वीडियो देख आप भी कहेंगे, स्कूल बसों में सीट बेल्ट जरूरी की जाए

इन हिमाचल डेस्क।। क्या बसों में भी सीट बेल्ट पहनना अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए? भले ही यह बात अटपटी लगे, मगर अमेरिका और कई यूरोपीय देशों में बसों में सीट बेल्ट इस्तेमाल की जाती हैं। भारत में भी प्रीमियम बसों में सीट बेल्ट्स होती हैं, मगर या तो वे हटा दी जाती हैं या फिर इस्तेमाल नहीं की जातीं।

पिछले दिनों जब शिमला में हिमाचल पुलिस ने वाहनों की आगे की सीट के लिए भी सीट बेल्ट पहनना अनिवार्य कर दिया था, तब लोगों ने विरोध किया था कि पहाड़ी राज्यों में कई बार वाहन खाई में गिरने लगते हैं तो कूदना पड़ता है। मगर यह तर्क काफी हास्यास्पद है, क्योंकि वाहन जिस गति में हादसे का शिकार होता है, उसमें सेकंड के कुछ ही हिस्सों में कूदना असंभव है।

क्या होता है जब बस पलटती है?
लोगों में यह अवधारणा भी बनी हुई है कि सीट बेल्ट सिर्फ हेड ऑन कलिज़न यानी टक्कर हो जाने पर ही फायदेमंद है। जबकि हकीकत यह है कि किसी भी स्थिति में सीट बेल्ट मददगार हो सकती है और खाई में लुढ़कने की स्थिति में भी। ऐसा इसलिए क्योंकि ज्यादातर मौतें इसलिए होती हैं क्योंकि जब बस या वाहन पलटियां खा रहे होते हैं, अंदर का सामान और आदमी भी उलट-पलट रहे होते हैं। ठीक वैसे, जैसे एक डब्बे के अंदर रखी चीजें उसे हिलाने पर इधर-उधर टकरा रही होती हैं।

नीचे का वीडियो बताता है कि सकूल बसों के लिए सीट बेल्ट कितनी जरूरी हैं। इससे ये भी पता चलता है कि स्कूल बसों के पलटने पर अंदर क्या होता है:

ऐसे में अगर सीट बेल्ट लगाई गई हो तो वाहनों के ऊंचाई से गिरने या पलटने पर उस स्थिति मे कम नुकसान होगा, जब यात्रियों ने सीट बेल्ट लगाई हो। ऐसा होने पर वे अपनी सीटों से चिपके रहेंगे, अंदर सीटों या छत से नहीं टकराएंगे। कुछ लोगों को तो चोटें आएंगी, लेकिन बहुतों की जान बचेगी। यानी नुकसान उस स्थिति के मुकाबले कम होगा, जिस स्थिति में बेल्ट न लगाई हो।

नीचे का वीडियो देखें, सीट बेल्ट न लगाने पर सवारियों का क्या होता है, जब वाहन पलटियां खाता है:

हिमाचल प्रदेश में आए दिन हो रहे हादसों में मरने वालों की संख्या इसलिए भी ज्यादा होती है, क्योंकि वे अंदर ही लगने वाले झटकों से जख्मी हो जाते हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि सीट बेल्ट्स से नुकसान को कम किया जा सकता है। अगर बाकी ने सीट बेल्ट लगाई हो और एक ने नहीं तो हादसा होने की स्थिति में वह व्यक्ति खुद इधर-उधर गिर-पड़कर बाकी लोगों को भी ज़ख्मी कर देगा।

नीचे हम कुछ वीडियो लगा रहे हैं, जिससे आपको पता चलेगा कि सीट बेल्ट्स कितनी जरूरी हैं। नीचे का वीडियो दिखाता है कि बस के पलटने पर क्या हुआ, जब अंदर सीट बेल्ट नहीं लगाई गई थी।

और नीचे का वीडियो देखें, बस पलटने पर सीट बेल्ट कितनी फायदेमंद रही।

क्या आपको नहीं लगता कि वाहनों, बसों और खासकर स्कूल बसों में तो सीट बेल्ट्स जरूरी की ही जानी चाहिए? अपनी राय कॉमेंट करके दें।

ये जयराम की नहीं, आपकी सरकार है; हम एक टीम हैं: मुख्यमंत्री

शिमला।। हिमाचल प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार के गठन को 100 दिन पूरे हो गए हैं। इस मौके पर हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने अपने फेसबुक पेज पर वीडियो संदेश डाला है।

इस वीडियो संदेश में उन्होंने सरकार के 100 दिन पूरे होने पर बधाई दी है और अपनी सरकार के अब तक के कार्यकाल के कुछ कामों को गिनाया है। इसके साथ ही उन्होंने कहा है कि इन सौ दिनों में सरकार ने ‘रोडमैप’ तैयार कर लिया है कि आगे कैसे काम करना है।

मुख्यमंत्री के इस संबोधन की खास बात यह नजर आती है कि वह जनता से सीधे संपर्क जोड़ते हुए नजर आ रहे हैं। उन्होंने युवाओं से भी कनेक्ट करने की कोशिश की है और उन्हें स्वरोजगार की ओर प्रेरित करने की कोशिश की है। क्या रही मुख्यमंत्री के संबोधन की पांच मुख्य बातें, नीचे पढ़ें-

‘विकास सरकार की प्राथमिकता’
भ्रष्टाचार मुक्त पारदर्शी शासन, रोजगार और स्वरोजगार के लिए प्रोत्साहन, गुणवत्ता वाली शिक्षा, व्यापारियों, किसानों और बागवानों का ख्याल रखना, घर द्वार तक सड़क और स्वास्थ्य सुविधाएं देना सरकार की प्राथमिकताओं में है।

‘जयराम की नहीं, आपकी सरकार’
मुख्यमंत्री ने कहा, “ये मेरी यानी जयराम की सरकार नहीं है, बल्कि आपकी अपनी सरकार है और इसीलिए हमने विधायक निधी बढ़ाई है ताकि सभी पार्टियों के विधायक जनता तक सरकार की योजनाएं पहुंचा सकें।

स्वरोज़गार को प्रोत्साहन दिया
मुख्ममंत्री ने कहा कि सरकार ने सरकार ने स्वरोजार के विकल्प पैदा करने के लिए लीक से हटकर कदम बढ़ाए हैं ताकि प्रदेश को स्वावलंबी बनाया जा सके। उन्होंने खेती औऱ बागवानी जैसे पारंपरिक व्यवसायों के प्रोत्साहन के लिए सरकार की कोशिशों का जिक्र किया।

युवाओं से अपील
सीएम जयराम ने कहा, “मैं हिमाचल के नौजवानों से वादा करता हूं कि अगर वे स्वरोजगार की तरफ़ अअपने आइडियाज़ लेकर एक कदम बढ़ाएंगे तो सरकार 10 कदम आपकी ओर बढ़ाएगी।” मुख्यमंत्री ने शिक्षा के लिए मॉडल स्कूल के कॉन्सेप्ट का भी जिक्र किया।

हर वर्ग का ख्याल रखने का दावा
मुख्यमंत्री ने कहा, “कठिन भगौलिक परिस्थितियों में भी सरकार ने लक्ष्य रखा है कि प्रदेश की हर पंचायत को सड़क सुविधा से जोड़ा जाएगा।” उन्होंने कहा कि इस बार बजट में बुजुर्गों, महिलाओं, युवाओं, दिव्यांगों, छात्रों.. हर वर्ग का ख्याल रखा गया है।

‘हम सब एक टीम’
सीएम ने कहा कि 100 दिन में सरकार ने प्राथमिकताएं और लक्ष्य तय करके रोडमैप बनाया है और उन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए जुट गई है। उन्होंने कहा कि हम सब टीम हैं, जिसमें शासन-प्रसासन ही नहीं, आप भी शामिल हैं। उन्होंने कहा कि हम मिलकर ही प्रदेश को सवावलंबी और नंबर वन बना सकते हैं।

बलग से आया एक और वीडियो, खुद को शक्ति बता रही महिला

शिमला।। ठियोग के बलग गांव में खुद को अवतार बता रहे बच्चों के मामले में प्रशासन द्वारा कार्रवाई करने के बाद अब भी आस लगाकर पहुंचने वाले लोगों के आने का सिलसिला थम नहीं रहा है। प्रशासन ने बच्चों के पास बाहरी लोगों के आने पर रोक लगा दी है और जबरन वहां पहुंचने की कोशिश करने वालों को पुलिस रोक रही है। अब सोशल मीडिया में एक वीडियो सामने आया है, जिसमें एक महिला खुद को शक्ति बताते हुए आगे जाने देने के लिए कह रही है।

इस वीडियो में पुलिस के सामने कुछ लोग खड़े दिखाई दे रहे हैं। बताया जा रहा है कि ये लोग चाहते थे कि पुलिस उन्हें तथाकथित शिव अवतार के पास जाने दे। इसके लिए महिला अजीब-अजीब बातें कर रही है। साथ ही कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो सुनी-सुनाई बातों पर यकीन करके यहां आए हैं और बलग जाना चाहते हैं। वे कह रहे हैं कि हम पागल नहीं हैं।

मगर इन सबमें महिला की बातें कुछ अजीब हैं, खुद देखिए-

बता दें कि बलग में एक ही परिवार के तीन बच्चे खुद को देवताओं का अवतार बता रहे थे और दावा कर रहे थे कि वे सब बीमारियों का इलाज कर देंगे। वे अन्य देवी-देवताओं को भी चुनौती दे रहे थे। हिमाचल के विभिन्न हिस्सों से ही नहीं बल्कि पंजाब और हरियाणा से भी लोग आ रहे थे। उन्हें उम्मीद थी कि कैंसर, किडनी या लीवर फेल हो जाने तक का ये तथाकथित अवतार इलाज कर देंगे।

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बलग गांव में लोगों और वाहनों की भीड़ जमा हो गई थी। डॉक्टर इस मामले को मानसिक समस्या और मास हिस्टीरिया का केस बता रहे थे, मगर प्रशासन की तरफ से कार्रवाई नहीं की जा रही थी। शनिवार को इन हिमाचल की ओर से सवाल पूछे जाने के बाद प्रशासन हरकत में आया और बलग में चल रहे तमाशे पर रोक लगाई।

पढ़े: ठियोग में तमाशा बंद; सड़कें ‘सील’, बच्चे इलाज को तैयार

अब बच्चों को भीड़ से दूर रखा जा रहा है और स्थानीय लोगों के अलावा और किसी को भी बलग की तरफ आने की इजाजत नहीं दी जा रही है। साथ ही प्रशासन के मुताबिक खुद को अवतार बताने वाले बच्चों के माता-पिता ने वादा किया है कि वे अपने बच्चों का इलाज करेंगे।

ठियोग में तमाशा बंद; सड़कें ‘सील’, बच्चे इलाज को तैयार

शिमला।। ठियोग के बलग में चल रहा तमाशा आखिरकार बंद हो गया है. यहां पर तीन बच्चों ने खुद को देवताओं का अवतार घोषित कर दिया था और वे कई रोगों के इलाज का दावा कर रहे थे। हरियाणा और पंजाब तक से हजारों लोग यहां आ रहे थे।

बता दें कि इस संबंध में In Himachal ने कल शिमला के डीसी और बाल अधिकार आयोग को ईमेल भेजकर पूछा था कि इस मामले में बच्चों को भीड़ और अंधविश्वास से बचाने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं। इसके अगले ही दिन शनिवार को एसडीएम ठियोग मोहनदत्त शर्मा पूरे प्रशासनिक अमले के साथ बलग पहुंचे और उन्होंने यहां लोगों के जाने पर रोक लगा दी है।

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बाहरियों के लिए रास्ते बंद: अब बाहरी लोगों की गाड़ियां फागू से बलग स्थित बच्चों के घर नहीं जाएगी। इसके अलावा अन्य रास्तों, जैसे कि गिरिपुल होकर भी बच्चों तक नहीं पहुंचा जा सकेगा। रास्तों को सील करने के लिए बाकायदा पुलिस बल की तैनाती की गई है। सिर्फ स्थानीय लोग ही अपने घरों की तरफ जा सकेंगे।

काउंसलिंग भी की गई: एसडीएम ने इन तीन भाई-बहनों और उनके माता-पिता से भी बातचीत की है। बच्चों के आसपास भी किसी को जाने की इजाजत नहीं होगी। एसडीएम के मुताबिक अब बच्चों ने अपने लिए सुरक्षा मांगी है को लिखकर दिया है कि उनके पास कोई नहीं आएगा और उन्हें अकेला छोड़ दिया जाए।

बच्चे इलाज करवाने को तैयार: बच्चों ने ऐसा भी लिखकर दिया है कि वे अपना इलाज करवाने के लिए तैयार हैं। बच्चों के माता-पिता ने कहा है कि वे खुद बच्चों का इलाज करवाएंगे।

इन हिमाचल ने कल डीसी शिमला और बाल अधिकार संरक्षण आयोग से पूछे थे ये सवाल, आज हो गई कार्रवाई-

  • बाल अधिकार संरक्षण आयोग की जानकारी में क्या यह मामला है? और हां तो इन बच्चों को भीड़ से अलग करके इन्हें स्वास्थ्य सुविधा देने की दिशा में क्या किया गया?
  • क्या आयोग ने प्रशासन या शिक्षा विभाग से जानकारी ली है कि बच्चों को फिर से स्कूल ले जाने की दिशा में क्या प्रयास किए गए?
  • लोगों में अंधविश्वास के प्रति जागरूकता लाने के लिए जिला प्रशासन ने क्या कदम उठाए हैं?
  • अब इन बच्चों के भविष्य पर असर न पड़े, इसके लिए इन्हें अंधविश्वासी लोगों की भीड़ से बचाने के लिए क्या कोई योजना बनाई गई है?
  • क्या प्रशासन को पता है कि कुछ स्थानीय लोग अपने हितों को साधने के लिए इन बच्चों का लाभ उठाने में जुटे हुए हैं?

बता दें कि अभी तक ईमेल से किए गए इन सवालों के जवाब नहीं आए हैं, जवाब आते ही प्रकाशित किया जाएगा।

ठियोग में तमाशा बंद: रोड सील, बच्चे इलाज के लिए तैयार

शिमला।। ठियोग के बलग में चल रहा तमाशा आखिरकार बंद हो गया है. यहां पर तीन बच्चों ने खुद को देवताओं का अवतार घोषित कर दिया था और वे कई रोगों के इलाज का दावा कर रहे थे। हरियाणा और पंजाब तक से हजारों लोग यहां आ रहे थे।

बता दें कि इस संबंध में In Himachal ने कल शिमला के डीसी और बाल अधिकार आयोग को ईमेल भेजकर पूछा था कि इस मामले में बच्चों को भीड़ और अंधविश्वास से बचाने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं। इसके अगले ही दिन शनिवार को एसडीएम ठियोग मोहनदत्त शर्मा पूरे प्रशासनिक अमले के साथ बलग पहुंचे और उन्होंने यहां लोगों के जाने पर रोक लगा दी है।

पूरा मामला क्या है, जानने के लिए यहां क्लिक करें

बाहरियों के लिए रास्ते बंद: अब बाहरी लोगों की गाड़ियां फागू से बलग स्थित बच्चों के घर नहीं जाएगी। इसके अलावा अन्य रास्तों, जैसे कि गिरिपुल होकर भी बच्चों तक नहीं पहुंचा जा सकेगा। रास्तों को सील करने के लिए बाकायदा पुलिस बल की तैनाती की गई है। सिर्फ स्थानीय लोग ही अपने घरों की तरफ जा सकेंगे।

काउंसलिंग भी की गई: एसडीएम ने इन तीन भाई-बहनों और उनके माता-पिता से भी बातचीत की है। बच्चों के आसपास भी किसी को जाने की इजाजत नहीं होगी। एसडीएम के मुताबिक अब बच्चों ने अपने लिए सुरक्षा मांगी है को लिखकर दिया है कि उनके पास कोई नहीं आएगा और उन्हें अकेला छोड़ दिया जाए।

बच्चे इलाज करवाने को तैयार: बच्चों ने ऐसा भी लिखकर दिया है कि वे अपना इलाज करवाने के लिए तैयार हैं। बच्चों के माता-पिता ने कहा है कि वे खुद बच्चों का इलाज करवाएंगे।

इन हिमाचल ने कल डीसी शिमला और बाल अधिकार संरक्षण आयोग से पूछे थे ये सवाल, आज हो गई कार्रवाई-

  • बाल अधिकार संरक्षण आयोग की जानकारी में क्या यह मामला है? और हां तो इन बच्चों को भीड़ से अलग करके इन्हें स्वास्थ्य सुविधा देने की दिशा में क्या किया गया?
  • क्या आयोग ने प्रशासन या शिक्षा विभाग से जानकारी ली है कि बच्चों को फिर से स्कूल ले जाने की दिशा में क्या प्रयास किए गए?
  • लोगों में अंधविश्वास के प्रति जागरूकता लाने के लिए जिला प्रशासन ने क्या कदम उठाए हैं?
  • अब इन बच्चों के भविष्य पर असर न पड़े, इसके लिए इन्हें अंधविश्वासी लोगों की भीड़ से बचाने के लिए क्या कोई योजना बनाई गई है?
  • क्या प्रशासन को पता है कि कुछ स्थानीय लोग अपने हितों को साधने के लिए इन बच्चों का लाभ उठाने में जुटे हुए हैं?

बता दें कि अभी तक ईमेल से किए गए इन सवालों के जवाब नहीं आए हैं, जवाब आते ही प्रकाशित किया जाएगा।

हिमाचल में बिना आकलन किए खोल दिए 17 निजी विश्वविद्यालय: CAG रिपोर्ट

शिमला।। सीएजी की रिपोर्ट में साफ हुआ है कि हिमाचल प्रदेश में 17 प्राइवेट यूनिवर्सिटीज़ को यह देखे बिना ही स्थापित कर दिया गया है कि इनकी कितनी आवश्यकता थी। और तो और 10 यूनिवर्सिटीज़ एक ही जिले में हैं और चार तो एक ही ग्राम पंचायत में।

सीएजी ने लिखा है कि इससे लगता है कि इन्हें इलाके की जरूरतों या प्राथमिकताओं पर ध्यान में रखे बिना ही स्थापित कर दिया गया है। बता दें कि ‘इन हिमाचल’ भी इस मुद्दे को उठाता रहा है।

बुधवार को विधानसभा में रखी गई रिपोर्ट में और भी जानकारियां सामने आई हैं कि कैसे सरकारों कि ढलाई के कारण पाठ्यक्रमों से लेकर अन्य कई बातों में क्वॉलिटी और पारदर्शिता नहीं रही। जैसे कि निजी शिक्षण संस्थानों पर नजर रखने के लिए बनाए गए हिमाचल प्रदेश शिक्षण संस्थान नियायम आयोग में स्टाफ की कमी रही। इसका प्रभाव यह पड़ा कि निजी संस्थानों का समय पर निरीक्षण नहीं हुआ।

सीएजी की रिपोर्ट कहती है कि साल 2011 से 2017 तक नियामक आयोग ने बिना निरीक्षण ही 1394 कोर्सों को स्वीकृति दे दी और यह भी नहीं देखा गया कि उन विश्वविद्यालयों के पास उस कोर्स के लायक स्टाफ और इन्फ्रास्ट्रक्चर है भी या नहीं।

यही नहीं, यह भी पता चला कि तीन निजी विश्वविद्यालयों ने 2017-18 अकैडमिक सेशन के लिए इससे पिछले सत्र की तुलना में 21 से 58 प्रतिशत बढ़ोतरी कर दी और उसके पीछे कोई लॉजिक भी नहीं दिया कि ऐसा क्यों किया जा रहा है।

कुछ यूनिवर्सिटीज़ ने डिवेलपमेंट चार्ज के नाम पर गलत ढंग से वसूली की। कुछ ने तो पासआउट छात्रों की सिक्यॉरिटी भी वापस नहीं की। यह रकम लगभग आठ करोड़ रुपये बनती है।

हिमाचल में खाकी की मिलीभगत से चल रहा है नशे का कारोबार?

ऊना।। एक तरफ तो हिमाचल पुलिस के कई अधिकारी नशे के कारोबार के खिलाफ दिन-रात अभियान चला रहे हैं, दूसरी तरफ कुछ खाकी वाले ऐसे भी हैं जो चंद पैसों के लालच में हिमाचल प्रदेश के भविष्य को बर्बाद करने पर तुले हुए हैं।

जानकारी सामने आई है कि पंजाब से चिट्टा ला रहे तीन युवक जब पुलिस के हत्थे चढ़े तो उन्होंने दावा किया कि एएसपी स्तर का एक अधिकारी हर महीने उनसे 25 हजार और एसआईयू टीम का इन्चार्ज 4 हजार रुपये की घूस लिया करते थे।

दावा किया गया कि एक साल पहले से यह खेल चल रहा था। अब दोनों अधिकारियों का यहां से तबादला हो चुका है। एसपी ऊना दिवाकर शर्मा ने पूर्व एसआईयू इंचार्ज को तो तुरंत सस्पेंड कर दिया है वहीं एएसपी पर कार्रवाई के लिए डीजीपी को रिपोर्ट भेजी है।

इस मामले ने संकेत दिए है कि और भी पुलिस वाले इस खेल में सामिल हो सकते हैं। एसपी दिवाकर शर्मा ने मीडिया से कहा कि पुलिस संदिग्धों से पूछताछ कर रही है और नशे के इस काले कारोबार से जुड़े किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा।

मंडी में 12 साल का लड़का पिता बना, 15 साल की लड़की बनी मां

मंडी।। हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले में नाबालिग लड़का-लड़की माता-पिता बन गए। लड़की ने पद्धर अस्पताल में स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया है। जब डॉक्टरों ने जच्चा-बच्चा को डिस्चार्ज करने के लिए आधार कार्ड मांगे तब पाया कि खुद को पति-पत्नी बता रहे लड़का-लड़की नाबालिग हैं।

बताया जा रहा है कि आधार कार्ड के मुताबिक लड़की की उम्र 15 साल है और लड़के की उम्र 12 साल। हालांकि लड़के का कहना है कि उसकी उम्र 17-18 साल है। ऐसे में डॉक्टरों ने तुरंत पुलिस को खबर की क्योंकि दोनों की ही उम्र विवाह के लिए जरूरी कानूनी उम्र से कम है।

विवाह के लिए लड़की की उम्र 18 वर्ष और लड़के की उम्र 21 वर्ष होनी चाहिए। ऐसे में पुलिस ने डॉक्टरों की शिकायत के आधार पर लड़के के खिलाफ धारा 376 और प्रिवेंशन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्शुअल ऑफेंसेज़ ऐक्ट (पॉक्सो ऐक्ट) के तहत मामला दर्ज कर लिया है।

क्या है मामला
ऐसी जानकारी सामने आई है कि लड़की के पिता का निधन हो चुका है और उसकी मां ने कहीं और शादी कर ली है। वहीं लड़का भी आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि वाले परिवार से है। दोनों साथ रह रहे थे औऱ कथित तौर पर उन्होंने शादी कर ली थी।

इसी बीच लड़की गर्भवती हो गई। 26 मार्च को नाबालिग लड़की को प्रसव पीड़ा हुई तो साथ रहने वाला लड़का उसे सिविल हॉस्पिटल पद्धर ले आया। यहां 27 तारीख को उसने लड़के को जन्म दिया।

पुलिस का कहना है कि लड़की के नाबालिग होने की पुष्टि हो गई है जबकि लड़के की उम्र का सही से पता नहीं चल पाया है। पंचायत वगैरह में रिकॉर्ड क्रॉस चेक करने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।

क्या नागरिकों को बचाने के लिए विदेश में ऑपरेशन चला सकता है भारत?

आई.एस. ठाकुर।। 25 जनवरी, 2012. रात के लगभग 2 बजे सोमालिया के गांव गलकायो के लोग एक अनोखी आवाज से चौंक उठे। ये हेलिकॉप्टरों की गड़गड़ाहट थी। रात के घुप अंधेरे में अमरीकी नेवी सील्स के दो दर्जन सदस्यों वाली टीम निकल चुकी थी अपने उन दो नागरिकों को सोमाली डाकुओं से छुड़ाने के लिए, जो पिछले तीन महीनों से बंधक थे।

कमांडो हेलिकॉप्टर से उतरे, दो मील की दूरी तय की, बंधकों को छुड़ाया और उन्हें सुरक्षित ले आए। नौ सोमाली समु्द्री लुटेरे मारे गए और नेवी सील्स के किसी सदस्य को आंच तक नहीं आई थी। अपने नागरिकों को मुश्किल से मुश्किल हालात से निकालने के अमरीका के कारनामों की लिस्ट बनाने लगें तो घंटों लग जाएंगे।

ऐसा शानदार काम सिर्फ अमरीका ही कर सकता है। इसलिए, क्योंकि उसके नेतृत्व के पास इच्छाशक्ति है, उसके सुरक्षा बलों के पास अनुभव और तकनीक है और सबसे बड़ी बात- पश्चिमी देशों में हर नागरिक की जान मायने रखती है।
Image result for US navy seals in actionसरकार को क्या आपकी कद्र है?
इधर भारत में तो अपने देश के अंदर ही लोग मर रहे हैं, सरकार को चिंता नहीं है। फिर विदेश में फंसकर तड़प रहे या मर रहे भारतीयों की परवाह कौन करेगा? ज्यादा से ज्यादा सरकार इतना ही कर सकती है कि देरी से जागे और मुश्किल में फंसे लोगों के मर जाने के बाद उनके शव घर ले आए। वह भी चुनाव करीब आने पर शायद यह दिखाने के लिए कि हमें अपने नागरिकों की परवाह है। मगर हकीकत यह है कि जिंदा लोगों की हमारी सरकारों को कोई कद्र नहीं।

हिमाचल के तीन बेटे छोटे से अफ्रीकी देश नाइजीरिया में बंधक बनाए हुए हैं। उनके परिजन हर दर पर अपने बच्चों को बचाने की गुहार लगा चुके हैं। प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से बात कर चुके हैं। सांसदों समेत कई नेता चिट्ठियां लिख चुके हैं, अखबार खबरें छाप चुके हैं और लोग सोशल मीडिया पर असंख्य पोस्ट्स डाल चुके हैं। मगर अब तक किसी को नहीं पता कि उन बच्चों को बचाने के लिए क्या किया जा रहा है। हर कोई यही दुआ कर रहा है कि बंधक बनाने वाले कहीं कुछ गलत न कर दें।

Location of Nigeria shown in dark green
नाइजीरिया हरे रंग में

उनकी जगह खुद को रखिए
आप उन माता-पिता की बेबसी का अंदाजा लगाइए, जो अपने लाल को छोटी सी दिक्कत में फंसा देखकर भी बेचैन हो जाया करते थे, वे आज खुद को कितना मजबूर और लाचार पा रहे होंगे। न उन्हें नींद आती होगी, न खाने का मन करता होगा। हर वक्त अनहोनी की आशंका छाई रहती होगी और रह-रहकर भगवान से प्रार्थना होती होगी कि उनका लाल सलामत रहे। परिजनों की जगह आप खुद को रखकर सोचेंगे तो शायद उनका दर्द महसूस कर पाएंगे।

भारत सरकार चाहे तो चुटकियों में संकट का समाधान कर दे। ये दो देशों का मामला है। हिंदुस्तान और नाइजीरिया के बीच अच्छे रिश्ते हैं। कई साझा कार्यक्रम चलते हैं दोनों के बीच। भारत अपनी जरूरत का लगभग पच्चीस प्रतिशत तेल नाइजीरिया से लेता है जो नाइजीरिया के उत्पादन का लगभग तीस फीसदी है। भारतीय कंपनियों ने निवेश किया है वहां।

भारत में पचास हजार से ज्यादा नाइजीरियन रहते हैं और करीब चालीस हजार भारतीय नाइजीरिया में हैं। अगर इतने गहरे संबंध होने पर भी आप उस देश में फंसे अपने नागरिकों को नहीं ला पाते तो क्या फायदा? और अगर नाइजीरिया का प्रशासन या सुरक्षा बल हिमाचल के बेटों को छुड़ाने में अक्षम हैं तो भारत अपनी सुरक्षा एजेंसियों से मदद की पेशकश करे।
Image result for हिमाचल नाइजीरियामगर यह सब तो तब होगा न जब कोई सरकार कुछ करना चाहेगी। यहां तो सरकार 2019 के चुनावों की तैयारियों में जुटी हुई है। 1 करोड़ 30 लाख की आबादी में तीन लोगों को कौन पूछता है?

यह अमरीका या इजरायल जैसे देशों के अंदर ही दम है कि किसी भी देश को अपने नागरिकों को बचाने के लिए मजबूर करें और अगर वह देश न माने तो दनदनाता हुआ घुसे और सुरक्षित निकाल लाए। बाकी, अपने देश के नेताओं को बेटों की नहीं, वोटों का चिंता है। कोई जीता है तो जिए, मरता है तो मरे। सरकारों के पास और भी बहुत काम हैं। अगर सरकारों ने पहले से इस तरह के मामलों पर गंभीर कार्रवाई की होती तो आज कोई भी भारतीय नागरिकों को हाथ लगाने से पहले शायद सौ बार सोचता।

(लेखक हिमाचल प्रदेश से जुड़े विषयों पर लिखते रहते हैं, उनसे kalamkasipahi @gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है)

बुलेट से पटाखे की आवाज निकालने से रोकने पर बुजुर्ग की पिटाई

ऊना।। अंब में एयरफोर्स से रिटायर्ड एक बुजुर्ग के साथ बुलेट सवारों ने मारपीट का मामला सामने आया है। बुजुर्ग ने बस इतना किया था कि इन बुलेट सवारों को इस बात के लिए टोका था कि सायलेंसर से पटाखे की आवाज न निकालें। बुजुर्ग के साथ मारपीट की गई है और उन्हें चोटें आई हैं।

भंजाल में रहने वाले सोहन लाल की शिकायत थी कि शनिवार को जब वह घर के पास बैठे थे तो वहां से गुजर रहे बुलेट सवार साइलेंसर से पटाखे की आवाज निकाल रहे थे, जिससे शोर हो रहा था। उनका कहना है कि जब उन्होंने इस बात के लिए रोका तो उनसे साथ ये लड़के बहस करने लगे।

बुजुर्ग के मुताबिक मारपीट भी की गई, जिसमें उन्हें गंभीर चोटें आई हैं। इस संबंध में पुलिस का कहना है कि उसने दोनों पक्षों का समझौता करवा दिया है। जांच अधिकारी ने बताया कि मारपीट के शिकार हुए बुजुर्ग का मेडिकल भी करवाया गया है।

(नीचे यूट्यूब पर कई लोगों ने गर्व से पटाखों की आवाज निकालने के वीडियो डाले हैं)

वैसे बुलेट के सायलेंसर से बीच-बीच में पटाखे की आवाज निकालने का चलन पूरे हिमाचल में फैल चुका है। अक्सर देखा जाता है कि लड़कियों के पास से गुजरने पर या किसी भीड़ से गुजरने पर इस तरह के पटाखे किए जाते हैं। यह स्पष्ट तौर पर छेड़छाड़ और अभद्र तरीका है, मगर पुलिस इस तरह के मामलों में कोई कार्रवाई नहीं करती। नतीजा- खुद को कूल समझने वाले बेवकूफों की संख्या बढ़ती जा रही है।