगर वीरभद्र ने अपनी राजनीतिक कार्यकाल में जो रिकॉर्ड बनाए हैं, वे तो शायद अब टूटने से रहे।

राजनीति में आने और सीएम बन जाने में उन्हें भूतपूर्व राज परिवार का सदस्य होने के कारण लाभ तो मिला था मगर इतने लंबे समय तक हिमाचल का मुख्यमंत्री रहना, लगातार बिना हारे कई चुनाव जीतना, अपने दम पर सरकार बना लेना… ये सब बिना योग्यता और कौशल के संभव नहीं। शायद इसीलिए उनके समर्थक उन्हें युगपुरुष कहते हैं। वीरभद्र को जब कभी याद किया जाएगा तो स्वाभाविक है कि उनकी और उनके कार्यकाल की अच्छाइयों-बुराइयों का भी जिक्र होगा। मगर हिमाचल के इतिहास में सबसे लंबा और रोचक अध्याय उन्हीं के नाम का रहने वाला है।

पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह का 87 साल की उम्र में निधन

पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह का 87 साल की उम्र में निधन

शिमला।। हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह का निधन हो गया है। वह 87 साल के थे। सोमवार को तबीयत बिगड़ने के बाद डॉक्टरों ने उन्हें वेंटिलेटर पर रखा था। गुरुवार सुबह पौने चार बजे उन्होंने आखिरी सांस ली।

इससे पहले अप्रैल में कोरोना से संक्रमित होने के बाद वह मोहाली के एक निजी अस्पताल से स्वास्थ्य लाभ करके लौटे थे मगर हिमाचल पहुंचते ही उनकी तबीयत बिगड़ गई थी। वह तभी से शिमला के आईजीएमसी में भर्ती थे। यहां पर वह दोबारा कोरोना संक्रमित पाए गए थे।

उनकी पार्थिव देह को शिमला में उनके निवास होली लॉज लाया गया है। इसके बाद शुक्रवार सुबह कांग्रेस कार्यालय ले जाया जाएगा ताकि कार्यकर्ता और आम लोग उनके अंतिम दर्शन कर सकें। इसके बाद पैतृक स्थान रामपुर ले जा जाएगा। वहीं पर अंतिम संस्कार किया जाएगा।

वह वर्तमान में अर्की से विधायक थे। वीरभद्र का जन्म 23 जून 1934 को मौजूदा शिमला जिले के सराहन में हुआ था। 6 बार प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके वीरभद्र यहां पर सबसे ज्यादा वक्त तक इस पद पर बने रहने वाले शख्स थे।

प्रदेश के सबसे लोकप्रिय नेताओं में गिने जाने वाले वीरभद्र सिंह उम्र के आखिरी पड़ाव में आय से अधिक संपत्ति मामले में भी घिरे। वह छह बार मुख्यमंत्री रहे। 5 बार वह लोकसभा के लिए भी चुने जा चुके थे और केंद्र में अहम मंत्रालय संभाल चुके थे।

वीरभद्र सिंह के निधन पर राज्य सरकार ने 3 दिन के राजकीय शोक की घोषणा की है। यह शोक 8 से 10 जुलाई तक रहेगा और इस दौरान कोई सरकारी मनोरंजन कार्यक्रम नहीं होगा। राज्य सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग की तरफ से यह अधिसूचना जारी कर दी गई है।

वीरभद्र सिंह एक ऐसा नाम है जिसे किसी परिचय की जरूरत नहीं है। वीरभद्र सिंह नौ बार विधायक, छ: बार मुख्यमंत्री, पांच बार लोकसभा में बतौर सांसद व एक बार केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं। वीरभद्र सिंह को राजनीति का एक युग कहा जाता है।

जन्म

स्वर्गीय वीरभद्र सिंह का जन्म 23 जून, 1934 को शिमला जिला के रामपुर (तत्कालीन बुशहर रियासत) के सराहन में राज परिवार में हुआ था। वीरभद्र सिंह बुशहर रियासत के अंतिम राजा थे। यही कारण है कि वीरभद्र सिंह को राजा साहब के नाम से भी जाना जाता था। उनके पिता का नाम राजा पदम सिंह और माता का नाम शांति देवी था।

शिक्षा

वीरभद्र सिंह ने अपनी स्कूली शिक्षा शिमला और देहरादून से प्राप्त की। उसके बाद स्नातक की पढ़ाई के वह दिल्ली चले गए थे। दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज से उन्होंने स्नातक की डिग्री हासिल की थी।

राजनीतिक जीवन

1962 में वीरभद्र सिंह के राजनीतिक जीवन की शुरुआत हुई। राज परिवार से ताल्लुक रखने वाले वीरभद्र सिंह 30 जनवरी, 1962 को कांग्रेस का दामन थामा। उन्होंने दिल्ली में कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की थी। हालांकि इससे दो दिन पहले ही कांग्रेस उन्हें महासू से अपना संसदीय उम्मीदवार घोषित कर चुकी थी।

1962 में वीरभद्र सिंह ने जीत हासिल की और महासू से लोकसभा सदस्य चुने गए। इसके बाद 1967 में एक बार फिर महासू से लोकसभा सदस्य निर्वाचित हुए। इसके 1972 में वह मंडी लोकसभा सीट से चुनाव लड़े और जीते। 1976 में उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया गया और वह पर्यटन एवं नागरिक उड्डयन राज्यमंत्री बने।

1977 में भी वीरभद्र सिंह ने मंडी से चुनाव लड़ा मगर यह चुनाव वो हार गए। वीरभद्र सिंह अपने पूरे राजनीतिक जीवन मे केवल मात्र यही एक चुनाव हारे थे। इसके बाद 1980 में फिर वीरभद्र सिंह मंडी से लोकसभा सदस्य चुने गए। 1982 में वह केंद्र में उद्योग राज्य मंत्री बने। फिर 1983 में रामलाल के स्थान पर वीरभद्र सिंह हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री बने।

1985 में उन्होंने रोहड़ू विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा। वह निर्वाचित हुए और दूसरी बार हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। 1990 में फिर रोहड़ू से विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए। 1993 में फिर रोहड़ू से विधानसभा के लिए चुने गए और तीसरी बार हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। 1998 में रोहड़ू से विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए। चौथी बार हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री तो बने, पर बहुमत साबित करने में नाकाम रहे।

फिर 2003 में रोहड़ू से विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए और पांचवीं बार हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। 2007 में रोहड़ू से विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए।

2009 में एक बार उन्होंने मंडी से लोकसभा चुनाव लड़ा। वह चुनाव जीते और केंद्र में इस्पात मंत्री बने। 2011 में उन्हें केंद्र में लघु, छोटे एवं मझोले उद्योग मामलों का मंत्री बनाया गया। 2012 उन्होंने केंद्रीय मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। इस्तीफा देने के बाद उन्होंने नवनिर्मित शिमला (ग्रामीण) विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और जीता। वह छठी बार हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री बने।

वर्ष 2017 में उन्होंने सोलन जिले के अर्की से चुनाव लड़ने की ठानी और चुनाव जीता भी। अपने अंतिम समय तक वीरभद्र सिंह अर्की विधानसभा क्षेत्र के विधायक रहे।

अपने पूरे राजनीतिक जीवन में वीरभद्र सिंह नौ बार विधायक, छ: बार मुख्यमंत्री और पांच बार लोकसभा में बतौर सांसद रहे। वहीं केंद्र में मंत्री पद की ज़िम्मेदारी भी उन्होंने संभाली। इसके अलावा वह कांग्रेस में भी संगठन के अहम पदों पर रहे। वीरभद्र सिंह अपने पूरे जीवन में केवल मात्र एक चुनाव हारे। यही कारण है कि उन्हें राजनीति का एक युग भी कहा जाता है।

विवाद

वीरभद्र सिंह हिमाचल प्रदेश के लोकप्रिय मुख्यमंत्रियों में से एक रहे। उम्र के आखिरी पड़ाव में वीरभद्र सिंह आय से अधिक संपत्ति मामले में गिरे। शिमला के कोटखाई में बहुचर्चित गुड़िया रेप एंड मर्डर केस में भी वीरभद्र सिंह का बयान विवादों में रहा था। उस समय वीरभद्र सिंह हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री थे।

अनुराग ठाकुर की उपलब्धि पर पूरे परिवार को गर्व है: प्रेम कुमार धूमल

हमीरपुर।। पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल ने बेटे अनुराग ठाकुर के कैबिनेट मंत्री बनने पर खुशी जताई है। उन्होंने कहा कि ‘अनुराग ठाकुर के केंद्रीय मंत्री के तौर पर प्रमोशन पर पूरा परिवार गौरवान्वित महसूस कर रहा है।’

पूर्व सीएम ने कहा कि एक पिता के लिए इससे बड़ा गौरव का पल नहीं हो सकता कि उसका बेटा केंद्र सरकार में कैबिनेट मंत्री पद की शपथ ग्रहण करे। धूमल ने कहा कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय नेतृत्व, राष्ट्रीय अध्यक्ष, गृह मंत्री सभी का आभार प्रकट करते हैं, जिन्होंने अनुराग ठाकुर के कार्यों को अच्छा पाया।

उन्होंने कहा, “भविष्य के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी टीम तैयार कर रहे हैं, जो आने वाले वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों में सफलता दिलाएगी और भारत को विश्व गुरु बनाने में मदद करेगी।”

अनुराग ठाकुर को बतौर कैबिनेट मंत्री मिले दो अहम मंत्रालय