लेख: भारतीय जनता पार्टी भी कोई दूध की धुली नहीं है

रोहन श्रीधर।। हिमाचल प्रदेश की प्राचीन पहाड़ियों में चुनावी बिगुल बज चुका है। जैसा कि हिमाचल में हर चुनाव में होता रहा है, राज्य में बीजेपी और सत्ताधारी कांग्रेस के बीच सीधी टक्कर है। अगर हिमाचल में वोटिंग के ऐतिहासिक पैटर्न के हिसाब से देखें तो बीजेपी जीत सकती है, क्योंकि हिमाचल में लंबे समय से कोई सरकार लगातार सत्ता में नहीं आई। चुनाव प्रचार पर नजर डालें तो लगता है कि भ्रष्टाचार, विकास, आर्थिक विकास, कानून व्यवस्था और सामाजिक सौहार्द जैसे मुद्दों पर बीजेपी का एकाधिकार है।

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बीजेपी का कांग्रेस और इसके नेताओं पर हमले करना काफी हद तक सही भी लगता है। मगर यह देखना मजेदार है कि भगवा ब्रिगेड अपने आप को आदर्श बता रही है। अगर भगवा नेताओं की कोई आलोचना कर दे तो उसके संगठनों के कार्यकर्ता गाली-गलौच, धमकियों और हिंसा पर उतर आते हैं। और अगर कोई बात उनकी पार्टी को पसंद न आए तो कानूनी कार्रवाई और केंद्रीय एजेंसियों की जांच का हमला होना अपरिहार्य है।

वैसे तो बीजेपी बहुत से मामलों को लेकर विपक्ष पर निशाना साधती है, मगर जिसका जिक्र वह सबसे ज्यादा करती है, वह है- भ्रष्टाचार। हालांकि यह सही है कि यूपीए कार्यकाल में यह अभूतपूर्व स्वरूप में दिखा, मगर कांग्रेस और इसकी सहयोगी पार्टियों पर निशाना साधने वाली बीजेपी खुद इससे अछूती नहीं है। जब से यह पार्टी केंद्र में सत्ता में आई है, लगता है इसके अंडर आने वाली जांच एजेसियां कुछ बातों को लेकर स्मृतिलोप की शिकार हो जाती हैं और इस तरह से व्यापम तो उनकी स्मृति से गायब ही हो गया है। बीजेपी शासित मध्य प्रदेश में ऐडमिशन और भर्ती घोटाले में कथित तौर पर कई वरिष्ठ नेता, सरकारी अधिकारी और कारोबारी शामिल हैं।

यह देश के महत्वाकांक्षी, मेहनती युवा वर्ग के खिलाफ शायद सबसे बड़ा स्कैम है। इस स्कैम से जुड़े 40 से ज्यादा लोग संदिग्ध हालात में मारे गए और आरोपियों में राज्य के मंत्री, आईएएस अधिकारी और पूर्व राज्यपाल तक शामिल हैं। इस मामले में इतनी मौतें और जांच एजेंसियों द्वारा संदिग्धों के खिलाफ कार्रवाई न करना सवालों के घेरे में हैं। इसमें शामिल संदिग्ध, जो बीजेपी या इसके संबंधित संगठनों से संबधित हैं, दिखाते हैं कि भगवा ब्रिगेड किस तरह से संगठित माफिया चला सकती है।

विकास का गड़बड़ियों भरा अफ़साना
हिमाचल में बीजेपी की सरकारों की विकासगाथा का प्रचार करने के लिए पार्टी ने योगी आदित्यनाथ को चुना है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बीजेपी के स्टार कैंपनर हैं। वह जनाब हिमाचल के भोले-भाले लोगों को अपना विकास का विज़न पूरे आत्मविश्वास से सुना रहे हैं। हालांकि 60 दिनों के अंदर ही उनके गृहक्षेत्र गोरखपुर में एक मेडिकल हॉस्पिटल में 290 बच्चों की मौत हो गई। हिमाचलियों को ऐसे शख्स द्वारा विकास का भाषण देना हास्यास्पद है, जो ऐसे राज्य का मुखिया है जो पूरे देश में सबसे पिछड़ा माना जाता है।

क्या वह अपने राज्य की 57.18 प्रतिशत महिला साक्षरता दर का बखान कर रहे हैं जो हिमाचल में 75.9 फीसदी है? या क्या वह अपने राज्य की 36,250 रुपये प्रति व्यक्ति आय की बात कर रहे हैं जो हिमाचल में 1,04,000 से ज्यादा है? उत्तर प्रदेश को तुलना करनी ही है तो सहारा के पिछड़े राज्यों से करे। उल्टा योगी और उनकी पार्टी के शासित राज्यों को मृदुभाषी लोगों के राज्य हिमाचल से कुछ सीखकर जाना चाहिए।

पढ़ें: दिल्ली की तरह हिमाचल में लड़खड़ाती दिख रही है बीजेपी

विमुद्रीकरण देश की आर्थिक और वित्तीय स्वतंत्रता पर हमला था। जीएसटी को जल्दबाजी में लागू करने से देश की आर्थिक तरक्की बाधित हुई है। उत्पादन दर भी प्रभावित हुई है। कुलमिलाकर बात यह है कि बीजेपी न तो भ्रष्टाचार विरोधी है न विकास समर्थक। फिर भी यह कांग्रेस द्वारा दिखाई गई अयोग्यता का ढिंढोरा पीट रही है। अगर कांग्रेस के नेता मतदाताओं, पार्टी और देश के प्रति जरा से भी संवेदनशील होते, तो बीजेपी को इतनी आसानी से हावी होने का मौका नहीं मिलता।

(लेखक मुंबई के एक थिंक टैंक से जुड़े हुए हैं। वह राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक विषयों पर लिखते हैं।)

ये लेखक के निजी विचार हैं

वीरभद्र को सलाखों के पीछे देखना चाहते हैं गुड़िया के पापा

शिमला।। मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने कोटखाई रेप ऐंड मर्डर केस में बयान दिया था कि ऐसी घटनाएं होती रहती हैं। इसके बाद जनता में नाराजगी फैल गई थी और आंदोलन उग्र हो गया था। मगर चुनाव की घड़ी में फिर उन्होंने यही बात दोहराई है और इससे फिर से नाराज़गी देखी जा रही है। गौरतलब है कि पिछली बार दिए गए बयान के बाद गुड़िया के परिवार में भी नाराजगी थी और इसे लेकर फिर से वीरभद्र ने यह बयान दिया है। ‘द क्विंट’ से बातचीत में गुड़िया के नाराज़ पिता ने कहा है कि वह चाहते हैं कि वीरभद्र को सलाखों के पीछे बंद किया जाए।

पहले ‘न्यूज 18 हिमाचल’ का यह वीडियो देखें, जिसमें वीरभद्र पत्रकारों से बात करते हुए गुड़िया प्रकरण पर क्या कह रहे हैं। उन्होंने इसे मामूली मामला बताया और फिर डैमेज कंट्रोल करने के लिए गंभीर मामला बताने लगे मगर वह यह साबित करना चाहते थे कि ऐसी घटनाएं पूरे देश में होती हैं।

यही नहीं, उन्होंने झूठ भी बोला कि मैंने दूसरे दिन ही सीबीआई जांच के लिए चिट्ठी लिख दी थी। मगर वीरभद्र यह नहीं बता रहे कि अगर यह मामूली घटना थी और ऐसी घटनाएं पूरे देश में होती हैं तो आपकी पुलिस के अधिकारी क्यों जेल में हैं और आरोपी बेल पर क्यों हैं। जांच अधिकारी ही आरोपी की हिरासत में मौत को लेकर बंद हों और आरोपियों का अता-पता न हो तो क्या मामले को मामूली कहा जा सकता है?

बहरहाल, ‘द क्विंट’ की रिपोर्ट का नाम है- Remembering the Kothkai Rape Victim Whose Death Shocked India. इसमें मुख्यमंत्री के यह कहने पर कि ‘ऐसी घटनाएं होती रहती हैं’ से नाराज़ गुड़िया के पिता कहते हैं, “वीरभद्र की अपनी बेटी के साथ ऐसा हुआ होता तो? तब भी वह यही कहते? मैं चाहता हूं कि उन्हें लॉक अप में बंद किया जाए।”

(क्विंट में छपा गुड़िया के पापा का बयान) Courtesy: The Quint

‘द क्विंट’ की रिपोर्ट के मुताबिक कोटखाई, जहां यह वारदात हुई, उससे दूर जहां पर गुड़िया के परिजन रहते हैं, वह इलाका ठियोग मे पड़ता है और यही वजह हो सकती है कि वीरभद्र ठियोग से चुनाव के लिए खड़े नहीं हुए।

रिपोर्ट के मुताबिक गुड़िया के पिता आश्वस्त हैं कि कोई भी वीरभद्र को वोट नहीं देगा। पूरी रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

हार का ठीकरा फोड़ने के लिए धूमल को CM का चेहरा बनाया गया: वीरभद्र

चंबा।। मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने आक्रामक अंदाज़ में चुनाव प्रचार अभियान जारी रखा है। बीजेपी के नेताओं और खासकर प्रधानमंत्री मोदी द्वारा की जा रही बयानबाजी पर तो वीरभद्र पलटवार कर ही रहे हैं, उन्होंने कहा कि बीजेपी को हार सामने दिख रही है और इस हार ठीकरा फोड़ने के लिए ही प्रेम कुमार धूमल को सीएम कैंडिडेट बनाया गया है।

 

सिंहुता मैदान में उन्होंने सरकार की उपलब्धियों का गिनाया और फिर कहा, “भाजपा चुनाव में कांग्रेस से बुरी तरह डरी हुई है। पहले वह जेपी नड्डा को उम्मीदवार बनाना चाहती थी मगर हार का ठीकरा फोड़ने के लिए प्रेम कुमार धूमल को सीएम का चेहरा बना दिया।”

 

मुख्यमंत्री ने कहा कि पीएम मोदी हिमाचल सौ बार आएं, उनका स्वागत है लेकिन सत्ता का दुरुपयोग करके वह हमें डरा लेंगे, यह उनकी गलतफहमी है। उन्होंने कहा कि हमारी हस्ती मिटाने के प्रयास हमें और मजबूती देते हैं।

 

वीरभद्र सिंह ने कहा कि बीजेपी ने बड़े नेता यहां डटे हैं और अभद्र भाषा इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि अमित शाह के बेटे का अस्सी करोड़ रुपये का घपला है, केंद्र को इशकी भी जांच करवानी चाहिए।

लाइव पोल में विकास के मामले में कांग्रेस पर भारी पड़ी बीजेपी

इन हिमाचल डेस्क।। लाइव रिऐक्शन के नतीजों के मुताबिक ऑनलाइन मौजूद रहने वाले लोगों को लगता है कि पिछले 20 सालों में कांग्रेस के मुकाबले बीजेपी ने ज्यादा विकास करवाया है। पिछले 20 सालों में 10 साल कांग्रेस और 10 साल बीजेपी का शासन रहा है। यानी दोनों दल बारी-बारी दो-दो बार सत्ता में रहे हैं।

 

लाइव रिऐक्शन पोल में लोगों को रिऐक्ट करना होता है और उसके हिसाब से काउंटर ऑप्शन में ऐड हो जाता है। बीजेपी के पक्ष के लिए Love और कांग्रेस के लिए Wow का ऑप्शन था। पिछले लाइव पोल की ही तरह इस बार भी Like ऑप्शन को नहीं रखा गया था क्योंकि बहुत से लोग सबसे पहले वीडियो को लाइक करते हैं जिससे नतीजे प्रभावित होते हैं।

 

लगभग 46 मिनट तक चले लाइव पोल में 610 लोगों ने बताया कि उनकी नजर में बीजेपी की सरकारों ने ज्यादा विकास करवाया है जबकि 347 की राय में कांग्रेस ने ज्यादा विकास करवाया।

इससे एक दिन पहले पोल करवाया गया था कि वीरभद्र सिंह और प्रेम कुमार धूमल में से किसे जनता अगला सीएम देखना चाहती है। उस मामले में वीरभद्र सिंह बीजेपी के सीएम कैंडिडेट धूमल पर थोड़े से भारी पड़े थे, मगर यह अंतर ज्यादा नहीं था। उस लाइव पोल के नतीजे जानने के लिए यहां क्लिक करें।

लेख: हिमाचल में दिल्ली चुनाव की तरह लड़खड़ाती नजर आ रही है बीजेपी

आई.एस. ठाकुर।। हिमाचल प्रदेश में आज प्रधानमंत्री के दो भाषण सुने। दोनों भाषणों में आधा वक्त तो प्रधानमंत्री जी ने आत्मस्तुति यानी अपनी तारीफ में बिता दिया। उन्होंने कहा, “आप सोचते होंगे कि मोदी कैसा आदमी है, इतना काम करता है, कभी छुट्टी भी नहीं लेता। सोचते हैं कि नहीं मित्रो?”

प्रधानमंत्री के लिए यह पहला मौका नहीं है कि वह आत्मस्तुति कर रहे हों। वह ऐसा करते रहे हैं और इसमें कुछ बुरा भी नहीं हैं। मगर उनके भाषणों में मैं हिमाचल के लिए कुछ योजनाएं, कुछ विज़न, कुछ प्लानिंग सुनना चाह रहा था मगर अफसोस, कुछ नहीं मिला। बस फौजी जवानों के नाम पर इमोशनल कार्ड खेलने की कोशिश, यह जताने की कोशिश कि मैं यहां का प्रभारी होते हुए कई जगह घूमा, वीरभद्र पर आरोप, कांग्रेस पर हमले और दो-चार ‘जुमले’ (अमित शाह जी की भाषा में) और भाषण खत्म।

किरन बेदी की तरह किया गया धूमल को आगे
बीजेपी की पूरी रणनीति जाने क्यों दिल्ली विधानसभा चुनावों की याद दिला रही है। बीजेपी का पूरा अमला उतर गया था आम आदमी पार्टी के खिलाफ प्रचार के लिए। आम आदमी पार्टी पर आरोपों पर आरोप लगाए जा रहे थे। बीजेपी अपना विज़न रखने के बजाय आम आदमी पार्टी और केजरीवाल को कोसने में व्यस्त रही। दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी वाले योजनाएं और सपने दिखाते गए। नतीजा यह हुआ कि प्रधानमंत्री मोदी ने ज्यादा सक्रियता नहीं दिखाई और बीजेपी ने कुछ ही दिन पहले किरन बेदी को सीएम कैंडिडेट घोषित कर दिया। नतीजा क्या रहा, सबके सामने है। पूरी दुनिया कहती रही कि यह मोदी की हार है, मगर कहीं न कहीं बीजेपी इस हार का दोष किरन बेदी को सीएम कैंडिडेट बनाने पर ट्रांसफर करती रही।

यही हाल हिमाचल में दिख रहे हैं। मोदी के बिलासपुर वाले भाषण और कल के दो भाषणों में फर्क था। वह भाषण आत्मविश्वास से भरा था। उसमें भी कांग्रेस औऱ वीरभद्र पर हमले किए गए थे मगर प्रधानमंत्री का अंदाज़ चुटीला था। कल के भाषणों में भी पीएम साहब ने कांग्रेस और वीरभद्र पर हमले किए मगर अंदाज़ चुटीला नहीं, नाराज़गी भरा था। वह जनता में मन में आक्रोश भरना चाहते थे कि कांग्रेस और वीरभद्र ने लूट लिया। एक जगह तो उन्होंने सड़ी हुई सोच वाली पार्टी बता दिया।

प्रधानमंत्री जी ने हिमाचल को लेकर कांगड़ा में तो पांच दानवों को खत्म करने की बात की, मगर उन्होंने यह नहीं बताया कि इससे पहले जब उनकी ही पार्टी की सरकारें थीं और जिन्हें उनकी पार्टी सत्ता प्रमुख बनाने वाली है, वही तब भी सत्ताधीश थे, तब ये पांच दानव थे या नहीं और फले फूले या नहीं। मगर इलेक्शन में तो ठीकरा आंख मूंदर विरोधियों पर फोड़ दीजिए, क्या जाता है?

फलों का जूस कोल्डड्रिंक में मिलाया ही नहीं जा सकता
इसके अलावा प्रधानमंत्री जो विज़न रख रहे थे हिमाचल को लेकर और ये पेप्सी में फलों का जूस मिलाने वाली बात कर रहे थे। ये सारी बातें 2014 के लोकसभा चुनाव प्रचार में वह कह गए थे। और निहायत ही अव्यवहारिक आइडिया है। पेप्सी या कोक का अपना फॉर्म्यूला है अपना टेस्ट है। उसमें जबरन कोई कंपनी संतरे या सेब का रस मिलाएगी तो वह टेस्ट बरकरार रहेगा क्या?

अगर सरकार कहे कि आप अलग से फ्रूट प्रॉडक्ट लॉन्च करें, तो ऐशा भी नहीं किया जा सकता क्योंकि संविधान के आधार पर आप किसी को जबरन कोई प्रॉडक्ट लॉन्च करने को बाध्य नहीं कर सकते। वैसे प्रधानमंत्री 2014 में पहली बार यह बात कही थी और अब तीन साल बाद फिर कह रहे हैं। राज्य सरकार का यह मामला है नहीं, केंद्र का है। और अब तक केंद्र सरकार ने यह आइडिया इंप्लिमेंट नहीं करवाया तो आप विधानसभा में बीजेपी की सरकार बनने पर कैसे हो जाएगा?

कोल्ड ड्रिंक में फलों का जूस कैसे मिलाया जा सकता है?

दरअसल प्रधानमंत्री का यह आइडिया  तीन साल में इसलिए जमीन पर नहीं उतर पाया क्योंकि यह जुमले के अलावा कुछ नहीं है और व्यावहारिक भी नहीं। वैसा ही प्रधानमंत्री हवाई चप्पल और हवाई यात्रा वाले डायलॉग वाला भाषण भी याद है, जिसकी हकीकत यह है कि आम आदमी क्या, मध्यमवर्गीय आदमी भी शिमला से दिल्ली उड़ने से पहले बजट के बारे में सौ बार सोचे।

अमित शाह तो तड़ीपार कर दिए गए थे
और हां, प्रधानमंत्री ने करप्शन के आरोपों को लेकर वीरभद्र को शर्मिंदा किया। आरोपों को लेकर, फिर कहता हूं आरोपों को लेकर। उनपर लगे आरोप जब तक अदालत में साबित नहीं हो जाते, तब तक वह सिर्फ आरोपी हैं और दोषी नहीं हैं। आरोपी होने से कोई दोषी नहीं हो जाता। वैसे आरोप तो प्रधानमंत्री के ऊपर भी लगे थे और अमित शाह के ऊपर भी लगे थे और बड़े ही नृशंस लगे थे। तो क्या उन आरोपों के लगते ही वे भी दोषी हो गए थे? नैतिकता के आधार पर राजनीति छोड़कर वे गायब हो गए थे? और अमित शाह को तो गुजरात हाई कोर्ट ने तड़ीपार कर दिया था। बाद में अदालतों ने ही आरोपमुक्त किया था। तो फिर दूसरों की बारी में मामला अलग कैसे हो जाता है? वीरभद्र ने अपराध किया है तो एजेंसियां जांच कर रही हैं और कोर्ट तय करेगा। आप खुद ही जज तो नहीं हैं न?

हाई कोर्ट ने अमित शाह के गुजरात में प्रवेश करने पर रोक लगा दी थी

कहीं हाल दिल्ली जैसा न हो
खैर, ये सब बातें और आरोप वैसे ही हैं जैसे बीजेपी ने केजरीवाल ऐंड पार्टी पर लगाए थे। और ये सारा नकारात्मक प्रचार था। दिल्ली में बीजेपी अपना विजन रखने के बजाय इसी नेगेटिव प्रचार में जुटी थी और उसका सीधा फायदा पहुंच रहा था केजरीवाल को। नतीजा यह रहा कि आम आदमी पार्टी ने सफाया कर दिया। और ठीकरा फोड़ने के लिए किरन बेदी तो थी हीं। तो वीरभद्र जैसे मंजे हुए राजनेता की बात सही लगती नजर आ रही है कि पहले तो लगता था बीजेपी को कि आराम से जीत जाएंगे, मगर देखा कि जनता साइलेंट है तो कवर लेने के लिए धूमल को आगे कर दिया। जीते तो सेहरा मोदी के सिर बंधेगा और हारे तो ठीकरा धूमल के सिर फोड़ा जाएगा।

बहरहाल, चुनाव रोमांचक होते जा रहे हैं। अभी देखना होगा कि बीजेपी वक्त रहते संभलती है या नहीं और दिल्ली से सबक लेकर नेगेटिव प्रचार से बचकर अपनी उपलब्धियां और भविष्य की योजनाएं जनता के सामने रखती है या नहीं। वरना हिमाचल कहीं 1985 के बाद वह न हो जाए, जो अब तक हुआ नहीं है। सरकार रिपीट।

(लेखक मूलत: हिमाचल प्रदेश के हैं और पिछले कुछ वर्षों से आयरलैंड में रह रहे हैं। उनसे kalamkasipahi @ gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

ये लेखक के निजी विचार हैं

विज़नहीन नेताओं की वजह से पिछड़ता चला गया हिमाचल

सुरेश चंबयाल।। जब से होश संभाला है, हिमाचल की राजनीति को बड़े करीब से देखता रहा हूं। हिमाचल में सत्ता के शीर्ष पर रहने वाले नेताओं ने कैसे-कैसे कब कहां कूटनीति से विरोधियों को चित किया, यह ताली बजा देने वाले लम्हे थे। मगर वक़्त के साथ मैंने देखा कि सत्ता के शीर्ष पर रहकर भी ये नेता लोग हिमाचल को आगे ले जाने के लिए कोई दिशा नहीं दे पाए।

उनकी जिंदगी और नीति बस कूटनीति की शतरंज के उन 68 खानों (जानता हूं 64 होते हैं परन्तु विधानसभा सीटों के आधार अपर 68 लिखा) तक सीमित रही। वो उस से बाहर कभी हिमाचल का भविष्य नहीं देख पाए। उन्हें सत्ता में रहने में मजा आता है। वो इसके मंजे हुए खिलाड़ी भी हैं। यह काबिल-ए-तारीफ़ भी है, मगर 80 के दशक के बाद से लेकर आज तक जो दशा-दिशा वे तय कर सकते थे, उसमें वे नाकाम रहे।

बेरोजगारों की लम्बी फौजें, खस्ताहाल स्वास्थ्य सुविधाएं, खराब सड़कें, कॉन्ट्रैक्ट दिहाड़ीदार एम्प्लॉयी, बद से बदतर होती शिक्षा व्यव्यस्था… क्या ये चीजें हिमाचल के नेताओं से इन इतने सालों के शासन का हिसाब नहीं मांगेगीं? वे लोग अपनी सत्ता के लिए अपने पार्टी के अंदर-बाहर के विरोधियों को तो चित करते रहे, मगर शह-मात के इस खेल में वे यह ध्यान नहीं दे पाए कि इस प्रदेश की उपलब्धियों का दायरा राष्ट्रीय भी हो सकता था।

आज हिमाचल के बुजुर्ग नेता कभी अवैध कब्जों को नियमित करते हैं तो कभी एक्स सर्विसमेन द्वारा किए गए कब्जों को नियमित करने का एलान करते हैं। और वे इसी मनोदशा में अगली जीत का स्वाद चखने के लिए बेता हैं, जिसे हिंदी में कहते हैं- तुष्टीकरण। नेतृत्व को समय से आगे रहना पड़ता है। समय से आगे सोचना पड़ता है। मगर हिमाचल के राजनेता कभी समय के कदम से कदम मिलाकर नहीं, बल्कि अपने नफे-नुकसान के हिसाब से चले।

भविष्य की राह देखती PTA, एसएमसी, पैट वगैरह-वगैरह अध्यापकों की फ़ौज किसकी नीति का परिणाम है? इन्हीं विज़नहीन नेताओं की। प्रदेश के लाखों स्नातक जम्मू-कश्मीर जाकर जिस दौर में B.Ed. करने जाते थे, उस दौर में हिमाचल की सरकारें कभी नहीं सोच पाई कि B. Ed. करने के लिए ऐसा क्या इंफ्रास्ट्रक्टर चाहिए, ऐसी क्या सुविधाएं, कितना बजट चाहिए कि हमारे लोगों को बाहर न जाना पड़े और वे हिमाचल में ही बी.एड कर सकें। मगर न जाने कितने ही लोग वहां से बी.एड करके आए।

फिर सरकारी टीचर लगने के लिए जहां तरफ जहां अच्छा-खासा कमिशन का टेस्ट पास करना होता था, वहां इन्हीं सरकारों ने चंद तनख्वाह पर पीटीए, एसएमसी और आउटसोर्स्ड आदि के नाम से लोगों को रख लिया गया। इनका न ढंग से टेस्ट होता था और न ही इंटरव्यू। होता भी था को क्या गारंटी उन लोगों पर स्थानीय नेताओं का दबाव न होता हो कि किसी रखना है किसे नहीं।  और फिर इन लोगों का शोषण करने राजनेताओं ने उन्हें रेग्युलर करने का कार्ड खेल दिया।

अब यह कहां का न्याय था कि एक तरफ़ तो कुछ लोगों को स्टेट लेवल का कमिशन देना पड़े, बाकायदा प्रतिस्पर्धा से आना पड़े और फिर नौकरी लगे, जबकि दूसरी तरफ मुख्यमंत्री उन लोगों के लिए नीति बनाने लगें जिनका इंटरव्यू प्रदान, प्रिंसिपल, सब्जेक्ट एक्सपर्ट आदि ने लिया हो। नौकरियों की तैयारी करते हुए कई साल खपाने के बाद लोग खुद खप गए, मगर वोट बैंक की राजनीति चलती रही।

इसका फायदा इन पीटीए, अनुबंध, आउटसोर्स्ड आदि कर्मचारियों को भी नहीं मिल पाया। वे आज बी कमशकश की स्थिति मे हैं। इतना समय नेताओं की चुग में पक्के होने के लिे गुजार दिए, मगर घोषणापत्रों में सिर्फ लॉलिपॉप मिला। अब अगर वे भावनात्मक आधार पर पक्के हो भी जाते हैं, तो उन लोगों का क्या होगा जो एक अदद टेस्ट और वेकंसी की राह देख रहे हैं?

अब कब्जे भी नियमित हो रहे हैं। नाजायज क्यों जायज हो रहा है, इसका न कोई सवाल करता है न कोई जबाब देता है। यह एक आधारशिला है आगे लोगों को यह बताने की जिसकी लाठी उसकी भैंस। सब कब्जे करो, सरकार वोट बैंक पर झुककर सब रेगुलर कर देगी। प्रदेश में लोग BA, MA करने के बजाय प्रफेशनल शिक्षा का रुख कर रहे हैं यहां के नेता लोग नए-नए कॉलेज खोले जा रहे हैं और पगड़ी कदमों में रख देने पर ऐलान कर दे रहे हैं कॉलेज खोलने का। एक बार इन नेताओं को प्रदेश के चार युवाओं को बुलाकर पूछना चाहिए कि क्या किसी कोने में बीए, बीएससी करवाने वाले कॉलेज की जरूरत है? कम से कम यही पता कर लीजिए कि अभी कॉलेजों की स्ट्रेंग्थ कितनी है।

जिन नए कॉलेजों का ऐलान किया जाता है, वे वर्षों तक पहले तो किराए पर चलते रहेंगे। न बच्चे पूरे होंगे न स्टाफ पूरा मिलेगा न शिक्षा मिलेगी। मिलेगा बस तुष्टीकरण। ऊपर से यह चरमराती हुई  शिक्षा व्यवस्था ताने मारती रहेगी और मज़बूरी का उपहास उड़ाती रहेगी। खासकर तब, जब हमारे बच्चे क्लर्क का एग्जाम भी पास नहीं कर पाएंगे। कौन इसका जिम्मेदार हुआ, कोई नहीं जानेगा। यही हालत स्वास्थ्य, पर्यटन, बागवानी, कृषि समेत तमाम क्षेत्रों की भी रही। टूरिस्ट अपने से आते हैं, अपने से जाते हैं मगर हम ढंग से कुछ डिवेलप नहीं कर पाए।

वक़्त के साथ मैंने यह जाना कि राजनीति के ये उस्ताद विज़न के हिसाब से प्रदेश को कुछ नहीं दे पाए और न ही अब देने की सोच रहे है। उम्मीद तो थी कि इन नेताओं के बीच कोई तो ऐसा आएगा जो कूटनीति से निकलकर हिमनीति पर चलेगा। मगर अफसोस, ऐसा होता दिख नहीं रहा। हिमाचल में शायद मौसम बदलने के लिए अभी इंतज़ार करना होगा। और यह बदलाव तभी होगा, जब जनता अपनी सोच बदलेगी।

(लेखक हिमाचल प्रदेश से जुड़े विभिन्न मसलों पर लिखते रहते हैं। इन दिनों इन हिमाचल के लिए नियमित लेखन कर रहे हैं।)

DISCLAIMER: ये लेखक के अपने विचार हैं

…तो क्या प्रेम कुमार धूमल के बाद जयराम ठाकुर?

मंडी।। हिमाचल प्रदेश में चुनाव प्रचार अभियान में जुटे बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने बुधवार को मंडी के सिराज में जनसभा को संबोधित किया। थुनाग में चुनावी जनसभा को संबोधित करते हुए बीजेपी अध्यक्ष ने कहा कि धूमल मुख्यमंत्री होंगे और सिराज के विधायक जयराम ठाकुर को सरकार में सबसे बड़ा पद दिया जाएगा। मगर उनके इस बयान को लेकर यह चर्चा शुरू हो गई है कि आखिर वह पद कौन सा होगा।

थुनाग में बोलते हुए अमित शाह ने कहा, “हिमाचल में मोदी और धूमल की जोड़ी सरकार बनाएगी। धूमल मुख्यमंत्री होंगे और सिराज के विधायक जयराम ठाकुर को सरकार में सबसे बड़ा पद दिया जाएगा(पढ़ें)।”

अमित शाह के इस बयान के सियासी मायने तलाशना शुरू कर दिया गया है। चर्चा का विषय यह बन रहा है कि सरकार में सबसे बड़ा पद तो मुख्यमंत्री का होता है, ऐसे में अमित शाह कौन से बड़े पद की बात कर रहे हैं। यह सुगबुगाहट भी शुरू हो गई है कि शाह का इशारा कहीं धूमल की उम्र 75 साल हो जाने के बाद सीएम पद की जिम्मेदारी जयराम ठाकुर को दिए जाने की तरफ तो नहीं था।

जयराम ठाकुर

यह है बीजेपी का 75+ फॉर्म्युला
हिमाचल प्रदेश के तमाम मीडिया संस्थान अनुमान लगा रहे हैं कि धूमल, जिनकी उम्र 73 साल है, उन्हें सीएम कैंडिडेट घोषित किया गया है और बीजेपी के जीतने की स्थिति में उन्हें सीएम भी बनाया जाएगा। मगर जैसी ही उनकी उम्र 75 साल होगी, उनकी जगह सीएम पद पर किसी नए चेहरे को बिठाया जाएगा।

इसके लिए तमाम लोग गुजरात का उदाहरण दे रहे हैं जहां से आणंदीबेन के 75 साल के होते ही सीएम बदल दिया गया और साथ ही 75 प्लस उम्र के लोगों को राज्य सरकारों में और केंद्र में बड़े पदों से मुक्त किया जाता रहा है, जिनमें कलराज मिश्र और नजमा हेपतुल्ला का नाम उदाहरण के तौर पर लिया जा सकता है।

ऐसे में क्या थुनाग में अमित शाह यह कहना चाहते थे कि धूमल के बाद जयराम ठाकुर सीएम होंगे? चर्चा है कि जिस तरह से धूमल को राजपूर बिरादरी के वोटों (करीब 37 फीसदी) को साधने के लिए सीएम प्रॉजेक्ट किया गया है, क्या इसी तर्ज पर जयराम ठाकुर को सत्ता सौंपी जाएगी।

जेपी नड्डा ने भी किया था इशारा
21 अक्तूबर को कुथाह में जनसभा को संबोधित करते हुए केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने भी कुछ ऐसा ही इशारा किया था।उन्होंने कहा था कि सिराज विधानसभा क्षेत्र को जल्द बड़ी जिम्मेदारी दी जा सकती है(पढ़ें)। himachal assembly election 2017 jp nadda and jairam thakur

बीजेपी के मन में क्या है, यह कहा नहीं जा सकता। हिमाचल में भी उसने चुनाव से ठीक पहले तक सीएम कैंडिडेट घोषित नहीं किया और आखिर में धूमल को प्रॉजेक्ट करके चौंका दिया। इससे कहीं न कहीं प्रचार के मामले में आगे चल रही कांग्रेस को झटका तो लगा है। ऐसे में भविष्य के लिए बीजेपी ने क्या रणनीति बनाई है, यह तो बाद में ही पता चल जाएगा। मगर अब लोगों ने बीजेपी के संकेतों के मायने तलाशना शुरू कर दिया है और हर छोटी बात को बड़ी गंभीरता के साथ देखा जा रहा है।

ऑनलाइन लोकप्रियता के मामले में धूमल पर भारी पड़े वीरभद्र

इन हिमाचल डेस्क।। बुधवार शाम को ‘In Himachal’ द्वारा अपने फेसबुक पेज पर करवाए गए लाइव रिऐक्शन पोल में बीजेपी के सीएम उम्मीदवार प्रेम कुमार धूमल पर कांग्रेस के सीएम कैंडिडेट वीरभद्र सिंह भारी पड़े। दोनों नेताओं के बीच करीब साढ़े तीन घंटों के फेसबुक लाइव में कांटे की टक्कर रही।

 

शुरू में दोनों बराबर-बराबर चलते रहे मगर 15 मिनट बाद धूमल ने वीरभद्र पर करीब 50 रिऐक्शंस की लीड ले ली। यह लीड डेढ़ घंटे तक बनी रही और एक मौके पर 80 तक पहुंच गई। मगर इसके बाद वीरभद्र सिंह ने वापसी करना शुरू किया। ढाई घंटे बाद वह धूमल से आगे हो गए और साढ़े तीन घंटे बाद जब ऐप द्वारा क्रिएट किया गया पोल अपने आप खत्म हुआ, वीरभद्र 365 रिऐक्शंस आगे थे।

लाइव पोल का नतीजा

वीरभद्र को कुल 3713 लोगों ने अपनी पसंद बताया वहीं धूमल को 3349 लोगों ने पसंद बताया। ध्यान देने वाली बात है कि यह अंतर ज्यादा नहीं है। हमने इस पोल में इस बार Love और Wow के ही रिऐक्शन के विकल्प रखे थे क्योंकि कई बार लोग Like बटन सामान्य तौर पर प्रेस कर देते हैं और इससे रिजल्ट प्रभावित हो जाते हैं।

कॉमेंट्स में ऐसे लोग भी थे जो बीजेपी या कांग्रेस के पक्ष में बातें कर रहे थे, वहीं ऐसे लोगों की संख्या भी अच्छी खासी थी जो कह रहे थे कि दोनों ही नेता उन्हें पसंद नहीं, वे किसी और को सीएम देखना चाहते हैं। इन दोनों नेताओं की असली परीक्षा चुनाव में होगी, मगर फिलहाल ऑनलाइन यूजर्स की पसंद के मामले में थोड़े से ही सही, मगर वीरभद्र धूमल पर भारी पड़े।

नीचे वीडियो प्ले करके देखें लाइव पोल:

लाइव पोल खत्म होने के बाद दिए गए रिऐक्शंस इसमें शामिल नहीं हैं।

Opinion: BJP is not holier than thou

Rohan Shridhar
The pristine hills of Himachal Pradesh are reeling under the noise of the election bugle. As every other election witnessed in the state, this is a direct fight between the BJP and the incumbent congress. If one is to go by the historical voting patterns in the state a BJP victory is likely as no government has ever repeated itself. In the ongoing campaigns that are unravelling it seems that the BJP has a complete monopoly over the issues of corruption, development, economic growth, law and order and social harmony.

The continuance chastising of Congress and its leaders by BJP though somewhat reasonable, smacks of arrogant hypocrisy. It is interesting to see that in establishing a moral high ground, the saffron brigade is fighting night and day to scuttle any narrative about their transgressions. Any criticism levelled at saffron leaders, workers or organizations is met with dreadful disdain, violent abuse and if deemed too dangerous for the party’s liking, action in courts or investigations by central government agencies is inevitable.

Of all the subjects over which the Bhartiya Janta Party has complete domination, the one the party rallies around the most is corruption. While it is true that graft seen during the UPA regime was unprecedented in nature, for BJP to be rebuking Congress and its allies seems like the kettle is calling the pot black. Ever since the party has come to power in the Centre it appears that all investigating agencies under its command have been diagnosed with selective amnesia that has completely wiped out Vyapam from their memory. The admission and recruitment scam that took place in BJP ruled Madhya Pradesh is alleged to be perpetrated by a group of senior politicians, government officials and businessman.

The entire scheme hatched by this unscrupulous nexus may be the greatest rip off executed against the hard working, aspiring and ambitious youth of the country. More than 40 people associated with the scam died in mysterious circumstances and some of the accused include senior ministers, IAS officers and even a former state Governor. The unparalleled nature of associated deaths, sheltering of high profile suspects and a lack of initiative shown by investigative agencies as well as the state government to lay bare the facts is perplexing even by Indian standards. The wrongdoers, all of whom are linked with the BJP or many of its affiliate organizations, have with Vyapam shown that the saffron brigade is more than capable of running a well-oiled mafia, greasing the palms of all in power with impunity.

Flawed development narrative
To masquerade all around Himachal as a messiah of BJP oriented development the party ironically chose Yogi Adityanath the current CM of Uttar Pradesh as one of its star campaigners. The man doesn’t seem lacking in confidence and was more than eager to virtuously lecture the innocent people of HP about the wonders of his vision of development, just sixty days after 290 children died in a single month at a medical hospital based in his home constituency of Gorakhpur. It is an insult to the collective pride of Himachalis to be lectured by a communal conman on the wonders of progress, when he himself heads a state which is considered the most backward in the country.

Marketing a dismal female literacy rate of 57.18%, a per capita income of only 36,250 rupees, an infant mortality rate as high as 64 and a GDP growth rate of mere 5.6 percent, UP should be competing with the likes of Sub Saharan nations. Himachal boasts of a nationwide high female literacy rate of 75.9 percent, a per capita income of more than 1,04,000, an infant mortality rate of 35 and constant growth rates of 7 percent over continuous periods. An average Himachali is three times wealthier than his counterpart in UP. The misguided maverick that is Yogi and his saffron army should humble down and learn from the soft spoken hill folk some tricks to revive the fortunes of his dismal state.

On all the subjects of common concern being championed by the BJP, it is quite evident that there are significant chinks in the saffron armory. The execution of demonetization, a blatant attack on the financial and economic liberty of Indians and haphazard execution of GST have shattered their narrative as the lone bearer of progress and economic growth in the myriad of Indian politics. Non-government component of GDP constituting more than 90 percent of the economy has slipped to a mere 4.3 percent the lowest since 2013. Capacity building in industry is at an all-time low with manufacturing growth restricted to a dismal 1.17 percent and construction at a poor 2 percent. The two sectors constitute around 85 percent of the industry.

The BJP is neither anti-corruption, nor pro development. It has faltered miserably on economic growth and yet it is miraculously controlling the narrative on all the important matters largely due to the sheer unimaginable scale of incompetency shown by the Congress party. Had the congress leaders been a tad bit sincere in their commitment to voters, party and country they might have given the BJP a run for its money.

(An associate at a Mumbai based think thank, Rohan Shridhar writes articles on political, financial and social subjects)

 

Disclaimer: The views expressed here are solely those of the author in his private capacity

लेख: वीरभद्र के आगे नतमस्तक हुए बीजेपी के चाणक्य अमित शाह

भाग सिंह ठाकुर।। वीरभद्र कांग्रेस की तरफ से अकेले ही प्रचार का जिम्मा संभाले हुए थे जबकि बीजेपी ने अपने कई नेताओं को झोंक दिया था। संबित पात्रा, सुधांशु त्रिवेदी, गडकरी, योगी और अमित शाह तक हिमाचल में आकर प्रचार में जुटे। एक तरफ बड़े नामों की फौज, दूसरी तरफ 83 साल का बुजुर्ग नेता अकेले ही सबसे लोहा ले रहा था और भारी भी पड़ रहा था। बीजेपी को जो उम्मीद थी कि आराम से हिमाचल में सरकार बना लेगी, वह कुंद पड़ती दिखाई दी। उसे समझ आ गया कि जुमलों और गप्पों और संवादों वाले भाषण से यहां काम नहीं चलने वाला। अगर माहौल बनाना है तो कुछ अलग करना पड़ेगा। क्योंकि उसने देखा कि जनता तो शांत बैठी हुई है। न तो रैलियों में ज्यादा भीड़ उमड़ रही है न ही खुलकर जनता अपना रुख दिखा रही है। वहीं दूसरे राज्यों में तो बीजेपी के छोटे-मोटे नेता के लिए लिए गजब भीड़ उमड़ आती थी।

 

वीरभद्र पर बीजेपी ने करप्शन के आरोप लगाए और उन्हें घेरने की कोशिश की। बार-बार उनके खिलाफ चल रहे मामलों का जिक्र किया। मगर दूसरी तरफ वीरभद्र ने इन्हीं मामलों को जिक्र करके सहानुभूति बटोरना शुरू कर दिया। इमोशनल कार्ड खेलकर वह लोगों की सहानुभूति बटोरते भी देखे। ऐसे में बीजेपी को लगा कि कहीं हम अपना सीएम कैंडिडेट घोषित न करके गलती तो नही ंकर रहे? वैसे गलती तो वे नहीं कर रहे थे क्योंकि आकलन किया जाए तो साफ था कि भले ही बीजेपी 50 या 40 प्लस सीटें न ला पाए, मगर सरकार तो उसी की बनेगी। मगर शाह और मोदी इस बात भला कैसे समझ पाते? उन्हें लगा कि हिमाचल में माहौल ठंडा है और कांग्रेस यह माहौल बना रही है कि बीजेपी तो बिना दूल्हे की बारात है। इसी चक्कर में उसने मतदान से ठीक पहले प्रेम कुमार धूमल को सीएम कैंडिडेट घोषित कर दिया।

 

वैसे कुछ दिन पहले तक बीजेपी तमाम नेता, जिनमें अरुण जेटली और शाह शामिल थे, कहते थे कि हिमाचल में सामूहिक नेतृत्व में और मोदी जी के नाम पर चुनाव लड़ा जाएगा। फिर अचानक ऐसा क्या हो गया कि उन्हें अपने ही बयान और पार्टी के रुख से पटलना पड़ा और जहां उन्होंने पिछले कई राज्यों में बिना चेहरा बताए चुनाव लड़े थे, हिमाचल में अलग रणनीति बनाकर नाम का ऐलान करना पड़ा? दरअसल बीजेपी सशंकित हो उठी थी कि कहीं वीरभद्र हावी न पड़ जाएं और कहीं कांग्रेस की सरकार फिर न बन जाए।

 

बीजेपी का यह डर ही उसे आखिरी वक्त में ऐसा कदम उठाने पर विवश कर गया, जिससे उसका फायदा हो न हो, नुकसान होने की आशंका ज्यादा है। अब जिन लोगों के मन में यह उम्मीद जगी थी कि चलो, बीजेपी कोई नया चेहरा देगी, अब वे शांत होकर बैठ जाएंगे। उनका उत्साह नए चेहरे के लिए था क्योंकि वे पुराने चेहरों को पसंद नही ंकरते थे। अब पुराना चेहरा आ जाने पर वे पार्टी के आधार पर नहीं, अपनी पसंद के आधार पर वोट करेंगे। बुद्धिजीवी वर्ग धूमल और वीरभद्र को एक जैसा मानता है। इसलिए वह नए चेहरे की उम्मीद में उत्साहित था, इसिलए वह अब दोनों की तुलना करेगा औऱ दोनों में उसे जो ज्यादा ठीक लगेगा, उसके पक्ष में मतदान करेगा।

साथ ही अब देरी हो गई है। वोटिंग के लिए बहुत कम समय बचा है। हो सकता है कि जिन सीटों पर नए चेहरे के नाम पर उत्साह बना था, वहां के कार्यकर्ता हताश हो जाएं और उसका सीधा फायदा कांग्रेस को हो।

बीजेपी के चाणक्य हिमाचल में आकर फेल
बीजेपी के चाणक्य का सलाहदाता न जाने कौन है। उन्हें मालूम ही नहीं है कि प्रदेश में कभी भी धूमल के नाम पर या सीएम कैंडिडेट के नाम पर वोट नहीं पड़े। धूमल सत्ता में आए तो कभी भी अपने नाम के दम पर नहीं आए। बल्कि प्रदेश की जनता ने विकल्पहीनता की स्थिति में जब सत्ताधारी दल को बाहर का रास्ता दिखाया है, ऑटोमैटिकली बीजेपी की सरकार बनी है और धूमल सीएम बने हैं। वरना धूमल के नाम पर वोट पड़ते होते वह सरकार रिपीट करवा चुके होते। पिछली बार जब उन्होंने इंडक्शन देने का वादा किया था, तब भी उन्हें प्रदेश की जनता ने खारिज कर दिया था।

खैर, चुनाव दिलचस्प हो गए हैं। कांग्रेस में पहले मनोबल कम था कि पता नहीं हम वापसी करेंगे या नहीं, मगर बीजेपी के ताज़ा कदम ने उसमें आत्मविश्वास भर दिया है। उसने यह यकीन हो गया है कि अब बीजेपी बैकफुट पर आकर सीएम कैंडिडेट घोषित कर रही है तो थोड़ा और ज़ोर लगाया जाना चाहिए। साथ ही बीजेपी  साथ बदलाव की उम्मीद में जुड़े लोग फिर पास पलट सकते हैं। बाकी तो वक़्त ही बताएगा कि ऊंट किस करवट बैठता है।

(लेखक कुल्लू से हैं और केंद्रीय लोक निर्माण विभाग से सेवानिवृत होने के बाद पैतृक गांव में बागवानी कर रहे हैं)

ये लेखक के निजी विचार है।