गोट फार्मिंग को बिज़नस स्टार्टअप की तरह अपनाकर कमाएं लाखों

आशीष नड्डा।। भारत में पारम्परिक बकरी पालन सदियों से किया जा रहा है। देश के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग जातियां-जनजातियां भी पेशेवर तरीके से बकरी और भेड़ पालन करती रही हैं। इनमें मुख्यत: गड़रिया, पाल,बघेल,गाडऱी और गद्दी प्रमुख हैं। हिमाचल में प्रदेश में बड़े स्तर पर हालांकि गद्दी जनजाति भेड़ बकरी पालन बड़े स्तर पर करती है। प्रदेश में छोटे स्तर पर भी ग्रामीण आंचलों में लोग बकरियां और भेड़े पालते है।

दुनिया के अन्य देशों में भी बकरी और भेड़ पालने का रिवाज है। ऑस्ट्रेलिया और अन्य पाश्चात्य देशों में भेड़ और बकरी पालन अब पारंपरिक तरीकों से हटकर पेशेवर रूप में किया जा रहा है। लेकिन, भारत और हिमाचल में में अभी यह पेशा व्यावसायिक रूप नहीं ले पाया है। बकरी या भेड़ साल में दो बार और दो या दो से अधिक बच्चे देती हैं। इसका दूध,मांस और खाल भी उपयोगी है। यह बाजार में ऊंचे दाम पर बिकता है। बाजार में बकरी के मांस की लगातार मांग बढ़ रही है। भेड़ की ऊन की इतनी डिमांड है कि यह पूरी नहीं हो पा रही है।

आज भी अधिकांश ग्रामीण बिना किसी वैज्ञानिक जानकारी के आधार एवं व्यवसाय का आर्थिक विश्लेषण किए बिना बकरी पालन के धंधे में उतरते हैं। कुछ समय बाद इसके परिणाम व्यावसायिक फार्म के आशा के विपरीत होते हैं तो वे इस धंधे को कोसते हुए गोट फार्मस को बंद कर देते हैं। बकरी और भेड़ पालन में सबसे बड़ा नुकसान इनकी बीमारी से होता है। एक ही झटके में बीमारी से तमाम बकरियां या भेड़ मर जाती हैं। इसलिए लोगों को नुकसान होता है। अमूमन अपने प्रतिरक्षा तंत्र से बकरियां तमाम बीमारियों पर नियंत्रण रखती हैं परन्तु जैसे ही वातावरण में किसी प्रकार का परिवर्तन होता है वे अक्सर बीमार पड़ जाती हैं।

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स्टार्टअप बिजनेस की तरह ले गोट फार्मिंग को
भेड़ और बकरी पालन को एक व्यवसाय के रूप में लेने की जरूरत है। इसलिए परंपरागत सोच छोडक़र वैज्ञानिक तरीके से भेड़-बकरी पालन को करना चाहिए। प्रत्येक बकरी का टीकाकरण और बीमा जरूरी है। बकरी पालक अमूमन अपने आसपास बाजारों ,मंडियों आदि से बकरी खरीद लेते हैं। यह गलत है। भेड़-बकरी की उन्नतिशील प्रजातियों को पालना चाहिए। जैसे अधिक दूध देने के लिए गाय-भैंस को पाला जाता है। उन्नतशील प्रजातियां तमाम तरह की बीमारियों और संक्रमण से मुक्त होती हैं। ये अधिक दूध,मांस और ऊन देती हैं। इससे ज्यादा फायदा होता है।

व्यावसायिक तरीके से बकरी और भेड़ पालन करने पर एक बकरी पर प्रति वर्ष 5 से 7 हजार रुपए का खर्च आता है। अमूमन एक बकरी का बाजार मूल्य भी इससे कम या लगभग इतना ही रहता है। इसलिए नए व्यवसायी को इसमें लाभ प्राप्त करना मुश्किल लगता है। इसलिए वह इस व्यवसाय को अधर में छोड़ देता है। जैसे अन्य व्यवसायों में कार्यशील पूंजी लगती है उसी तरह इस व्यवसाय में भी एक-दो साल के लिए कार्यशील पूंजी की व्यवस्था कर लेनी चाहिए। हालांकि अन्य व्यवसायों की तुलना में भेड़-बकरी पालन में आहार और अन्य प्रबंधन में बहुत कम धन लगता है।

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कैसे अन्य पशुपालन से अलग है गोट फार्मिंग
गोट फार्मिंग की तुलना अन्य पशुपालन जैसे गौ पालन या भैंस पालन से करें तो हमें पहला लाभ ये मिलता है कि इसके लिए गौ या भैंस पालन के मुकाबले काफी कम जगह चाहिए। दूसरी लाभ जितनी जगह में आप 1 भैंस या गाय पाल सकते हैं उतनी जगह में 5-7 बकरियां आराम से पाली जा सकती हैं। अधिकतर नस्ल की बकरियाॅ को गर्मी हो या ठण्ड या बारिश किसी भी वातावरण में ढलने की अद्भुत क्षमता होती है। बकरियां अन्य बडे़ पशुओं के मुकाबले बहुत छोटी होती हैं लेकिन ये परिपक्व बहुत जल्द हो जाती हैं।

बकरी का जीवित तथा मृत्यु के उपरान्त केवल एकमात्र ही उपयोग नहीं है। जहाॅ इसके माॅस का उपयोग लोग खानें में करते हैं वहीं इसके दूध का उपयोग पीने में किया जाता है। बकरी के बालों का उपयोग फाइबर बनाने में तथा खाल का उपयोग विभिन्न प्रकार के वाद्य यंत्र बनाने में किया जाता है। गोट फार्मिंग को बहुत कम पूॅजी में भी शुरु किया जा सकता है। चूॅकि बकरियों के अनेकों नस्ल होती हैं जो साल में 2 बार बच्चे देती हैं और हर बार 2 से 3 बच्चे देती हैं। इसलिए इस व्यापार के जल्द से जल्द बढ़ने की अधिक सम्भानाएं होती हैं।

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यदि आप पहले से कोई पशुपालन कर रहे हैं और Goat farming Training in India भी करना चाहते हैं तो आप बकरियों को वही जगह दे सकते हैं, जिस जगह पर आप पहले से पशुपालन कर रहे हैं। गोट फार्मिंग में आपको अपने उत्पादों की मार्केटिंग करने की जरुरत नहीं पड़ती क्योंकि मांग अधिक होने के कारण ग्राहक आपको ढ़ूढते-ढ़ूढते आपके फार्म हाउस तक पहॅुच जाते हैं।

गोट फार्मिंग के लिए उपयुक्त स्थान

जमीन का चुनाव
हमारे देश का हर कोना Goat Farm का व्यवसाय करने के लिए उपयुक्त माना गया है। हमें यह व्यवसाय शुरु करने के लिए अपने घर के आस-पास ही कोई जगह तलाश करनी है, जहाॅ से हम इस व्यवसाय को आसानी से क्रियान्वित कर सकें। इसके अतिरिक्त जमीन का चुनाव करते समय निम्न बातों का ध्यान रखा जाना बेहद आवश्यक
है:

  • ऐसी जगह जमीन की तलाश करनी चाहिए जहाॅ शुद्ध पानी और हवा की प्रचुरता हो।आस-पास के क्षेत्र में खेत हों ताकि आप आसानी से घास और अनाज पैदा कर सकें ताकि बकरियों को खिलाने का खर्च कम किया जा सके।
  • आस-पास के क्षेत्र में ऐसा मार्केट हो जहाॅ बकरी पालन से संबंधित वस्तुएं और दवाइयां आसानी से उपलब्ध हो।
  • गाॅव के आस-पास ही Goat farming in UP, India शुरु करने का सोचें क्योंकि शहरों के मुकाबले गांवों में जमीन और लैबर बहुत सस्ते दामों में उलपब्ध रहते हैं।

बकरी पालन को क्षेत्र ऐसा हो जहां आस-पास कोई पशु चिकित्सालय हो ताकि आपको टीके व अन्य दवाइयां आसानी से उपलब्ध हो सके न हीं तो आपको सारी दवाइयां और टीके अपने फार्म पर ही रखने पड़ेगें। यातायात की सुविधा का होना जरुरी है ताकि जरुरत पड़ने पर आप अपनी जरुरत की वस्तुएं किसी नजदीकी मार्केट से खरीद सकें तथा अपने फार्म के उत्पादों को आसानी से बाजार में पहॅुचा और बेच सकें।

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शुरू में एक 20 बकरी और एक नर बकरा से शुरुआत करना बेहतर है जोकि बजट में भी है और रिस्क भी कम है । इसके लिए आपको 80 x 14 वर्ग फ़ीट का शेड बनाना है जिसमे आप आसानी से 100 बकरी रख सकते हैं , यह विशेषज्ञों द्वारा बताया जाता है की कम से कम एक बकरी को रखने के लिए 10 -12 वर्ग फ़ीट का जगह जरूर रखें।

शेड निर्माणः
गोट फार्मिंग करने के लिए बकरियों के लिए घर या शेड का निर्माण बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य है। लेकिन हमारे देश में अभी तक इस क्रिया को एक महत्वपूर्ण स्थान नहीं दिया जाता क्यांेकि जो लोग छोटे पैमाने पर goat farming करते हैं वे बकरियों के लिए अलग सा घर न बना कर उन्हें अन्य पशुओं के साथ ही ठहरा देते हैं, जिससे उनकी उत्पादकता पर असर स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है। व्यवसायिक रुप से बहुत ही जरुरी हो जाता है कि बकरियों के रहने के लिए एक अलग मानक स्थान तैयार किया जाए और निम्न् बातों का स्पश्ट ध्यान रखा जाए कि:

  • कोशिश करें कि बकरियों के रहने का स्थान जमीन से दो-तीन फीट ऊँचा हो। इसके लिए आप तख्त इत्यादि का इस्तेमाल कर सकते हैं क्योंकि गीलेपन और नमी से बकरियों मे बीमारी पैदा हो जाती है।
  • चूहों, मक्खियों, जूँ इत्यादि कीट पतंगे बकरियों के आवास पर बिलकुल नहीं होने चाहिए।
  • आवास को हमेशा पूर्व-पष्चिम दिशा में बनवाना चाहिए, ताकि हवा का आवागमन आसानी से हो सके।
  • आवास से पानी निकास की उचित व्यवस्था पहले से ही करके रखें, ताकि फार्म की साफ-सफाई के दौरान पानी की निकास बाहर की ओर आसानी से हो सके।

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  • इस बात की उचित व्यवस्था करें कि बकरियों के आवास में किसी भी प्रकार का पानी चाहे वो बारिश का हो या कोई अन्य, अन्दर न आने पाए। यह पानी बीमारियों की जड़ है।
  • आवास में तापमान को स्थिर रखने के लिए उचित प्रबन्ध करें। गर्मी तथा सर्दियों के लिए आवास में तापमान नियंत्रण के लिए उचित प्रबन्ध करें।
  • बकरी पालन से सम्बन्धित सभी तरह के उपकरणों, बर्तनों की साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें।

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कामयाबी का उदाहरण- 9 महीने में भेड़ पालन से कमाए 7 लाख
तरीके से चलेंगे तो कामयाबी कदम चूमेगी। मथुरा के एक फर्नीचर व्यवसायी हैं रवींद्र चड्ढा ने परंपरागत पेशे से हटकर भेड़ पालन शुरू किया और नौ माह में साल लाख रुपये कमा लिए। उनका लक्ष् हैय कि अब पांच साल में 72 लाख कमाएं। उन्होंने विधिवित ट्रेनिंग ली और ऊपर जो तरीके बताए हैं, उसी तरह से प्लानिंग के साथ काम किया। आज उनके फार्म को देखने के लिए विदेश से भी लोग आते हैं।

तो देर किस बात की? आप भी संभावनाएं तलाशना शुरू करें। हिमाचल में वैसे भी जयराम सरकार ने इस बजट में भेड़-बकरी पालन के प्रोत्साहन के लिए अलग प्रावधान किया है। जैसे कि सरकार की तरफ से बकरियां देने की बात कही गई है। तो सरकारी योजनाओं का लाभ भी उठाएं, मार्केट को स्टडी करें और आत्मनिर्भर होने की तरफ कदम बढ़ाएं।

(लेखक वर्ल्ड बैंक ग्रुप में एनर्जी पॉलिसी और माइक्रो फाइनैंसिंक एनालिस्ट हैं। उनसे उनसे aashishnadda @gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

एक दिन फ़ेसबुक पर ‘इंकलाब जिंदाबाद’ लिख देने से कुछ नहीं होगा

राजेश वर्मा।। शहीदी दिवस..आज सभी ने सोशल मीडिया पर जी भर के उन महान शहीदों को श्रद्धांजलि दी जिनकी वजह से हम आप इस आज़ादी का आनंद भोग रहे हैं। दिल पर हाथ रख कर बताना क्या हम सचमें इन वीर सपूतों को याद कर रहे हैं? जरा सोचिए क्या जरूरत थी उन नौजवानों को शहीद होने की? वह अपने लिए नहीं करोड़ों लोगों के लिए कुर्बान हो गए, बस इतना है वह शहीद नहीं होते तो न तो मैं जिंदगी का सुख भोग रहा होता न आप।

वे जुनूनी थे लेकिन हम बातूनी हैं । आज सैंकड़ों में से कोई एकाध थोड़ी बहुत हिम्मत करता भी है अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाने की तो सबसे पहले उसे जीवत मौत किस तरह दी जाए ज्यादातर इस ओर ध्यान देने लग जाते हैं। जरूरी नहीं की फांसी के फंदे पर उन शूरवीरों की तरह झूल कर ही देश प्रदेश के लिए कुछ किया जा सकता है।

किसी जरूरतमंद की मदद करना, अपने देश के लोगों व यहां की संपत्ति को अपना समझ कर रख रखाव करना भी देशभक्ति से कम नहीं परंतु केकड़ा प्रवृत्ति ने हमें इतना घेर रखा है की हर कोई एक-दूजे को नीचे खींचने में लगा है न तो वह खुद उपर उठ पा रहा है न ही वह दूसरे को उपर उठता देखना चाहता है। इसी चक्कर में हम देश को भी नीचे की तरफ खींच रहे हैं। इतना जरूर है यदि आज़ादी के महान सपूतों को पता होता की ऐसा भी होगा तो शायद वह कभी भी फांसी पर नहीं झूलते।

जीना कौन नहीं चाहता कोई खुद के लिए तो कोई परिवार के लिए लेकिन क्या इनका परिवार नहीं था? इन्होनें देश को अपना घर परिवार माना जबकि हम तो अपने गांव शहर तक को अपना नहीं मानते। थोड़ी देर के लिए ही सही पर याद करो की यदि आज वही गुलामी होती तो क्या हम आप में से कोई भी इस जगह होता? शायद इसे ब्यां करने की जरूरत नहीं।

उन्होंने तो जीवन का बलिदान दिया लेकिन क्या हम आप महज सोशल मीडिया पर “इंकलाब जिंदाबाद” के नारे लगाकर और कहीं पर खाना पूर्ति के लिए महज कार्यक्रम आयोजित करने भर से उनको श्रद्धांजलि दे देंगे। यह तो हमें याद है की इन शहीदों ने देश के लिए जान दे दी लेकिन हमनें देश के लिए क्या किया।

(स्वतंत्र लेखक राजेश वर्मा बलद्वाड़ा, मंडी के रहने वाले हैं और उनसे 7018329898 पर संपर्क किया जा सकता है।)

अगर आपकी राय इस सुझाव के खिलाफ है तो हमें तुरंत लेख भेजें। अगर आपके पास प्रदेश या देश की बेहतरी के लिए कोई अन्य सुझाव हैं तो भी हमारे फेसबुक पेज पर मेसेज करें या फिर ईमेल करें हमारी आईडी inhimachal.in @gmail. com पर।

वायरल हुआ मनरेगा के ब्रेक के दौरान CM जयराम पर गाया गाना

एमबीएम न्यूज नेटवर्क, मंडी।। सराज के एस शख्स ने मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर और उनती पत्नी डॉक्टर साधना पर एक गाना गाया है। मनरेगा में काम करते समय बीच में लिए ब्रेक के दौरान सराज के शोभा राम ने यह गाना गाया है और उनके साथियों ने रिकॉर्ड किया है। यह गाना सोशल मीडिया पर तेजी से शेयर हो रहा है।

गायक शोभा राम देख नहीं सकते। मगर उनकी आवाज में ऐसा जादू है कि आपको गाने के बोल भले समझ न आएं, आपका दिल चाहेगा कि उन्हें बस सुनते ही जाएं। गीत किसने लिखा है, यह पता नहीं चला है मगर पारंपरिक लोकगीत की शैली में इसे शोभा राम ने बेहद खूबसूरती से गाया है।

इस गीत में जयराम ठाकुर के संघर्ष से लेकर मुख्यमंत्री बनने तक के सफर की बात की गई है और उनकी धर्मपत्नी डॉक्टर साधना ठाकुर का भी जिक्र किया गया है जो राजस्थान से आकर यहां पहाड़ी क्षेत्र में आईं। बहरहाल, आप गाना सुनें।

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क्या आपको नहीं लगता कि हिमाचल में मेलों या अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों में बाहरी कलाकारों को बुलाकर लाखों रुपये देने के बजाय इस तरह की प्रतिभाओं को मंच दिया जाना चाहिए? कॉमेंट करके अपनी राय जरूर दें।

खली की कंपनी के रेसलिंग शो के चक्कर में बुरी फंसी सरकार

शिमला।। हिमाचल प्रदेश सरकार में खेल मंत्री गोविंद सिंह ठाकुर ने ऐलान किया था कि मंडी और सोलन में खली की  कंपनी CWE (जी हां, WWE नहीं) की तरफ से रेसलिंग का आयोजन किया जाएगा ताकि खेलों को प्रोत्साहन दिया जाएगा। मगर सरकार के लिए ये आयोजन करना परेशानी का सबब बन गया है क्योंकि जिस तरह की रेसलिंग खली करते हैं, वह शेड्यूल गेमों की लिस्ट में शामिल ही नहीं।

बता दें कि इन हिमाचल ने उसी समय कहा था कि डब्ल्यूडब्ल्यूई की तर्ज पर होने वाली यह रेसलिंग खेल कम, परफॉर्मिंग आर्ट ज्यादा है, जिसमें ड्रामा का मिश्रण होता है। अगर यह खेल होता तो हिमाचल क्या, राष्ट्रीय स्तर पर भी इसके लिए अकादमी होती और ओलिंपिक जैसे आयोजनों में भी यह गेम होता। मगर यह विशुद्ध एंटरटेनमेंट है, जिसमें ऐथलेटिक्स दांव-पेंच शामिल हैं।< ‘खेल विभाग अन्य विभागों से मांग रहा पैसा’
अब चूंकि राज्य सरकार की शेड्यूल्ड गेम्स की लिस्ट में इस तरह की रेसलिंग (जिसे मीडिया WWE कह रहा है) नहीं है, ऐसे में खली की कंपनी के शो के लिए साढ़े 3 करोड़ रुपये जुटाना मुश्किल हो गया है। तथाकथित खिलाड़ियों (परफॉर्मर) को बुलाने के लिए यह रकम ली जानी है। मगर अब खबर आई है कि इस पैसे के जुगाड़ के लिए खेल विभाग के बजाय अन्य विभागों से मदद मांगी गई है (स्रोत)।

जानकारी सामने आई है कि अब खेल विभाग ने उद्योग विभाग, पर्यटन विभाग और राज्य बिजली बोर्ड से आर्थिक मदद की गुहार लगाई है और नॉन शेड्यूल गेम के लिए अन्य विभागों से पैसा लेने के लिए बैठकों का सिलसिला जारी होने की भी बात कही जा रही है।

बता दें कि पहले खेल मंत्री गोविंद ठाकुर ने खली से मुलाकात की थी और फिर मुख्यमंत्री जयराम भी उनसे जालंधर में मिले थे।

इन हिमाचल ने पहले भी उठाए थे सवाल
जब खेल मंत्री ने हिमाचल में इस तरह की रेसलिंग करवाने का ऐलान किया था, इन हिमाचल ने उसी दौरान लिखा था कि WWE कोई खेल नहीं बल्कि एक एंटरटेनमेंट कंपनी है, जो प्रोफेशनल रेसलिंग करवाती है। प्रोफेशनल रेसलिंग दरसअल ऐथलेटिक्स और नाटकीय प्रदर्शन का मिश्रण है। यानी यह सही है कि हम टीवी पर जो रेसलिंग देखते हैं, उसमें वे प्रतियोगी भाव से खेल रहे होते हैं, मगर स्टंट आदि नाटकीय होते हैं। जीत-हार आदि भी संदिग्ध रहता है। यानी आप घूंसा मारने का दिखावा करके छुआएंगे भर तो सामने वाला खुद ही उछलकर गिर जाएगा। इसी तर्ज पर खली ने CWE यानी कॉन्टिनेंटल रेसलिंग एंटरटेनमेंट की स्थापना की है और उनके पहलवानों के जो भी वीडियो सोशल मीडिया पर उपलब्ध हैं, उनमें WWE जैसी परफेक्शन भी नहीं है।

इन हिमाचल ने लिखा था कि प्रदेश सरकार अपने खर्च पर आयोजन करने जा रही है, बाहर से रेसलर भी बुलाने जा रही है तो प्रश्न उठता है कि इससे किस खेल को बढ़ावा मिला? जो खर्च इस आयोजन पर आएगा, वह क्या सिर्फ माहौल बनाने की कोशिश भर नहीं होगी? क्या हिमाचल के आम पहलवानों को भी इस आयोजन में खेलने का मौका मिलेगा और क्या कुश्ती सामान्य कुश्ती होगी या फिर ऐसे ही फर्जी स्टेज बनाकर WWE स्टाइल वाली नकली कुश्ती?

विस्तार से पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें-

खेल के नाम पर WWE वाला ड्रामा करवाएगी हिमाचल सरकार?

#ForestDay हिमाचल की वन संपदा को तबाह कर रही है आग

शिमला।। गर्मियों का आगमन हुआ ही है और जंगलों में आग लगने का सिलसिला शुरू हो गया है। हाल ही में मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने वन अग्नि गाजरूकता अभियान की शुरुआत की ताकि लोगों को इस विषय में जागरूक किया जाए। पिछली सरकारें भी इस तरह के कई कार्यक्रम करती रही हैं, मगर जमीन पर उनका असर कम ही देखने को मिलता है।

दरअसल कई बार जंगलों में शरारती तत्व आग लगा देते हैं तो कई बार पास में रहने वाले लोग चारे के लालच में आग भड़का देते हैं। कई बार जंगल के साथ लगी अपनी जमीन में लगाई गई आग भी अनियंत्रित हो जाती है। वैसे प्राकृतिक कारणों की तुलना में आग इंसानों द्वारा ज्यादा लगाई जाती है।

वित्त वर्ष 2017-18 (जो अभी जारी है) में पिछले वित्त वर्ष की तुलना में 50 प्रतिशत कम मामले सामने आए हैं। यह राहत की बात तो लगती है लेकिन अभी भी 10 दिन बचे हुए हैं और गर्मी बढ़ने के कारण मार्च के आखिरी हफ्तों से आग लगने की घटनाएं बढ़ जाती हैं।

25 फरवरी तक रिपोर्ट की गई आग लगने की 845 घटनाओं में 5,748 हेक्टेयर वनों को नुकसान पहुंचा है और अनुमान है कि इससे लगभग नौ करोड़ रुपये की वन संपदा का नुकसान हुआ है।

वहीं 2016-17 में 1832 घटनाएं रिपोर्ट की गई थीं, जिनमें 19538 हेक्टेयर जमीन पर लगे वन चपेट में आए थे औ नुकसान हुआ था करीब साढ़े तीन करोड़ रुपये का। यानी इस साल कम घटनाओं के वाजबूद ज्यादा नुकसान हुआ है।

समस्या ये भी है कि जंगलों में आग लगने की घटनाओं की गंभीरता से जांच नहीं की जाती। यदि कोई व्यक्ति किसी की गाड़ी या घर में आग लगा दे तो गंभीरता से कार्रवाई की जाती है। जंगलों के मामले में न तो वन विभाग की तरफ से तत्परता नजर आती है न पुलिस और अन्य एजेंसियों की तरफ से। नतीजा, आग लगाने के मामले में शायद ही कोई कार्रवाई हुई हो। यही कारण है कि निरंकुश होकर लोग लगातार आग लगाते हैं।

जरूरी है कि हर नागरिक अपना फर्ज निभाए। अगर आपको पता चले कि किस व्यक्ति ने आग लगाई है और क्यों, तुरंत पुलिस को सूचना दें। साथ ही फायर डिपार्टमेंट को भी, ताकि समय रहते आग पर काबू पाया जा सके।

#ForestDay मिलिए 80 सालों में 1 लाख पेड़ लगाने वाले बुजुर्ग से

एमबीएम न्यूज नेटवर्क, नाहन।। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि 90 साल के बुजुर्ग बचपन से पौधे लगा रहे हैं और आज तक यह सिलसिला जारी है। पिछले 80 सालों में वह लगभग एक लाख पौधे लगा चुके हैं। नाम है मीन सिंह और वह रहने वाले हैं सिरमौर जिले की नौहराधार तहसील में देवना पंचायत के फागनी गांव के।

आपने देखा होगा कि अक्सर बड़े-बड़े कार्यक्रमों में पर्यावरण को बचाने के नाम पर पौधे लगा दिया जाते हैं मगर बाद में उनकी सुध नहीं ली जाती। मगर मीन सिंह जिस पौधे को लगाते हैं, उसका ख्याल भी रखते हैं। वह एक-एक पौधे को बच्चे की तरह सहेजते हैं। उनके लगाए पौधों से आज जंगल तैयार हो चुका है।

मीन सिंह कहते हैं कि उन्हें बचपन से ही पौधे लगाने का शौक था। 60 के दशक में वन विभाग में पौधारोपण का कार्य किया मगर बाद में जीवन का हिस्सा ही बन गया। 90 साल के हो चुके हैं मगर आज भी देवदार, बान और चीड़ के बीजों को जंगल में रोपित करते हैं। जैसे ही अंकुर फूटता है, मीन सिंह पौधे की देखभाल में जुट जाते हैं।

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समय-समय पर मीन सिंह उस पौधे का हाल जानने जंगल जाते रहते हैं। यह सिलसिला तब तक जारी रहता है जब तक पौधा टिक न जाए और पेड़ न बन जाए। आज फागनी और देवना में कहीं भी खाली जमीन नहीं दिखती। इलाके में देवदार, बान और चीड़ के जंगल शान से लहरा रहे है और इसके पीछे मीन सिंह की लग्न का भी योगदान है।

(यह एमबीएम न्यूज नेटवर्क की खबर है और सिंडिकेशन के तहत प्रकाशित की गई है)

सभी विधायकों को मिलेंगे सैमसंग के 68 हजार के स्मार्टफोन

शिमला।। जानकारी सामने आई है कि विधानसभा का ई-विधान विंग सभी चुने हुए सदस्यों को सैमसंग गैलक्सी नोट 8 स्मार्टफोन दिए जाएंगे। इस स्मार्टफोन को इसलिए दिया जा रहा है ताकि सदस्य विधानसभा की पूरी जानकारी ले पाएं। फोन देने के साथ-साथ ई-विधान विंग विधायकों को ट्रेनिंग भी देगा।

शुक्रवार को सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री डॉक्टर राम लाल मार्कंडा ने विधानसभा सचिवालय में विधानसभा अध्यक्ष डॉक्टर राजीव बिंदल को उनके रूम में जाकर सैमसंग गैलक्सी नोट 8 स्मार्टफोन, लैपटॉप और प्रिंटर दिया। उन्होंने कहा कि मंत्रियों समेत सभी चुने गए सदस्यों को कार्यालय प्रयोग के लिए ये चीजें दी जाएंगी।

सैमसंग गैलक्सी नोट 8 की कीमत 67900 रुपये है यानी लगभग 68 हजार रुपये। इस तरह से अगर 68 विधायकों का यह खर्च मिला दिया जाए तो सिर्फ स्मार्टफोन्स की खरीद पर 46,24,000 रुपये यानी 46 लाख रुपये का खर्च बैठेगा।

सोशल मीडिया पर उठने लगे सवाल
बेशक ये स्मार्टफोन सरकारी कार्यों के लिए दिए जा रहे हैं, मगर सोशल मीडिया पर लोग सवाल उठा रहे हैं कि एक तो प्रदेश पहले से ही कर्ज से डूबा हुआ है, ऊपर से जनता के पैसे से विधायकों को 68 हजार रुपये के स्मार्टफोन दिए जा रहे हैं। कुछ लोग ये प्रश्न भी उठा रहे हैं कि एक कंपनी विशेष को ही स्मार्टफोन्स के लिए किस आधार पर चुना गया।

वहीं कुछ लोग विधायकों के भारी-भरकम वेतन और इनकम टैक्स को लेकर भी सवाल उठा रहे हैं। गौरतलब है कि विधायकों का वेतन पिछली वीरभद्र सरकार के समय बढ़ाकर 1 लाख 45 हजार रुपये कर दिया गया था। भत्ते मिलाने से यह रकम 2 लाख 30 हजार रुपये हो जाती है। विधायकों के वेतन पर जो इनकम टैक्स बनता है, वह भी सरकार देती है। यानी विधायकों को मिलने वाला पैसा टैक्स फ्री होता है और एक तरह से उसपर लगने वाला टैक्स जनता के पैसे से दिया जाता है।

सार्वजनिक नल से पानी भरने पर दलित विकलांग बच्चे की पिटाई का आरोप

एमबीएम न्यूज नेटवर्क, मंडी।। नल में पानी न आने पर अनुसूचित जाति से संबंध रखने वाले चार बच्चे पास के गांव में लगे सार्वजनिक नल पर पानी भरने गए थे। आरोप है कि सामान्य वर्ग का एक शख्स वहां आया और बच्चों के प्रति जातिसूचक शब्द इस्तेमाल करने लगा। तीन बच्चे तो भाग गए मगर विकलांग बच्चा भाग नहीं सका और उस शख्स ने उसकी बेरहमी से पिटाई कर दी।

मामला मंडी जिले के होकर उपमंडल की नौण पंचायत का है। पुलिस स्टेशन गोहर में एक व्यक्ति की शिकायत पर अनुसुचित जाति-जनजाति अधिनियम धारा 3 और 323 के तहत नौण के यदोपति नाम के शख्स के खिलाफ मामला दर्ज किया है, जो सामान्य वर्ग है।

क्या है घटना
कोट गांव का विकलांग बच्चा बुधवार शाम गांव के तीन अन्य बच्चों के साथ गांव में लगे सार्वजनिक नल से पानी भरने गया था। बुधवार को इन बच्चों के घर में लगे नल में पानी नहीं आया था। जब ये चारों बच्चे सार्वजनिक नल से पानी भरने लगे तो वहां मौजूद उक्त व्यक्ति ने बच्चों को जातिसूचक गालियां दीं। 3 बच्चे तो घटनास्थल से भाग गए मगर विकलांग बच्चे को भागने में मुश्किल हो गई। इस बच्चे को कथित तौर पर उस व्यक्ति ने पकड़ा और निर्ममता पिटाई कर दी।

दावा है कि बच्चा जोर-जोर से चिल्लाया भी मगर किसी ने उसकी सहायता नहीं की। इस बारे में पीडि़त बच्चों ने कहा कि यह व्यक्ति पहले भी उन्हें वहां पानी भरने से रोकता था और जातिसूचक गालियां देता रहता था।

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क्या कहना है पुलिस का
पुलिस अधीक्षक मंडी ने इस तरह का मामला दर्ज होने की पुष्टि की है। वहीं थाना प्रभारी मनोज वालिया ने कहा कि संदिग्ध के खिलाफ मामला दर्ज कर दिया गया है और जल्द ही उसे पूछताछ के लिए बुलाया जाएगा।

(यह एमबीएम न्यूज नेटवर्क की खबर है और सिंडिकेशन के तहत प्रकाशित की गई है)

जातिवाद पर लेख पढ़ें-

हिमाचल में जातिवाद: शुतुरमुर्ग बने बैठे हैं तथाकथित अगड़ी जातियों के कुछ लोग

हिमाचल में घर, गांव और राजनीति से लेकर देव परंपरा तक फैला है जातिवाद

हर तरफ पेड़ कट रहे हैं तो हिमाचल में वन क्षेत्र कैसे बढ़ रहा है?

इन हिमाचल डेस्क।। फरवरी के दूसरे हफ्ते में इंडियन स्टेट ऑफ़ फॉरेस्ट-2017 रिपोर्ट आई, जिसपर बनी खबरें खूब शेयर की गईं। इसमें सैटलाइट सर्वे से जुटाई गई जानकारी के आधार पर दावा किया गया कि हिमाचल प्रदेश में वन क्षेत्र 393 वर्ग किलोमीटर बढ़ गया है। हिमाचल के लोग, जो हिमाचल की हर छोटी-बड़ी उपलब्धि पर उत्साहित होते हैं, इस रिपोर्ट पर भी खुश हुए और उन्होंने धड़ाधड़ खबरें शेयर कीं मानो यह गर्व का विषय हो।

गर्व होना भी चाहिए। लेकिन खुश होने की जल्दी में हम उन खबरों को कैसे भूल जाते हैं, जो आए दिन हिमाचल के अखबारों पर छपती हैं। कहीं पर देवदार के पेड़ साफ करके सेब के पौधे लगा दिए गए हैं, कहीं पर खैर की लकड़ी के ट्रक पकड़े जाते हैं, कहीं पर हजारों पेड़ों का कटान हो जाता है तो कहीं पर वनरक्षक संदिग्ध हालात में मृत पाया जाता है। चारों तरफ हिमाचल से इतनी ज्यादा लकड़ी कट रही है तो वन क्षेत्र बढ़ा या घटा? और वन क्षेत्र मानो बढ़ भी गया, जंगलों में पेड़ों का घनत्व बढ़ा या घटा?

सवाल यह है कि मान लीजिए पहले एक वर्ग किलोमीटर में 500 पेड़ थे और वन माफिया ने बीच-बीच से 150 पेड़ काट दिए। तो वन क्षेत्र तो उतना ही रहा, पेड़ तो कम हो गए। इसका हिसाब कौन देगा? हिमाचल प्रदेश के विभिन्न हिस्सों पर पेड़ों का अवैध कटान चल रहा है। इसकी तस्दीक हाल ही की कुछ खबरें करती हैं। नैना देवी के जंगल से खैर के 25 हजार पेड़ कटने की खबर आई, मुख्यमंत्री जयराम के गृह जिले में पेड़ों के कटान की खबर आई, शिमला और सिरमौर के जंगलों से पेड़ कट गए। ये खबरें आती हैं, एक दिन छपती हैं, मंत्रियों के बयान आते हैं- माफिया को बख्शा नहीं जाएगा।

मगर सवाल है कि कितने माफिया पकड़े गए, कितनों पर कार्रवाई हुई और मिलीभगत के लिए कितने वन विभाग के कर्मियों पर कार्रवाई हुई? और अगर वन विभाग के कर्मचारी खुद को असुरक्षित महसूस करते हैं तो उन्हें सशक्त करने के लिए क्या इंतजाम किए? कितनों को ट्रेनिंग दी गई, कितनों को बंदूकें दी गईं, कितने वायरलेस सिस्टम दिए गए और उनकी SOS कॉल पर तुरंत कार्रवाई करके बैकअप देने के लिए कितनी यूनिट्स लगाई गई हैं।

एक महीने के अंदर ये कर दिया जाएगा, दो महीनों में वो कर दिया जाएगा, पिछली सरकार जैसी ये सरकार नहीं चलेगी… इस तरह के बयान अखबारों की सुर्खियों के लिए अच्छे हैं। मगर जंगलों की रक्षा बयानवीर बनकर नहीं की जा सकती। ठोस नीतियां बनाकर और उन नीतियों को सही ढंग से लागू करने से जंगल बचेंगें। लोगों की भागीदारी बढ़ाकर जंगल बचेंगे। वन विभाग और पुलिस महकमे के बीच तालमेल बिठाकर जंगल बचेंगे।

वरना सरकारें आएंगी, जाएंगी और वन विभाग के कर्मचारी दबाव में काम करते रहेंगे। उनके सामने दो ऑप्शन होंगे- या तो करप्ट सिस्टम का हिस्सा बनकर खुद भी लाभ उठाएं या फिर सबकुछ नजरअंदाज करके चुपचाप बैठे रहें। क्योंकि कोई नहीं चाहेगा कि वह भी किसी दिन नौकरी के चक्कर में किसी जंगल में पेड़ पर उल्टा टंगा पाया जाए और पुलिस कहे कि उसने आत्महत्या कर ली थी। जब वनरक्षक होशियार सिंह की मौत हुई थी, तब इन हिमाचल ने आर्टिकल छापा था- सिर्फ डंडे के सहारे बहुत बड़े इलाके में जंगलों की रक्षा करते हैं फॉरेस्ट गार्ड. इस आर्टिकल के छपने के बाद तत्कालीन वन मंत्री की तरफ से इन हिमाचल को कानूनी नोटिस भेज दिया गया था। मगर वनरक्षकों की सुरक्षा के लिए कोई ठोस कदम आगे के छह महीनों में नहीं उठाया गया था।

होशियार सिंह (बाएं) और उनकी दादी।

जंगलों को बचाने के लिए क्या किया जाए?
बरहरहाल, हिमाचल के जंगलों को बचाना है तो जनता को ही आगे आना होगा। नीति और कानून निर्माताओं को चेताना होगा कि भाषणों और मीडिया को दी जाने वाली बाइट्स से काम हीं चलेगा। इसलिए आज से हम अपने मंच को हिमाचल प्रदेश के उन युवाओं के लिए खोल रहे हैं, जो अपने आसपास चल रहे अवैध कटान की जानकारी हमें देना चाहते हैं।

हमारा विचार है कि अगर आप इस काम में लगे माफिया और प्रभावशाली लोगों के नाम सबूतों सहित बताना चाहते हैं, वे हमें contact @ inhimachal.in पर ईमेल करें। आपका नाम और पता गुप्त रखा जाएगा और आपके द्वारा मुहैया करवाई गई जानकारी को वेरिफाई करने बाद संबंधित लॉ एन्फोर्समेंट एजेंसी तक पहुंचाकर सार्वजनिक किया जाएगा।

आपके पास कोई और सुझाव हो कि इस विषय में और क्या किया जा सकता है, तो उसे आप contact @ inhimachal.in पर भेज सकते हैं।

CM ने ‘पोल खोली’ तो वॉकआउट कर गए कांग्रेस के विधायक

शिमला।। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने पिछली कांग्रेस सरकार पर आरोप लगाया है कि 7 अक्तूबर, 2017 को मंडी में हुई राहुल गांधी की रैली में सरकारी खजाने का दुरुपयोग करने का आरोप लगाया है। बजट पर चर्चा का जवाब देते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि फिजूलखर्ची और लोन पर सवाल उठाने वाली कांग्रेस ने सत्ता में रहते राहुल गांधी की रैली में कार्यकर्ताओं को पहुंचाने के लिए एचआरटीसी की बसें लगा दीं।

75 लाख रुपये का खर्च
मुख्यमंत्री ने कहा कि कांग्रेस सरकार ने राहुल गांधी की रैली के लिए इन बसों का 75 लाख रुपये किराया सरकारी खजाने से भर दिया। ‘अमर उजाला’ ने विस्तार से लिखा है कि सदन में जयराम ठाकुर के इस खुलासे के बाद कांग्रेस के विधायकों ने नारेबाजी करते हुए जमकर हंगामा करना शुरू कर दिया।

दरअसल विपक्ष बजट में रोजगार सृजन को लेकर सवाल पूछ रहा था और लोन को लेकर भी सवाल किए। इस पर मुख्यमंत्री ने कहा कि आपकी सरकार ने तो सरकारी खजाने का उपयोग पार्टी की रैलियों के लिए किया। सीएम ने कहा, “वैसे तो रैली में ज्यादा लोग नहीं आए, लेकिन जितने आए उन्हें लाने और ले जाने के  लिए एचआरटीसी की बसों का इस्तेमाल किया गया। यही नहीं, इसके लिए सरकारी खजाने से 75 लाख रुपये भी खर्च कर दिए गए।”

मुख्यमंत्री के ऐसा कहते ही कांग्रेसी विधायकों ने हंगामा करना शुरू कर दिया। कांग्रेस विधायक दल के नेता मुकेश अग्निहोत्री ने भी पलटवार करते हुए कहा, “प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह की रैली के लिए सरकारी तंत्र और सरकारी पैसे का इस्तेमाल किया गया।”

अखबार के मुताबिक इसके बाद विधायकों ने जब एक भी रुपये के खर्च का सुबूत देने को कहा तो कांग्रेसी विधायक चुप हो गए और सरकार विरोधी नारे लगाते हुए सदन से बाहर चले गए। हालांकि बाहर आकर कांग्रेस विधायकों का कहना था कि मुख्यमंत्री ने बजट में रोजगार आदि से जुड़े सवालों पर कोई जवाब नहीं दिया।

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