शिमला।। हिमाचल प्रदेश में सरकारी निगमों और बोर्डों के चेयरमैन और उपाध्यक्षों की नियुक्तियों का सिलसिला जारी है। पहले दौर में जहां 3 नामों की घोषणा हुई थी, आज जयराम सरकार ने 10 और नामों का ऐलान किया है।
नियुक्ति के बाद सभी उपाध्यक्ष और चेयरमैन मुख्यमंत्री का धन्यवाद करने सचिवालय पहुँचे और नईं ज़िम्मेदारी देने के लिए मुख्यमंत्री का आभार जताया।
पढ़ें, किसे कौन सा पद मिला।
1.हमीरपुर से विजय अग्निहोत्री ,एचआरटीसी के उपाध्यक्ष बनाए गए
2.ऊना से रामकुमार HPSIDC के उपाध्यक्ष बनाए गए
3.पूर्व मंत्री प्रवीण शर्मा HIMUDA के उपाध्यक्ष बनाए गए
4.किन्नौर से सूरत नेगी को फ़ॉरेस्ट कारपोरेशन का उपाध्यक्ष बनाया गया
5.शिमला से रूपा शर्मा को सक्षम गुड़िया बोर्ड का उपाध्यक्ष बनाया गया
6.काँगड़ा से मनोहर धीमान को GIC का उपाध्यक्ष बनाया गया
7.सोलन के दर्शन सैनी को हिमाचल जल प्रबंधन बोर्ड का उपाध्यक्ष बनाया गया
8.सिरमौर के बलदेव तोमर को हिमाचल खाद्य एवं आपूर्ति निगम का उपाध्यक्ष बनाया गया
9.कुल्लू से राम सिंह को HPMC का उपाध्यक्ष बनाया गया
10.शिमला से गणेश दत्त को HIMFED का चेयरमैन बनाया गया
ए.आर. प्रसन्न।। आपको किसी बात पर गुस्सा आता है तो आप क्या करते हैं? झुंझलाते हैं, बड़बड़ाते हैं और अगर मामला हद से बाहर हो जाए तो हो सकता है आपकी सामने वाले हाथापाई भी हो जाए। सामान्य सी बात है। ऐसा होना नहीं चाहिए मगर इंसान आपा खो बैठता है कई बार। आप जब स्कूल-कॉलेज में होते हैं तो नासमझ होते हैं। आपमें इतनी समझ नहीं होती कि क्या करना चाहिए, क्या नहीं। छोटी-छोटी बातों को लेकर दोस्तों या सहपाठियों से झगड़ा हो जाता है, गाली-गलौच हो जाती है और कई बार नौबत मारपीट तक आ पहुंचती है।
मेरी जेनरेशन के बहुत से लोगों ने स्कूल-कॉलेज में खूब लड़ाई की होगी। मगर गनीमत कि हमारे दौर में मोबाइल कैमरे नहीं थे वरना लोग हमारी उन नादानियों के वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाल देते। उस दौर में मोबाइल फोन और फेसबुक वगैरह भले ही नहीं थे, मगर लोगों और हमारी उम्र से बच्चों में एक चीज थी जो आज की जेनरेशन में दिखाई नहीं देती- समझदारी।
जब कभी झगड़ा होता था तो कोई न कोई बीच-बचाव करने वाला आ ही जाता था। हां, कुछ तत्व ऐसे होते थे जिन्हें लड़ने-लड़वाने में मजा आता था, मगर छुड़वाने और बीच-बचाव करने वालों की संख्या उनसे ज्यादा होती थी। मगर आज अगर कोई स्कूल-कॉलेज में झगड़ने लगे, कोई भी छुड़वाने की कोशिश बाद में करता है, पहले मोबाइल निकालकर वीडियो बनाने लगता है।
आजकल हमीरपुर के किसी कॉलेज में दो बच्चियों की लड़ाई का वीडियो खूब चटखारे लेकर शेयर किया जा रहा है। अखबार वाले बेशर्मी से उस वीडियो को अपनी वेबसाइट पर चटपटे शीर्षकों के साथ लगा रहे हैं- बॉयफ्रेंड को लेकर गुत्थमगुत्था हुईं लड़कियां। और हमारे और आपके ही जैसे लोग इस वीडियो को मजे लेते हुए शेयर भी कर रहे हैं।
कई जगह चटखारे लेकर परोसा गया है वीडियो
लड़कियां लड़ पड़ीं तो क्या हो गया?
मैं देखता हूं कि लड़कियों के इस तरह के वीडियो कुछ ज्यादा शेयर किए जाते हैं। जैसे कि सिगरेट पीती लड़कियों की तस्वीरें, शराब या बियर पी रही लड़कियों की तस्वीरें या वीडियो या फिर गाली दे रही लड़कियों के वीडियो आदि। आपको शायद ही कोई ऐसा वीडियो शेयर होता दिखाई देगा जिसमें व्यस्क पुरुष गाली दे रहा हो, शराब पी रहा हो या सिगरेट पी रहा हो। कम से कम तब तक नहीं, जिसमें कोई फनी बात न हो रही हो। मगर लड़कियों के मामले में अगर लड़की सिगरेट पी रही हो, शराब पी रही हो, उतना ही काफी है। उसमें किसी फनी एंगल या हास्यास्पद या यूनीक घटना की जरूरत नहीं है। लड़की का गाली देना, शराब या सिगरेट पीना ही खुद में लोगों के लिए रोमांचक हो जाता है।
इतना ही नहीं, उस वीडियो के साथ बहुत गंभीर मेसेज देने की कोशिश की जाती है कि लड़कियां बर्बाद हो गईं, लड़कियों को पंख लग गए, ऐसी लड़कियां कैसी मां बनेंगी कल, या मां-बाप ने ज्यादा आजादी दे दी है। यही काम अगर लड़के करते हैं तो इशू नहीं है, लड़कियां कर देती हैं तो वायरल मटीरियल हो जाता है। लड़के अगर गर्लफ्रेंड के लिए लड़ पड़ें तो नॉर्मल है मगर लड़कियां अगर बॉयफ्रेंड के कारण भिड़ जाएं तो मजा आने लग जाता है।
ये हमारी मानसिकता को दिखाता है कि हम लड़कियों या महिलाओं के प्रति कितने पूर्वग्रहों से भरे हैं। लड़कों के लिए जिन चीजों को हम सामान्य समझते हैं, वे लड़कियों को लेकर कैसे असमान्य समझ ली जाती हैं। अगर कोई चीज गलत है तो वो सबसे लिए गलत है और ठीक है तो सबसे के लिए ठीक है। ऐसा नहीं हो सकता कि लड़के करें तो ठीक, लड़कियां करें तो गलत।
लड़के आए दिन लड़ते हैं, उनके वीडियो पर क्यों खबर नहीं बनती?
वैसे इस बहस से इतर मुद्दा यह है कि अगर कोई लड़ रहा है तो अगर आप उन्हें छुड़ा नहीं सकते, उनकी मदद नहीं कर सकते तो कम से कम वीडियो तो मत बनाइए। और अगर किसी बेवकूफ ने ऐसा वीडियो बना लिया है तो आप तो कम से कम समझदारी बरतिए। उसे शेयर करके आप लड़ने वालों की मूर्खता का नहीं, बल्कि अपनी मूर्खता का प्रदर्शन कर रहे होते हैं। क्योंकि ईश्वर न करे आपका या आपके बच्चों का किसी करीबी का कोई ऐसा वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाल देता तो आप क्या करते?
हर मामले में खुद को रखकर सोचना चाहिए। ये कॉलेज के बच्चे हैं, नासमझ हैं, भावनाओं में बह गए, लड़ पड़े। कल को ये पछताएं और शायद फिर दोस्त बन जाएं मगर आपने जो वीडियो वायरल कर दिया, उससे उनकी छवि को कितना नुकसान पहुंचा ये सोचिए। वे डिप्रेशन में जा सकते हैं।
बात लड़के या लड़कियों के वीडियो की नहीं, किसी भी संवेदनशील वीडियो की है। आप खुद को बहुत क्रांतिकारी समझकर हर वीडियो को शेयर कर देते हैं कि आगे बढ़ा दिया जाए। मगर इस तरह के वीडियो कितना नुकसान पहुंचा रहे होते हैं आपको पता नहीं होता। कई बार तो आप फर्जी वीडियो ही शेयर कर रहे होते हैं।
इसलिए प्लीज, कोई भी वीडियो बनाने से पहले या उसे शेयर या फॉरवर्ड करने से पहले एक पल के लिए सोचें जरूर कि क्या आपका ऐसा करना जरूरी है? क्या ये वीडियो असली या ऑथेंटिक है? क्या इसे शेयर करने से कुछ भला होगा? अगर नहीं तो वहीं पर रुक जाएं। आपका ये छोटा सा कदम एक जिम्मेदार नागरिक के तौर पर बेहद महत्वपूर्ण कदम होगा।
(हिमाचल प्रदेश में रह रहे लेखक ने हमारे फेसबुक पेज पर मेसेज करके यह टिप्पणी प्रकाशित करने के लिए भेजी है।)
एमबीएम न्यूज नेटवर्क, नाहन।। सिरमौर के औद्योगिक इलाके कालाअंब के बारे में यह कहा जाता है कि इसका नाम इसलिए पड़ा क्योंकि यहां एक आम के पेड़ के नीचे अपराधियों को फांसी दी जाती थी। लेकिन इस संबंध में गहन पड़ताल के बाद जानकारी सामने आई है कि अपराधियों को रियासती काल में नाहन जेल में तय स्थान में ही फांसी दी जाती। फिर सवाल उठता है कि आखिर इसका नाम कालाअंब कैसे पड़ गया? इसकी एक रोचक कहानी सामने आई है कि इस जगह का ऐसा नाम काले खान नाम के एक योद्धा के कारण पड़ा था।
काले खान के बारे में पता चला है कि वह ऐसे योद्धा थे, जिनसे बाहरी लोग डरा करते थे। कहा जाता है कि 18वीं सदी में सिरमौर रियासत के राजा ने ताकतवर काले खान को उस जगह की जिम्मेदारी दी थी, जहां से सिरमौर में प्रवेश किया जाता था। काले खान लंबे और तगड़े योद्धा थे, जो अकेले ही एक साथ कईयों पर भारी पड़ते थे।
बताते हैं कि पहले सिरमौर रियासत की राजधानी सिरमौरी ताल में थी। उसके बाद नाहन में बसी। काले खान की ड्यूटी पहले सिरमौरी ताल क्षेत्र के एक गांव में होती थी। राजधानी बदलने के बाद काले खान भी राज परिवार के साथ नाहन आ गए। सिरमौर के महाराजा ने काले खान की बहादुरी, युद्ध कौशल को देखते हुए सिरमौर के बॉर्डर की रक्षा के लिए उन्हें मारकंडा के जंगल में भेजा, जो आज कालाअंब में है। काले खान ने लंबे समय तक यहां अपनी सेवाएं दी।
प्रतीकात्मक तस्वीर
ऐसी बात भी चलन में है कि सिरमौर के महाराजा जब भी शिकार पर जाते थे तो काले खान को भी अपने साथ ले जाते थे, क्योंकि शिकार में काले खान के सामने कोई नहीं टिकता था।
ऐसे पड़ा काला अंब नाम
कालाअंब जो अब एक औद्योगिक क्षेत्र बन गया है, पहले एक जंगल हुआ करता था। मारकंडा नदी सिरमौर रियासत को अन्य रियासतों से अलग करती थी, इसी कारण यह सिरमौर का बॉर्डर बना था। सिरमौर के महाराजा ने काले खान को उक्त बॉर्डर की जिम्मेदारी दी थी। इस जिम्मेदारी को काले खान ने बखूबी निभाया।
काले खान के नाम से इस क्षेत्र को ‘काले वाला’ इलाका कहा जाने लगा। कालांतर में यह नाम काला आम हो गया क्योंकि इस इलाके में आम के कई पेड़ थे। यानी ‘आम के पेड़ों वाला काले वाला इलाका’ था यह। इतना लंबा नाम तो कोई ले नहीं सकता था, इसलिए इसे काला अंब यानी काला आम ही कहा जाने लगा।
काले खान के ‘वशंज’ भी हैं वीर काले खान के वशंज भी हां रहते हैं। त्रिलोकपुर पंचायत के पूर्व प्रधान साधुद्दीन भी खुद को काले खान के वंशज बताते हैं। साधुद्दीन से जब इस बारे पूछा गया तो उन्होंने बताया कि वह अपने बहादुर बुजुर्ग की कहानी अपने बुजुर्गों से बचपन से सुनते आ रहे हैं।
साधुद्दीन ने कहा, “हमें गर्व है कि हम ऐसे महायोद्धा के वंशज हैं। हम उनकी विरासत को बनाए रखने के लिए हर एक अच्छा काम करते जाएंगे।”
बता दें कि साधुद्दीन अपने क्षेत्र में जब प्रधान थे तो उन्होंने पंचायत का कोई भी लड़ाई-झगड़ा कोर्ट या पुलिस चौकी में नहीं जाने दिया। उन्होंने सभी केस अपने क्षेत्र में ही निपटाए। उधर साधुद्दीन के पुत्र इकबाल खान भी क्षेत्र में राजनीतिक रूप से सक्रिय हैं।
शिमला।। मंगलवार को कोटखाई से बीजेपी विधायक नरेंद्र बरागटा ने खुद को मुख्य सचेतक बनाने के लिए मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर का आभार प्रकट किया और इसके लिए वह समर्थकों की भीड़ के साथ सचिवालय पहुंचे। यहां न सिर्फ महत्वपूर्ण काम करवाने आए लोगों को असुविधा का सामना करना पड़ा बल्कि सड़क के बीच नाच रहे विधायक समर्थकों के कारण ट्रैफिक जाम भी लग गया।
सवाल उठ रहे हैं कि आखिर इस ‘धन्यवाद कार्यक्रम’ नाम के राजनीतिक कार्यक्रम को सचिवालय से बाहर करवाने की इजाजत क्यों दी गई। दरअसल इस कार्यक्रम के लिए आए भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता सचिवालय के गेट के सामने ही नाटी डालने लगे। सैकड़ों की संख्या में इस तरह लोगों के जमा होने से शहर की यह महत्वपूर्ण सड़क जाम हो गई और लोग फंस गए।
Image: Social Media/Facebook
कर्मचारियों, पर्यटकों और स्कूल-कॉलेज के छात्रों को भी असुविधा का सामना करना पड़ा। छोटा शिमला से राजभवन की ओर जाने वाली सड़क पर भी वाहनों की आवाजाही बंद रखी गई थी।
सोशल मीडिया पर लोगों ने नाराजगी जताते हुए कहा है कि क्या प्रशासन किसी पार्टी को सचिवालय के सामने धरना-प्रदर्शन करने की इजाजत देता है जो इस तरह से नाचने-गाने की इजाजत दे दी गई।
Image: FB/Jairam Thakur
लोगों का यह भी कहना था कि अगर इस तरह के कोई और सड़क जाम करता तो उसके खिलाफ कार्रवाई होती जबकि सत्ताधारी पार्टी के कार्यकर्ता बीच सड़क पर नाचकर लोगों के लिए असुविधा खड़ी करते रहे मगर इस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया।
गौरतलब है कि पिछले दिनों सीपीएम ने महंगाई और बसों के बढ़े किराए के खिलाफ सड़क जाम कर दी थी जिससे अव्यवस्था का माहौल पैदा हो गया था। लोग इस कथित शक्ति प्रदर्शन की तुलना उसी से कर रहे हैं, क्योंकि दोनों आयोजनों से जनता को असुविधा ही हुई।
इन हिमाचल डेस्क।। पंडित सुखराम के पोते और ऊर्जा मंत्री अनिल शर्मा के बेटे आयुष शर्मा की मूवी लवयात्री फ्लॉप होने की कगार पर है। सलमान खान प्रोडक्शन के बैनर तले आयुष शर्मा और वरीना हुसैन ने अपना बॉलीवुड डेब्यू तो कर लिया है लेकिन ये दोनों कलाकार दर्शकों पर अपनी छाप छोड़ने में असफल रहे हैं।
गौरतलब है कि वरीना इससे पहले कैडबरी के विज्ञापन में भी नज़र आ चुकी हैं। रोमांटिक फिल्म होने के बावजूद भी दर्शकों ने फिल्म को नकार दिया। फिल्म की स्टोरीलाइन बासी होने के चलते दर्शकों ने इस फिल्म से दूरी बनाना बेहतर समझा। ‘लवयात्री’ के साथ ही श्रीराम राघवन की फिल्म ‘अंधाधुन’ भी रिलीज हुई थी। पहले दिन ‘लवयात्री’ ने ‘अंधाधुन’ से ज्यादा कमाई करने में सफल रही लेकिन दूसरे दिन से फिल्म का कमाई का आंकड़ा गिरता चला गया था।
अपना खर्च नहीं निकाल पा रही
‘लवयात्री’ ने ओपनिंग डे पर 1 करोड़ 66 लाख रुपए का बिजनेस किया था। वीकेंड का भी फिल्म को खास फायदा नहीं मिला और फिल्म दूसरे दिन 2 करोड़ 4 लाख रुपए का बिजनेस और रविवार को 2 करोड़ 6 लाख रुपए का बिजनेस करने में सफल हुई। सोमवार को फिल्म ने 1 करोड़ का आंकड़ा छुआ। मंगलवार को फिल्म ने करीब 99 लाख रुपए का बिजनेस किया। बुधवार को भी फिल्म 80 लाख रुपए का बिजनेस करने में सफल हुई।
शुक्रवार तक फिल्म 10 करोड़ 20 लाख रूपए कमा चुकी थी और फिल्म ने शनिवार को 55 लाख का बिजनेस किया। इसके साथ ही फिल्म का टोटल कलेक्शन 10 करोड़ 75 लाख हो चुका है।हालांकि फिल्म का बजट 25 करोड़ है और फिल्म को हिट होने के लिए 35 करोड़ कमाने की ज़रूरत थी।
‘जनसत्ता‘ के मुताबिक ट्रेड पंडित ऐसे कयास लगा रहे हैं कि फिल्म 13-14 करोड़ रुपए से ज्यादा का कारोबार करने में सफल नहीं हो पाएगी। ऐसे में फिल्म पर फ्लॉप होने का खतरा मंडरा रहा है। फिल्म ‘फाई-डे’, ‘जलेबी’ और ‘हेलीकॉप्टर ईला’ के रिलीज़ होने की वजह से भी ‘लवयात्री’ की कमाई पर प्रभाव पड़ा है। फिल्म को भारत में 800 स्क्रीन्स पर रिलीज किया गया है।
शिमला।। प्रदेश की राजधानी के बड़े अस्पताल आई.जी.एम.सी. में अब बॉटल्ड वॉटर की बिक्री पर रोक लगा दी गई है। प्रशासन ने कैंटीन चलाने वालों और दुकानदारों को निर्देश दिया है कि वे मिनरल वॉटर न बेचें। इस फैसले के पीछे प्रशासन ने वजह बताई है कि हाल ही में मुख्यमंत्री ने यहां वॉटर एटीएम का उद्घाटन किया है जिससे मरीजों और तीमारदारों को साफ पानी मिल रहा है।
यह हास्यास्पद फैसला है क्योंकि अगर कोई व्यक्ति सफाई न होने के कारण या किसी और वजह से वॉटर एटीएम से पानी नहीं लेना चाहता और वह बोतलबंद पानी ही खरीदना चाहता है तो उसे ऐसा करने से रोकने का अधिकार किसी को नहीं है। अगर कोई सक्षम है तो वह पैसे देकर अपनी मर्जी से बोतलबंद पानी खरीदेगा। जिसके पास इतने पैसे नहीं होंगे, वह अपने आप वॉटर एटीएम से पानी ले लेगा।
लेकिन खबर आई है कि प्रशासन ने दुकानदारों और कैंटीन वालों को कहा है कि मिनरल वॉटर का जो स्टॉक बचा हुआ है, उसे बेचकर दोबारा से स्टॉक न मंगवाए। अगर दोबारा स्टॉक मंगवाया गया तो प्रशासन सख्त कार्रवाई करेगा।
आईजीएमसी प्रशासन का यह भी कहना है कि वह अस्पताल को प्लास्टिक फ्री बनाने में जुटा हुआ है। लेकिन अस्पताल में क्या प्लास्टिक की अन्य चीजें इस्तेमाल नहीं होतीं? शहर में क्या प्लास्टिक बैन है? समस्या प्लास्टिक में नहीं, प्लास्टिक के सही निपटारे की है। फिर वह पानी की बोतलों का हो या किसी और चीज का।
प्रशासन का कहना है कि अब मरीजों को साफ पानी अस्पताल में वॉटर एटीएम में मुहैया करवाया गया है। मरीजों व तीमारदारों को बाहर से पानी खरीदने की कोई जरूरत नहीं है। अगर मरीज वाटर एटीएम से साफ पानी खरीदता है तो उनके पैसे भी बच जाएंगे।
डॉ. पंकज राणा।। करीब 68 लाख 65 हजार की आबादी वाला पहाड़ी प्रदेश 55,673 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में बसा है। प्रदेश की संस्कृति ने पशुधन एवं मनुष्य को माला की भांति रिश्ते मे पिरो कर रखा है। पशुधन एक तरफ तो मनुष्य को खाद्य सुरक्षा प्रदान करता है तो दूसरी तरफ आजीविका की व्यवस्था भी करता है।
स्पष्ट है कि हिमाचल प्रदेश में पशुधन का स्वास्थ्य वह महत्वपूर्ण कड़ी है जिसके बिना प्रदेश में खुशहाली नहीं लायी जा सकती। किन्तु क्या प्रदेश की संस्कृति के इस अभिन्न अंग के स्वास्थ्य की सुध कभी ली गई? इन मूक पशुओं की व्यथा की बानगी ही है कि ये महज चुनावी वादों और दावों का हिस्सा मात्र बनकर रह गए।
19वीं पशुगणना 2012 के अनुसार हिमाचल प्रदेश में कुल 48,44,431 संख्या में पशुधन है। इस कुल संख्या में 21,49,259 गौवंश, 7,16,016 भैंस प्रजाति, 8,04,871 भेड़, 11,19,491 बकरियां एवं 15,081 घोड़े हैं। इन आंकड़ों पर गौर कीजिये कि संपूर्ण पशुधन के स्वास्थ्य की सुध लेने के लिए प्रदेश में केवल 439 पशु चिकित्सकों के पद ही स्वीकृत है। लेकिन विडंबना ही है प्रदेश में इनमे से भी केवल 320 पदों पर ही चिकित्सक तैनात हैं। सरल शब्दों में समझें तो 21000 पशुधन पर केवल 1 चिकित्सक है।
ये अनुपात ही प्रदेश में पशु स्वास्थ्य सुविधा की खस्ता हालत बताने के लिए पर्याप्त है। यह कहना अतिशियोक्ति न होगी कि ये पशुधन के साथ अन्याय तो है ही साथ ही उस महत्वपूर्ण कड़ी के साथ भी खिलवाड़ है, जिसके तहत मानव एवं पशु स्वास्थ्य एक दूसरे से बंधे हुए हैं।
प्रदेश में सड़कों में घूम रहे बेसहारा गोवंश की समस्या को हल करने की कवायद भी जारी है। गौ सेंचरी बना कर निस्संदेह हम कुछ समय तक तत्काल राहत पा सकते हैं किन्तु यह समस्या के मूल का निवारण नहीं है। हाँ, भयावह रूप धारण कर चुकी परिस्थति के निदान के लिए अनिवार्य भी है परन्तु गोवंश सड़कों पर आए ही न, ये ऐसा उपाय नहीं है।
क्यों आज तक गोवंश के संरक्षण की कोई ठोस योजना एवं नीति धरातल पर नहीं उतर पाई? सत्य यही है कि गोवंश के संरक्षण एवं देख- रेख की केवल बातें हुईं है। यदि गोवंश के खान-पान के लिए चरागाह विकसित किए जाएँ, उनके इलाज के आधारभूत ढांचा बनाया जाए एवं उनके इलाज़ को नीम हकीमों के भरोसे न छोड़कर प्रशिक्षित डॉक्टर उपलब्ध करवाएं जाएं तो काफी हद तक हम समस्या के मूल को ठीक कर सकतें हैं।
प्रदेश के कृषि विश्वविद्यालय के एक अध्ययन के अनुसार करीब 55 % बेसहारा मादा गौवंश मादा स्त्री रोगों से ग्रसित पाया गया। अर्थात इलाज़ के बाद इनमें से बहुत से गोवंश को दोबारा पशुपालकों द्वारा पाला जा सकता है। आवारा कुत्तों की समस्या से भी हम सब परिचित हैं। गौरतलब है कि राजधानी शिमला में ही हर वर्ष करीब 1000 लोग आवारा कुत्तों द्वारा काट लिए जाते हैं। फिर पूरे प्रदेश में यह आकंड़ा कितना बड़ा होगा।
माननीय उच्चतम न्यायालय ने भी पिछले वर्ष शिमला को आवारा कुत्तों से मुक्त करवाने के आदेश दिए थे। किन्तु जब कुत्तों की नसबंदी के लिए प्रदेश में पशु चिकित्सक ही न हों, न ही आधारभूत ढांचा और न ही नीति तो आवारा कुत्तों की रोकथाम की बात करना महज हवामहल ही है। इस परिस्थिति की जिम्मेदारी किसकी है? रेबीज़ जैसी भयंकर बीमारी का डर भी यदि सरकारों को सोचने पर विवश नहीं करता तो फिर कुछ कहना लिखना भी व्यर्थ है।
ऐसा नहीं है कि पशु चिक्त्सिक उपलब्ध नहीं है, किन्तु वे प्रदेश छोड़कर महानगरों में प्राइवेट प्रैक्टिस करने के लिए विवश हैं। हमें आवश्यकता है की वादों और दावों से निकलकर चरणबद्ध वैज्ञानिक ढंग से पशुधन के स्वास्थ्य के लिए कार्य करें। पशुधन के उचित स्वास्थ्य के लिए चरागाह विकसित करने होंगे, आधारभूत ढांचा विकसित करना होगा एवं पशु चिकत्स्कों को तैनाती देनी होगी। गौ सेंचरी, गोसदन और गोशाला बना कर हम अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो जाते बल्कि वहां भी उनके खान-पान एवं स्वास्थ्य के विषय में विचार करना होगा। जनतंत्र में यह तभी होगा जब जनता इन मांगों को सरकार के समक्ष उठाये क्योंकि पशुधन स्वयं वोटबैंक नहीं।
(लेखक डॉक्टर पंकज राणा से 9816601776 पर संपर्क किया जा सकता है)
नोट- ये लेखक के अपने विचार हैं, इनके लिए वह स्वयं उत्तरदायी हैं।
महाराष्ट्र के नागपुर शहर में आयोजित होलीडे एक्स्पो टूरिज़म ऐंड ट्रैवल्स प्रदर्शनी में हिमाचल प्रदेश के पर्यटन विभाग के स्टॉल में पर्यटकों की खूब भीड़ रही।
12 से 14 अक्टूबर तक आयोजित इस प्रदर्शनी में स्थानीय लोगों के अलावा देश के अन्य हिस्सों से आए पर्यटकों ने भी हिस्सा लिया।
प्रदर्शनी में लगी तस्वीरों आदि के माध्यम से लोगों ने हिमाचल के सौंदर्य को निहारा और यहां घूमने आने में रुचि दिखाई।
इस बारे में होटेल पीटरहॉफ के मैनेजर डीडी शर्मा ने जानकारी दी और कहा कि पर्यटक हिमाचल के अडवेंचर और धार्मिक पर्यटन को लेकर काफी उत्साहित नजर आए।
डी. डी. शर्मा
डीडी शर्मा ने कहा, “पर्यटकों को हिमाचल प्रदेश पर्यटन विकास निगम और पर्यटन विभाग द्वारा चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं और पर्यटकों को दी जाने वाली सेवाओं व सुविधाओं के बारे में बताया गया।”
इस प्रदर्शनी का उद्देश्य विभिन्न राज्यों के प्राकृतिक सौंदर्य, कला संस्कृति आदि के प्रति पर्यटकों को आकर्षित करना और आपसी सहयोग से पर्यटन को बढ़ाना देना था।
तीन दिन की इस प्रदर्शनी में हिमाचल के अलावा गुजरात, मध्य प्रदेश, झारखंड, गोवा और राजस्थान समेत अन्य राज्यों ने हिस्सा लिया। इसके साथ ही पर्यटन कारोबार से जुड़े लोगों ने भी इसमें शिरकत की।
कांगड़ा।। हिमाचल प्रदेश के अस्पतालों में डॉक्टरों और सुविधाओं के अभाव की कहानी नई नहीं है। अक्सर एक अस्पताल से बड़े अस्पताल में रेफर किया जाता है और समय पर सही इलाज न मिलने से कई बार मरीज़, खासकर ज़ख़्मी लोग दम तोड़ देते हैं। अफसोस, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं देने का वादा कर सत्ता में आई बीजेपी की सरकार को एक साल पूरा होने वाला है मगर अभी तक हालत में सुधार नहीं हुआ।
बैजनाथ के एक निवासी ने आपबीती शेयर की है। इसे पढ़कर आप यही दुआ कर सकते हैं कि आप कभी इस तरह के हालात में न फंसें। संजीव ठाकुर मंडयाल ने फेसबुक पर लिखा है-
“यह मेरे पापा हैं जो पिछले कल पहाड़ी से पांव फिसलने की वजह से गिर गए थे हम इन्हें लेकर बैजनाथ के एक सरकारी अस्पताल में गए जब हम वहां पहुंचे तो काफी देर तक अस्पताल के स्टाफ ने बात तक नहीं की काफी देर बाद उन्होंने फर्स्ट एड दीया, सुविधाएं प्राप्त ना होने के कारण उन्हें पालमपुर के सरकारी अस्पताल में रेफर कर दिया.”
“वहां पर उनका सिटी स्कैन किया गया और टांके लगाएं, उसके बाद यह कहकर टांडा अस्पताल रेफर कर दिया कि हमारे पास पूरी सुविधाएं नहीं है, जब हम पापा को लेकर टांडा अस्पताल गए तो वहां पर उन्होंने दोबारा से सीटी स्कैन, एक्स-रे बगैरा करवाया, वहां से भी स्टाफ ने यह कहा कि हमारे पास प्राप्त डॉक्टर नहीं है इसलिए आप इन्हें चंडीगढ़ या आईजीएमसी ले जाएं.”
“एक ही सवाल है इन नेताओं से अगर समय पड़ने पर इस तरह की स्वास्थ्य सुविधाएं हमें नहीं मिल पाएगी तो हमारे आप लोगों को वोट देने टैक्स देने का क्या फायदा, मैं पिछले 2 दिनों से किस मनोदशा से गुजरा हूं यह सिर्फ मैं ही जानता हूं या मेरा परिवार जानता है, बहुत सारे मरीज और घायल लोग इसी तरह सुविधाओं के अभाव में मारे जाते हैं आखिर इसके लिए जिम्मेदार कौन है? आप लोगों से सिर्फ इतनी विनती है कि इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें”
कांगड़ा।। हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा ज़िले के पालमपुर से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। एक शिक्षण संस्थान में पढ़ने वाले दो छात्रों के खिलाफ गंभीर धाराओं में मामला दर्ज किया है। इनपर अपनी सहपाठी से गलत हरकतें करके फ़ोटो व्हॉट्सऐप और सोशल मीडिया पर शेयर करने का आरोप है।
यह मामला पालमपुर पुलिस स्टेशन के अंतर्गत दर्ज किया गया है। इसमें जो घटनाक्रम है, वह बताता है कि कैसे आजकल युवा पीढ़ी खतरनाक मंसूबों को अंजाम दे रही है।
क्या है घटनाक्रम
बताया जा रहा है कि नाबालिग छात्रा को उसका दोस्त अपनी बाइक में बिठाकर ले गया। इस दौरान लड़के ने अपना दोस्त भी बाइक पर बिठाया हुआ था।
कथित तौर पर लड़की का दोस्त उसे अपने इस अन्य दोस्त के साथ पालमपुर से बाहर किसी अन्य स्थान पर ले गया। यहां उसने न केवल लड़की से गलत हरकतें की बल्कि फ़ोटो भी खींचे औए बाद में अन्य दोस्तों के साथ व्हॉट्सऐप पर शेयर कर दिया।
लड़की के परिजनों ने इसकी शिकायत पुलिस में की जिस पर पुलिस ने दोनों आरोपियों के विरुद्ध आईपीसी की धारा 354 बी, 323, 292, 506, 34 तथा आई.टी. ऐक्ट की धारा 67 के तहत मामला दर्ज कर लिया है।
कांगड़ा के एसपी संतोष पटियाल ने मामले की पुष्टि करते हुए बताया है कि जांच जारी है।