पालमपुर में मुस्लिम युवकों की पिटाई, पुलिस ने अभी तक नहीं की कार्रवाई

पालमपुर।। कांगड़ा जिले के पालमपुर का एक वीडियो सामने आया है जिसमें कुछ लोग बस स्टैंड से बाजार की ओर आ रहे दो मुस्लिम युवकों की पिटाई कर रहे हैं। वीडियो को एक मकान/दुकान की पहली मंजिल से बनाया गया है। शूट किसने किया, यह नहीं पता मगर सोशल मीडिया पर शेयर हो रहा है।

वीडियो में कुछ लोगों को इन मुस्लिम युवकों को पीटते हुए और गाली देते देखा जा सकता है। चीखें भी साफ सुनी जा सकती हैं। एक युवक को तो गिराकर पीटा गया। जिस तरह से कुछ पेज इसे पुलवामा हमले के जवाब में उठाया गया कदम बता रहे हैं, उससे पता चलता है कि यह कोई आम विवाद का मामला नहीं बल्कि साम्प्रदायिक नफरत का मामला है।

पालमपुर में शर्मनाक हरकत, असामाजिक तत्वों ने मुस्लिम युवकों को पीटा। पुलवामा हमले के जवाब में बहादुरी भरा काम बताकर शेयर कर रहे वीडियो।

In Himachal ಅವರಿಂದ ಈ ದಿನದಂದು ಪೋಸ್ಟ್ ಮಾಡಲಾಗಿದೆ ಶುಕ್ರವಾರ, ಫೆಬ್ರವರಿ 15, 2019

इस संबंध में पुलिस का कहना है कि न तो किसी की शिकायत आयी है और न ऐसी कोई घटना उसकी जानकारी में है। पिटने वाले कौन थे, पीटने वाले कौन; पुलिस को इसका भी नहीं पता। मगर चूंकि यह घटना 10 से 11 बजे सुबह की बताई जा रही है, यह पुलिस का काम बनता है कि शिकायत मिले न मिले, संवेदनशीलता देखते हुए मौके पर जाकर पड़ताल करे। क्या पुलिस तभी हरकत में आएगी जब शिकायत मिले? अगर शिकायत करने वाला बचा ही न हो तब भी पुलिस शिकायत की प्रतीक्षा करेगी?

देखे हिमाचल पुलिस, कैसे रची जा रही साम्प्रदायिक माहौल बिगाड़ने की साजिश

ऊपर से शर्मनाक बात यह है कि सोशल मीडिया पर लोग इस हरकत की तारीफ कर रहे हैं और कह रहे हैं- यह सही हुआ। ये बताता है कि लोग कैसे नफरत की भावना से भर गए हैं और सिर्फ धार्मिक पहचान के कारण लोगों को निशाना बनाने में जुटे हैं। हिमाचल और भारत से असंख्य लोग खाड़ी देशों में काम करते हैं। सोचकर देखें, क्या हो अगर ऐसे वीडियो देखकर वहां के कुछ तत्व हिंदुओं को सिर्फ हिन्दू होने के कारण पीटने लगें? यह हर नागरिक का फर्ज है कि पढ़-

22 दिन के बेटे को छोड़ गया पुलवामा में शहीद हुआ हिमाचली सपूत

इन हिमाचल डेस्क।। कश्मीर के आतंकी हमले में हिमाचली लाल ने भी शहादत को चूम कर अपने प्राण देश पर न्योछावर कर दिए हैं। कांगड़ा की ज्वाली तहसील के धेवा गांव के रहने वाले कांस्टेबल तिलक राज की शहादत की सूचना रात 9:00 बजे के बाद समूचे प्रदेश के कोने-कोने में आग की तरह फ़ैल गई। लेकिन इसकी पुष्टि आधिकारिक तौर पर 10 बजे के बाद हो पाई। 2 मई 1988 को जन्मे शहीद तिलक राज ने सीआरपीएफ में अपनी सेवाएं 27 अप्रैल 2007 को शुरू की थी।

उल्लेखनीय है कि वीरवार करी साढे तीन बजे हुए हमले में सीआरपीएफ के 4 दर्जन के आसपास जवान शहीद हो गए। आतंकियों ने सीआरपीएफ की बस को निशाना बनाया। जानकारी के मुताबिक शहीद तिलकराज अपने पीछे पत्नी सावित्री देवी के अलावा एक नन्हा बेटा छोड़ गए हैं। यह जानकारी मिली है की शाहिद तिलक राज 11 फरवरी को ही ड्यूटी पर लौटा था। छोटा बेटा महज 22 दिन का है। शहीद तिलक सीआरपीएफ की 76 बटालियन में तैनात था।कांस्टेबल तिलक राज की शहादत पर समुचित कांगड़ा घाटी में शोक की लहर है।

जानकारी के मुताबिक आत्मघाती हमले में हिमाचली बेटा तिलकराज घायल हो गया था, लेकिन सेना के अस्पताल में उसने दम तोड़ा।

यह भी बताया जा रहा है कि तिलक राज सीआरपीएफ के जवानों की बस एस्कॉर्ट टीम का हिस्सा था। उधर ज्वाली विधायक अर्जुन ठाकुर,पूर्व विधायक नीरज भारती, पुर्व मंत्री चौधरी चंद्र कुमार , भाजपा के प्रदेश महामंत्री कर्पाल परमार दुख प्रकट करते हुए शहीद के परिवार से बात की। यह भी जानकारी मिली है कि मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने तुरंत ही स्थानीय विधायक को शहीद के परिवार से मिलने की बात कही है। साथ ही कैबिनेट मंत्री किशन कपूर भी शिमला से शहीद के गांव के लिए रवाना हुए है। कांगड़ा के डीसी संदीप कुमार ने तिलक राज शहादत की पुष्टि की है।

चम्बा के फुलमू और रांझू के प्रेम की दुख भरी अमर कथा

इन हिमाचल डेस्क।। हिमाचल प्रदेश के लोकगीतों में कई प्रेम कहानियों का पता चलता है। ऐसी ही एक कहानी है फुलमू और रांझू की। वैलंटाइंस डे पर पेश है उनकी कहानी।

रांझू एक बड़े जमींदार का बेटा था जिसके पास बहुत सी भेड़ें और जमीन थी। उस जमींदार की भेड़ें चराने वाला एक गडरिया चराया करता था। एक बार काम करने गया गडरिया अपनी बेटी फुलमू को साथ ले जाता है और उसको एक जगह बिठाकर खुद काम में व्यस्त हो जाता है। रांझू फुलमू के साथ खेलने लग जाता है और उनके बीच दोस्ती हो जाती है। इसी खेल कूद के साथ फुलमू रांझू बड़े हो जाते हैं और दोनों मन न ही एक दूसरे को चाहने लग जाते हैं पर इजहार नहीं कर पाते। वो रोज एक दूसरे से मिलते थे और शरारतें किया करते थे।

एक दिन रांझू भेड़ें चराते हुए बांसुरी बजा रहा था और फुलमू भागते हुए उसके पास आती है और कहती है कि वो बांसुरी न बजाया करे। उसकी बांसुरी की वजह से वो कोई काम नहीं कर पाती और बेचैन हो जाती है। इसी के साथ रांझू भी अपनी भावनाएं फुलमू को बताता है और प्यार का इजहार कर बैठते हैं। दोनों रोज छिप छिपकर मिलते, रांझु बांसुरी बजाता और बहुत सी बातें करते। दोनों का मन किसी भी काम में नहीं लगता था।

दोनों एक दिन मिलने गए हुए थे और जीने-मरने की कसमं खा रहे थे तभी जमींदार का एक आदमी यह सब देख लेता है। वह जाकर सारी बात जमींदार को बता देता है। जमींदार रांझू को डांट देता है और उसको फुलमू से न मिलने को कहता है। उधर गांव वाले दोनों के बारे में बातें करने लग जाते हैं। फुलमू के पिता इस पर उसका घर से निकलना बंद कर देते हैं।

एक दिन रांझू रात के अंधेरे में छिपकर फुलमू को मिलने चला जाता है जहां फुलमू रांझू को समझाती है कि ऐसे दोनों का मिलना सही नहीं है और उसको अपने घरवालों की बात मान लेनी चाहिए। फुलमू रांझू को कहती है कि वह खुद को संभाल लेगी, वह उसको भूल जाए और उसको चले जाने को कहती है।

रांझू के घर लौटते वक्त जमींदार को पता चल जाता है और वह रांझू को एक कमरे में कैद कर देता है। अगले दिन जमींदार पंडित को बुलाता है और रांझू की शादी की बात कहता है। पंडित दूसरे किसी गांव के जमींदार की बेटी के बारे में बताता है और जमींदार के कहने पर उसी हफ्ते का एक शुभ मुहूर्त शादी के लिए देख लेता है। पंडित शादी की बात पक्की कर लेता है और शादी की तैयारियां शुरू हो जाती हैं।

जब रांझू की शादी की बात का पता फुलमू को पता चलता है तो वो सहन नहीं कर पाती और जहर खाकर अपने जान दे देती है। एक तरफ रांझू की बारात की तैयारी हो रही होती है और दूसरी तरफ फुलमू की अर्थी तैयार हो रही होती है। एक तरफ रांझू की बारात बहुत ही धूमधाम से निकलती है और दूसरी तरफ फुलमू की अर्थी जा रही होती है।

जब रांझू यह देखता है तो वह पालकी को रोकने को कहता है और फुलमू को अग्नि देने पहुंच जाता है। फुलमू की चिता को जैसे ही वह अग्नि देता है उसी चिता में खुद भी कूदकर अपनी जाता दे देता है और खुद के साथ-साथ फुलमू-रांझू की इस प्रेम कहानी को भी अमर कर देता है।

इसपर एक लोकगीत भी है-

क्या युवा सांसद पर महिला नेता के आरोपों की खबर वाली कटिंग सच्ची है?

इन हिमाचल डेस्क।। सोशल मीडिया पर कुछ लोग एक खबर को कटिंग के रूप में शेयर कर रहे हैं जिसमें दावा किया गया है कि हिमाचल प्रदेश भाजयुमो इकाई की एक युवती ने पार्टी के एक युवा सांसद के खिलाफ शिकायत भेजी है कि उन्होंने उसके साथ अभद्र व्यवहार किया है।

इस खबर में दावा किया गया है कि ‘युवती की शिकायत के आधार पर पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा को जांच की जिम्मेदारी सौंपी है। यही नहीं, आगे दावा किया गया है कि जिस सांसद पर आरोप लगा है, उनका कहना है कि यह नड्डा और मुख्यमंत्री की साजिश है उन्हें बदनाम करने की।’

इस कटिंग को शेयर करने वाले लोग सवाल उठा रहे हैं कि आखिर वह युवा सांसद कौन है, भारतीय जनता पार्टी को स्पष्ट करना चाहिए।

ध्यान देने वाली बात यह है कि इस कटिंग को पंजाब केसरी की बताया जा रहा है। बहुत छोटे से कॉलम में लिखी गई इस खबर के आखिर में गॉसिपगुरु का यूआरएल Gossipguru.in दिया गया है और नीचे पंजाब केसरी ईपेपर लिखा हुआ है।

क्या यह कटिंग वाकई पंजाब केसरी की है?
सवाल उठता है कि पंजाब केसरी मे वाकई कुछ ऐसा छपा था? कटिंग के नीचे 10 फरवरी लिखा हुआ है। जब हमने ईपेपर चेक किया तो वाकई उसमें ‘दिल का मामला है’ शीर्षक से छापी गई राजनीतिक हलचल के आखिर में ‘और अंत में…’ हेडिंग के साथ छापा गया है। आप भी यहां क्लिक करके देख सकते हैं।

पंजाब केसरी के ईपेपर का स्क्रीनशॉट

यह कैसी गॉसिप?
त्रिदीब रमण नाम के शख्स को बाइलाइन दी गई है, साथ में उनकी तस्वीर लगी है और लिखा गया है- मिर्च मसाला। आखिर में जो गॉसिपगुरु का यूआरएल दिया गया है, उसे खोलने पर पता चलता है कि वह भी लेखक त्रिदीब रमण का ही पोर्टल है, जिसमें वह गॉसिप्स लिखते हैं। उन्होंने अपने पोर्टल की पंचलाइन दी है- स्पाइसी ऐंड जूसी द पॉलिटिकल कानाफूसी।

गॉसिप यानी बकवास बातें या निंदा करते हुए कानाफूसी करना, भले बात में दम हो या नहीं, भले वह अफवाह ही हो। ऐसा लगता है कि पंजाब केसरी ने त्रिदीब रमण के लिखे को ब्लॉग के रूप में प्रकाशित करता है। ऐसे में यह तो सच है कि ऐसी खबर के रूप में गॉसिप पंजाब केसरी पर छपी है मगर इसमें लिखी गई बातों में क्या सच्चाई है, ये पंजाब केसरी या उसके गॉसिप गुरु ही बेहतर जानते होंगे। मगर हिमाचल प्रदेश में सोशल मीडिया पर लोग कयास लगाते हुए इस कटिग को शेयर कर रहे हैं।

जब लड़के ने प्रेमिका से पूछा- तुम दार्शनिक कब से हो गई

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इन हिमाचल डेस्क।। पत्रकार रवीश कुमार के कार्यक्रमों के अपने प्रशंसक और आलोचक हैं। मगर उनके लेखन के मुरीदों की संख्या भी कम नहीं है। ‘इश्क में शहर होना’ प्यारी सी प्रेम कहानियों का संकलन है। इसमें छोटी-छोटी कहानियों के माध्यम से प्यार के खूबसूरत अहसास को जताने की कोशिश की गई है।

इन कहानियों में से एक कथा को वैलेंटाइन वीक में वीडियो के रूप में पेश किया है यूट्यूब चैनल मुंतज़िर ने।

इसमें दो प्यार करने वालों के बीच मासूमियत भरा मगर गहरा संवाद है।  देखें, ‘इश्क़ में शहर होना’ कैसा होता है।

कॉमेंट करके ज़रूर बताएं कि आपको यह वीडियो कैसा लगा।

यहां 5 मिनट में पढ़ें, बजट में किसे क्या और कितना मिला

इन हिमाचल डेस्क।। शनिवार को मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर प्रदेश के वित्त मंत्री के रूप में अपना दूसरा बजट विधानसभा में पेश किया। 2019-20 के लिए वार्षिक योजना का परिव्यय 7100 करोड़ रुपये है जो कि 2018-19 के योजना आकार (6300 करोड़ रुपये) से लगभग 12.7 फीसदी अधिक है। जानिए बजट में विभिन्न वर्गों के लिए कई बड़ी घोषणाएं और नई योजनाएं।

बजट में आर्थिक रूप से पिछड़े सामान्य वर्ग के युवाओं को नौकरी और शैक्षणिक संस्थानों में 10 प्रतिशत आरक्षण प्रदान किया जाएगा। 2019-20 के लिए वार्षिक योजना का आकार 7,100 करोड़ होगा।

केंद्र सरकार के सहयोग से एक साल में 10,330 करोड़ की परियोजनाएं अनुशंसित करवाई गईं। विधायक प्राथमिकता योजनाओं को नाबार्ड द्वारा वित्तीय पोषण के लिए वर्तमान निर्धारित सीमा 90 करोड़ को बढ़ाकर 105 करोड़ रुपये प्रति विधानसभा चुनाव क्षेत्र किया जाएगा।

विधायक क्षेत्र विकास निधि योजना के तहत वर्तमान प्रावधान को 1.25 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 1.50 करोड़ रुपये प्रति विधानसभा चुनाव क्षेत्र किया जाएगा।माननीय विधायकों की विवेक अनुदान राशि को बढ़ाकर 8 लाख रुपये किया जाएगा।

विधायक क्षेत्र विकास निधि से माननीय विधायक पंजीकृत युवक मंडलों को 25,000 रुपये तक की खेल सामग्री व खेल उपकरण हेतु प्रति युवक मंडल प्रदान कर पाएंगे। महिला मंडलों के लिए भी इस राशि को बढ़ाकर 25,000 रुपये कर दिया जाएगा।

आपातकाल के दौरान एमआईएसए के तहत हुई गिरफ्तारियों से प्रताड़ित व्यक्तियों को 11,000 रुपये वार्षिक लोकतंत्र प्रहरी सम्मान राशि प्रदान की जाएगी। 136 अतिरिक्त जीटूसी सेवाओं को पूर्ण रूप से कम्प्यूटरीकृत कर ई-डिस्ट्रक्ट पोर्टल से जोड़ा जाएगा।

20 हजार पदों को भरने का एलान

सामाजिक सुरक्षा पेंशन अब 850 और 1500 रुपये प्रदान की जाएगी। इस क्षेत्र के लिए 642 करोड़ का बजट प्रस्तावित है। एसएसबी में अफसर बनने को कोचिंग के लिए अब राशि 6 हजार की बजाय 12 हजार देने की घोषणा।

गृह विभाग के लिए 1609 करोड़ का बजट प्रस्तावित है। बजट में 20 हजार पदों को भरने का एलान किया गया है। शिक्षकों के 8 हजार, डॉक्टरों के 3 हजार, क्लर्क और जेओए के 1000, पैरामेडिकल स्टाफ के 3 हजार, पटवारी के 400, पुलिस विभाग में 1400 और जेई के 100 पद भरे जाएंगे।

बिजली बोर्ड में 1000 और अन्य विभागों में 3500 पद भरे जाएंगे। नई पेंशन स्कीम के तहत कर्मचारियों के लिए अब सरकार का अंशदान 10 से बढ़कर 14 फीसदी किया। 80 हजार कर्मचारी इससे लाभान्वित होंगे।

175 करोड़ का सरकार को अतिरिक्त व्यय करना पड़ेगा। 1 जुलाई 2018 से प्रदेश सरकार के कर्मचारियों को 4 फीसदी महंगाई भत्ता देने की घोषणा।अनुबंध पर तैनात कर्मचरियों को अब वेतन प्लस ग्रेड पे प्लस ग्रेड पे का 125 फीसदी दिया जाएगा।

पहले ग्रेड पे का 100 फीसदी दिया जाता था। चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी जो 20 साल का कार्यकाल पूरा कर चुके हैं उन्हें एक अतिरिक्त वेतन वृद्धि दी जाएगी। दिहाड़ीदारों की दिहाड़ी 225 से बढ़ाकर 250 रुपये की।
हिमाचल गृहिणी सुविधा योजना के तहत मिलेगा ये लाभ

उच्च और अत्याधुनिक तकनीक से एक राज्य स्तरीय लोक सुरक्षा केंद्र स्थापित किया जाएगा। प्रदेश में “मुख्यमंत्री हेल्पलाइन सुविधा” की स्थापना होगी। राज्य सरकार को आम नागरिक के करीब लाने के लिए माईजीओवी पोर्टल शुरू किया जाएगा।

केंद्र सरकार की “उज्जवला” योजना में प्रदेश सरकार अपने संसाधनों से एक सिलिंडर, गैस चूल्हा एवंपाइप देगी। “हिमाचल गृहिणी सुविधा योजना” और केंद्रीय “उज्जवला“ योजना के लाभार्थियों को एक अतिरिक्त गैस रिफिल मुफ्त दिया जाएगा। इसका लाभ 2 लाख परिवारों को मिलेगा।
कृषि क्षेत्र के लिए ये बड़ी घोषणाएं

लोगों की मांग/सुझाव को देखते हुए फसल संरक्षण हेतु ”मुख्यमंत्री खेत संरक्षण योजना के तहत कांटेदार तार/चेन लिंक बाड़ लगाने के लिए 50 प्रतिशत सहायता प्रदान की जाएगी। प्राकृतिक खेती के प्रोत्साहन के लिए देसी नस्ल की गाय खरीदने के लिये 50 प्रतिशत उपदान दिया जाएगा।

कृषकों द्वारा सिंचाई के लिये बिजली की दर घटाकर 50 पैसे प्रति यूनिट की जाएगी। 2019-20 में “नादौन मध्यम सिंचाई परियोजना“ को पूरा कर इसे चालू कर दिया जाएगा। “फिना सिंह सिंचाई परियोजना” को गति प्रदान की जाएगी।

स्वां नदी बाढ़ प्रबंधन परियोजना और छौंच खड्ड तटीकरण परियोजना को और गति दी जाएगी। हिमाचल प्रदेश बाढ़ एवं नदी प्रबंधन परियोजना के पहले चरण में 1,235 करोड़ रुपये और दूसरे चरण में 1,850 करोड़ रुपये भारत सरकार द्वारा बाह्य सहायता से कार्यान्वित की जाएगी।

”मुख्यमंत्री किसान एवं खेतीहर मज़दूर जीवन सुरक्षा योजना“ में मिलने वाली राषि दोगुनी होगी। 150 करोड़ रुपये की “मुख्यमंत्री नूतन पॉली हाउस परियोजना” शुरू की जाएगी। एंटी हेलनेट के तहत बजट को 100 प्रतिशत बढ़ा कर 20 करोड़ रुपये किया जाएगा। मुख्यमंत्री खुंब विकास योजना“शुरू की जाएगी।

पंचायत प्रतिनिधियों को बड़ा तोहफा

शहर स्थानीय निकायों में नप सदस्यों का मानदेय 2500, उपाध्यक्ष को 4000 और अघ्यक्ष को 5500 रुपये प्रति माह देने का एलान किया गया। शिमला और धर्मशाला नगर निगम के पार्षदों का मानदेय 5500, उप महापैर को 8500 और महापौर को 12 हजार देने का एलान किया। राजस्व चौकीदारों का मानदेय बढ़ाकर 3500 रुपये करने की घोषणा। ग्राम सभा सदस्य को अब मानदेय 250 रुपये, उप प्रधान को 3000 रुपये, प्रधान को 4500 मानदेय मिलेगा।

पंचायत समिति सदस्य को 4000, उपाध्यक्ष को 5000 रुपये, अध्यक्ष को 7000 रुपये, जिप सदस्य को 5000 रुपये, उपाध्यक्ष को 8000 रुपये और अध्यक्ष को 12000 मानेदय दिया जाएगा। पंचायत चौकीदारों को अब 4500 रुपये मासिक मानदेय मिलेगा। नई पेंशन स्कीम के तहत कर्मचारियों के लिए अब सरकार का अंशदान 10 से बढ़कर 14 फीसदी किया। इससे 80 हजार कर्मचारी लाभान्वित होंगे। बजट में सामाजिक सुरक्षा पेंशन अब 850 और 1500 रुपये प्रदान की जाएगी। एसएसबी में अफसर बनने को कोचिंग के लिए अब राशि 6 हजार की बजाय 12 हजार देने की घोषणा।
इन शिक्षकों का वेतन बढ़ा, पत्रकारों को लैपटॉप

हिमाचल सरकार ने बजट में राज्य व जिला स्तर के मान्यता प्राप्त पत्रकारों को एक-एक लैपटॉप देने की घोषणा की है। सेवारत पत्रकारों की मौत पर अब सरकार चार लाख रुपये देगी। पहले यह राशि दो लाख थी। सेवानिवृत्त पत्रकारों की मौत पर सरकार अब 50 हजार की बजाय 1 लाख रुपये देगी।

बजट में शिक्षा के क्षेत्र में 15 नए आदर्श विद्या केंद्र खोलने की घोषणा हुई है। रिक्त कार्यमूलक शिक्षकों के पद भरे जाएंगे। वाटर कैरियर को अब मानदेय 2400 मिलेगा। पार्ट टाइम वाटर कैरियर और अन्य 1000 रिक्त पद भरे जाएंगे।

पीटीए और पैरा टीचरों को अब नियमित अध्यापकों के बराबर वेतन मिलेगा। 1-10-2018 को तीन वर्ष कार्यकाल पूरा करने वाले पीटीए पैरा टीचरों को न्यूनतम पे बैंड प्लस ग्रेड पे और महंगाई भत्ता दिया जाएगा।

एसएमसी शिक्षकों के मानदेय में 20 फीसदी बढ़ोतरी की घोषणा। शिक्षा पर 7598 करोड़ खर्च करने का बजट प्रस्तावित है। दुर्घटना में मारे गए बच्चों और व्यस्कों के परिजनों को एक समान मुआवजा राशि दी जाएगी।

प्रदेश में चरणबद्ध तरीके से उड़ान परियोजना-2 के तहत तीन शहरों को हेली टैक्सी सेवा से जोड़ा जाएगा। चरणबद्ध तरीके से हर विधानसभा क्षेत्र में एक-एक हेलीपैड बनाया जाएगा।

किसानों को ये सौगात दी

राज्य में 1,688 करोड़ रुपये की एचपीशिवा बाह्य सहायता से लागू की जाएगी। 11 करोड़ रुपये की लागत से साहीवाल व रेडसिंधी पशुधन प्रजनन फार्म स्थापित किया जाएगा। गरीबी रेखा से नीचे रह रहे किसानों की आय को बढ़ाने के लिये 85 प्रतिशत उपदान पर बकरियां उपलब्ध करवाई जाएंगी।

उन्नत नस्ल की भेड़ों का आयात किया जाएगा। 11 करोड़ रुपये की लागत से मुर्रा नस्ल की भैंसों का फार्म स्थापित किया जाएगा। दत्तनगर जिला शिमला एवं चक्कर, जिला मंडी में 50,000 लीटर प्रतिदिन क्षमता के दूध प्रसंस्करणसंयंत्र स्थापित किए जाएंगे।

दूध खरीद मूल्य को 2 रुपये प्रति लीटर की दर से बढ़ाया जाएगा। 2019-20 में 100 ट्राउट ईकाइयों की स्थापना होगी और कार्प मच्छली उत्पादन के लिये लगभग 10 हैक्टेयर में नए तालाबों का निर्माण भी किया जाएगा। कांगड़ा, चंबा और शिमला जिलों में मत्स्य खुदरा विक्रय केंद्रों की स्थापना की जाएगी। मत्स्य पालकों की ईकाइयों को बीमाकृत किया जाएगा।
ये नई योजनाएं शुरू होंगी

विभिन्न ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों की आवासीय योजनाओं के तहत वर्तमान उपदान के अतिरिक्त 20,000 रुपये प्रति लाभार्थी की दर से राज्य की ओर से अपने संसाधनों से प्रदान किए जाएंगे। “मुख्यमंत्री आवास योजना” के तहत आवासों की मुरम्मत हेतु अब 35,000 रुपये दिए जाएंगे। समाज को बेटियों व वृक्षों की सुरक्षा एवं संरक्षण हेतु जागरूक करने के लिये एक नई योजना “एक बूटा, बेटी के नाम” लागू की जाएगी।

जंगलों की आग की रोकथाम हेतु एसएमएस सेवा के माध्यम से व्यापक जन अभियान चलाया जाएगा। चीड़ की पत्तियों पर आधारित 25 लघु उद्योगों को उपदान देकर स्थापित किए जाएंगे।

एक नई योजना “मुख्यमंत्री ग्रीन टेक्नोलॉजी ट्रंसफर स्कीम” शुरू की जाएगी। ऊना और चंबा जिलों में “एकीकृत सहकारिता विकास परियोजना”आरंभ की जाएगी। सहकारी समितियों के लेखा परीक्षण के लिये 250 ऑडिटर्ज़ को सूचीबद्ध किया जाएगा।
वन्य कर्मियों को हथियार, 500 बस्तियों को स्वच्छ पेयजल

200 अति संवेदनशील बीटों में तैनात वन्य कर्मियों को 15,000 रुपये तक का अनुदान देकर निजी हथियार उपलब्ध करवाए जाएंगे। राज्य आपदा राहत बल (एसडीआरएफ) का गठन किया जाएगा।

500 बस्तियों को स्वच्छ पेयजल सुविधा उपलब्ध करवाने का लक्ष्य। “मुख्यमंत्री स्वजल योजना” शुरू की जाएगी। इसके तहत आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों के लिए 50 मीटर पाइप 50 प्रतिशत अनुदान पर उपलब्ध करवाई जाएगी।

सिंचाई एवं जन स्वास्थ्य विभाग में कार्यरत वाटर गाड का मानदेय 3,000 रुपये और पैरा-फिटर व पंप ऑपरेटर का मानदेय 4,000 रुपये किया जाएगा। सरकार एक नई सूक्ष्म, लघु व मध्यम उद्योग नीति लेकर आएगी।

गरीब परिवारों को नए विद्युत कनेक्शन पर राहत

“मुख्यमन्त्री स्वावलम्बन योजना” के तहत अब अधिकतम आयु सीमा 45 साल होगी और अधिकतम निवेश 60 लाख रुपये किया जाएगा। एक नई “मुख्यमन्त्री दस्तकार सहायता योजना”शुरू की जाएगी।

कांगड़ा के चन्नौर, बिलासपुर के गेहड़वीं व ऊना के बसौली बनगढ़ में औद्योगिक क्षेत्र विकसित होंगे। 2019-20 में 500 मैगावाट क्षमता की परियोजनाएं चालू होने की संभावना है।

चांजू-3 और दियोथल चांजू जल विद्युत परियोजनाओं का निर्माण कार्य शीघ्र किया जाएगा।“मुख्यमंत्री रोशनी योजना” आरंभ की जाएगी। इसके तहत गरीब परिवारों को नए विद्युत कनेक्शन हेतु कोई सर्विस चार्जिज़ नहीं देने पड़ेंगे। बिजली पर सब्सिडी के लिए 475 करोड़ रुपये का प्रावधान।

पर्यटन क्षेत्र के लिए ये बड़ी घोषणाएं

पर्यटन विकास और प्रोत्साहन क्षेत्र के लिए नई पर्यटन नीति तैयार की जाएगी। राज्य सरकार ईको-टूरिज्म को बढ़ावा देने के लिए मास्टर प्लान किया जाएगा। पौंग क्षेत्र विकास बोर्ड की स्थापना की जाएगी।

धार्मिक पर्यटन को प्रोत्साहन देने के मकसद से मंडी जिले में एक “ शिव धाम ” स्थापित किया जाएगा। बाह्य सहायता से 1,892 करोड़ रुपये की एक पर्यटन आधारभूत संरचना परियोजना आरंभ की जाएगी।

कौशल विकास भत्ता योजन के लिए 100 करोड़ रुपये बजट का प्रावधान होगा। परिवहन निगम द्वारा आईपीटीएमएस प्रणाली की स्थापना की जाएगी। नई विद्युत वाहन नीति तैयार की जाएगी।

सड़कों के निर्माण तथा रख-रखाव के लिये आईआरसी मान्यता प्राप्त गैर-पारंपारिक सामग्री और नई तकनीक का उपयोग पॉयलट आधार पर किया जाएगा।

इतनी नई सड़कों का निर्माण होगा

हिमाचल में 750 किलोमीटर नई सड़कों का निर्माण किया जाएगा। 850 किलोमीटर लंबाई की सड़कों पर पुलियों ,1,500 किलोमीटर पक्की सड़कों और 50 पुलों का निर्माण किया जाएगा।

50 नए गांवों को सड़क सुविधा से जोड़ा जाएगा। जीएसटी में पंजीकरण हेतु वार्षिक टर्नओवर सीमा को 40 लाख रुपये तक बढ़ाया जाएगा। टर्नओवर की कंपोजिशन लिमिट को बढ़ाकर 1.50 करोड़ रुपये किया जाएगा।

सीजीसीआर, पीजीटी और एजीटी को ऑनलाइन और ‘मोबाईल ऐप’के माध्यम से जमा करने की सुविधा उपलब्ध करवाई जाएगी। विद्यालयों में वीडियो सम्मेलन कक्षों की स्थापना की
जाएगी।

खेल के क्षेत्र में ये नई योजनाएं शुरू होंगी

राज्य में “खेल से स्वास्थ्य योजना” आरंभ की जाएगी। नई “अटल निर्मल जल योजना” के तहत वाटर फिल्टर लगाए जाएंगे। “नवधारणा ” योजना के तहत दिव्यांगजनों के प्रशिक्षण के लिए कार्यक्रम का शुरू किया जाएगा।

50 आईटीआई को और आधुनिक बनाया जाएगा। 5,500अतिरिक्त विद्यार्थी आईटीआई में दाखिला ले सकेंगे। “ मुख्यमंत्री युवा निर्माण योजना” के तहत प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में दो बड़े खेल के मैदानों का निर्माण किया जाएगा।

इसमें जिम सुविधा भी उपलब्ध होगी। “खेलकूद प्रतिभा खोज कार्यक्रम” शुरू किया जाएगा। परफार्मिंग आर्टस आदि में अध्ययन के लिए “ मुख्यमंत्री कलाकार प्रोत्साहन योजना“ शुरू की जाएगी।

स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए ये घोषणाएं

500 स्वास्थ्य उप-केंद्रों और 125 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को स्वास्थ्य एवं वेलनैस केद्रों में परिवर्तित किया जाएगा।“सम्पूर्ण स्वास्थ्य योजना” के तहत 12 स्वास्थ्य संस्थानों को स्तरोन्नत किया जाएगा।

लाल बहादुर शास्त्री आयुर्विज्ञान महाविद्यालय मंडी एवं डॉ. वाईएस परमार राजकीय आयुर्विज्ञान महाविद्यालय नाहन में हृदय एवं संबंधित रोगों के उपचार के लिए कैथ लैब की स्थापना की जाएगी।

इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज शिमला में डिजिटल सबटेक्शन एंजियोग्राफी मशीन स्थापित की जाएगी। आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग से संबंधित गंभीर बीमारियों से ग्रस्त मरीज़ों को आर्थिक सहायता देने के मकसद से एक नई योजना ‘सहारा’ का शुरू किया जाएगा।

एचआईवी एड्स से संक्रमित व्यक्तियों के भत्ते को 1,500 रुपये प्रति माह किया जाएगा। जननी सुरक्षा योजना के तहत प्रसूताओं की प्रोत्साहन राशि को बढ़ाकर 1,100 रुपये किया जाएगा। ब्रेस्ट तथा सरवाइकल कैंसर की रोकथाम के लिए मोबाइल डायग्नोस्टिक वैन तैनात किए जाएंगे।

पांच लाख से अधिक पेंशनरों को तोहफा

आशा वर्कर्ज का मानदेय बढ़ाया जाएगा। हिम केयर के तहत ऐसे मनरेगा मजदूरों, जिन्होंने कम से कम 50 दिन का रोज़गार प्राप्त किया हो, और सामाजिक सुरक्षा पेंशन प्राप्त करने वाली विधवाओं को मुफ्त स्वास्थ्य बीमा कवर दिया जाएगा।

आउटसोर्स कर्मियों को यह कवर रियायती दर पर दिया जाएगा। 45 साल से कम आयु की विधवाओं को कौशल प्रशिक्षण एवं रोजगार हेतु आवश्यक सहायता का प्रावधान किया जाएगा। इन विधवाओं को आईटीआई एवं नर्सिंग शिक्षण संस्थानों में पढ़ाई के लिए आरक्षण भी दिया जाएगा।

बाल आश्रम में रहने वाले बच्चों को 18 साल की आयु पूर्ण करने पर अलग से ‘आफ्टर केयर होम’ स्थापित किए जाएंगे। इन बच्चों को फलेक्सी आईटीआई के तहत कौशल प्रशिक्षण भी दिया जाएगा।

सुरक्षा और नशामुक्ति के लिए ये घोषणाएं

आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं, सहायकों और मिनी आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का मानदेय बढ़ाया जाएगा। प्रदेश के सभी पांच लाख से अधिक पेंशन धारकों की पैंशन को बढ़ाया जाएगा। नूरपुर में युद्ध स्मारक का निर्माण होगा।

एसएसबी कोचिंग हेतु प्रोत्साहन राशि 6,000 रुपये से बढ़ाकर 12,000 की जाएगी।प्रदेश भर की 100 पुलिस चौकियों को रिपोर्टिंग पुलिस चौकियों के तौर पर नामित किया जाएगा और मुख्य आरक्षियों को भी आबकारी मामलों की जांच के लिए अधिकृत किया जाएगा।

स्नातक आरक्षियों को भी कुछ मामलों में जांच शक्तियां दी जाएंगी। मादक पदार्थों की तस्करी तथा प्रयोग को रोकने के लिए “युवा नव जीवन बोर्ड” की स्थापना की जाएगी। 5 नशा निवारण एवं पुनर्वास केंद्रों की स्थापना की जाएगी।

लाखों उपभोक्ताओं को राहत, महंगी नहीं होगी बिजली

चुनावी साल में प्रदेश सरकार घरेलू उपभोक्ताओं पर बिजली की महंगी दरों का बोझ नहीं डालेगी। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने साल 2019-20 में घरेलू उपभोक्ताओं को उपदान दरों पर बिजली आपूर्ति प्रदान करने के लिए सहर्ष 475 करोड़ रुपये का बजट देने की घोषणा की है।

इससे संभावित है कि इस साल घरेलू बिजली उपभोक्ताओं को राहत मिलेगी। बीते साल भी सरकार ने बिजली बोर्ड को उपदान दरों पर बिजली देने के लिए 475 करोड़ का बजट दिया था। इसके चलते सरकार ने साल 2018-19 में बिजली की दरों में बढ़ोतरी नहीं की थी।

हिमाचल के साढ़े 19 लाख घरेलू उपभोक्ताओं को अप्रैल महीने से बिजली की महंगी दरों का झटका लगने की संभावना बहुत कम है। सरकार से अनुदान मिलने से बिजली बोर्ड को बड़ी राहत मिली है।

475 करोड़ के अनुदान से बोर्ड अपने घाटे को कम कर सकता है। ऐसे में अनुमान लगाया जा रहा है कि साल 2018-19 की दरें ही साल 2019-20 में भी लागू रहेंगी। बता दें कि बीते साल हुए घाटे का हवाला देेते हुए बिजली बोर्ड ने विद्युत नियामक आयोग में पिटीशन दायर की है।

इसमें हालांकि दरें बढ़ाने की मांग नहीं की है, लेकिन बिजली बोर्ड का खर्च बढ़ने और बीते साल भी दरें नहीं बढ़ने की दुहाई देते हुए आर्थिक स्थिति को खराब बताया गया है।

हिमाचल प्रदेश के लिए आफत है या वरदान है हिमपात?

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कर्म सिंह ठाकुर।। हिमालय तथा निम्न हिमालय में करीब 27 वर्षों बाद पहाड़ों को नसीब हुई बर्फबारीl 1992 में इस तरह की बर्फबारी दर्ज की गई थी। मंडी जिले का सुंदर नगर, बिलासपुर, हमीरपुर तथा ऊना के निचले क्षेत्रों में भी काफी लंबे समय के बाद बर्फबारी देखने को मिली। बृहत हिमालय के साथ साथ मध्य हिमालय से सटे क्षेत्रों में मंडी जिले में स्थित बदलाधार, सिकंदर आधार तथा मुरारी माता की पहाड़ियां बर्फ से लदालद हो गईl यदि यह पहाड़ियां पर्यटन मानचित्र से जुड़ी होती तो आज वैश्विक स्तर पर इन पहाड़ियों की प्राकृतिक सुंदरता का प्रभाव होता है।

सफेद बर्फ की चादर जहां एक तरफ हर किसी को अपनी तरफ आकर्षित करती है, वहीं दूसरी तरफ फसलों के लिए भी किसी अमृत से कम नहीं होती। हिमाचल प्रदेश का 90 फ़ीसदी जनमानस ग्रामीण क्षेत्र में रहता है तथा उनकी आजीविका का मुख्य स्त्रोत कृषि तथा बागवानी है। बारिश अच्छी हो और ऊपर से बर्फबारी हो जाए, तो सोने पर सुहागा माना जाता है।

इस वर्ष सेब की फसल अच्छी होगी क्योंकि सेब की फसल के लिए 1400 घंटे का चिलिंग आवर से अधिक का समय मिला है। जो सेब की बंपर फसल के लिए पर्याप्त है। गत वर्ष सेव का उत्पादन बहुत कम हुआ था। जिससे प्रदेश के किसानों की अर्थव्यवस्था माली हो गई थी, लेकिन इस बार बर्फबारी ने किसानों के चेहरे पर रौनक ला दी है।

यदि निम्न हिमालय की बात करें तो आम की फसल के लिए ज्यादा बर्फबारी का होना नुकसानदायक होता है। इस समय में आम के पेड़ों पर अंकुरण होता है। बर्फ पड़ने के कारण वह झड़ जाता है तथा पौधों को भी नुकसान पहुंचता है, तो इस वर्ष आम की फसल प्रभावित होगी।

बर्फबारी के होने से बच्चे, जवान तथा वृद्ध सभी गदगद हैं वहीं दूसरी तरफ भारी बर्फबारी के कारण बिजली का बाधित होना यातायात व्यवस्था का ध्वस्त होना तथा प्रचंड शीतलहर की चपेट में प्रदेशवासियों को तीन दशक पहले की जीवन शैली याद आई। बर्फबारी होने के कारण प्रदेश की सड़कें तथा बिजली व्यवस्था बुरी तरह से प्रभावित हुई।

ग्लोबल वार्मिंग के कारण एक तरफ जहां पहाड़ गर्मी से जल रहे हैं, वही इस वर्ष ठंड से सिकुड़ना पड़ा। पिछले कई दिनों से ऊपरी हिमाचल ठंड की चपेट के साथ दुनिया से कटा हुआ है। लेकिन अब मध्य हिमाचल का क्षेत्र भी कई तरह की आपत्तियों में फंसा हुआ है। सरकारे बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन जैसे ही कोई छोटी सी आपदा आती है तो प्रशासन की सारी पोल खुल जाती है। पिछले 24 घंटे से करीब आधे से ज्यादा हिमाचल अंधेरे की चपेट में है, यातायात व्यवस्था बुरी तरह से प्रभावित हुई हैl जिस तरह से आम आदमी का जनजीवन अस्त व्यस्त हुआ है,तो किसी भी भयंकर विपत्ति से कम नहीं है।

इसी बर्फबारी को यदि पर्यटन व्यवसाय से जोड़कर देखा जाए तो पूरे भारत के लोगों को हिमाचल के दर्शन करवाए जा सकते हैं लेकिन सड़क व्यवस्था व अन्य आधारभूत आवश्यकताओं की कमी के कारण हिमाचल में कोई भी पर्यटक नहीं आना चाहता। अधिकतर पर्यटक अपनी छुट्टियों का सबसे बेहतर उपयोग करना चाहते हैं यदि उनका अधिकतर समय छोटी-छोटी आपदाओं में ही निपट जाए तो वे दूसरी बार प्रदेश में कदम रखना पसंद नहीं करेंगे।

हिमाचल प्रदेश की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं हैl करीब 52000 करोड रुपए का ऋण है। इस ऋण को चुकाने के लिए प्रदेश के नेतृत्व को केंद्र सरकार के सामने झोली फैलानी पड़ती है यदि प्रदेश के नीति निर्माता व राजनीतिक नेतृत्व प्रदेश में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों को पर्यटन व्यवसाय से जोड़ लें, तो प्रदेश की आर्थिक स्थिति को सुधारा जा सकता है। बेरोजगारों को रोजगार दिया जा सकता है तथा खस्ता हालत में पड़ी सड़क व्यवस्था को भी तंदुरुस्त किया जा सकता है। यदि मौसम मेहरबान हो जाए तो उसका लाभ उठाना आना चाहिए लेकिन यहां पर तो हाल ऐसे हैं, लाभ उठाना तो दूर की बात प्रदेश का जनमानस आधारभूत सुविधाओं से वंचित है। इस स्थिति से प्रदेश को निकालना होगा तभी हिमाचल आगे बढ़ सकता है।

(लेखक कर्म सिंह ठाकुर सुंदरनगर, मंडी, हिमाचल प्रदेश से हैं, उनसे 98053 71534 पर सम्पर्क किया जा सकता है)

जानें, जहां आमतौर पर बर्फ नहीं पड़ती, वहां क्यों हुई बर्फबारी

इन हिमाचल डेस्क।। सर्दियों का मौसम इस बार मस्त रहा। बेशक कुछ लोग त्रस्त भी हुए मगर बर्फबारी इस बार अच्छी हुई है। इसका मतलब है कि हिमालय की पहाड़ियों पर भी दबाकर बर्फबारी हुई होगी और इससे साल भर बर्फीली पानी वाली नदियां लबालब रहेंगी। बर्फ देखने में तो सुंदर लगती है मगर इसकी भी कई परेशानियां हैं। प्रचण्ड ठंड में पानी जम जाता है, बिजली की सप्लाई बाधित हो जाती है और यातायात भी रुक जाता है।

पहाड़ी इलाकों, जहां अक्सर बर्फबारी होती है, वहां के लोगों को तो इसकी आदत होती है इसलिए वे तैयार रहते हैं। मगर इस बार कुछ ऐसे इलाकों में भी बर्फ गिरी, जहां अमूमन स्नोफॉल होता नहीं है। जैसे कि मंडी में 10 साल बाद बारिश हुई। सुंदरनगर में बर्फ के फाहे गिरे। हमीरपुर, बिलासपुर और ऊना की कई जगहें भी लंबे अंतराल के बाद बर्फ के दर्शन कर लेती हैं।

लेकिन सवाल उठता है कि आखिर जिन इलाकों में बर्फ नहीं पड़ती, कई बार वहां क्यों अचानक बर्फबारी हो जाती है? आगे आसान भाषा में समझिए-

कैसे बनती है बर्फ
बात बर्फ की हो रही है, इसलिए हम ध्यान इसी पर रखेंगे। आप जानते हैं कि पानी तीन अवस्थाओं में मौजूद रह सकता है- ठोस, द्रव और गैस। गैस यानी वाष्प, द्रव यानी वो पानी जो हम-आप देखते हैं और ठोस यानी बर्फ। अब जरा बारिश होने की प्रक्रिया को याद कीजिए जो आपने स्कूल में पढ़ी होगी। याद करें कि कैसे हमारे आसपास से लगातार पानी वाष्पीकृत होता रहता है। सूरज की गर्मी के कारण वाष्पीकरण की यह रफ्तार बढ़ती है और विभिन्न जगहों से द्रव के रूप में मौजूद पानी भाप बनकर गैस की अवस्था में बदल जाता है।

तो ये भाप हल्का होने के कारण वायुमंडल में ऊपर उठता चलता है। ऊपर ये पानी के महीन कण इकट्ठे होते हैं तो बादलों का रूप ले लेते हैं। आपको यह भी मालूम होगा किजैसे-जैसे हम वायुमंडल में ऊपर जाते हैं, तापमान में गिरावट आती चलती है। तापमान कम होने के कारण पानी की महीन बूंदें संघनित होने लगती हैं यानी गैस की अवस्था से द्रव में बदलने लगती हैं। तो फिर भारी होकर पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के कारण ये बूंदों के रूप में गिरने लगती हैं तो नीचे बारिश होने लगती है।

यानी गैस से द्रव में बदली तो बारिश हुई। मगर कई बार तापमान में गिरावट के कारण बादलों में गैस की अवस्था में मौजूद पानी के ये कण द्रवित होने के बजाय सीधे ठोस अवस्था में चले जाते हैं। इस प्रक्रिया को कहते हैं Sublimation, हिंदी में ‘उर्ध्वपातन।’ जब ऐसा होता है तो बर्फ का निर्माण होता है जो नीचे की ओर फाहों के रूप में गिरना शुरू करती है। बर्फ के फाहे दरअसल जमे हुए जल कणों से बनते हैं जो षटकोणीय क्रिस्टल के रूप में एक-दूसरे से जुड़ना शुरू करते हैं। बर्फ के फाहों का आकार कई तरह का हो सकता है, मगर अंदर से उनके जुड़ने का क्रम छटकोणीय ही रहता है।

जैसा कि आप ऊपर क्लोज़ तस्वीर में देख सकते है, ये कण होते तो पारदर्शी हैं मगर जब आपस में जुड़कर फाहों का रूप लेते हैं तो सफेद दिखते हैं। इसलिए क्योंकि जब बर्फ पर रोशनी गिरती है तो यह सभी रंगों की किरणों में विभक्त हो जाती है और फिर क्रिस्टलों से रिफ्लेक्ट होती है। ये क्रिस्टल सभी रंगों की किरणों को रिफ्लेक्ट करते हैं तो हमें बर्फ सफेद दिखाई देती है। सभी रंगों की  क्योंकि बर्फ के क्रिस्टल सभी रंगों की किरणों को परावर्तित करते हैं तो हमें सफेद रंग दिखाई देता है। (सभी रंगों को मिलाने से सफेद रंग बनता है)।

कहां-कहां पड़ती है बर्फ
दुनिया में कई जगहों पर बर्फबारी होती है। कुछ पहाड़ों, ध्रुवीय क्षेत्रों, उत्तरी गोलार्ध के ऊपरी हिस्से, दक्षिणी गोलार्ध के पहाड़ी इलाकों और अंटार्कटिक में बर्फबारी देखने को मिलती है। मगर कई बार उन क्षेत्रों में भी बर्फबारी होती है, जहां आमतौर पर इसका होना असामान्य है। इसके पीछे कई मौसमी कारण होते हैं। वैसे तो बर्फ लो प्रेशर एरिया, झीलों और समंदर के कारण पैदा होने वाले विशेष प्रभाव और मौसम को प्रभावित करने वाले वायमुंडल के विभिन्न घनत्व वाले हिस्सों के कारण भी पड़ती है, मगर हम  माउंटेन इफेक्ट की बात करेंगे क्योंकि हिमाचल प्रदेश में बर्फबारी का प्रमुख कारण माउंटेन इफेक्ट ही है।

क्या है माउंटेन इफेक्ट
जब हवा के दबाव कारण वायुमंडल का एक हिस्सा पर्वतों या ऊंची उठी जगह से टकराता है तो हवा ऊपर की ओर उठती है। जब हवा ऊपर उठती है तो नमी अलग हो जाती है और नीचे शुष्क और गर्म हवा रह जाती है। ऊपर की ओर उठी हवा का तापमान ऊंचाई के साथ कम होता जाता है। इससे एडीअबैटिक कूलिंग होती है। नतीजा यह रहता है कि ऊपर कम तापमान के कारण बारिश या बर्फबारी के लिए आदर्श हालात बन जाते हैं। वाष्पकण संघनित होने लगते हैं और वर्षण होने लगता है। सामान्य तौर पर बारिश होगी और तापमान और गिर जाएगा तो बर्फ का निर्माण होगा, सीधे गैस से ठोस में तब्दीली होने से।

आपने पढ़ा भी होगा कि कैसे हिमालय पर्वत बारिश करने में अहम भूमिका निभाता है। यही कारण है उसका। तो इस माउंटेन इफेक्ट के कारण वायुमंडल के ऊपरी हिस्से में बर्फ बनती है तो वह नीचे आते-आते कई बार पिघल जाती है और बारिश के रूप में गिरती है। सर्दियों में तापमान कम रहता है तो वायुमंडल में बर्फ बनने की और उसके ऊपर से नीचे तक आने तक पिघलने से बचे रहने की संभावनाएं ज्यादा होती हैं। इसी कारण सर्दियों में हिमपात ज्यादा देखने को मिलता है।

जहां नहीं गिरती बर्फ, वहां क्यों गिर जाती है कई बार
मौसम विज्ञान एक बेहद मजेदार, रोमांचक मगर पेचीदा विषय है। मगर इसके बुनियादी नियम आसान से हैं। एक बार आप पढ़ लेंगे तो समझ जाएंगे कि कहीं पर हो रही बारिश या कहीं हो रही बर्फबारी के पीछे क्या साइंस कम कर रही है। इस बात को समजना है तो समझिए वर्षण क्या है और ये कितनी तरह से होता है।

वर्षण क्या है
वर्षण यानी अंग्रेजी में प्रेसिपिटेशन (Precipitaion). इसका अर्थ है- वायुमंडल में मौजूद वाष्पकणों का संघनित होकर पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण नीचे की ओर गिरना। वर्षण का मतलब सिर्फ बारिश से नहीं है, बल्कि विभिन्न स्वरूपों से है। ये स्वरूप हैं- बारिश, बर्फ, ओले, बजरी (स्लीट) और फ्रोज़न रेन।

बारिश (रेन)- बादलों में मौजूद वाष्पकणों का संघनित होकर द्रव (लिक्विड स्टेट) बन जाना और बूंदों के रूप में धरती पर गिरना बारिश कहलाता है।

बारिश की बूंदें

बर्फ (Snow)- जब बादलों से लेकर धरती तक तापमान हिमांक (फ्रीजिंग मार्क- 32 डिग्री फारेनहाइट) या इससे कम रहेगा, बर्फ गिरेगी। जब जमीन पर तापमान 32 फारेनहाइट से ज्यादा हो, तब भी बर्फ गिरती है अगर थोड़ी ऊंचाई तक तापमान इससे नीचे हो।

बर्फ़

स्लीट (Sleet)- जब बर्फ के फाहे रास्ते में पिघलकर बारिश की बूंदों में बन जाएं मगर धरती के पास कम तापमान होने के कारण फिर से जम जाएं तो इसे स्लीट कहते हैं। इससे छोटी-छोटी बारिश की बूंदें या बरफ के फाहे होते हैं। हिमाचल में इसको बोलते हैं- बजरी।

चूंकि पहले तापमान थोड़ा गर्म होता है इसलिए बर्फ पिघलकर बजरी या स्लीट में बदल जाता है। मगर इससे तापमान में गिरावट होती है और फिर बर्फ गिरने की संभावना बन जाती है। इसीलिए स्लीट गिरने पर लोग कहते हैं- अब बर्फ गिरने वाली है।

फ्रीज़िंग रेन (Freezing Rain)- ऐसा तब होता है जब पृथ्वी की सतह बहुत ठंडी हो मगर हवा गर्म हो। तो ऊपर से तो बारिश की बूंदें गिरती हैं मगर धरती पर गिरते ही वो जम जाती हैं। हिमाचल में ऐसा कम ही देखने को मिलता है।

फ्रीजिंग रेन पौधों और जीव जंतुओं के लिए खतरनाक है। बारिश की बूंदें तुरंत गिरते ही जम जाती हैं।

कच्चे ओले या ग्रॉपल (Graupel)- ये भी कम ही देखने को मिलते हैं। पहली नजर में ये ओलों जैसे लगेंगे मगर साइज छोटा होता है नरम होते हैं। दरअसल बर्फ के फाहों का बाहरी हिस्सा पिघलकर दोबारा जम जाता है तो छोटी-छोटी गोलियां सी बन जाती हैं। बाहर से सख्त ओलों जैसे नजर आते हैं मगर दबाने पर मुलायम होते हैं।

ग्रॉपल बर्फ़ की तरह सफेद होते हैं मगर मुलायम और थोड़े खुरदरे से लगते हैं देखने में।

ओले (Hail) – ओले तो आपको पता ही हैं क्या होते हैं। जमे हुए पानी के टुकड़े होते हैं जिनका निर्माण चमकते-गरजते तूफानी बादलों में होता है। बर्फ, स्लीट, फ्रीज़िंग रेन और ग्रॉपल तो सर्दियों में बनते हैं मगर ओले गर्म वातावरण में भी बन जाते हैं। इनका आकार इस बात पर निर्भर करता है कि थंडरस्टॉर्म कितना बड़ा है। वैसे दिल्ली एनसीआर के लोग ओलों को ही समझ बैठे बर्फ। उन्हें ये लेख जरूर पढ़ाएं।

ये तो बड़े खतरनाक होते हैं। कई बार साइज बड़ा होता है। गाड़ियों, घरों, जीव-जुंतुओं, इंसानों और सेब के पौधों समेत अन्य वनस्पति के लिए खतरनाक होते हैं।

…तो इसलिए गिरी बर्फ़

तो जैसा कि आपने ऊपर पढ़ा, तापमान में ज्यादा गिरावट आ जाए तो ऊपर से नीचे की ओर गिर रही बर्फ को पूरे वायुमंडल में कम तापमान मिले तो नीचे बर्फबारी होगी। जिन इलाकों में आमतौर पर तापमान अधिक रहने के कारण बर्फबारी नहीं हो पाती, वहां का तापमान कई बार बहुत गिर जाता है। इस कारण वहां बर्फबारी हो जाती है। कई बार ऐसा भी होात है कि हवा के कारण ऊपर पहाड़ों से उड़ रही बर्फ उन नजदीकी जगहों तक पहुंच जाती है, जहां कम हिमपात होता है या नहीं होता है।

तो उम्मीद है कि आपको इतनी जानकारी मिल गई होगी कि आप बर्फ, स्लीट, ग्रॉपल और ओलों की पहचान कर पाएंगे। जब कभी आप ओले या बर्फबारी देखें, जरूर सोचें कि बादलों से लेकर धरती तक पहुंचने की इसकी यात्रा कैसी रही होगी। बहरहाल, चलते-चलते इस वीडियो को भी देख लीजिए-

नोट- इस लेख को बहुत सावधानी से तैयार किया गया है। फिर भी अगर किसी भी तरह की गलती हो तो तुरंत In Himachal के फेसबुक पेज पर मेसेज भेजें या inhimachal.in @ gmail.com पर ईमेल करें।

बजट में इस बार कर्मचारियों की पुकार भी सुने सरकार

राजेश वर्मा।। प्रदेश सरकार इस बार अपना दूसरा बजट पेश करने वाली है। प्रदेश का हर नागरिक इस बजट से अपने लिए कुछ न कुछ अच्छा होने की उम्मीद लगाए बैठा है। चाहे बेरोजगार युवा हो , छात्र हो, गृहणी हो, बुजुर्ग हो या फिर सरकार की रीढ़ कहे जाने वाले कर्मचारी हों? सभी अपने लिए कुछ न कुछ बेहतर की उम्मीद रखे हुए है।

नई सरकार बने हुए 1 वर्ष से उपर समय हो चला अभी भी बहुत से ऐसे वादे हैं जो सरकार को पूरे करने बाकी हैं। प्रदेश में सत्ता प्राप्ति और परिवर्तन के लिए कर्मचारियों की अहम भूमिका होती है। सरकार ने सत्ता में आने से पहले चुनावों में वादा किया था की वह सत्ता में आने पर कर्मचारियों की हर जाएज मांग को पूरा करेगी। हालांकि आमजन से किए वादे काफी हद तक पूरे भी हुए लेकिन कर्मचारियों से किए वादे अभी तक जस के तस है।

अनुबंध कर्मियों को वरिष्ठता की बात हो, अनुबंध कार्यकाल को कम करने का विषय हो, 2003 के बाद नियुक्त कर्मचारियों को पेंशन बहाली का मुद्दा हो, 4-9-14 की बात हो, अस्थाई कर्मचारियों के लिए कोई स्थाई नीति हो, या फिर नया वेतनमान लागू करने की बात हो अभी तक यह सब वादे अधूरे ही रहे हैं।

प्रदेश में विभिन्न विभागों में पिछले कुछेक वर्षों से ज्यादातर नियुक्तियां अनुबंध आधार पर ही हो रही हैं और इन्हें नियमित करने में भी नीति कम राजनीति ज्यादा रही है। जहां भाजपा के पिछले कार्यकाल में नियुक्त कर्मचारियों को पिछली सरकार ने पहले 8 व 6 वर्ष बाद नियमित किया तो बाद में इन कर्मचारियों के दबाव के चलते यह नीति अपने घोषणा पत्र अनुसार 5 वर्ष की कर दी तो बाद में इसी अनुबंध नीति को 3 वर्ष कर दिया जोकि अनुबंध कर्मियों के लिए राहत भरा फैसला था। लेकिन एक समान नीति न होने के चलते हजारों कर्मचारियों को शोषित होने पर मजबूर होना पड़ा।

यह कैसी अनुबंध नीति है जिसमें कर्मचारी की नियुक्ति के लिए तो एक समान नीति है एक समान नियम हैं लेकिन राजनीति स्वार्थ के चलते उन्हें अलग-अलग नीति के तहत नियमित किया जाता रहा है और किया जा रहा है। कर्मचारी चयन आयोग या लोक सेवा आयोग द्वारा संवैधानिक प्रक्रियाओं के तहत नियुक्त होने वाले कर्मचारियों को अलग-अलग अनुबंध काल के बाद नियमित करना किसी भी सरकार की शोषणकारी नीतियों को दर्शाता है। ऐसी नीतियां आपका वोट बैंक कभी नहीं बना सकती क्योंकि इसके तहत लगा युवा पूरे सेवाकाल में शोषित होता है, फिर चाहे कोई 8 वर्ष बाद, कोई 6, कोई 5, कोई 3 या फिर भले ही कोई 2 वर्ष बाद नियमित क्यों न हो रहा हो।

इसी कुंठा व शोषण के चलते अनुबंध कर्मी अपने अनुबंध काल को अपने नियमित सेवाकाल में गणना करने की मांग जोर शोर से उठाते आए हैं। चुनावों के समय इसी आक्रोश के चलते भाजपा ने ऐसे अनुबंध कर्मियों को उनके अनुबंध काल की वरिष्ठता ( सीनियोरटी) देने का वादा किया था। कर्मचारियों द्वारा मांग उठाते हुए एक वर्ष बीत चला लेकिन अभी तक यह वादा अधूरा ही है। देश के आम चुनाव दहलीज पर हैं लेकिन अभी तक इस मुद्दे पर बेरुखी समझ से परे है।

प्रदेश सरकार को इस बार के बजट में अनुबंध कर्मचारियों को सीनियोरटी देने का वादा पूरा कर अपनी कथनी को करनी में बदलना चाहिए लोकसभा चुनाव से पहले इस वादे को पूरा करने का बजट से बढ़िया और कोई समय नहीं हो सकता।

अनुबंध कार्यकाल को 3 वर्ष से कम करके 2 वर्ष करने के अपने चुनावी वादे को पूरा करने के लिए सरकार को बजट में तरजीह देनी चाहिए । हजारों अनुबंध कर्मी इस वादे के पूरा होने के इंतजार में हैं। अनुबंध प्रथा के खात्मे की तरफ यह फैसला मील का पत्थर साबित होगा।

आज प्रदेश ही नहीं देश भर में पेंशन बहाली को लेकर कर्मचारियों का आंदोलन चरम पर है। कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति के बाद महज 1 हजार या 15 सौ रुपए की पेंशन मिलना कर्मचारी से ही भद्दा मजाक नहीं बल्कि संविधान का भी उपहास है महज 2003 से पहले वाले कर्मचारियों को पेंशन और उसके बाद नियुक्त कर्मचारियों को भीख मांगने पर मजबूर करना इस देश में इन कर्मचारियों व इनके करोड़ों परिवारजनों के साथ एक नई तरह की गुलामी को दर्शाता है। जो 2003 के बाद नियुक्त कर्मचारियों के हिस्से में आई जबकि संविधान में ऐसा कहीं इंगति नहीं है कि 2003 के बाद नियुक्त कर्मचारियों को पेंशन नहीं मिलेगी।
चुनाव से पहले वादा था की पुरानी पेंशन बहाली पर विचार होगा लेकिन अभी तक न पेंशन बहाल हुई न ही आजदिन तक इसपर विचार हुआ। उम्मीद की जानी चाहिए की प्रदेश के बजट में पुरानी पेंशन बहाली पर कुछ ठोस किया जाएगा ताकि आम चुनावों से पहले सरकार अपने वादे को पूरा कर वादाखिलाफ़ी के आरोपों प्रत्यारोपों से बच सके।

पिछली सरकार के समय सभी कर्मचारी, 4-9-14 को लेकर पांच साल तक मांग पर मांग करते आए लेकिन उनकी अनदेखी पिछली सरकार को चुनाव परिणामों के बाद नजर आयी। इसीलिए भाजपा ने चुनाव के समय वादा किया था कि वह सत्ता में आने पर कर्मचारियों को 4-9-14 का सेवा लाभ अवशय देगी। कर्मचारियों का यह मांग भी अभी तक पूरी नहीं हो पायी इसमें कछेक 4-9-14 का फायदा ले गए तो बहुत से अभी भी इस सेवा लाभ से वंचित हैं। यह कैसा नियम है कि एक साथ, एक ही विभाग, एक ही पद पर नियुक्त कुछेक कर्मचारियों को 4-9-14 का सेवा लाभ मिल रहा है तो वहीं शेष इस सेवा लाभ से वंचित हैं। इस बजट में कर्मचारियों की इस मांग को लेकर प्रदेश सरकार को गंभीरता दिखानी चाहिए।

अस्थाई भर्तीयां प्रदेश के बेरोजगारों का शोषण का जरिया बन चुकी हैं इसके लिए केवल एक राजनीतिक दल या सरकार ही दोषी नहीं सभी जमकर शोषण करते हैं चाहे पीटीए, पैरा, पैट, एसएमसी हो, आईटी शिक्षक हो या विभिन्न सोसायटीज के माध्यम से नियुक्त अन्य कर्मचारी हों इनके लिए स्थाई नीति व नियमितीकरण न होना इनमें पनप रहे आक्रोश को और बढ़ा रहा है। ऐसी नीतियों से सरकारें तो पैसे की बचत कर लेती हैं लेकिन इनके असुरक्षित भविष्य को लेकर कोई चिंतित नहीं दिखता बेरोजगार नीतियां नहीं बनाता वह तो बनी नीतियों का शिकार होकर शोषित होता है। बजट में सरकार को अस्थाई कर्मचारियों के लिए कुछ स्थाई समाधान अवशय करना चाहिए।

अंतिम मुख्य मांग जिसको लेकर कर्मचारी हमेशा उत्सुक रहता है वह है नया वेतनमान। केंद्र में नया वेतनमान कब से लागू हो चुका है और केंद्रीय कर्मचारी इसका लाभ भी उठा रहे हैं लेकिन प्रदेश पंजाब वेतनमान की सिफारिशों को लागू करने के चलते अभी भी नया वेतनमान लागू नहीं कर पाया। इसमें सरकार को दोष भी नहीं दिया जा सकता क्योंकि अभी पंजाब द्वारा गठित वेतन आयोग की न तो रिपोर्ट आई है और नही इसे वहां लागू किया गया है जिसके चलते प्रदेश में भी नए वेतनमान को लागू करने में देरी हो रही है। हालांकि प्रदेश सरकार ने इसकी भरपाई के लिए अंतरिम राहत और मंहगाई भत्ते की अतिरिक्त किश्तें जारी कर कर्मचारियों को काफी हद तक राहत दी है फिर भी समय आ गया है प्रदेश सरकार केंद्रीय वेतन आयोग की सिफारिशों को ही प्रदेश के कर्मचारियों पर लागू करे क्योंकि प्रदेश के कर्मचारियों को पंजाब पैटर्न पर केवल वेतन ही मिलता आया है।

भत्ते तो प्रदेश सरकार अपनी मर्जी से लागू करती व देती आयी है इसलिए पंजाब वेतनमान की मांग करने का कोई औचित्य भी नहीं बनता । प्रदेश सरकार बजट में केंद्रीय वेतनमान की सिफारिशों को लागू कर प्रदेश के कर्मचारियों को सौगात दे कर एक नयी पहल कर सकती है।

(स्वतंत्र लेखक राजेश वर्मा बलद्वाड़ा, मंडी के रहने वाले हैं और उनसे 7018329898 पर संपर्क किया जा सकता है।)

जनमंच में गुस्सा दिखाकर, डांट-डपटकर प्रपंच क्यों कर रहे मंत्री

आई.एस.ठाकुर।। जब हिमाचल प्रदेश में जयराम ठाकुर मुख्यमंत्री बने थे और उन्होंने पूरे प्रदेश में लोगों की समस्याएं सुलझाने के लिए जनमंच कार्यक्रम का ऐलान किया था, तब ये एक अच्छी पहल लगी थी। जाहिर है, सरकार नई-नई बनी थी और उसे दिखाना था कि पिछली सरकार के समय जो ढिलाई बरती गई थी, उसके कारण सुस्त पड़े सिस्टम में हरकत पैदा करने के लिए नई सरकार प्रतिबद्ध है। मगर अब ये जनमंच दिखाते हैं कि नई सरकार के समय भी सिस्टम वैसा ही ढीला है, जैसा पिछली सरकार के समय था।

जनमंच कार्यक्रम पहली नजर में तो अच्छा कार्यक्रम लगता है मगर इसके साथ कुछ दिक्कतें हैं। पहली बात तो ये कि जनमंच कार्यक्रमों में मंत्रियों का दरबार लगाकर बैठना अजीब है। वे मंच से फरियादियों की समस्याओं को सुनते हैं, अफसरों को इन समस्याओं को दूर करने का आदेश देते हैं और फिर चले जाते हैं। प्रश्न ये है कि क्या उनसे सुनाए गए फरमानों के बाद वाकई लोगों की समस्याएं सुलझती हैं?

दूसरी समस्या इस आयोजन से तरीके से है। ये एक तरह का मेला है। सारे अधिकारी बुलाए जाते हैं, फॉरमैलिटी में शिविर लगाए जाते हैं जहां पर उनकी चलती है, जिनकी पहुंच होती है। कई बार इस मौके का फायदा उठाकर अयोग्य लोग भी कुछ योजनाओं का लाभ उठाने में कामयाब रहते हैं। उदाहरण के लिए विकलांगता सर्टिफिकेट बनाने में कुछ ऐसे लोग भी आते हैं, जो होते ठीक हैं मगर डॉक्टरों पर विकलांगता प्रमाण पत्र बनाने का दबाव बनाते हैं या फिर विकलांगता का प्रतिशत बढ़ाकर दिखाने के लिए कहते हैं। डॉक्टर बेचारे करें तो क्या?

फिर इस पूरे आयोजन के लिए तंबुओं, कुर्सियों, मैट, माइक, स्पीकर और गैरजरूरी धाम पर जो खर्च किया जाता है, क्या वह पहले से ही कर्ज में डूबे प्रदेश के लिए सही है? बेहतर होता इस पैसे को जनहित में इस्तेमाल किया जाता। जनमंच को जनहित मत समझिए। यह तो प्रपंच बनने की ओर अग्रसर है। जहां मंत्री आते हैं, माइक पर समस्याएं सुनते हैं, गुस्सा दिखाकर, डांट-डपटकर अधिकारियों को हड़काकर चले जाते हैं, जनता इस कलाकारी पर तालियां बजाती है और फिर धाम का लुत्फ उठाकर घर चली जाती है।

होना क्या चाहिए?
जनमंच का बंद हो जाने का मतलब होगा इसका कामयाब हो जाना। यानी कि अगर जनमंच कार्यक्रम शुरुआती कुछ महीनों तक चलने के बाद बंद हो जाते तो इसका मतलब होता कि सरकार नकारा हो चुके सिस्टम को चुस्त-दुरुस्त करने में में कामयाब रही। जनमंच में वही लोग आते हैं जिनकी सुनवाई नहीं हो रही होती। सामान्य ढंग से सरकारी महकमों से जुड़े काम करवाने में जिन्हें दिक्कत आती है। जनमंच में मॉनिटर किया जाना चाहिए था कि किस महकमे में किस तरह की शिकायतें ज्यादा आती हैं और फिर बाकायदा उस विभाग को योजना बनानी चाहिए थी कि इस तरह की समस्याओं को दूर करने के लिए क्या किया जा सकता है।

अगर सिस्टमैटिक ढंग से जनमंच कार्यक्रम को जनता की समस्याओं को समझने के कार्क्रम के तौर पर सरकार लेती और फिर उस हिसाब से ऐक्शन लेती तो सरकारी विभागों की कार्यप्रणाली भी सुधरती और अधिकारी भी लाइन पर नहीं आते। धीरे-धीरे लोगों की समस्याएं कम होतीं तो जनमंचों में भीड़ जुटना कम हो जाती। मगर जनमंच को सिर्फ एक रवायती आयोजन में बदलकर रख दिया गया। नतीजा यह रहा कि पहले जनता फ्रस्ट्रेट थी, अब मंत्री फ्रस्ट्रेट होने लगे हैं। कोई जनता के सामने हीरो बनने के लिए अधिकारियों को दुत्कारता है तो कोई मेयर को ही डपट देता है। कोई कहता है अधिकारी मेरी नहीं सुन रहे तो कोई जनता को ही समस्याओं के लिए जिम्मेदार बता देता है।

जनमंच में भीड़ जुटने का मतलब यह नहीं है कि सरकार अच्छा काम कर रही है। इसका मतलब है कि सककार नाकाम रही है सिस्टम को ठीक करने में। तभी तो लोग परेशान होकर मंत्रियों के पास आ रहे हैं। जो काम अधिकारियों के लेवल पर होने चाहिए, उनके लिए किसी को मंत्री या मुख्यमंत्री के पास क्यों जाना पड़ रहा है? मंत्रियों और मुख्यमंत्री का काम नीतियां बनाना है या पटवारी या लाइनमैन को निर्देश देना?

जनमंच निस्संदेह नए मुख्यमंत्री के पिटारे से निकली महत्वाकांक्षी और अच्छी योजना थी। मगर काम करने के बजाय चहेतों को लाभ पहुंचाने में ज्यादा इच्छुक नजर आने वाले कुछ लोगों ने इसे प्रपंच बनाकर रख दिया है। वे जनमंचों में जाते तो हैं, मगर समस्या का स्थायी हल ढूंढने नहीं, राजा-महाराजा की तरह दरबार लगाने। अभी भी समय है, अगर जनमंच में आई समस्याओं और शिकायतों को स्टडी करके देखा जाए कि कौन से महकमे में कहां दिक्कत है और वह कैसे ठीक हो सकती है, तभी ये कामयाब होंगे। वरना यूं ही जनता का पैसा फूंकने का कोई मतलब नहीं है।

(लेखक हिमाचल प्रदेश से जुड़े विषयों पर लंबे समय से लिख रहे हैं, उनसे kalamkasipahi @ gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है)

ये लेखक के निजी विचार हैं