पैसे के पीछे मत भागिए, अथाह दौलत भी सुख-चैन नहीं दे सकती

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कर्म सिंह ठाकुर।। आज TV चैनल समाचार पत्रों में नीरव मोदी के कारनामे सुर्खियां बटोर रहे हैं। PNB को करोड़ों रुपए का चूना लगाने के बाद नीरव मोदी कहां चले गए किसी को कोई खबर नहीं। भारत विश्व में एक उभरती हुई शक्ति के रूप में अपनी पहचान बना रहा है लेकिन देश की जनता के पैसे को सरकारी तंत्र व गैर सरकारी तंत्र की मिलीभगत के कारण नीरव मोदी जैसे व्यापारी लूट कर फरार हो जाते हैं।

यूपीए-1 और यूपीए-2 के 10 वर्षों के शासनकाल में निरंतर घोटाले सामने आए थे जिससे परेशान होकर बरस 2014 के चुनावों में भारतीय जनता जनता पार्टी को भारी बहुमत देकर सत्तासीन करवाया था। वैश्विक मंच पर नरेंद्र मोदी द्वारा भारत की छवि को उभारने की भरसक कोशिश की गई जिसके काफी हद तक सकारात्मक परिणाम भी देखने को मिलते हैं। लेकिन हाल ही में सरकारी बैंकिंग प्रणाली में घोटाले सामने आए हैं उन्होंने सरकार की चिंताओं को भी बढ़ा दिया है। इन सरकारी बैंकों में जमा राशि देश के गरीब असहाय व जरूरतमंद लोगों की है जिन्होंने अपने संपूर्ण जीवन की पूंजी को बैंकों में जमा करा कर रखा है ताकि आने वाले कल में अपनी जरूरतों को पूरा कर सके लेकिन इस तरह की लूट जो बैंकों में देखने को मिली इससे बैंकिंग तंत्र पर भी संदेह के घेरे में आ जाता है।

भारत की वास्तविक स्थिति का आंकलन किया जाए तो देश में 17 करोड लोग भुखमरी की चपेट में है भूखे पेट सोने के लिए मजबूर है। दुनिया में सबसे अधिक बच्चे कुपोषण के शिकार भारत में ही है अन्नदाता किसान गरीबी ब ऋण को चुकाने की मजबूरी के कारण आत्महत्या करने के लिए विवश है। बेरोजगार दर-दर की ठोकरें खाने के लिए मजबूर है। ऐसे देश में यदि एक समृद्ध हीरा व्यापारी बैंक को करोड़ों रुपए का चूना लगाकर भाग जाता है तो यह देश को शर्मसार करता है। कहीं ना कहीं नीरव मोदी भी चैन की नींद नहीं सो पा रहा होगा आज भारत की खुफिया तंत्र नीरव मोदी को पूरे देश में खोजने में लगी हुई है तो नीरव मोद भी अपने आप को बचाने के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहा है तथा एक-एक दिन के लिए करोड़ों रुपए स्वाहा करने पड़ रहे होंगे। तभी वह पुलिस तंत्र से बचने में कामयाबी पा रहा है।

कभी किसी एक कमरे में रात बिताता होगा तो कभी किसी दूसरे व्यक्ति के परिचय के साथ किसी अन्य होटल या अन्य देश की तरफ रुख करता होगा ताकि सुरक्षा एजेंसियों की नजरों से बचा जा सके। ऐसी परिस्थिति के लिए कौन जिम्मेवार है यह प्रशन नीरव मोदी को सता रहा होगा जबकि एक बेरोजगार असहाय गरीब ब भिखारी भी अपनी मर्जी से जहां भी चाहे जा सकता है जो चाहे खा सकता है किसी की गुलामी या एहसान का मोहताज नहीं बना हुआ है। लेकिन निर्भय मोदी करोड़ों रुपए की संपत्ति के बावजूद भी सुखचैन इज्जत की जिंदगी को जीने के लिए लाचार और विवश है।

दुनिया भर में नीरव मोदी हीरा व्यापारी के रूप में ख्याति प्राप्त कर चुका था लेकिन पश्चिम की अंधी भौतिकवादी सभ्यता ब धन की असीम लालसा ने नीरव मोदी को अंधा कर दिया और इस अंधेपन के कारण ही आज नीरव मोदी सुख व इज्जत के एक पल को पाने के लिए भी करोड़ों रुपए खर्च करने के लिए मजबूर बन गया है। नीरव मोदी द्वारा किए गए घोटाले की चर्चाएं भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में सुर्खियां बटोर रही है।

इस तरह के कृत्य का यदि वास्तविक आंकलन किया जाए तो रातों-रात धनकुबेर बनने की लालसा में मानव को अंधा कर दिया है। आज के बच्चे अपने माता-पिता व बुजुर्गों की हत्या भी महज कुछ रुपयों की को पाने की लालसा के लिए कर देते हैं। नैतिक मूल्य मूल्यों का स्तर इतना गिर चुका है कि मानव अपने अस्तित्व का ही दुश्मन बन चुका है। आज के युवा को भी नीरव मोदी के इस कुकृत्य से सबक लेना होगा दुनिया में सफलता का कोई भी शॉर्टकट नहीं है रातों रात अमीर बनने का सपना आपको नीरव मोदी जैसी जिंदगी जीने के लिए विवश कर सकता है।

इस घटना से सबक लेते हुए आज के युवा वर्ग को पूर्ण इमानदारी मेहनत व सजगता से अपने भविष्य को संवारना का प्रण लेना होगा था भिखारी से भी बदतर जिंदगी जीनी होगी जिसकी जिसका उदाहरण आज नीरज मोदी की जीवन शैली में देखने को मिलता है। ऐसी संपत्ति का भी क्या फायदा जो कि एक पल का सुख भी ना दे दे सके। किसी ने सच ही कहा है की बुरे कार्यों का नतीजा भी बुरा ही होता है और मानव द्वारा किया गया एक कुकृत्य उसके अपने जीवन के साथ-साथ उसकी संपूर्ण पारिवारिक जीवन को भी प्रभावित कर देता है। ऐसी कुकृत्यों से बचने के लिए मानव को अपनी लालसाओं को नियंत्रित करके अपनी जीवनशैली को जीना चाहिए मानव को जो मिलता है उसी में संतोष करके शांत जीवन जीने की कला सीखनी होगी। पर यह आधारभूत सत्य है जो मनुष्य को मिलता है उससे बस संतुष्ट नहीं होता है और जो नहीं मिलता है उसको पाने के लिए वह जीवन भर तड़पता छटपटाता रहता है। यही कारण है कि आज देश में नीरव मोदी जैसे व्यापारी अपनी समृद्धता के कारण भी अपने परिवार व समाज को एक इज्जतदार जिंदगी देने में असमर्थ है।

भ्रष्टाचार से निजात पाने के लिए सरकार को कड़े नियमों का निर्धारण करना होगा ताकि विजय माल्या व नीरव मोदी जैसे व्यापारी सरकारी जनतंत्र में सेंध ना लगा सके। अंतर्राष्ट्रीय गैर सरकारी संगठन ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की ताजा रिपोर्ट ग्लोबल करप्शन इंडेक्स 2017 के अनुसार भारत का क्रमांक 81/180 है 180 देशों में से असमय स्थान पर है भारत को अंक आ जाना है बेहद चिंतनीय बहुत शर्मनाक स्थिति को दर्शाता है। वर्तमान में भारत एक बड़ी ताकत के रूप में वैश्विक मंच पर अपनी छाप छोड़ रहा है वहीं दूसरी तरफ भ्रष्टाचार के मामले में दिन-प्रतिदिन नए-नए मामले सामने आ रहे हैं जो कि भारत की छवि को तार तार कर रहे हैं। एशिया के अति पिछड़े देश में भ्रष्टाचार व अन्य सुविधाओं के मामले में भारत से आगे निकलते नजर आ रहे हैं। भारत को एशिया महाद्वीप पर अपना स्थायित्व स्थापित करने के लिए ट्रांसपेरेंसी को बढ़ाना होगा तभी भारत है एशिया में अपनी छवि को सुधार सकता है।

भारतवर्ष में भ्रष्टाचार को लेकर बड़े-बड़े आंदोलन भी किए गए लेकिन परिणाम बेहद निराशाजनक रहे वर्तमान युग आधुनिक सूचना प्रौद्योगिकी की सुगमता से भ्रष्टाचार से निजात पाई जा सकती है। इस संदर्भ में सरकार को कड़े से कड़े नियमों का निर्धारण करके भ्रष्टाचार को मिटाना होगा ताकि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में एक साधारण से साधारण व्यक्ति तक भी सरकारी तंत्र की सुविधाओं की धरातलीय पहुंच सुनिश्चित की जा सके अन्यथा आम आदमी का विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र से विश्वास उठता जाएगा।

भ्रष्टाचार तथा घोटालेबाजी भारत को अंदर से खोखला करती जा रही है आम आदमी इसकी चपेट में पिस्ता जा रहा है धनिक तंत्र भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभाता है। व्यापार की आड़ में या राजनीतिक सरकारी व गैर सरकारी तंत्र की सहभागिता के कारण भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता है। अमीर व्यक्ति दिन प्रतिदिन अमीर होता जा रहा है जबकि गरीब व्यक्ति और भी गरीब बन रहा है

(लेखक कर्म सिंह ठाकुर मंडी ज़िले के सुंदरनगर से हैं। उनसे ksthakur25@ gmail. com या 98053 71534 पर संपर्क किया जा सकता है।)

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(ऊपर लेखक के निजी विचार हैं)

पक्के हिंदू मगर जातिवाद के कट्टर विरोधी थे शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती

राजेश वर्मा।। शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती जी एक ऐसी शख्सियत जिन्हें धर्मगुरु कहें, समाजसेवी कहें या सनातन धर्म के प्रचारक प्रसारक कहें या कुछ और? जमाने के साथ चलने वाले शंकराचार्य का चले जाना दुखद ही नहीं बल्कि देश व समाज के लिए अपूरणीय क्षति है। भारतीय संस्कृति को नए जमाने के साथ चलते हुए कैसे संरक्षित रखा जा सकता है यह इनसे बेहतर आजतक कोई नहीं कर पाया। इन्होनें न केवल सनातन धर्म की रक्षा की बल्कि सनातन धर्म के प्रति फैली भ्रांतियों को भी दूर करने का हर संभव प्रयास किया।

सभी जानते हैं सनातन धर्म में किस तरह जाति वर्ग विशेष का बोलबाला रहा लेकिन यह पहले शंकराचार्य हुए जिन्होनें ऐसे सनातन धर्म की परिभाषा गढ़ी जिसमें सभी जाति वर्ग के लोगों को एक सूत्र में पिरोने की बात कही गई। यही वजह थी कि यह सबके लिए पूजनीय भी थे। आज भले ही राजनीतिक दल धर्म के नाम पर राजनैतिक रोटियाँ सेंकते रहें परंतु जयेंद्र सरस्वती ने धर्म के नाम पर हिंदू समाज को हमेशा जोड़ने का काम किया व सनातन की तरफ मोड़ने का काम किया। जिस तरह अपने-अपने धर्म की रक्षा व आस्था बनाए रखने के लिए सभी प्रयासरत रहते हैं वही काम इन्होनें किया। भारत देश की जिस संस्कृति का उल्लेख हमें हमारे ग्रंथों, वेदों व अन्य स्त्रोतों में मिलता है उसी बहुमूल्य धरोहर को बनाए रखने के लिए जयेंद्र सरस्वती जी ने अपना पूरा जीवन लगा दिया।
Sri Jayendra Saraswathi Shankaracharya
शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती जी का जन्म 18 जुलाई 1935 में तमिलनाडु के तंजावुर जिले में हुआ। माता-पिता ने उन्हें सुब्रमण्यम महादेवन नाम दिया। शंकराचार्य जी बचपन से ही अन्य बच्चों से अलग व बेहद कुशाग्र बुद्धि के धनी थे कम उम्र में ही वो हिंदू धर्म में सबसे अहम व शक्तिशाली समझे जाने वाली कांची कामकोटी पीठ में आ गए। केवल 19 साल की उम्र में ही अति प्राचीन कांची कामकोटी पीठ के उत्तराधिकारी के तौर पर 69वें शंकराचार्य के रूप में इनका अभिषेक हुआ। महज इतनी छोटी आयु में ही इन्होंने सांसारिक जीवन को त्याग कर अपने आध्यात्मिक सफर की शुरुआत की। वैसे तो इनसे पहले कई शंकराचार्य रहे लेकिन इनमें बहुत कुछ ऐसा था जो इन्हें अन्य सभी से अलग करता था। इन्होंने नई परिभाषाएं गढ़ी, सीमाओं और बंधनों को तोड़ा कांची मठ्ठ को जमाने के साथ चलाया।
जातिवाद विरोधी
जयेंद्र सरस्वती ही पहले शंकराचार्य थे जिन्होंने हिंदू धर्म की खुल कर पैरवी की लेकिन इस पैरवी में इन्होनें हिंदू धर्म को किसी जाति विशेष की जागीर बनने की पैरवी नही की। जातिगत सीमाओं को तोड़ते हुए धर्म को नई राह दिखाने के लिए इन्होनें ही सबसे पहले दलितों के मंदिर प्रवेश की वकालत करने के साथ-साथ दलितों को मंदिर में प्रवेश देने का अभियान चलाया। वहीं धर्म परिवर्तन का पुरजोर विरोध किया। आलोचक व अन्य राजनैतिक दल इन पर भाजपा व हिंदू संगठनों के फायदे की राजनीति करने का आरोप भी लगाते रहे हलांकि वह पहले शंकराचार्य थे, जिन्होंने अपने राजनीतिक विचारों को दबाने की बजाए उन पर खुलकर बोलने का काम किया। शायद यह भी एक प्रमुख वजह थी जिसके चलते तमिलनाडु में  करुणानिधि की डीएमके की आंखों में खटकने से लेकर  जयललिता तक इनकी ठन गई।
अपने समय में इन्होंने सनातन परंपराओं की स्थापना के लिए अपनी सोच व दर्शन में हिंदू समाज को जिस तरह आगे रखा, वह सचमें अलग था। जयेंद्र सरस्वती जी बेहद विद्वान थे,सभी वेदों व हिंदू दर्शन से जुड़े तमाम धर्म ग्रंथों का उन्हें बहुत गहरा ज्ञान था।  घंटों तक संस्कृत में वेदांत व उपनिषदों पर धारा प्रवाह बात करते। यह सब किसी साधारण धर्म गुरु के बस की बात नहीं थी। जैसे ही इन्होनें कांची कामकोटी पीठ की कमान संभाली  उसके बाद ये मठ्ठ आध्यात्मिक और आर्थिक शक्ति का बड़ा केंद्र बनकर उभरता गया। शुरू में उनकी सक्रियता की किसी को भी समझ नहीं लगी सभी के लिए पहेली बन गए लेकिन धीरे-धीरे सभी समझने लग गए की बदलते समय के साथ यदि हम नहीं बदले तो जमाना हमें बदल देगा। यही वह चीजें थी जिसने मठ को धार्मिक कार्यों के साथ-साथ सामाजिक कार्यों की तरफ भी सक्रियता दिखाने पर मजबूर किया। इस सब के पीछे शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती जी की ही सोच व दूरदर्शिता थी। इन्हीं के समय में शिक्षा व स्वास्थ्य के क्षेत्र में बड़े-बड़े प्रोजेक्ट पर काम शुरू हुआ।

जयेंद्र सरस्वती की पहल से ही मुफ्त अस्पताल, शिक्षण संस्थान और बेहद सस्ती कीमत पर उच्च शिक्षा देने के लिए विश्वविद्यालय तक संचालित किए गए । चेन्नई स्थित शंकर नेत्रालय आज की तारीख में देश का सबसे बड़ा और आधुनिक सुविधाओं वाला आंखों का अस्पताल है और इस अस्पताल की खास बात यह है कि यहां किसी भी धर्म जाति व राजनैतिक दल से संबंध रखने वाला शख्स यहां स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ ले सकता है और लाभ ले भी रहें हैं। ऐसा ही एक अस्पताल बाद में गुवाहाटी में भी खोला गया। बहुत से और अस्पतालों व स्कूलों की शुरुआत भी इन्हीं की देन है, इनके शंकराचार्य बनने के बाद कांची मठ केवल धार्मिक संस्थाओं तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि कई ट्रस्ट, शैक्षिक संस्थान व स्वास्थ्य के कामों को संचालित करने का केंद्र भी बन गया।

अयोध्या में मंदिर निर्माण के बड़े पैरोकार के तौर पर भी इन्हें याद रखा जाएगा जब अटल जी की सरकार केंद्र में सत्ता में आई तो शंकराचार्य इस मामले में काफी सक्रिय दिखे। वह मंदिर निर्माण के बड़े पैरोकार बनकर उभरे, यहां तक की मृत्यु से कुछ समय पहले भी उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में कहा कि अयोध्या में हर हाल में मंदिर बनना चाहिए।

देश में शंकराचार्य परंपरा 9वीं सदी से चली आ रही है। समय के साथ शंकराचार्यों ने सनातन हिंदू धर्म जागरण के लिए तमाम काम किए, देशभर में लगातार यात्राएं की इसी परंपरा को आगे बढ़ाने वाले शंकराचार्य रहे जयेंद्र सरस्वती, लेकिन उन्होंने अपनी भूमिका को और ज्यादा बड़े परिप्रेक्ष्य में देखा उसे विस्तार भी दिया। उनसे मिलने वाले भी उनकी विद्वता व जटिल चीजों को समझने की क्षमता से चकित रह जाते थे। पूर्ववर्ती शंकराचार्यों की तरह वो कई भाषाओं पर अधिकार रखते थे और माना जाता था कि वह भी कई ईश्वरीय शक्तियों से लैस हैं। बेहद साधारण जीवन व्यतीत करने वाले जयेंद्र सरस्वती जी से मिलना कठिन नहीं था। कई बार में उन्होंने ऐसे काम भी किए कि लोग हैरान रह गए, 1987 में उन्होंने अचानक मठ्ठ छोड़ दिया किसी को पता नहीं चला की वह कहां गए। यह खबर देशभर के अखबारों में सुर्खियां बन गई। दो तीन दिन बाद पता लगा कि वो कर्नाटक में हैं।

देश के उनके अनुयायियों से लेकर व खुद उनके लिए साल 2004 बडा़ मुश्किलों भरा रहा जब जयललिता के मुख्यमंत्री रहते हुए शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती को बड़ी बेअदबी के साथ गिरफ्तार किया गया। कहते हैं कि कार्तिक का महीना शुरू होने वाला था इसे देखते हुए जयेंद्र सरस्वती आंध्र प्रदेश के महबूबनगर में त्रिकाल संध्या पूजन की तैयारी कर रहे थे। उन्हें पूरी रात जागकर पूजा करनी थी लेकिन इसी दौरान तमिलनाडु की तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता के आदेश पर जयेंद्र सरस्वती को पूजा के बीच से पुलिस गिरफ्तार करके चेन्नई ले आई। मठ के मैनेजर शंकर रामन की हत्या की साजिश रचने का आरोप इन पर लगाया गया था। हालांकि जयेंद्र बार बार कहते रहे कि इससे उनका कोई लेना देना नहीं है लेकिन राजनैतिक प्रतिशोध के चलते जयललिता अड़ी रही।
जयललिता सरकार के इस कदम के खिलाफ पूरे देश में गुस्सा भड़का,विरोध प्रदर्शन भी हुए। निचली अदालत ने उन्हें तीन बार जमानत देने से मना कर दिया बाद में उन्हें  सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल गई। अंततः वह इस मामले से बरी भी हो गए। इस हत्याकांड में शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती और उनके उत्तराधिकारी विजयेंद्र सरस्वती के गिरफ्तार होने के बाद आध्यात्मिक मठ की रौनक गायब हो गई थी। जहां एक समय इस मठ में बड़े राजनेताओं से लेकर तमाम सेलीब्रिटी व सितारों का मेला लगा रहता था वहीं इसके हत्याकांड के बाद लोगों ने कई सालों तक इससे किनारा कर लिया  मगर पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी इस मिथक को तोड़ते हुए मठ में दर्शन के लिए पहुंचे और पुनः लोगों का आवागमन होने लगा।
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एक तरफ जयललिता तो दूसरी तरफ दूसरी तरफ डीएमके प्रमुख करुणानिधि जयेंद्र सरस्वती की राजनीतिक सक्रियता से इस कदर खफा थे कि उन्होंने ठान लिया था कि इस मठ को सरकार के नियंत्रण में लेकर रहेंगे लेकिन सांच को आंच क्या? करुणानिधि चाहकर भी ऐसा नहीं कर पाए इसके बाद तो कांची मठ और मजबूत होकर उभरा, न केवल देश में ही बल्कि प्रवासी भारतीयों के साथ जाने माने राजनीतिज्ञों का संरक्षण भी इसे मिला। अब इससे बड़ा सम्मान और क्या हो सकता है कि तमिलनाडु आने वाला कोई भी केंद्रीय मंत्री, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति अपने कार्यक्रम में कांची मठ्ठ का दर्शन जोड़ना नहीं भूलता है।
मैं समझता हूं कि हिंदू दर्शन व सनातन के लिए जो कुछ इनके द्वारा किया गया वह भारतीय संस्कृति व हिंदू समाज के लिए बहुत कुछ भंडारण कर गया। आने वाले समय में उनकी इस विरासत को उनके बाद बनने वाले उनके उत्तराधिकारी विजेंद्र सरस्वती जी के लिए किसी चुनौती से कम न होगा क्योंकि किसी चीज़ को उपर ले जाने से भी ज्यादा कठिन है उस ऊंचाई को बरकार रख पाना। सभी जानते हैं आज सनातन धर्म किस दौर से गुजर रहा है। खुद अपने लोग ही ऊंगलियां उठा रहे हैं। राजनीतिज्ञों के लिए हिंदू व सनातन केवल राजनीति का विषय बन कर रह गया है उन्हें इससे कोई लेना-देना नहीं की आज खुद उनकी पहचान इसी सनातन से है।

(स्वतंत्र लेखक और शिक्षक राजेश वर्मा बलद्वाड़ा, मंडी के रहने वाले हैं और उनसे 7018329898 पर संपर्क किया जा सकता है।)

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पिछली सरकारों की राह चली जयराम सरकार, तीसरी बार लेगी कर्ज

शिमला।। दो महीने के अंदर पहले ही दो बार 500-500 करोड़ रुपये का कर्ज ले चुकी जयराम सरकार अब तीसरी बार 500 करोड़ रुपये का कर्ज लेने जा रही है। ध्यान देने वाली बात यह है कि जो जानकारी सामने आ रही है, उसके मुताबिक यह कर्ज तो लिया जाएगा विकास कार्यों के नाम पर, मगर इसे खर्च किया जाएगा वेतन और पेंशन देने पर (स्रोत)।

हिमाचल प्रदेश पर पहले ही 45 हज़ार करोड़ रुपये से ज्यादा का कर्ज है और अब कर्मचारियों और पेंशनरो को लाभ आदि देने में पैसा कम पड़ रहा है। इसलिए पिछली सरकारों के समय चला आ रहा कर्ज लेने का दुष्चक्र टूट नहीं रहा और जयराम सरकार भी इसी राह पर चल रही है।

यह स्पष्ट है कि हिमाचल प्रदेश के खर्च ज्यादा हैं और आय के साधन कम। ऐसे में पहले से ही कर्ज में डूबा प्रदेश और कर्ज में डूबा चला जा रहा है क्योंकि सरकारें यह नहीं सोच रही कि हिमाचल कैसे अतिरिक्त आय कर सकता है। गुरुवार को वित्त विभाग ने कर्ज के लिए अधिसूचना जारी की है और इसके लिए सरकार अपनी प्रतिभूतियां बेचेगी।

नई सरकार ने अब तक एक भी कदम ऐसा नहीं उठाया है जिससे प्रदेश के लिए आय के नए स्रोत विकसित हों या फिर पहले से ही मौजूद स्रोत और आय देने लगें। हां, इधर-उधर के खर्च बढ़ाने के लिए तरह-तरह के ऐलान जरूर कर दिए हैं। कहावत है- पैसा बचाना भी पैसा कमाने के बराबर है। मगर नई सरकार इस दिशा में कुछ करती नजर नहीं आ रही।

होली ऐसे मनाई, जंगल से दारू की बोतलें उठाकर की सफाई

मंडी।। गुरुवार को मंडी में जब धूमधाम से होली मनाई जा रही थी, बहुत से युवा बाइकों पर बिना हेलमेट मस्ती करते नजर आए तो कुछ जंगल में शराब पीकर जश्न मनाते हुए फेसबुक लाइव करते भी नजर आए। मगर क्या होली मस्ती का ही त्योहार है? और होली के अलावा वैसे भी जंगल में दारू अडवेंचर पर निकलने वाले लोग वहां से वापस आते समय बोतलें, नकमीन के रैपर या खाने की पैकिंग वापस लाकर सही जगह फेंकते हैं?

ज्यादातर का जवाब नहीं होगा, मगर होली के दिन मंडी के कांगणा माता मंदिर के पास लगे इसी तरह के कचरे के अंबार को साफ कर दिया गया है। मंदिर के पास जंगल में शराब, बियर, पानी की खाली बोतलों और पॉलिथीन के ढेर लगे हुए थे। मगर भारतीय जनता पार्टी के युवा नेता प्रवीण शर्मा ने अपनी फेसबुक पोस्ट पर कुछ तस्वीरें डाली हैं और बताया है कि उन्होंने चार घंटे में मंदिर के आसपास के जंगल की सफाई की है। ये वही प्रवीण शर्मा हैं जिन्हें इस बार विधानसभा चुनाव में बीजेपी के टिकट का दावेदार माना जा रहा था।


बहरहाल, सोशल मीडिया पर इस पहल की चर्चा हो रही है और बहस छिड़ी है इसी तर्ज पर धार्मिक स्थलों और अन्य जगहों को साफ-सुथरा रखा जा सकता है। युवक मंडल और गांव के युवाओं के समूह महीने में एक दिन निकालकर इस तरह के अभियान तो चला ही सकते हैं, साथ ही प्रण भी कर सकते हैं कि जंगल में किसी भी काम पर जाएं तो कचरा वहीं फेंकने के बजाय वापस ले आएं।

वरिष्ठ आईएएस ऑफिसर तरुण श्रीधर का केंद्र सरकार में तबादला

शिमला।। हिमाचल प्रदेश के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी तरुण श्रीधर का तबादला भारत सरकार में सचिन (पशु एवं मत्स्य पालन विभाग) में हो गया है। अभी वह हिमाचल में अडिशनल चीफ सेक्रेटरी (पशुपालन विभाग) थे।

1984 बैच के आईएएस ऑफिसर श्रीधर को कुछ महीने पहले भारत सरकार में सचिव के लिए सूची में शामिल किया गया था और वह पोस्टिंग का इंतजार कर रहे थे। दो बार वह केंद्र में सेवाएं दे चुके हैं। एक बार पेट्रोलियम और एक बार कृषि मंत्रालय में।

हिमाचल प्रदेश में वह विभिन्न पदों पर चुके हैं, जिनमें अडिशनल चीफ सेक्रेटरी (पावर, पर्सनेल, वन और पर्यावरण) शामिल है।

पढ़ें: मिसाल पेश करने वाले प्रशासनिक अधिकारी- तरुण श्रीधर और संदीप कदम

पढ़ें: …जब 24 साल बाद लौटा जनता का चहेता अफसर

लेख: हिमाचल की लचर स्वास्थ्य सुविधाओं को ऐसे सुधार सकती है सरकार

कर्म सिंह ठाकुर।। सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में दिन प्रतिदिन सुविधाएं गर्त में जा रही है। सुबह ही लंबी लंबी कतारें हर अस्पताल की कहानी बनी हुई है। पर्ची बनाने के लिए ही लंबी लंबी कतारों में घंटों लग जाते हैं उसके उपरांत डॉक्टर साहब से उपचार के लिए लंबे समय तक इंतजार करने के उपरांत बारी आती है। एक साधारण सी बीमारी के लिए भी पूरा दिन दर-दर की ठोकरें खानी पड़ती है और डॉक्टर साहब ने कहीं कोई टेस्ट है लिख दिया तो 2 से 3 दिन का समय है लग जाता है। यदि कोई क्रिटिकल बीमारी सामने आती है तो कई महीनों तक सरकारी अस्पतालों में चक्कर काटने पड़ते हैं। ऐसी व्यवस्था में स्वास्थ्य लाभ पाना अति कठिन दुखदाई प्रतीत होता है।

हिमाचल प्रदेश पूरे भारतवर्ष में स्वास्थ्य पर खर्च करने में एक अग्रणी राज्य के रूप में जाना जाता है। सरकार द्वारा बहुत सी सुविधाएं हॉस्पिटलों में मुहैया करवा दी गई है लेकिन अस्पताल का प्रशासन इन सुविधाओं की धरातलीय बहुत से सुनिश्चित करने में लाचार नजर आता है। एक तरफ सरकारी डॉक्टरों सहायक स्टाफ तथा नर्सों द्वारा चलाया जाने वाला भाई भतीजावाद तथा जान पहचान पर अपने चहेतों को कतारों से हटकर स्वास्थ्य चेकअप करवाया जाता है। हर रोज करीब-करीब सभी सभी स्वास्थ्य संस्थानों में इस तरह का खुल्लम खुल्ला ड्रामा देखने को मिलता है। गरीब असहाय तथा लाचार व्यक्ति पूरा पूरा दिन लंबी लंबी कतारों में खड़ा होकर अपनी बारी के इंतजार में रहता है तो दूसरी तरफ जान पहचान वालों को पीछे के दरवाजे से उपचार किया जाता है जो कि बहुत ही निंदनीय तथा शर्मनाक है।

जगह-जगह अस्पतालों में अच्छी सुविधाएं न होने पर बड़े अस्पतालों पर बोझ बढ़ रहा है।

अक्सर गर्भवती महिलाओं वृद्धों बच्चों को सरकारी संस्थानों में दर-दर की ठोकरें खानी पड़ती है। हर तीसरे दिन समाचार पत्रों में भी इस तरह की घटनाएं प्रकाशित होती रहती है लेकिन कोई भी इन सुविधाओं को तंदुरुस्त करने के लिए प्रयासरत नहीं दिखता है।

सरकारी अस्पतालों में फैली यह कुव्यवस्था गले की फांस बनी हुई है जब कोई व्यक्ति बीमार होता है तो उसे आर्थिक बोझ भी उठाना पड़ता है। एक तरफ महंगाई आसमान छू रही है तो दूसरी तरफ दवाइयों के दाम भी बहुत ही तीव्र गति से बड़े हुए हैं तथा सरकारी हॉस्पिटलों में फैली अव्यवस्था और भी परेशान कर देती है। ऐसे में सरकार को ही आगामी बजट में कठोर कदम उठाने होंगे ताकि हिमाचल प्रदेश का गरीब से गरीब जरूरतमंद व्यक्ति तक सरकार द्वारा चलाई जा रही स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ पहुंचाया जा सके।

इसमें सर्वप्रथम पर्ची बनाने की प्रक्रिया लगभग सभी सरकारी अस्पतालों में कंप्यूटर के माध्यम से पूरी की जा रही है, जैसे किसी मरीज की एंट्री उस कंप्यूटर पर होती है तो मरीज का आधार नंबर भी पर्ची के साथ में जोड़ दिया जाए तथा मरीज से पूछा जाए कि किस तरह की समस्या से ग्रसित है। उसी पर्ची पर कंप्यूटर से ही उसे वार्ड नंबर तथा डॉक्टर को दिखाने के लिए उसका क्रमांक नंबर भी उस पर्ची पर ही दर्शाया जाना चाहिए। जबकि वर्तमान में यह नंबर डॉक्टर साहब के कमरे के बाहर खड़े सुरक्षा कर्मियों द्वारा दिया जाता है जो कि जान पहचान वालों को वरीयता देते हैं तथा भ्रष्टाचार का प्रथम चरण यहीं से शुरू हो जाता है। यदि सरकार आगामी बजट में पर्ची पर ही संबंधित डॉक्टर का क्रमांक नंबर भी दर्शा दें तो इस समस्या से बचा जा सकता है।

इसी तरह से जब डॉक्टर साहब मरीज के लिए कोई टेस्ट या अन्य दवाई पर्ची पर लिखें तो मरीज को उसकी एंट्री करवानी सुनिश्चित की जाए इस व्यवस्था से मरीज की पूरा विवरण सरकारी अस्पतालों में बना रहेगा तथा जब भी अगली बार अपना चेकअप करवाने के लिए स्वास्थ्य संस्थान में आएगा तो आधार नंबर से ही उसकी पर्ची बनेगी तथा पिछली बीमारियों का विवरण भी प्रिंट हो जाएगा। इससे डॉक्टर साहब को मरीज का सही व उचित उपचार करने में सहायता मिलेगी तो वहीं दूसरी तरफ मरीजों को भी स्वास्थ्य लाभ में बेहतर सेवाओं का अहसास होगा। इस प्रक्रिया को संपन्न करने के लिए सरकार को कोई अतिरिक्त वित्तीय संसाधन जुटाने की भी आवश्यकता नहीं है। सरकारी अस्पतालों में जो सॉफ्टवेयर वर्तमान में काम कर रहा है, उसी में आधार नंबर से पर्ची को बनाना तथा विवरण को सेव करने का अतिरिक्त काम करना बाकी है।

यह भी सुनने में आता है कि डॉक्टरों द्वारा महंगी महंगी दवाइयां लिखी जाती है तथा कमीशन बटोरी जाती है। यदि डॉक्टरों द्वारा परामर्श की गई दवाएं गलत पाई जाती है तो डॉक्टरों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। कई बार डॉक्टरों की लापरवाही द्वारा मरीजों की जान तक चली जाती है। देखिए, किसी भी व्यक्ति को किसी भी व्यक्ति के जीवन से खेलने का कोई भी अधिकार नहीं है। यदि किसी डॉक्टर के कारण किसी मरीज को जान की हानि होती है तो इस संदर्भ में सरकार को अति कठोर नियम बनाने होंगे ताकि किसी भी तरह की कोताही बरतने पर डॉक्टर को दंडित किया जा सके। जो डॉक्टर सरकार के निर्देशानुसार सही कार्य करें उसे सरकार द्वारा पुरस्कृत करने का भी प्रावधान आगामी बजट में किया जाना चाहिए।

समाचार पत्रों में यह खबरें प्रकाशित की जा रही है कि गर्भवती महिलाओं को जिला मंडी सुंदर नगर कुल्लू में भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। मंडी जिला में तीन से चार गायनी स्पेशलिस्ट डॉक्टर कार्यरत है इन्हीं डॉक्टरों का बारी-बारी डेपुटेशन पर मंडी सुंदरनगर रति कुल्लू में 15 दिनों के लिए या 1 महीने के लिए तैनाती दी जाती है जिस कारण यह डॉक्टर भी गर्भवती महिलाओं का सही ढंग से जांच करने में असमर्थ है। इस संदर्भ में सरकार को इन डॉक्टरों के स्थाई आदेश करने होंगे ताकि किसी एक जगह पर एक डॉक्टर द्वारा ही मरीजों का पूरा इलाज किया जाए तथा लोगों को इधर-उधर ना भटकना पड़े।

अस्पतालों की स्थिति सुधारी जानी चाहिए

वर्तमान में प्रचलित इस अव्यवस्था से निजी संस्थानों के डॉक्टरों को भारी लाभ पहुंच रहा है। मजबूरी में गरीब असहाय मजदूर व जरूरतमंद व्यक्तियों को प्राइवेट अस्पतालों में जाना पड़ता है, जहां पर मन चाहे दामों पर स्वास्थ्य सेवाएं बेची जाती हैं। इन पर भी सरकार को आगामी बजट में लगाम लगानी होगी। प्राइवेट स्कूलों की तरह निजी अस्पतालो की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। जो अच्छे डॉक्टर हैं वे सरकारी अस्पतालों से रिजाइन करके अपने क्लीनिक खोल रहे हैं। बहुत सी जगहों पर तो बाहरी राज्यों के डॉक्टरों ने भी अपना अधिपत्य जमाना शुरू कर दिया है। जब सरकारी तंत्र में इतनी सारी त्रुटियां होगी तो निजी अस्पतालों का व्यापार खूब बढ़ेगा। इस संदर्भ में सरकार को कड़े दिशा-निर्देश आगामी बजट में तैयार करने होंगे ताकि सरकारी अस्पतालों से ही सभी व्यक्तियों को स्वास्थ्य लाभ मिल सके।

हाल ही में बिलासपुर के क्लीनिक में शिशु लिंग जांच का मामला सामने आया जो कि प्रदेश को शर्मसार करता है। प्रदेश की छवि एक इमानदार कर्मठ व मेहनतकश निवासियों के रूप में की जाती है। पर यदि स्वास्थ्य सेवाओं में इसी तरह की भी लापरवाही बरती गई तो आने वाले दिनों में हिमाचल की छवि बाहरी राज्यों जैसी बन जाएगी। समय रहते ही सरकार को स्वास्थ्य सेवा में सजगता बरतनी होगी तथा कई प्रशासनिक नियमों का निर्धारण भी करना होगा। इसकी अवहेलना करने पर सख्त दंड की प्रवृत्ति को अपनाना होगा।

मार्च महीने में प्रदेश सरकार द्वारा वर्ष 2018 19 का बजट पेश किया जाएगा। इस बार का बजट मंडी जिले के प्रथम मुख्यमंत्री माननीय श्री जयराम ठाकुर जी द्वारा प्रस्तुत किया जाएगा जिनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि गरीब ईमानदार दूरदराज के क्षेत्र का स्पष्ट उदाहरण प्रस्तुत करती है। हाल ही में माननीय मुख्यमंत्री जी के गृह क्षेत्र में भी सरकारी सुविधाओं में बरती जा रही लापरवाही की खबरें मीडिया में आई थीं। इस बजट में प्रदेश की जनता माननीय मुख्यमंत्री जी से यह गुहार लगाती है कि सरकारी संस्थानों में धूल फांक रही मशीनरी भाई भतीजावाद ब कुव्यवस्था से निपटने के लिए बजट में कठोर प्रावधान किए जाएं। माननीय मुख्यमंत्री जी की पृष्ठभूमि जिस तरह की है, अधिकतर हिमाचली भी उसी पृष्ठभूमि मैं अपना जीवन यापन का निर्वहन करते हैं और मुख्यमंत्री जी इस तरह की कुव्यवस्था को भली-भांति समझ सकते हैं।

(लेखक कर्म सिंह ठाकुर मंडी ज़िले के सुंदरनगर से हैं। उनसे ksthakur25@ gmail. com या 98053 71534 पर संपर्क किया जा सकता है।)

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जानें, क्या है रोहतांग का अर्थ और इस दर्रे का नाम ऐसा क्यों पड़ा

समुद्र तल से लगभग 3980 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है रोहतांग दर्रा। यह दर्रा सड़क यातायात के मामले में हिमाचल प्रदेश का सबसे खतरनाक दर्रा है। दर्रा यानी वह संकरा रास्ता, जिससे होकर पहाड़ियों को पार किया जाता है। दर्रे को स्थानीय भाषा में जोत भी कहते हैं।

इस दर्रे के नाम ‘रोहतांग’ का अर्थ है- शवों वाला इलाका। यह सच है कि इस दर्रे से पैदर गुजरते हुए असंख्य लोगों ने अपने प्राण गंवाए हैं। संभवत: इसीलिए इसका नाम रोहतांग रखा गया है। इससे पहले इसे भृगुतुंग नाम से भी जाना जाता था। दरअसल तिब्बती भाषा में རོ་ (Ro, रो) का अर्थ होता है शव और ཐང་། (thang, तांग) का अर्थ होता है- मैदान।

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तस्वीर: admis.hp.nic.in

दंतकथा
वैसे इसे लाशों वाला मैदान यानी रोहतांग कहे जाने के पीछे भी एक कहानी बताई जाती है। जम्मू कश्मीर रियासत के सेनापति जनरल जोरावर सिंह ने कुल्लू रियासत पर आक्रमण किया और कुल्लू को जीतकर खूब पैसा बटोरा। जोरावर सिंह के मन में लाहौल-स्पीति को जीतने की भी इच्छा आई।

जोरावर ने सेना के साथ कुल्लू से लाहौल स्पीति का रुख किया परन्तु भृगुतुंग जोत (वर्तमान रोहतांग) को पार करते करते सेना समेत जोरावर सिंह बर्फीले तूफ़ान की चपेट में आ गए। मौसम ने ऐसा कहर बरपाया कि पूरी सेना के साथ बर्फ में दबकर मृत्यु को प्राप्त हुए।

गर्मियों का मौसम आया तो कुल्लू की ओर तिब्बत से आने वाले लोग यहां से होकर गुजरे। पिघली हुई बर्फ के नीचे शवों के ढेर देखकर वे डर गए। मनाली पहुंचे तो पता चला कि डोगरा सेनापति जोरावर सिंह ने यहां से आक्रमण की कोशिश की थी। तब उन्हें मामला समझ आया।

इसके बाद बहुत से लोग इकट्ठे हुए, उन्होंने शवों को यहां से निकालकर मनाली के पास एक समतल जगह पर रखा और अंतिम संस्कार किया। इसी जगह का नाम मढ़ी पड़ा। पंजाबी में श्मशानघाट या समाधि को भी मढ़ी कहते हैं। ऐसी जगह, जहां पूर्वजों का अंतिम संस्कार होता था, वहां पत्थर या ईंटों का ढेर लगाकर समाधि यानी मढ़ी सी बना दी जाती है, जिसपर परिवार के सदस्य दिये जलाया करते हैं। हिमाचल के कुछ इलाकों में भी श्मशान को मढ़ी कहा जाता है।

हालांकि यह भी कहा जाता है कि जोरावार सिंह की मौत रोहतांग में हीं, तिब्बत में हुई थी। तिब्बत में एक अभियान के दौरान बर्फीले मौसम में उन्हें और उनकी सेना को मुश्किल हालात का सामना करना पड़ा था। ऐसे में तिब्बतियों और उनके चीनी सहयोगियों के साथ तो-यो की लड़ाई में 12 दिसंबर 1841 की लड़ाई में जख्मी हो जाने के कारण उनका निधन हुआ बताया जाता है।

मगर ऊपर बताई गई दंतकथा के अलावा भी रोहतांग में अचानक बदल जाने वाले मौसम के कारण कई लोगों ने दम तोड़ा है। और ये शव गर्मी होने पर ही सामने आते थे।तो भृगुतुंग में असंख्य शव मिलने के कारण ही इस दर्रे का नाम रोहतांग पड़ गया जो आज तक चलन में है।

संकलन: आशीष नड्डा

सबसे कम उम्र की प्रधान जबना ने किया हिमाचल का प्रतिनिधित्व

इन हिमाचल डेस्क। देश की सबसे युवा हिमाचल की जबना चौहान ने झारखंड की राजधानी रांची में LPG की प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत चल रहे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में हिमाचल का प्रतिनिधित्व किया। सम्मेलन में आए लोगों को संबोधित करते हुए मंडी की थरजूण पंचायत की प्रधान ने बताया कि प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना को प्रभावी ढंग से कैसे लागू किया जाए।

प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के लिए नए सिरे से अलग सर्वे करवाकर उसे पंचायत की ग्राम सभा में पारित करवाने का सुझाव रखते हुए अपने संबोधन में जबना चौहान ने कहा कि प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के लाभार्थी की सूची जनगणना-2011 के आधार पर तैयार की जाती है जबकि इसका चयन पंचायत रिकॉर्ड के आधार पर होना चाहिए। तभी सही मायने में केंद्र सरकार की इस महत्वपूर्ण योजना का उन गरीब महिलाओं को लाभ मिलेगा जो कि इसकी हकदार है।

जबना चौहान ने भारत सरकार से इस योजना मे BPL केलावा पंचायत में मौजूद उन परिवारों को भी शामिल करने की मांग उठाई है जो गरीब है और जिनकी आर्थिक स्थिति गैस कनेक्शन खरीदने के काबिल नहीं है। साथ ही जबना चौहान ने पंचायत स्तर पर महिलाओं को गैस के प्रयोग को लेकर समय-समय पर प्रशिक्षण देने की भी केंद्र सरकार से अपील की।

यही नहीं जबना चौहान ने केंद्र सरकार से महिलाओं को संबंधित विभाग में प्राथमिकता के आधार पर रोजगार देने और गैस डिस्ट्रीब्यूशन में प्राथमिकता देने की प्रभावी ढंग से मांग उठाई। प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना की सराहना करते हुए जबना चौहान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान व विभाग के अधिकारियों का इस योजना को देश में लागू करने के लिए आभार प्रकट किया।

जबना चौहान ने कहा कि यह मोदी सरकार का सामाजिक बदलाव वह महिला सशक्तिकरण को लेकर एक सराहनीय कदम है जिसने गांव की तस्वीर बदल कर रख दी है और गरीबी रेखा से नीचे रह रही महिलाओं के जीवन में इस योजना से एक बहुत बड़ा बदलाव पूरे देश में आया है।

हिमाचल में घर, गांव और राजनीति से लेकर देव परंपरा तक फैला है जातिवाद

हिमाचल प्रदेश में कुल्लू के चेष्टा स्कूली बच्चों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यक्रम में कथित रूप से जाति के आधार पर किए गए भेदभाव के बाद हिमाचल प्रदेश में जातिवाद को लेकर बहस छिड़ गई है। ‘इन हिमाचल’ ने इस संबंध में एक लेख प्रकाशित किया गया था, जिसमें यह कहा गया था कि कैसे अगड़ी जाति के कुछ लोग यह स्वीकार करने को ही तैयार नहीं हैं कि जातिवाद है ही। साथ ही वे जातिगत भेदभाव की आलोचना करने के बजाय आरक्षण को बीच में लाकर बहस की दिशा घुमाने की कोशिश करते हैं। इसी लेख में एक पाठक की ओर से टिप्पणी आई है, जो सभी को पढ़नी चाहिए। हम दीपक शर्मा नाम के पाठक की इस लंबी टिप्पणी को नीचे यथावत प्रकाशित कर रहे हैं।

दीपक शर्मा।। ये सही है कि हिमाचल में सिर्फ जात के लिए ज़िंदा जला देने के किस्से कभी नहीं सुने गए. यहां बगाव़ती मोहब्बतों का अंत गांव के बाहर लटकी लाशों में भी नहीं होता. अंतरजातीय जीवनसाथी खोजने का एक उदाहरण ख़ुद ये नाचीज़ है. लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि कुदरत की जन्नत में इंसान भी देवता हो चुके हैं. एक तरह से आज के हिंदुस्तान पर टिप्पणी ही है कि अगर कुछ हिमाचली महज़ इतने पर भी फख्र महसूस करने लगें.

कम से कम पहाड़ी हिस्सों में दलितों को विवाह-कारज का न्योता भी होता है. लेकिन ऊंची जातियों की पैंठ के बीच से अगर एक दलित बच्चा भी ग़लती से गुज़र जाए तो 100 के 100 लोग भी उठने में एक मिनट ना लगाएं. ज़िंदा इंसान की चमड़ी छील दें, उनके रीति-रिवाज पर दादागीरी चलाएं, ऐसी तासीर हममें नहीं है कम आबादी, कुदरती संपदा, उन्मुक्त जनजातीय संस्कृति की छाप और ज़मीन की मिल्कियत में अपेक्षाकृत कम विषमता का नतीजा है शायद. लेकिन अपने इर्द-गिर्द नज़र दौड़ाना ही काफ़ी है इस नतीजे तक पहुंचने के लिए कि जातिवाद का ज़हर हमारी ख़ूबसूरत फ़ज़ाओं में भी उतना ही घुला है जितना देश के किसी दूसरे हिस्से में.

शुतुरमुर्ग बने बैठे हैं तथाकथित अगड़ी जातियों के कुछ लोग

हिमाचल के दलितों में करीब 93 फीसदी गांवों में रहते हैं. ये वो इलाके हैं जहां इंसान अगर देवता हो जाएं तो भी दलितों की दुश्वारी नहीं सुलझेगी. बल्कि कई गुना बढ़ ही जाएगी. ऊपरी हिमाचल के मध्यम वर्ग का अधिकांश हिस्सा- जो पढ़-लिखकर शहर पहुंच चुका है- जाति के मामले में कहीं ज़्यादा लिबरल हो सकता था- लेकिन उसके आड़े वही देव-संस्कृति आ जाती है जिसपर हम सब गर्व करते हैं. निचले हिमाचल में अगड़ी जातियों के श्रेष्ठता-बोध का मनोविज्ञान थोड़ा अलग है. उस पर मध्यकाल में मैदान से पलायन करके बसे रजवाड़ों का असर दिखता है. लेकिन ज़मीनी परिणाम दलितों के लिए वही है.

प्रतीकात्मक तस्वीर

देवी-देवताओं के कर्मकांडों में भागीदारी की ड्यूटी हर जाति के होती है. सभी को देवता के उत्सव-कर्मकांडों के सालाना कैलेंडर के मुताबिक वक्त देना होता है. लेकिन निष्ठा का ढोल यहां भी दलितों के गले में ही ज़्यादा होता है. बमुश्किल परिवार का पेट पालने वाला बजंतरी कई-कई दिन भारी-भरकम वाद्य यंत्रों को ढोता है, आयोजनों में अगड़ी जातियों से चार सीढ़ी नीचे या 10 हाथ दूर बचे हुए खाना खाता है. घर की निचली मंज़िल पर मेहमानों के कमरों में अस्थायी तौर पर तब्दील गोशालाओं या गोदामों में ज़मीन पर ही सो जाता है.

ये सब बग़ैर दिहाड़ी. लेकिन देवता के मंदिर के भीतर जाना तो दूर उसके लिए देवता के रथ को छूना भी पाप होता है. देवता भी ऐसे जिनके कायदे राजा के वंशजों और ब्राह्मणों समेत अगड़ी जाति को साफ तौर पर वरीयता देते है. नाफ़रमानी की सज़ा- दैवीय प्रकोप का खौफ़. अक्सर दलितों के अपने अलग देवता होते हैं जो भव्य रथों, साज़ों और मंदिरों में नहीं चट्टानों, पेड़ों, खोखरों में ज़्यादा बसते हैं.

गांव के ताने-बाने से लेकर राज्य सरकार की मशीनरी तक- दलित हिमाचल में हर जगह हैं. राजनीति, किसानी-बाग़वानी, शिक्षा, सरकारी क्षेत्र, आप जहां चाहें देख लें. लेकिन जब बात ताकत देने की आती है तो किसकी चलती है इसका एक नमूना सियासत से ही मिलता है. नए बने मुख्यमंत्री का सरनेम ही इसकी गवाही देता है.

हिमाचल के अब तक के छह मुख्यमंत्रियों में पांच राजपूत रहे हैं. छठे बचे हुए शांता कुमार ब्राह्मण हैं. राज्य के पहले सीएम यशवंत सिंह परमार खुद राजपूत समुदाय से थे. यहां की दो बड़ी पार्टियों कांग्रेस और बीजेपी, दोनों के अब तक के सभी राज्याध्यक्ष इन्हीं दो जातियों से रहे हैं. मौजदगी रखने वाली तीसरी पार्टी सीपीएम भी दलितों को उनकी आबादी के अनुपात में नुमाइंदगी नहीं दे पाई है. यहां आज तक किसी पार्टी ने 17 आरक्षित सीटों के अलावा किसी दूसरी सीट पर कभी किसी दलित को टिकट नहीं दिया. दिल्ली की सियासत में दिखने वाले हिमाचल के सभी नेताओं के नाम गिनिए- अनुराग ठाकुर, सुखराम, आनंद शर्मा, जेपी नड्डा, शांता कुमार- सब के सब ब्राह्मण या राजपूत.

ये हालात तब हैं जब कुल आबादी के हिसाब से दलितों के अनुपात के मामले में हिमाचल (25.2 फीसदी) का नंबर देश भर में दूसरा है. इसकी तुलना में देश की आबादी का 16.2 फीसदी हिस्सा अनुसूचित जाति की श्रेणी में आता है. अगर ओबीसी को भी जोड़ दें तो ये तबका कुल आबादी का 38 फीसदी से कुछ ज़्यादा होता है जो तकरीबन 32 फीसदी वाले राजपूत समुदाय से भी ज़्यादा है.

हिंदुस्तान के नक्शे के कंठ से जब हम नीचे देखते हैं तो जाति और धर्म में बंटी सियासत का जर्जर चेहरा नज़र आता है. लेकिन ऐसे ध्रुवीकरण वाले राज्यों में कम से कम जाति की समस्या को स्वीकार तो किया गया है. हम अब भी अपनी मंथर गति से चलती ज़िंदगी में उनींदी आंखों के साथ आगे बढ़ रहे हैं. पहाड़ों में ज़िंदगी की शर्तें अभी इतनी गलाकाट नहीं बनी हैं कि इंसान को बर्बर बना दे. आइये इतने मूर्ख और दंभी भी ना बनें सच को ना पहचानें. शोषण और उसकी ओर आंखें बंद रखने की कोई जस्टिफिकेशन नहीं हो सकती- ना संस्कृति, ना ही पैदाइश.

(आप भी इस विषय पर या किसी अन्य विषय पर अपने लेख हमें inhimachal.in @ gmail.com या contact @ inhimachal.in पर ईमेल कर सकते हैं)

एचआरटीसी बस में ओवरलोडिंग, दम घुटने से बेसुध हुईं छात्राएं

एमबीएम न्यूज नेटवर्क, नाहन।। सोमवार को ओवरलोडिंग के चलते दम घुटने से स्कूल की दो छात्राएं बेसुध होकर गिर गईं। घटना सिरमौर जिले में डुंगाघाट-किलाकलांच सड़क पर चलने वाली एचआरटीसी बस की है। बस का रूट मेहंदोबाद से सराहां का था। यह रूट पर निगम की इकलौती बस सेवा है, ऐसे में लोगों को जान जोखिम में डालकर भी इससे यात्रा करनी पड़ती है। (कवर इमेज प्रतीकात्मक है)

सोमवार को हुई घटना अपवाद नहीं है। रोज बस की हालत ऐसी ही होती क्योंकि सवारियों को ठूंसकर भरना पड़ता है। सोमवार को छात्राओं के बस में बेसुध हो जाने से अफरा-तफरा फैल गई। हालांकि छात्राओं को बस से उतारकर खुली हवा में कुछ देर के लिए बिठाया गया, तब उन्हें होश आया।

छात्राओं को उतारने के लिए रोकनी पड़ी बस (IMAGE: MBM NEWS NETWORK)

100 सवारियां
गांववाले बताते हैं कि कई बार तो लगभग 100 यात्री बस पर सवार होते हैं। लोग मांग करते हैं कि अतिरिक्त बस चलाई जाए क्योंकि सवारियों की संख्या ज्यादा होती है। सराहां पंचायत ने भी प्रस्ताव भेजा है मगर उनका कहना है कि इस पर कोई सुनवाई नहीं हो रही।

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लोगों की चिंता इसलिए बढ़ रही है कि बोर्ड की परीक्षाएं शुरू होने वाली हैं, ऐसे में छात्रों को कहीं पैदल ही सफर न तय करना पड़े। रीजनल मैनेजर एचआरटीसी राशिद शेख ने कहा है कि उन्हें पंचाय की तरफ से कोई प्रस्ताव नहीं मिला है। हालांकि उन्होंने कहा कि बसों की कमी है और फिर भी समस्या को हल करने की कोशिश की जाएगी। उन्होंने बताया कि सोमवार को वैसे भीड़ ज्यादा होती है।

(यह एमबीएम न्यूज नेटवर्क की खबर है और सिंडिकेशन के तहत प्रकाशित की गई है)