मंडी।। हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के करसोग में केरी कतांडा बीट के फॉरेस्ट गार्ड की संदिग्ध हालात में मौत के मामले में सीबीआई अब तक हरकत में नहीं आई है। हाई कोर्ट ने 13 सितंबर को मामला हिमाचल पुलिस से लेकर सीबीआई को जांच के लिए ट्रांसफर किया था, मगर अब तक केस दर्ज नहीं हुआ है। सीबीआई ने स्टेट सीआईडी से अब तक रिकॉर्ड कब्जे में नहीं लिया है।
लापता हुए होशियार सिंह का शव रहस्यम हालात में पेड़ पर उल्टा टंगा मिला था। पुलिस ने पहले हत्या का मामला दर्ज किया मगर फिर आत्महत्या में बदल दिया। लोगों ने प्रदर्शन किए और सीबीआई जांच की मांग की मगर हिमाचल प्रदेश सरकार ने पुलिस से ही जांच करवाने का फैसला किया। आखिर में हाई कोर्ट ने मामले का संज्ञान लिया और उसे पुलिस की कार्रवाई संतोषजनक नहीं लगी, तब जाकर मामला सीबीआई को ट्रांसफर किया गया।
होशियार सिंह का शव पेड़ पर उल्टा टंगा मिला था.
मगर सीबीआई की ढील इसलिए भी सवालों के घेरे में है क्योंकि शिमला के गुड़िया केस की जांच कर रही सीबीआई टीम का कहना है कि पुलिस जांच में सहयोग नहीं कर रही। उसे सबूत भी ढंग से नहीं मिले। और तो और, हिमाचल पुलिस के ही अधिकारी जेल में बंद हैं, क्योंकि सीबीआई की नजर में वे एक संदिग्ध आरोपी की हिरासत में मौत के लिए जिम्मेदार हैं।
ऐसे में जब पुलिस की छवि भरोसे की नहीं है, उसे लेकर पहले से ही आशंका जताई जा रही है, वैसे में इस केस में सीबीआई को सबूत नष्ट होने की चिंता क्यों नहीं सता रही? ऐसे में बाद में कहीं यह केस गुड़िया केस की तरह न लटक जाए।
एमबीएम न्यूज नेटवर्क, नाहन।। हिमाचल प्रदेश के नाहन की प्रतिष्ठा कुंवर जब पांच साल की थीं, तब उन्होंने पहला स्केच बनाया था। मगर उसके बाद स्केचिंग को उन्होंने अपना पैशन बना लिया। 14 साल की प्रतिष्ठा आज सिर्फ पेंसिल इस्तेमाल करके ऐसे कृतियां तैयार करती हैं कि देखने वाले हैरान रह जाएं।
प्रतिष्ठा के पिता कुंवर निर्भय सिंह और दादा कुंवर सत्यदेव सिंह भी इस कला में महारत रखते हैं। कहा जा सकता है कि यह हुनर उन्हें विरासत में मिला है, लेकिन प्रतिष्ठा ने तो सबको पीछे छोड़ने की ठानी हुई है।
पिता पंचकूला में सैटल हैं, लिहाजा वहीं दसवीं कक्षा की पढ़ाई कर रही है। प्रतिष्ठा कुंवर ने बताया कि उन्होंने दो बार स्केच प्रदर्शित भी किए हैं।
प्रतिष्ठा के बनाए स्केच (Courtesy: MBM News Network)
उन्होंने कहा कि स्कैच बनाना पूरी तरह से मूड पर निर्भर करता है। ऐसा नहीं है कि रोज स्केचिंग करती हैं। प्रतिष्ठा बताती हैं कि उन्हें पूरे परिवार से सहयोग मिलता है।
(यह एमबीएम न्यूज नेटवर्क की खबर है और सिंडिकेशन के तहत प्रकाशित की गई है)
इन हिमाचल डेस्क।। इन दिनों वॉट्सऐप पर हिमाचल प्रदेश के एक बच्चे का वीडियो शेयर किया जा रहा है, जिसमें वह गलत पहाड़े (TABLE) पढ़ रहा है। उसे न तो 2 का टेबल आता है और न ही 10 का। हिमाचल के ही किसी शख्स ने इस वीडियो को बनाया है, जिसमे बच्चा बोल रहा है कि वह 10वीं तक पढ़ा है। व्यंग्य करते हुए आखिर में वीडियो वाला कहता है कि आपको तो टेस्ट के लिए अप्लाई करना चाहिए था, सरकारी नौकरी लग जाती।
हो सकता है कि आपके पास भी यह वीडियो आया हो और आप हंसे भी हों और इसे आगे बढ़ा दिया हो। मगर यह वीडियो हंसने और मज़ाक उड़ाने के लिए आगे बढ़ा देने की चीज़ नहीं है। यह वीडियो सोचने के लिए मजबूर करने वाला है। इस वीडियो में बच्चे की स्थिति जहां हमारी शिक्षा व्यवस्था पर सवालिया निशान लगाती है, इसे शेयर करके सिर्फ मजे लेना हमारे समाज की संवेदनहीनता को भी दिखाती है।
वीडियो में बच्चा खुद को मंडी के एक सरकारी स्कूल से दसवीं तक पढ़ा हुआ बताता है। हमने बच्चे का चेहरा और उसके स्कूल का नाम छिपा दिया है ताकि उसकी पहचान जाहिर न हो। ऐसा करना इसलिए जरूरी है क्योंकि बच्चे की इसमें कोई गलती नहीं है और इस तरह से सोशल मीडिया पर शर्मिंदा करना उसे डिप्रेशन में डाल सकता है। साथ ही एक बच्चे की वजह से स्कूल पर ही सवाल उठा देना ठीक नहीं। पहले आप वीडियो देखें:
बच्चा अगर बुनियादी सी चीज़ नहीं जानता कि 6×10=60 होते हैं न कि 40 तो यह चिंता की बात है। अगर वह 10वीं तक पहुंच गया इस बात को जानते हुए भी तो यह पूरे एजुकेशन सिस्टम पर ही सवाल खड़े कर देता है। और चिंता वाजिब है कि अध्यापक कैसे रहे होंगे कि जो इस बच्चे पर ध्यान नहीं दे सके। मगर पहली बात तो यह कि इस वीडियो को किसने कहां पर बनाया है और बच्चा क्या करता है, इसके बारे में स्थिति स्पष्ट नहीं है। वैसे भी बच्चों को शुरू में पहाड़े रटाए जाते हैं तो उसके बजाय समझाया जाना चाहिए कि पहाड़े होते क्या है। अगर बच्चे को पता होता कि 10 का पहाड़ा यानी 10 x 6 है तो वह 60 ही कहता, न कि 40. वह उटपटांग इसलिए बोल रहा है क्योंकि उसने चीजें रटी हैं और रटने में चीजें आगे पीछे हो जाती हैं।
दूसरी बात यह है कि बच्चा तो बच्चा है, उसका क्या कसूर। सभी के समझने का स्तर अपना होता है। कोई जल्दी समझता है तो देर से। सभी का मानसिक स्तर एक सा नहीं होता। हमारे यहां पर मानसिक स्वास्थ्य को लेकर पहले ही बहुत अज्ञानता है। हो सकता है बच्चा डिफ्रेंटली एबल्ड हो, उसकी समझ का विकास न हो पाया हो। ऐसे में बिना उसकी बैकग्राउंड जाने उसकी खिल्ली उड़ाना सही नहीं है।
बच्चा भोला भी है क्योंकि उसे नहीं पता कि वह सही बोल रहा या गलत, बस वह बोलता जा रहा है। जब उसपर व्यंग्य किया जाता है कि तुम्हें तो सरकारी नौकरी में होना चाहिए तो उसे वह समझ नहीं पाता और यस सर बोलता है मुस्कुराते हुए। इसलिए ‘In Himachal’ की गुजारिश है कि जब कहीं कुछ ऐसा देखें तो सिर्फ वीडियो बनाने के लिए वीडियो न डालें। क्योंकि इससे हो सकता है कि आपकी मंशा अच्छी हो, मगर लोगों का नुकसान हो सकता है।
सोचिए, क्या हो जब इस बच्चे को पता चले कि उसकी खिल्ली उड़ाई जा रही है। बेचारा परेशान होकर तनाव में आ जाएगा। ऐसी कई घटनाएं घट चुकी हैं जब सोशल मीडिया पर शेमिंग के चलते बच्चों ने ग़लत कदम तक उठा लिए हैं। इसलिए थोड़ी जिम्मेदारी बरतें। बच्चों के मामले में ही नहीं, बड़ों के मामले में भी।
बिलासपुर।। यह सवाल चर्चा का विषय बना हुआ है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सभा खत्म होने के बाद वह कुर्सी कहां चली जाती है, जिसपर पर मंच पर बैठे होते हैं। बिलासपुर की आभार रैली के बाद बिलासपुर की आभार रैली के बाद मंच से कुर्सी गायब हो गई।
माना जा रहा है कि उनका समर्थक इसे रैली की याद के तौर पर उठा ले गया। दरअसल प्रधानमंत्री जैसे ही मंच से उतरे, वहां से कड़ी सुरक्षा हट गई। वहां मौजूद लोगों का ध्यान इस पर रहा कि कैसे लोगों को पंडाल से निकाला जाए। माना जा रहा है कि इसी बीच किसी ने वह कुर्सी उठा ली।
इससे पहले शिमला में जब परिवर्तन रैली हुई थी, वहां से भी कुर्सी गायब हो गई थी। अब कुर्सी तो कुर्सी है, इसके गायब होने पर चिंता क्यों? मगर शिमला में कुर्सी गायब हुई थी तो शिकायत मिलने पर पुलिस ने मामले की जांच शुरू की थी और खबरों के मुताबिक उस वक्त डीएसपी सिटी को मामले की जांच का दायित्व सौंपा गया था। अब तक कुर्सी का पता नहीं चल पाया है।
मंडी।। कुछ महीने पहले करसोग के जंगल में मृत पाए गए वनरक्षक होशियार सिंह का मामला सुलझा भी नहीं है कि एक और गार्ड के रहस्यमय ढंग से गायब होने का मामला सामने आया है। मंडी के बड़ा देव कमरूनाग में जातर में शामिल होने गए बल्ह के टोला गांव के रहने वाले वनरक्षक मोहन लाल 29 सितंबर से लापता हैं। इससे पूरे इलाके में चर्चा और आशंकाओं का माहौल बना हुआ है।
सोमवार को पुलिस के साथ एसडीआरएफ, वन विभाग, प्रशानिक अधिकारी और देवता कमेटी समेत कई लोगों ने कमरूघाटी में मोहन लाल को ढूंढने की कोशिश की, मगर कामयाबी नहीं मिली। बताया जा रहा है कि मोहन लाल के मोबाइल की आखिरी लोकेशन घीडी टावर से मिली थी। इसके बाद से उनका फोन स्विच ऑफ है। लोकेशन के आधार पर उनका पता लगाने की कोशिश की जा रही है। यह भी पता लगाया जा रहा है कि आखिरी बार उनकी बात किससे हुई।
परिजनों का परेशान होना इसलिए भी लाजिमी है, क्योंकि वनरक्षक होशियार पहले अचानक लापता हो गया था और उसके कुछ दिनों बाद उसका शव पेड़ से उल्टा लटका मिला था। पहले हत्या और फिर आत्महत्या का केस दर्द करने को लेकर पुलिस की आलोचना हुई थी। प्रदेश सरकार ने कई जांच टीमें बदली थीं, जिससे लोगों मे गुस्सा था। सरकार इस मामले में सीबीआई जांच करवाने को तैयार नहीं थी, मगर हाई कोर्ट ने इसका आदेश दिया है। अभी तक होशियार सिंह की मौत एक पहेली बनी हुई है।
इन हिमाचल डेस्क।। भले ही सेना शिमला के अनाडेल मैदान को अभी सक्रिय रूप से ट्रेनिंग, खेल व अन्य गतिविधियों के लिए ही करती है, मगर जानकार बताते हैं कि किसी आपात स्थिति में (युद्ध या फिर भयंकर प्राकृतिक आपदा) में सेना को यहां बेस कैंप बनाकर गतिविधियां संचालित करने में सुविधा होगी। मगर 2012 में तो तत्कालीन सरकार के मुखिया प्रेम कुमार धूमल कहते थे कि सेना को दी गई लीज़ खत्म हो चुकी है, ऐसे में सेना इसपर अवैध कब्जा करके बैठी हुई है। वह मांग कर रहे थे कि सेना तुरंत इस कब्जे को छोड़े और मैदान को प्रदेश सरकार के हवाले करे। उसी समय मुख्यमंत्री के बेटे अनुराग ठाकुर चाहते थे कि यहां पर क्रिकेट का मैदान बनाया जाए। अनुराग और उनके पिता मिलकर बयानबाजी कर रहे थे और यह मामला अखबारों की सुर्खियों में बना रहा था।
स्टेडियम बनाने की चाहत जब प्रेम कुमार धूमल 1998 से 2003 तक मुख्यमंत्री रहे थे, उसी दौरान अनुराग ठाकुर हिमाचल प्रदेश क्रिकेट असोसिएशन के प्रेजिडेंट चुने गए थे और उसी दौरान उनके पहले प्रॉजेक्ट ‘धर्मशाला क्रिकेट स्टेडियम’ का निर्माण शुरू हुआ था। विजिलेंस ने अपनी चार्जशीट में धूमल पर अपने बेटे की खेल संस्था को फायदा पहुंचाने के लिए मुख्यमंत्री रहते हुए कई तरह की अनियमितताओं का आरोप लगाया था। इसके बारे में आप विस्तार से यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं।
2003 के बाद फिर से कांग्रेस की सरकार आई और फिर उसके पांच साल बाद फिर से बीजेपी को मौका मिला और प्रेम कुमार धूमल फिर मुख्यमंत्री बने। मिशन धर्मशाला सक्सेसफुल हो चुका था। अनुराग ठाकुर धर्मशाला में स्टेडियम बना चुके थे और उसकी चारों तरफ चर्चा हो रही थी। उन दिनों युवा वर्ग भी काफी अभिभूत नजर आ रहा था और अनुराग उनकी नजरों में स्टार थे। संभवत: अनुराग शिमला में भी स्टेडियम बनाकर इसे अपनी उपलब्धियों में शुमार करना चाहते थे। क्योंकि अनाडेल मैदान बहुत खूसबूरत है और दूर से नजर आता है।
तो जब धूमल मुख्यमंत्री बने ही थे, उन्होंने इस मैदान को सेना से प्रदेश सरकार के लिए कोशिश शुरू कर दी थी। उनका मई 2008 का एक बयान अभी तक मीडिया में है, जिसमें उन्होंने अनाडेल ग्राउंड का जिक्र करते हुए कहा था कि सरकार अनाडेल ग्राउंड को वापस लेने के लिए रक्षा मंत्रालय से मुद्दा उठाएगी, क्योंकि रक्षा मंत्रालय को पट्टे पर यह जमीन दी थी जिसकी अवधि 28 साल पहले खत्म हो चुकी है।
जब सेना के खिलाफ किया गया था प्रदर्शन 2008 से कोशिशें जारी रही, सेना अपना पक्ष रखती रही कि हमारे लिए यह मैदान महत्वपूर्ण है, सामरिक दृष्टि से भी। मगर प्रदेश सरकार, इसके मुखिया प्रेम कुमार धूमल और उनके बेटे तत्कालीन सांसद और एचपीसीए के प्रमुख अनुराग ठाकुर ने कोशिशें जारी रखीं। जब केंद्र सरकार के रक्षा मंत्रालय से कोई सहयोग नहीं मिला तो सेना के खिलाफ बयानबाजी से बढ़कर सेना के खिलाफ प्रदर्शन किए गए और सेना पर हथकंडे अपनाने का आरोप लगाया गया।
कई खेल संगठनों के बैनर तले शिमला में रैलियां निकाली गईं और अनाडेल में प्रदर्शन तक किया गया- जिनके आगे लिखा गया था- फ्री अनाडेल। यह नारा कश्मीर में होने वाले उन प्रदर्शनों जैसा था, जिनमें भारत को कब्जाधारी बताते हुए सेना के ठिकानों के बाहर प्रदर्शन करते वक्त बैनरों में लिखा होता है- फ्री कश्मीर।
फ़्री अनाडेल के प्लैकार्ड के साथ सेना से ग्राउंड छुड़ाने के ‘अभियान’ की एक तस्वीर (Daily Mail)
‘अनुराग का नारा, अनाडेल हमारा’ यह नारा ऐसा लगता है मानो किसी और देश की ताकत ने हमारे संसाधन पर कब्जा कर लिया हो। घटना 7 अप्रैल, 2012 की है। ‘अनाडेल वापस करो’ रैली का आयोजन किया गया था। यह रैली डेढ़ बजे रिज मैदान से लेकर मुख्यमंत्री आवास ओकओवर तक निकाली गई। अनुराग ठाकुर की अध्यक्षता में एक लाख से अधिक हस्ताक्षरित बैनरों को मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल को सौंपा गया। बच्चों ने अनाडेल वापस दो और फ्री अनाडेल जैसे बैनर भी पकड़ हुए थे। वे नारे लगा रहे थे कि उन्हें अनाडेल मैदान वापस चाहिए। एचपीसीए ने बच्चों को इस दौरान टी शर्ट भी दी थी, जिस पर लिखा था कि अनाडेल हमारा है।
अनुराग ने इस मौके पर कहा था– ‘अनाडेल मैदान पर पिछले 50 वर्षों में सेना की कोई भी महत्वपूर्ण गतिविधि नहीं हुई है। इसका प्रयोग केवल अधिकारी गोल्फ खेलने के लिए करते हैं, जिस पर शिमला की जनता और खेल प्रेमियों को आपत्ति है। इशसे बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ हो रहा है। अनाडेल मैदान पर स्पोर्टिंग हब बनने से यहां पर पर्यटन को बढ़ावा देने में भी मदद मिलेगी, जैसे धर्मशाला मे मिली। किसी भी आपातकालीन स्थिति के दौरान हम सेना के साथ होंगे और जरूरत पड़ने पर बॉर्डर की तरफ कूच करने के लिए भी तैयार हैं।’
Image: The Hindu
यह था सेना का पक्ष बेटे अनुराग द्वारा स्टेडियम के निर्माण के मकसद को लेकर निकाली गई इस रैली के कुछ दिन बाद सेना और धूमल के बीच आरोप-प्रत्यारोप शुरू हुए। सेना के प्रवक्ता ने चंडीगढ़ में जारी बयान में मुख्यमंत्री पर वन माफिया को संरक्षण देने का आरोप लगाया और कहा कि मैदान सुरक्षा की दृष्टि से सेना के पास रहना चाहिए क्योंकि क्रिकेट के बजाय देश की सुरक्षा ज्यादा महत्वपूर्ण है। हालांकि सेना ने बाद में इस विवादास्पद बयान से किनारा कर लिया था कि पर्यावरण के बिगड़ने और भू-माफिया के साथ हिमाचल सरकार की साठगांठ होने के आधार पर अनाडेल को क्रिकेट स्टेडियम के लिए नहीं दिया जा रहा। सेना की तरफ से कहा गया कि हिमाचल सरकार के साथ उसके अच्छे संबंध हैं और इस तरह का कोई बयान सेना की ओर से अधिकारिक तौर पर नहीं दिया गया। सेना की तरफ से जारी प्रेस रिलीज पर खूब विवाद हुआ था।
धूमल का सेना पलटवार इस बयान पर तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल ने पलटवार किया और इस बयान के लिए बिना शर्त माफ़ी मांगने को कहा और ऐसा न होने पर मानहानि का दावा करने की बात कही। उन्होने कहा, ‘अनाडेल हिमाचल सरकार की पूंजी है और यह मैदान सेना के अवैध कब्जे में है। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी व रक्षा मंत्री जार्ज फर्नाडीस के साथ सेना के पदाधिकारियों की मौजूदगी में विस्तृत चर्चा हुई थी। निर्णय हुआ था कि सेना को वैकल्पिक भूमि उपलब्ध करवाई जाएगी।’
धूमल ने यह भी कहा था, ‘प्रदेश न्यायालय ने प्रदेश सरकार को यह निर्देश दिए हैं कि शहर के युवाओं में खेल गतिविधियों को प्रोत्साहित करने के लिए उचित स्थान की तलाश की जाए। इसके लिए शिमला के नागरिकों ने फोरम गठित किया है, जिसमें 14 खेल संघ भी शामिल हैं। फोरम ने विस्तृत हस्ताक्षर अभियान चलाया, जिसमें 1.08 लाख लोगों ने हस्ताक्षर किए। इस हस्ताक्षरित ज्ञापन मुख्यमंत्री को प्रस्तुत किया गया। मुख्यमंत्री के व्यक्तिगत पत्र सहित ज्ञापन की प्रतियां प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री को प्रेषित की जा रही हैं, ताकि समुचित कार्रवाई कर मैदान को सेना के कब्जे से मुक्त करवाया जाए।’
वरिष्ठ नेता थे खामोश ध्यान देने वाली बात यह है कि जिस वक्त अनाडेल मैदान को लेकर यह सब खींचतान चल रही थी, शिमला के विधाय सुरेश भारद्वाज सक्रिय रूप से धूमल और उनके पुत्र अनुराग के साथ थे। उन्होंने इसे शिमला नगर-निगम चुनाव का मुख्य मुद्दा बनाने का भी ऐलान किया था। वीरेंद्र कश्यप ने भी प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी और सेना को नसीहत दी थी। मगर उनके अलावा पार्टी के वरिष्ठ नेता सक्रिय रूप से अपनी ही सरकार के स्टैंड पर साथ नहीं थे। शांता कुमार ने अपनी पार्टी के नेताओं को संयमित होकर बयान देने के लिए कहा था।
उनका कहना था कि राष्ट्रीय सुरक्षा क्रिकेट स्टेडियम से बड़ा विषय है। वहीं नड्डा का कहना था, “राज्य सरकार ने इस मैदान पर किसी खेल गतिविधि अथवा क्रिकेट स्टेडियम के लिए किसी अभियान का कभी भी समर्थन नहीं किया है।” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि मैदान को सेना से हासिल करने के लिए राज्य सरकार कोई समझौता नहीं करेगी। उन्होंने हस्ताक्षर अभियान का पार्टी से कोई संबंध न होने की भी बात कही थी।
सरकार बदली, रुख बदला जब 2012 में हुए चुनाव में बीजेपी सत्ता से बाहर हुई और कांग्रेस की सरकार बनी, उसने कहा कि अनाडेल मैदान सेना के पास ही रहेगा। मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने कई मौकों पर दोहराया कि रणनीतिक दृष्टि, आपदा राहत और प्रबंधन के अभ्यास के लिए अनाडेल मैदान उचित है, ऐसे में इसे सेना के अधीन ही रखा जाना चाहिए। जिस दौरान धूमल सरकार इसे सेना से लेने की कोशिश कर रही थी, उस दौरान भी वह विपक्ष में रहते हुए सरकार के रुख की आलोचना कर रहे थे।
पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धमल (File Picture)
आज जब केंद्र में बीजेपी की सरकार है, अगर इस मैदान को लेने में हिमाचल का हित है तो धूमल और अनुराग अपनी ही सरकार के सामने कम से कम इस मैदान को वापस लेने के लिए बात कर सकते हैं। मगर आज यह मुद्दा कहीं नहीं है। एक वक्त सेना को कब्जाधारी बताकर उसके खिलाफ नारेबाजी करने वाले अनुराग ठाकुर आज खुद सेना में लेफ्टिनेंट हो चुके हैं। शायद उन्हें यह भी समझ आ गया है कि स्टेडियम बनाने का इंप्रेशन ज्यादा दिनों तक नहीं चलता।
क्या है अनाडेल मैदान का मसला? अनाडेल ग्राउंड की 121 बीघा ज़मीन मूल रूप से हिमाचल प्रदेश सरकार की है और उसके आसपास करीब 12 बीघा जमीन पर नगर निगम का मालिकाना हक है। 121 बीघा ज़मीन ब्रिटिश शासन के दौरान सेना को दरअसल ट्रेनिंग आदि के लिए दूसरे विश्व युद्ध के दौरान (1941 में)मिली थी, जिसकी लीज़ करीब 35 साल पहले (1982 में) खत्म हो चुकी है। वहीं निगम की ज़मीन सेना ने 1955 में 20 साल के लिए लीज़ पर ली थी। 1975 में लीज़ खत्म हुई, मगर इसे रिन्यू नहीं करवाया गया। निगम को अभी भी सेना से करीब 819 रुपये लीज मनी मिलते हैं। निगम का कहना है कि 1988 में सेना ने 1975 के बाद से बनी लीज मनी दे दी थी मगर नियमों के मुताबिक आज तक लीज़ रिन्यू नहीं करवाई।
मैदान को लेकर क्या-क्या है विवाद दरअसल कई सरकारों ने बहुत पहले से सेना से इस मैदान को लेने की कोशिश की थी। मसला तब भी उठा था जब नब्बे के दशक की शुरुआत में सेना ने प्रदेश सरकार के हेलिकॉप्टर के यहां उतरने पर आपत्ति जताई थी। धूमल ने पहली बार मुख्यमंत्री बनने पर भी जॉर्ज फर्नांडिज़ (तत्कालीन रक्षा मंत्री) से यह मसला उठाया था मगर नतीजा कुछ नहीं निकला था। मगर 2008 मे जब वह मुख्यमंत्री थे, तब उन्होंने पुत्र के साथ मिलकर जो अभियान चलाया, वह कुछ अलग ही था। केंद्र में यूपीए सरकार थी और उनके बेटे अनुराग यहां क्रिकेट स्टेडियम बनाना चाहते थे। प्रदेश के मुख्यमंत्री का बेटे के लिए इस तरह से व्यक्तिगत रूप से देश की सेना के खिलाफ उतर जाना उस वक्त के प्रबुद्ध लोगों को रास नहीं आया था।
स्टेडियम बन जाता तो क्या होता? सेना की अपनी जरूरत हो सकती है और इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि शिमला और हिमाचल प्रदेश को भी उस मैदान की जरूरत है। शिमला शहर में इतनी खुली जगह कहीं नहीं है, जहां पर बड़े खेलों का आयोजन हो सके। ऐसे में बातचीत से बीच का रास्ता निकालना कठिन नहीं है। जब सेना को जरूरत हो, इसे सेना इस्तेमाल करे और जब प्रदेश सरकार या यहां की खेल संस्थाओं को जरूरत हो, तब खेल संस्थाएं इस्तेमाल करें। मगर इस तरह का समाधान केंद्र और राज्य सरकार के बीच संवाद से ही हो सकता है। संविधान के प्रति निष्ठा लेने की शपथ लेने वाली सरकारें और उनके प्रतिनिधि इस तरह से सेना आदि के खिलाफ नारेबाजी करें, यह ठीक नहीं लगता।
सेना पर आरोप लगाए जा रहे थे कि इस मैदान को सेना कभी-कभार ही इस्तेमाल करती है। मगर शिमला के इस मैदान में क्रिकेट स्टेडियम बन जाता तो क्या हो गया होता? धर्मशाला में स्टेडियम बन गया तो यहां आज तक कितने मैच हो गए? 2003 में यह स्टेडियम खुला था और आज कई साल हो चुके हैं। इतने समय में सभी फॉरमैट्स के अंतरराष्ट्रीय मैचों को मिला दिया जाए प्रति वर्ष बमुश्किल एक मैच की औसत निकलती है। अगर अनाडेल में भी क्रिकेट ग्राउंड होता तो इसके दोगुने मैच तो हो नहीं जाते। फिर बाक़ी दिन यहाँ क्या होता?
सुरेश चंबयाल।। दिल्ली में आलाकमान से बात करके आए मुख्यमंत्री वीरभद्र दिन अपने तेवरों के साथ एक बार फिर संगठन पर भारी पड़े हैं। मुख्यमंत्री ने कह दिया है कि संगठन अब कमरे में रहेगा और फील्ड में मैं। कांग्रेस की बात की जाए तो नेहरू-इंदिरा दौर के बाद राजीव से होते-होते 90 के दशक के दौरान राजेश पायलट और माधव राव सिंधिया जैसे नेताओं ने कांग्रेस में इस बात पर जोर देना शुरू कर दिया था कि कांग्रेस का अध्यक्ष चुनकर आना चाहिए। राजेश पायलट तो इसके मुखर समर्थक हो गए थे। जिस दौर में राजेश पायलट या सींधिया जैसे लोग पार्टी में चुनकर अध्यक्ष बनाए जाने की वकालत कर रहे थे, कहीं से उन्हें समर्थन नहीं मिला। कांग्रेस के ज्यादातर नेता नेहरू-गांधी परिवार के प्रति ही आस्था जता रहे थे। राहुल गांधी जब पैदा हुए थे, तब कांग्रेस समर्थकों ने ऐसे पोस्टर लगा दिए थे कि देश का अगला प्रधानमंत्री पैदा हो गया है।
कांग्रेस पीवी नरसिम्हा राव के समय गांधी परिवार के प्रभाव से बाहर निकल चुकी थी। उस वक्त सीताराम केसरी कांग्रेस अध्यक्ष हुआ करते थे। मगर सत्ता पलटने के बाद सीताराम केसरी को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया और एक बार फिर पार्टी का पूरा कंट्रोल नेहरू गांधी परिवार के हाथ में आ गया और अब तक उन्हीं के हाथ में है। यहां तक कि पार्टी के उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी मनोनीत हैं, न कि इलेक्टेड। तो फिर वीरभद्र ने तो कभी सींधिया या पायलट की तरह आवाज़ नहीं उठाई कि शीर्ष पदाधिकारी भी उनके बेटे की इलेक्टेड होने चाहिए।
क्या वाकई मनोनीत किए जाने के खिलाफ हैं वीरभद्र? हिमाचल के हालिया प्रकरण की बात करें तो वीरभद्र सिंह भी राजेश पायलट सरीखे नेताओं के विचारों से सहमत नजर आते हैं कि कांग्रेस का अध्यक्ष चुनकर आना चाहिए। हर मंच, हर प्लैटफॉर्म पर वो यही बात करते हैं। यह भी उदाहरण देते हैं कि उनके बेटे विक्रमादित्य सिंह भी चुनकर युवा कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष बने हैं। कहते हैं कि खुद भी कांग्रेस में चुनकर आता रहा हूं और किसी को मनोनीत किए जाने के खिलाफ हूं।
विरोधाभासी बातें करते हैं मुख्यमंत्री
वीरभद्र सिंह की यह मनोनयन वाली सवाल काफी विरोधाभासी प्रतीत होती है। क्योंकि शिमला की ही बात करें तो मुख्यमंत्री ने दिल्ली से आते ही शिमला ग्रामीण संगठन जिला, जिसमें कांग्रेस ने शिमला शहरी सीट को छोड़कर बाकी की 7 सीटों को रखा है, वहां के अध्यक्ष रितेश कपरेट को हटाकर यशवंत छाजटा को अध्यक्ष बना दिया है। कपरेट छात्र राजनीति से कांग्रेस में आए हुए हैं और सुक्खू समर्थक माने जाते हैं। सुक्खू ने भी डैमेज कंट्रोल के लिए उन्हें कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया, परन्तु यह बात समझ नहीं आई कि अध्यक्ष और कार्यकारी अध्यक्ष एक साथ हो सकते हैं क्या? और किस लॉजिक पर? साथ ही एक सवाल और है, वीरभद्र सिंह जब नॉमिनेटड अध्यक्ष के समर्थन में नहीं है तो छाजटा को क्यों नॉमिनेट किया गया?
सीएम की कथनी और करनी में अंतर क्यों?
सूत्रों के अनुसार यह कहानी गहरी है। यूथ कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए जब विक्रमादित्य सिंह ने चुनाव लड़ा था, उस समय परिवहन मंत्री जीएस बाली के बेटे रघुबीर बाली, मनमोहन सिंह कटोच और अन्य दावेदारों के बीच रितेश कपरेट ने भी अध्यक्ष पद के लिए दावेदारी दी थी। रितेश कपरेट को आए मतों के अनुसार उन्हें यूथ कांग्रेस संगठन में उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी भी मिली थी। और अब शिमला ग्रामीण के अध्यक्ष के तौर पर कपरेट वीरभद्र की आँखों में सुक्खू समर्थक के तौर पर भी चुभ रहे थे क्योंकि शिमला ग्रामीण से विक्रमादित्य को चुनाव लड़ना है और कपरेट का वहां होना कहीं न कहीं मुख्यमंत्री को खटक रहा था।
कपरेट की जगह जिन यशवंत छाजटा को अध्यक्ष बनाया गया, उनका कांग्रेस संगठन से ज्यादा गहरा नाता नहीं रहा है। छाजटा कॉन्ट्रेक्टर हुआ करते थे और अभी हिमुडा के उपाध्यक्ष हैं। छाजटा की वीरभद्र परिवार से बहुत नजदीकियां हैं। चर्चा है कि पूर्व सांसद प्रतिभा सिंह भी पूरा जोर लगा रहीं हैं कि यशवंत छाजटा को शिमला शहर से कांग्रेस का उमीदवार भी बनाया जाए। सुनने में आया है कि सुक्खू कपरेट को नहीं हटाना चाहते थे, परन्तु उन्हें प्रदेश प्रभारी की बात माननी पड़ी। प्रदेश प्रभारी शिंदे तक भी छाजटा की व्यक्तिगत पहुंच थी क्योंकि छाजटा की धर्मपत्नी नागपुर यानि महाराष्ट्र से ही हैं। इसलिए सुक्खू को भी मन मसोस कर रहना पड़ा और कपरेट को कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में एक पोस्ट हाल फिलहाल पकड़ा दी गई।
क्या होगा यह तो भविष्य के गर्भ में है, मगर फिलहाल यही लग रहा है कि कांग्रेस में मुख्यमंत्री बेशक नॉमिनेटेड बनाम चुनकर आए लोगों में से ‘चुनकर आए’ लोगों को तरजीह देने की बात करें, मगर जहां वह चाहेंगे वहां अपने हिसाब से ही गोटियां सेट करेंगे। शिमला इसका एक उदाहरण है। आगे-आगे कहां क्या होता है, यह देखने वाली बात होगी।
(लेखक हिमाचल प्रदेश से जुड़े विभिन्न मसलों पर लिखते रहते हैं। इन दिनों इन हिमाचल के लिए नियमित लेखन कर रहे हैं।)
इन हिमाचल डेस्क।। चुनाव से पहले हिमाचल प्रदेश की जनता के मूड को भांपने के लिए करवाए गए सर्वे के नतीजों को कंपाइल कर लिया गया है। इसके लिए कोशिश की गई थी कि हर विधानसभा सीट में कम से कम 1000 लोगों से बातचीत करके पूछा जाए कि वे किस पार्टी के उम्मीदवार को वोट देंगे। सिर्फ कुछ जगहों पर लगभग 500 लोगों से बातचीत की गई है और वे सीटें हैं- बैजनाथ, चुराह, करसोग, भरमौर, लाहौल-स्पीति, किन्नौर, शिलाई और रेणुका जी।
सर्वे सिर्फ बीजेपी और कांग्रेस पर आधारित पाठकों से कैजुअल बातचीत की गई ताकि उन्हें कहीं से भी यह न लगे कि उनसे किसी संस्थान द्वारा राजनीतिक राय मांगी जा रही है। अगर उन्हें बताया जाता कि सर्वे किया जा रहा है तो वे शायद कुछ ज्यादा ही सचेत होकर बात करने लगते। इसलिए सामान्य बातचीत के दौरान यह पता लगाया कि वे राजनीतिक पार्टी के सदस्य हैं या नहीं। इसके बाद बातों के दौरान उनसे स्थानीय राजनीति को लेकर उनकी पसंद-नापसंद पता की गई। इसके आधार पर ही नतीजे बनाए गए। जो लोग राजनीति को लेकर उदासीन लगे, उन्हें भी सर्वे के सैंपल में जगह दी गई। हालांकि ऐसे लोगों की संख्या ज्यादा नहीं थी। इसलिए न सिर्फ शहर के भीड़भाड़ भरे इलाकों में बात की गई, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में बात की गई और सभी आयु वर्गों और लिंग आदि की राय शामिल की गई।
प्रतिनिधि चुनने को लेकर है स्पष्टता ध्यान देने वाली बात यह है कि अधिकतर लोग स्पष्ट रूप से बीजेपी और कांग्रेस में से किसी एक के पक्ष में खड़े नजर आए। कुछ सीटों पर लोग इसलिए भी कन्फ्यूज़ लगे क्योंकि उनके नेता को इस बार टिकट मिलने में या तो संशय है या फिर उनकी पसंद का नेता नया है और किसी पार्टी से टिकट चाहता है। मगर ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम थी, इसलिए उनकी राय बीजेपी या कांग्रेस या उनके समर्थकों की तुलना में नगण्य थी। सिर्फ दो सीटें ऐसी नज़र आईं, जहां पर बीजेपी और कांग्रेस से इतर किसी एक नेता के समर्थकों की संख्या काफी ज्यादा थी। इनमें झंडूता और जोगिंदर नगर शामिल हैं। यहां पर निर्दलीय चुनाव प्रचार अभियान में जुटे उम्मीदवार अच्छा-खासा समर्थन जुटा रहे हैं, खासकर झंडूता में। जोगिंदर नगर में ज्यादातर लोग बीजेपी के पक्ष मे हैं, मगर उनकी पसंद टिकटार्थियों में बंटी हुई है। ऐसे में इन दोनो सीटों पर बीजेपी किसे टिकट देती है, इसके ऊपर काफी चीजें निर्भर करेंगी।
इनके अलावा किसी भी सीट पर ऐसा नहीं मिला, जहां जनता कांग्रेस या बीजेपी में से किसी को चुनने के लिए कन्फ्यूज़न में हो और मुकाबला फिफ्टी-फिफ्टी लग रहा हो। या तो जनता स्पष्ट रूप से कांग्रेस पार्टी या उसके संभावित उम्मीदवार के पक्ष में थी या फिर बीजेपी या उसके संभावित उम्मीदवार के समर्थन में थी। कहीं पर ऐसा नहीं मिला कि जितने लोग एक पक्ष में हों और उतने ही दूसरे पक्ष में।
अगर माना जाए कि आज चुनाव होते हैं तो कांग्रेस सत्ता से बाहर होने जा रही है और बीजेपी की सरकार बनने जा रही है। बावजूद इसके कांग्रेस का प्रदर्शन उतना खराब नहीं होने वाला, जितना दावा बीजेपी कर रही है। यानी उसका मिशन 50+ पूरा नहीं होने जा रहा।
पार्टी
इतनी सीटें मिल सकती हैं (कुल 68)
सर्वे में शामिल लोगों का प्रतिशत में मिला समर्थन
बीजेपी
43
49%
कांग्रेस
24
38.5%
अन्य
1
12.5%
कांग्रेस इस बार 24 सीटें जीतने जा रही है और बीजेपी 43 सीटें। सीटवार जानें, सर्वे के आधार पर किस सीट पर जनता किस पार्टी के साथ खड़ी नज़र आ रही है।
विधानसभा सीट- पार्टी
1. चुराह – बीजेपी
2. भरमौर – बीजेपी 3. चंबा – कांग्रेस 4. डलहौजी – कांग्रेस
5. भटियात- बीजेपी
6. नूरपुर- बीजेपी
7. इंदौरा – बीजेपी
8. फतेहपुर- बीजेपी
9. ज्वाली- बीजेपी
10. देहरा- बीजेपी
11. जसवां-परागपुर- बीजेपी
12. ज्वालामुखी- बीजेपी 13. जयसिंहपुर – कांग्रेस
14. सुलह- बीजेपी 15. नगरोटा- कांग्रेस
16. कांगड़ा- बीजेपी 17. शाहपुर- कांग्रेस 18. धर्मशाला- कांग्रेस 19. पालमपुर- कांग्रेस 20. बैजनाथ- कांग्रेस
21. लाहौल-स्पीति- बीजेपी 22. मनाली- कांग्रेस
23. कुल्लू- बीजेपी
24. बंजार- बीजेपी
25. आनी – बीजेपी
26. करसोग- बीजेपी 27. सुंदरनगर-कांग्रेस
28. नाचन- बीजेपी
29. सिराज- बीजेपी
30 द्रंग – बीजेपी
31. जोगिंदर नगर- बीजेपी
32. धर्मपुर – बीजेपी 33. मंडी- कांग्रेस 34. बल्ह -कांग्रेस 35. सरकाघाट- बीजेपी
36. भोरंज- बीजेपी
37. सुजानपुर- बीजेपी
38. हमीरपुर- बीजेपी
39. बड़सर- बीजेपी
40. नादौन- बीजेपी 41. चिंतपूर्णी – कांग्रेस
42. गगरेट – बीजेपी 43. हरोली – कांग्रेस
44. ऊना- बीजेपी
45. कुटलेहड़- बीजेपी 46. झंडूता – निर्दलीय
47. घुमारवीं- बीजेपी
48. बिलासपुर- बीजेपी
49 श्री नैना देवी- बीजेपी
50. अर्की- बीजेपी
51. नालागढ़ – बीजेपी 52. दून – कांग्रेस 53. सोलन- कांग्रेस
54. कसौली- बीजेपी
55. पच्छाद- बीजेपी
56. नाहन- बीजेपी 57. श्री रेणुकाजी – कांग्रेस 58. पावंटा साहिब- कांग्रेस
59. शिलाई- बीजेपी
60. चौपाल- बीजेपी 61. ठियोग- कांग्रेस 62. कुसुम्पटी- कांग्रेस
63. शिमला- बीजेपी 64. शिमला ग्रामीण- कांग्रेस
65. जुब्बल-कोटखाई- बीजेपी 66. रामपुर- कांग्रेस 67. रोहड़ू- कांग्रेस 68. किन्नौर- कांग्रेस
अभी चुनाव में वक्त है और टिकट आदि का आवंटन भी शुरू नहीं हुआ है। जैसे ही सिलसिला शुरू होगा, कई तरह के समीकरण हर सीट पर बदलने को मिलेंगे। साथ ही चुनाव प्रचार अभियान के चरम पर आने के बाद जो माहौल बनेगा, उसपर भी कई चीज़ें निर्भर करेंगी। जैसा कि देखने को मिलता रहा है, उस दौरान लोगों के रुझान में बदलाव आएगा। ऐसे में हम चुनाव से पहले एक बार फिर लोगों की राय लेने की कोशिश करेंगे।
शिमला।। पिछले दिनों कुछ शिक्षकों ने जिला सोलन के दाडलाघाट में आयोजित एक कार्यक्रम में राज्यपाल से शिक्षा का स्तर गिरने की शिकायत करते हुए शिक्षा विभाग की नीतियों पर सवाल उठाए थे। इस मामले पर संज्ञान लेते हुए उच्च शिक्षा निदेशालय ने पांच शिक्षकों को 11 अक्तूबर को शिमला तलब किया है। (कवर इमेज प्रतीकात्मक है)
इन शिक्षकों पर आरोप है कि 13 अगस्त 2016 को दाड़लाघाट में हिमाचल शिक्षक महासंघ की ओर से आयोजित सेमिनार में इन्होंने सरकार और शिक्षा विभाग की नीतियों पर सवाल उठाते हुए प्रदेश में शिक्षा का स्तर ठीक नहीं होने की राज्यपाल से शिकायत की।
साल 2016 में इस मामले को तत्कालीन उच्च शिक्षा निदेशक ने गंभीरता से लेते हुए पांचों शिक्षकों को कारण बताओ नोटिस जारी किए थे। इसके बाद सभी शिक्षकों को चार्जशीट भी कर दिया था। अब करीब एक साल बाद निदेशालय ने दोबारा इस मामले पर जांच शुरू कर दी है।
शिमला।। हिमाचल प्रदेश में जल्द ही विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। किस सीट पर कौन भारी पड़ सकता है और किसी पार्टी के सत्ता में आने की संभावनाए हैं, इसे लेकर In Himachal रविवार को ओपिनियन पोल जारी करने जा रहा है। ‘इन हिमाचल’ ने जनता मे मूड को भांपने के इरादे से प्रदेश की सभी 68 सीटों पर विभिन्न व्यक्तियों से बात की और उनकी पसंद पूछी। ऐसा करते वक्त कुछ बातों का ध्यान रखा गया। पुरुषों, महिलाओं, बुजुर्गों और युवा मतदाताओं से समान रूप से फीडबैक लिया गया है।
‘इन हिमाचल’ ने सभी सीटों पर लगभग 1000 लोगों से बातचीत की है। यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि बैजनाथ, चुराह, करसोग, भरमौर, लाहौल-स्पीति, किन्नौर, शिलाई और रेणुका सीटों का सर्वे करीब 500 लोगों के रुझान पर आधारित है। सर्वे के वक्त इस बात ध्यान रखा गया है कि जिनकी राय ली गई, वे किसी राजनीतिक पार्टी से सक्रिय कार्यकर्ता या पदाधिकारी न हों।
रविवार सुबह 10 बजे In Himachal का ओपिनियन पोल आप हमारी वेबसाइट या फेसबुक पेज के माध्यम से पढ़ पाएंगे।