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Tuesday, April 21, 2026
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26 जनवरी की परेड में हिमाचल के रमेश 20वीं बार करेंगे नेवी के ब्रास बैंड की अगुवाई

इन हिमाचल डेस्क।। इस बार दिल्ली में 26 जनवरी की परेड में भारतीय नौसेना का चर्चित ब्रास बैंड प्रस्तुति देगा, जिसकी अगुवाई करेंगे ऑनररी सब लेफ्टिनेंट रमेश चंद कटोच। रमेश चंद कटोच हिमाचल प्रदेश के रहने वाले हैं और नेवी के बैंड में रहते हुए 30वीं बार गणतंत्र दिवस समारोह में हिस्सा लेने जा रहे हैं। खास बात यह है कि पिछले 20 सालों से परेड में वही अपने दस्ते का नेतृत्व करते आ रहे हैं। इस बार वह आखिरी बार इस बैंड का नेतृत्व करेंगे क्योंकि अप्रैल में वह रिटायर हो जाएंगे।

गणतंत्र दिवस परेड तथा बीटिंग रिट्रीट में नौसेना के 80 सदस्यीय बैंड का नेतृत्व करने वाले रमेश चंद कटोच पिछले 30 वर्षों से राजपथ पर नौसेना के बैंड का हिस्सा रहे हैं जिसमें से 20 वर्ष उन्होंने बतौर बैंड मेजर दस्ते की अगुवाई की है।

कटोच साल 1981 में नेवी में शामिल हुए थे। पहली बार उन्हें साल 1989 के गणतंत्र समारोह में ब्रास बैंड में शामिल होने का मौका मिला था। उनके नेतृत्व में यह बैंड देश-विदेश में कई जगह पर परफॉर्म कर चुका है।

कटोच को इस बात का मलाल है कि अगले वर्ष की 26 जनवरी की परेड में वह इस बैंड का हिस्सा नहीं रहेंगे क्योंकि 37 वर्षों की सेवा के बाद वह अप्रैल में सेवानिवृत्त हो रहे हैं। बहरहाल, हमारे तरफ से कटोच को शुभकामनाएं।

लेख: जैविक खेती से संवर सकता है हिमाचल के युवाओं और किसानों का भविष्य

करम सिंह ठाकुर।।  कृषि व्यवस्था जीवन का महत्त्वपूर्ण पहलू है। भारत एक कृषि प्रधान देश है। हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ भी कृषि ही है। प्राचीन समय में खेतीबाड़ी गोबर, गोमूत्र व देशी प्रयोगों पर आधारित थी। उस समय किसानों को भारी-भरकम धन रासायनिक उर्वरकों या खरपतवारों पर नहीं खर्चना पड़ता था, इसीलिए किसानों की आर्थिकी काफी सुदृढ़ थी। उस दौरान कृषि उत्पाद भी स्वास्थ्य के लिहाज से बेहद गुणकारी थे। आधुनिकता की अंधी दौड़ में कृषि व्यवस्था में कीटनाशकों व यूरिया के प्रयोग से फसलों की पैदावार में तो बढ़ोतरी हुई, लेकिन गुणवत्ता का स्थान विषैले व मानव जीवन के लिए घातक कीटनाशकों ने ले लिया।

जहरीली खेती से फैल रही हैं बीमारियां
आज की कृषि पूर्ण रूप से जहरीली हो चुकी है। अंधाधुंध कीटनाशकों का प्रयोग एक तरफ भूमि की उर्वरकता को नष्ट कर रहा है, वहीं दूसरी ओर स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ हो रहा है। उपभोक्ता पैसे देकर जहर खरीद रहा है। जानलेवा बीमारियां जैसे हार्ट अटैक, कैंसर, दस्त, उल्टियां, अपच कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग का ही नतीजा है। एक तरफ आज की युवा पीढ़ी कृषि से अपना मुंह मोड़ रही है, वहीं औद्योगिकीकरण, विकासशील गतिविधियों तथा बढ़ती जनसंख्या भूमि को सिकोड़ रही है। ऐसी परिस्थिति में जिस बची-खुची भूमि पर खेती हो रही है, वह पूर्ण रूप से विषैली हो चुकी है। कभी मौसम की मार, कभी बीज व अन्य कृषि उपकरणों के अभाव से किसान पिसता रहता है।

ऐसे में कृषि व्यवस्था को अपनाना घाटे का सौदा बन गया है। यही कारण है कि युवा पीढ़ी कृषि से हट कर महज चंद रुपए के लिए नौकरी करने को मजबूर हो गई है। गर्त में जाती कृषि व्यवस्था को बचाने का एकमात्र उपाय जीरो बजट आर्गेनिक खेती ही हो सकती है। जैविक खेती बिना कोई धन खर्च करके की जा सकती है। किसानों को देशी गउओं के गोबर और गोमूत्र का प्रयोग कीटनाशकों और खाद के रूप में करके, महंगे व हानिकारक कीटनाशकों पर पैसा खर्च नहीं करना पड़ेगा। गोमूत्र में जहरीले पौधे खासकर नीम का प्रयोग करके फसलों की गुणवत्ता को बरकरार रखा जा सकता है।

soil quality theme

जैविक खेती के हैं कई फायदे
जैविक कृषि की कई ऐसी विशेषताएं हैं, जिन्हें जानकर हम समझ सकते हैं कि जैविक खेती आज के समय की जरूरत क्यों बन चुकी है? इसका पहला और महत्त्वपूर्ण लाभ है कम लागत तथा उपलब्धता। जैविक खादों को सल्फर, जिंक तथा अन्य रासायनिक तत्त्वों की तुलना में स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कृषि के व्यर्थ उत्पादों द्वारा अपेक्षाकृत सस्ती दर पर खादों का निर्माण किया जा सकता है। जब जैविक खेती के प्रचलन को प्रोत्साहन दिया जाए, तो अधिकाधिक किसानों द्वारा रासायनिक उर्वरकों व खादों पर बर्बाद होने वाली मुद्रा को बचाया जा सकता है।

खेती की इस विधा में उत्पादन एवं पोषण में अपेक्षाकृत अंतर साफ देखा जा सकता है। जैविक खादों से उत्पादित वस्तुओं में गुणवत्ता, पौष्टिकता एवं ठहराव की स्थिति ज्यादा होती है, जबकि रासायनिक खादों से उत्पादित वस्तुओं में साइड इफेक्ट ज्यादा होते हैं। संभवतः इसी वजह से डाक्टर या वैद्य अपने मरीजों को यह सलाह दिया करते हैं कि वे जैविक खादों द्वारा उत्पादित वस्तुओं का अधिकाधिक मात्रा में सेवन किया करें। रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध उपयोग ने जल, जंगल व जमीन को दूषित ही किया है। ऐसे में पर्यावरण को बचाने की दिशा में भी जैविक खेती एक कारगर उपाय साबित हो सकती है।

एक गाय का गोबर पांच बीघा जमीन की खेती के लिए उपयुक्त रहता है। साथ में दूध भी प्राप्त होता है, जबकि बड़ी कंपनियां आर्गेनिक फार्मिंग से फसलें तैयार करने के नाम पर मोटी कमाई कर रही हैं। इस संदर्भ में किसानों में जागरूकता पैदा करने की आवश्यकता है। किसान खुद समर्थवान हैं, वे अपनी मेहनत से फसलें पैदा कर सकते हैं। बाजार में जैविक उत्पादों की मांग दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। मांग अच्छी हो तो दामों का अच्छा मिलना स्वाभाविक ही है।

घर बैठे मिलेगा रोज़गार
आज का डिग्री धारक युवा लाखों रुपए खर्च करके महज पांच-सात हजार की नौकरी के लिए घूमता-फिरता रहता है। यदि युवा वर्ग को जीरो बजट खेती की ओर लगाया जाए तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वर्ष 2022 तक देश में फसल उत्पादन व किसानों की आय को दोगुना करने का लक्ष्य पूरा हो सकता है। युवाओं को रोजगार भी उपलब्ध होगा। कृषि व्यवस्था में फैली गंदगी को भी साफ किया जा सकता है। उत्पादन प्रणाली स्वच्छ, समृद्ध व संपन्न होगी तो स्वतः ही बाजार में भी स्वास्थ्यवर्द्धक उत्पाद उपलब्ध होंगे।

farmer holding box of organic vegetables

स्वस्थ भारत के निर्माण के लिए स्वच्छ उत्पादन व ईमानदार विपणन प्रणाली का होना अति आवश्यक है। किसान समृद्ध हो गया, तो देश की गिरती अर्थव्यवस्था को भी बचाया जा सकता है। युवाओं के हाथों में कृषि व्यवस्था में रोजगार के साधन उपलब्ध कराए जाएं, तो युवा पीढ़ी भी नए भारत निर्माण में अपना योगदान दे सकती है। किसान व युवा वर्ग किसी भी राष्ट्र की दिशा व दशा बदलने का दम रखते हैं। जैविक खेती को अपनाकर युवाओं व किसानों के भविष्य को संवारा जा सकता है। सिक्किम जैसा छोटा सा राज्य जैविक खेती की सफलता का गवाह है।

(लेखक करम सिंह ठाकुर मंडी जिले के सुंदरनगर से हैं। उनसे 98053 71534 और ksthakur25@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

आप भी हिमाचल प्रदेश की समस्याओं पर या सुझावों आदि पर हमें अपने लेख भेज सकते हैं। अपने लेख हमें inhimachal@gmail.com या contact@inhimachal.in पर भेजें।

सुजानपुर में लड़कियों ने ‘छेड़छाड़ पर सिखाया सबक’, वीडियो वायरल

हमीरपुर।। सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें एक लड़कियां एक गाड़ी वाले से बहस करती हुई नजर आ रही हैं। बताया जा रहा है कि यह वीडियो हमीरपुर जिले के सुजानपुर का है और गाड़ी सवार लोग कथित तौर पर इन लड़कियों का पीछा कर रहे थे। ऐसे में लड़कियों ने खुद ही इन्हें सबक सिखा दिया।

अभी तक घटना के बारे में विस्तृत जानकारी नहीं मिल पाई है और न ही यह पता चल पाया है कि घटना कहां पर और किस समय हुई। वीडियो देखने पर नजर आता है कि गाड़ी के आगे सड़क पर स्कूटी खड़ी है और पीछे खड़ी गाड़ी से ऊंची आवाज में बात कर रही लड़की के हाथ में हेलमेट है। बीइंग हिमाचली पेज पर इस वीडियो को शेयर करते हुए लिखा गया है-In Sujanpur(Hamirpur, Himachal Pradesh), Girls Teach Eve-Teaser a Lesson. वीडियो देखें:

ऐसे में अंदाज़ा लगाया जा रहा है कि स्कूटी सवार का ये लोग पीछा कर रहे थे, इसी पर स्कूटी सवार लड़कियों ने तंग आकर बीच सड़क पर अपनी गाड़ी खड़ी कर दी। इसके बाद वीडियो में बहस होती सुनाई दे रही है। चूंकि अभी कुछ भी स्पष्ट नहीं हुआ है, ऐसे में मामला रोड रेज का भी हो सकता है।

पतंजलि को फायदा पहुंचाएगी सरकार, डिपुओं में बिकेंगे उत्पाद

शिमला।। हिमाचल प्रदेश सरकार ने एक और विवादास्पद और पक्षपात भरा फैसला लिया है। अब सरकारी डिपुओं में बाबा रामदेव के पतंजलि के उत्पाद भी बिकेंगे। मगर इस बात को लेकर सवाल उठने लगे हैं कि सरकार आखिर एक कंपनी विशेष के उत्पाद ही क्यों बेचेगी और किस आधार पर पतंजलि का चयन किया गया है। अगर मामला क्वॉलिटी का है तो पतंजलि के कई उत्पादों की गुणवत्ता पर सवाल उठते रहे हैं और अगर मामला स्वदेशी है तो पतंजलि इकलौती स्वदेशी कंपनी नहीं है। पतंजलि पर गुणवत्ता, भ्रामक विज्ञापन और अन्य जगह बने सामान अपने नाम से बेचने जैसे मामलों पर सवाल उठ चुके हैं और कुछ में कोर्ट से जुर्माना भी लग चुका है (पढ़ें)। पतंजलि के कई उत्पाद, जैसे कि जूस आदि फेल हो चुके हैं।

खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री किशन कपूर ने शुक्रवार को पतंजलि आयुर्वेद सीमित के पदाधिकारियों से बैठक की। उनका कहना था- पतंजलि के उत्पादों में प्रदेश के लोगों की विश्वसनीयता और मांग देखते हुए सरकारी डिपुओं के जरिये इन उत्पादों को जनता को मुहैया करवाया जाएगा। इनमें खाने पीने की चीजें, शर्बत, मसाले, जूस, करियाने का सामान, तेल दालें आदि होंगी ताकि वे लोगों को घर के पास मिलें।

उन्होंने कहा कि चरणबद्ध तरीके से उचित मूल्य की दुकानों में ये उत्पाद मुहैया करवाए जाएंगे। इस संबंध में नागरिक आपूर्ति निगम के अधिकारियों को दिशा निर्देश देते हुए उन्होंने कहा था कि फरवही माह के अंत तक पतंजलि उत्पादों की उपलब्धता को व्यवहार्य बनाने के लिए सबी औपचारिकताएं पूर्ण कर ली जाएं।

मगर कुछ सवालों के जवाब अभी भी सार्वजनिक नहीं हैं कि हिमाचल प्रदेश सरकार को इससे क्या फायदा होने वाला है और इस कंपनी का चयन उसने किस आधार पर किया। क्या उसने निविदाएं या आवेदन मंगवाए थे कि कंपनियां आदेवन करके हमारे डिपुओं के माध्यम से अपने उत्पाद बेच सकती हैं? हिमाचल सरकार की किस संस्था ने पतंजलि के उत्पादों की गुणवत्ता की जांच की और पाया कि ये शानदार हैं। साथ ही वह किस आधार पर डिपुओं में कंपनी विशेष को फायदा पहुंचाने के बारे में निगम को आदेश दे सकते हैं।

किशन कपूर के दोहरे मापदंड?
पाठकों को याद दिलाएं कि पिछली सरकार में जब शहरी विकास मंत्रालय ने धर्मशाला में एक वैकल्पिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम बनाने के लिए बेलारूस की कंपनी से करार किया था, तब ‘इन हिमाचल’ ने इस संबंध में रिपोर्ट छापकर कंपनी को लेकर कुछ सवाल उठाए थे और बाद में ‘इकनॉमिक टाइमस’ ने भी यह मामला उठाया था। आज किशन कपूर तत्कालीन शहरी विकास मंत्री को हराकर ही विधायक बने हैं और मौजूदा सरकार में मंत्री हैं। उस समय इन हिमाचल की रिपोर्ट के आधार पर ही किशन कपूर ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके सवाल उठाए थे कि सरकार ने कैसे इस कंपनी (स्काईवे) का चयन किया था। किशन कपूर ने पूछा था- स्मार्ट सिटी धर्मशाला को स्काईवे की भ्रष्ट नींव पर नहीं बनाया जा सकता। मैं गुजारिश करता हूं कि कांग्रेस सरकार यह बताए कि इस स्काईवे प्रॉजेक्ट के लिए स्विस या किसी अन्य कंपनी के बजाय बेलारूस की कंपनी को क्यों चुना गया? (पढ़ें)

ऐसे में सवाल उठता है कि किशन कपूर अब सत्ता में आकर बताएं कि उन्होंने क्यों किसी अन्य कंपनी के बजाय डिपुओं से उत्पाद बेचने को लेकर पतंजलि को ही चुना, किसी अन्य कंपनी को नहीं। कहीं ऐसा तो नहीं कि विपक्ष में उनके सिद्धांत अलग हैं और सत्ता में आने के बाद अलग?

हिमाचल प्रदेश में कैसी होनी चाहिए ट्रांसफर पॉलिसी, ये हैं सुझाव

मंडी।। प्रदेश की राजनीति में सबसे ज्यादा चर्चित विषय है तबादला कोई भी हो सरकार हो सत्ता परिवर्तन के साथ ही विभिन्न विभागों में तबादलों का होना स्वाभाविक बन जाता है। कई बार तो कर्मचारियों को इस प्रक्रिया के खिलाफ न्यायालय तक की शरण में जाना पड़ता है। बीते कई दशकों से प्रदेश में एक कारगर व उपयुक्त स्थानांतरण नीति की मांग तो उठती रही है परंतु यह धरातल पर नहीं उतर पाई।

प्रदेश में मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर के नेतृत्व में बनी सरकार ने आते ही घोषणा कर कहा की जल्द ही प्रदेश के कर्मचारियों के लिए एक उपयुक्त स्थानांतरण नीति बनाई जाएगी जिसके लिए उन्होंने आमजन व कर्मचारियों से भी इस दिशा में सुझाव आमंत्रित किए हैं। इसी कड़ी में मंडी जिला के बलद्वाडा क्षेत्र से संबंधित लेखक व पेशे से शिक्षक राजेश वर्मा ने मुख्यमंत्री, शिक्षा मंत्री, मुख्य सचिव, शिक्षा सचिव व शिक्षा निदेशालय के दोनों निदेशकों को स्थानांतरण नीति पर सुझाव पत्र भेजा है। जिसपर इन्होनें कई बिंदुओं पर अपने सुझाव रखें हैं।

ऑनलाइन आवेदन मंगवाए जाएं
इनका कहना है कि सर्वप्रथम सामान्य तीन वर्ष का कार्यकाल पूरा कर चुके कर्मचारी से आनलाइन आवेदन आमंत्रित किए जाएं जिसमें पिछले स्टेशनों की जानकारी भी मांगी जाए जैसे की क्या वह दुर्गम क्षेत्र में अपना कार्यकाल पूरा कर चुका है और क्या वह शहर या नगरों में या अपने गृह क्षेत्र में भी सेवा कर चुका है या नहीं? वहीं किसी कर्मचारी ने अपना दुर्गम क्षेत्र का कार्यकाल पूरा नहीं किया तो दुर्गम क्षेत्र में अपना कार्यकाल पूरा कर चुके कार्यरत कर्मचारी से उसे स्थानांतरित कर दिया जाए। यह सुनिश्चित हो की प्रत्येक कर्मचारी को अपने पसंद के स्टेशन पर अपने सेवाकाल में कम से कम एक बार तैनाती मिली या नहीं।

तीन ऑप्शन मांगे जाएं
तबादलों के इच्छुक कर्मचारियों से तीन स्टेशन की आप्शन मांगी जाए, प्रत्येक कर्मचारी को एक यूनिक कोड आवंटित किया जाए किसी भी कर्मचारी का स्थानांतरण उसके नाम से न हो बल्कि उसी यूनिक कोड के आधार पर हो जो उसे दिया गया है। यह इतने गोपनीय तरीके से हो की किसी भी संबंधित कर्मचारी या अधिकारी को इसकी जानकारी न मिल पाए की फंला कर्मचारी का स्थांतरण साफ्टवेयर द्वारा उस यूनीक नंबर के आधार पर किया गया है। वह साफ्टवेयर ही संबंधित विभाग व कर्मचारी को मेल या अन्य किसी साधन द्वारा सूचित करे।

साल में एक महीने ही हो प्रक्रिया
स्थांतरण करने की प्रक्रिया साल में केवल विशेष माह में ही शुरू व संपन्न हो जैसे शिक्षा विभाग में शैक्षणिक सत्र की शुरूआत होने से पहले संपन्न हो जाए। यह नियम पूरी तरह खत्म किया जाए की प्रथम नियुक्ति दुर्गम व जन जातिया क्षेत्र में हो क्योंकि कहीं सिफारिश तो कहीं रिक्तियां न होने के कारण यह नियम आधा अधूरा ही लागू हो पाता है। यदि कोई कर्मचारी या उसका पारिवारिक सदस्य जैसे बूढ़े माता-पिता किसी गंभीर बीमारी से लंबे समय से ग्रसित है तो उस हालात के अनुसार स्थांतरण करते समय इन सामजिक पहलुओं को भी ध्यान में रखा जाए। बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल के लिए कर्मचारियों को इस नीति में रियायत दी जाए।

महिलाओं के लिए यह हो व्यवस्था
विवाहित महिला कर्मचारियों के मामले में यदि पति कर्मचारी हो तो दोनों को एक ही मंडल या उपमंडल पर तैनात किया जाए। अविवाहित महिला कर्मचारियों को कोशिश की जाए की उनको उनके गृह क्षेत्र में ही तैनाती मिले, गृह क्षेत्र की परिधि की सीमा तय कर ली जाए वह 15 से 20 किलोमीटर के दायरे में हो, यदि किसी विद्यालय से संबंधित स्थानीय लोग या स्कूल प्रबंधन समिति के ज्यादातर सदस्य किसी शिक्षक को उसके कार्य की वजह से उसी विद्यालय में लंबे समय तक रखना चाहते हैं तो जनहित को देखते हुए उस शिक्षक की तैनाती ज्यादा से ज्यादा एक वर्ष तक बढाई जाए। सेवानिवृत्त के अंतिम 5 वर्ष रहे कर्मचारियों को गृह क्षेत्र या पसंद के किन्हीं दो स्टेशनों पर समायोजित किया जाना चाहिए जो गृह क्षेत्र से 15-20 किलोमीटर की परिधि में हो।

राजेश वर्मा का कहना है उपरोक्त सुझावों के अलावा बहुत से बिंदु और भी हो सकते हैं जो एक बेहतर स्थानांतरण नीति में उपयोगी साबित हो सकते हैं तथा इन सुझावों पर तकनीकी व सामाजिक पहलुओं को ध्यान में रखते हुए विचार किया जाना चाहिए। यह सारी प्रक्रिया तकनीक व साफ्टवेयर के माध्यम से पूरी की जानी जिसमें मानवीय हस्तक्षेप बिल्कुल न हो। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के नेतृत्व में बनी इस युवा सरकार से कर्मचारियों को स्थांतरण नीति को लेकर बहुत उम्मीदें हैं। हम उम्मीद करते हैं की वह इस पर जल्द ही धरातल पर काम करेगी।

(स्वतंत्र लेखक और शिक्षक राजेश वर्मा बलद्वाड़ा, मंडी के रहने वाले हैं और उनसे 7018329898 पर संपर्क किया जा सकता है।)

अगर आपके पास भी तबादला नीति को लेकर सुझाव हैं तो हमारे फेसबुक पेज पर मेसेज करें या फिर inhimachal.in @gmail. com पर भेजें।

अब एसपी बनकर बद्दी लौटे चर्चित आईपीएस ऑफिसर गौरव सिंह

शिमला।। आईपीएस गौरव सिंह हिमाचल प्रदेश के औद्योगिक शहर बद्दी के एसपी के तौर पर तैनात हो गए हैं। 2013 बैच के अधिकारी पहले भी बद्दी में बतौर एएसपी सेवाएं दे चुके हैं। यहां उन्होंने लगातार कार्रवाई करके ड्रग्स, शराब और अवैध खनन माफिया की कमर तोड़ दी थी। उन्होंने विधायक की पत्नी के टिप्पर का भी चालान कर दिया था, जिसके बाद इनका तबादला पिछली सरकार ने कांगड़ा कर दिया था। तब जनता ने इनके तबादले का विरोध भी किया था। मगर अब दोबारा वह यहां लौटे हैं तो एसपी बनकर।

आगरा में जन्मे गौरव जब पिछली बार बद्दी में तैनात थे, उन्होंने सात महीनों में अवैध खनन के 177 मामले पकड़े थे और लगभग 26 लाख रुपये का जुर्माना वसूला था। इसी तरह से उन्होंने शराब के अवैध कारोबार के 75 और ड्रग्स के 13 मामले पकड़े थे। उन्होंने अन्य मामलों को सुलझाने में भी कामयाबी पाई थी। इन्होंने तत्कालीन कांग्रेस विधायक की पत्नी के टिप्पर का चालान कर दिया था। इसके बाद वीरभद्र सरकार ने इन्हें कांगड़ा भेज दिया था।

उस समय ‘इन हिमाचल’ ने भी इस मामले को उठाया था और यह प्रकाशित किया था:

दबंग विधायक की पत्नी के ट्रक पर ऐक्शन लेने वाले ईमानदार पुलिस अफसर का तबादला

सख्त मिज़ाज़ अधिकारी
गौरव सिंह कांगड़ा और बद्दी के अलावा शिमला में भी एएसपी के तौर पर सेवाएं दे चुके हैं। अभी वह हिमाचल में सबसे कम उम्र के एसपी बने थे और लाहौल-स्पीति की जिम्मेदारी उनके ऊपर थी। वह सख्त कार्रवाई करने के लिए जाने जाते हैं और अब तक पुलिस और होमगार्ड के 26 जवानों पर कार्रवाई कर चुके हैं। इन्होंने सेना के अफसर से रिश्वत लेने पर लाहौल-स्पीति में 18 पुलिसकर्मियों को सस्पेंड कर दिया था। नई सरकार बनने के बाद बद्दी की जनता और जनप्रतिनिधि इन्हें यहां लाए जाने की मांग कर रहे थे।

पूर्व मंत्री ने खाली नहीं किया बंगला, नए मंत्री किशन कपूर परेशान

शिमला।। नई सरकार में खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री किशन कपूर जो बंगला अलॉट हुआ है, वह पिछली सरकार में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री धनीराम शांडिल को मिला हुआ था। शांडिल खुद तो यहां नहीं रहते मगर उनका सामान अभी तक यहीं है। इस कारण किशन कपूर को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। जानकारी मिली है कि कभी उन्हें सरकारी गेस्ट हाउस में रुकना पड़ रहा है तो कभी रिश्तेदारों के यहां।

क्या हैं नियम
सचिवालय के जनरल ऐडमिनिस्ट्रेशन डिपार्टमेंट (जीएडी) को ही मंत्रियों के लिए बंगले आदि की व्ययवस्था करने की जिम्मेदारी होती है। नियम कहते हैं कि सरकार बदलने के बाद 15 दिनों के अंदर आवास को खाली करना होता है। इस संबंध में कई मंत्रियों ने पहले ही आवास खाली कर दिए थे। मगर इस मामले में जीएडी भी मुश्किल में फंस गया है।

बता दें कि भले ही कांग्रेस हार गई है मगर शांडिल चुनाव जीत गए हैं। मीडियाकर्मी पूर्व मंत्री से इस संबंध में संपर्क करने की कोशिश करते रहे मगर वह उपलब्ध नहीं हो पाए। इस तरह से पूरी स्थिति अजीब सी बनी हुई है।

गोपनीयता से पद सृजित कर HPPSC में पत्रकार डॉ. रचना गुप्ता की नियुक्ति

शिमला।। हिमाचल प्रदेश सरकार ने वरिष्ठ पत्रकार डॉक्टर रचना गुप्ता को प्रदेश लोक सेवा आयोग (HPPSC) की सदस्य के रूप में नियुक्ति दी है। खबर है कि गोपनीय तरीके से मंत्रिमंडल ने आयोग में दो सदस्यों के पद सृजित करने का निर्णय लिया और मंगलवार को सरकार ने फैसले की अधिसूचना जारी की। इसके बाद मंगलवार को ही दोपहर बाद तीन बजे राजभवन में राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई।

शपथ दिलाए जाने के दौरान मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर, शहरी विकास मंत्री सरवीण चौधरी, ग्रामीण विकास मंत्री वीरेंद्र कंवर, उद्योग मंत्री विक्रम सिंह, मुख्य सूचना आयुक्त नरेंद्र चौहान, मुख्य सचिव विनीत चौधरी, अतिरिक्त मुख्य सचिव एवं मुख्यमंत्री की प्रधान सचिव मनीषा नंदा, प्रदेश लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष मेजर जनरल डीवीएस राणा, निदेशक सूचना एवं जन संपर्क अनुपम कश्यप समेत प्रदेश सरकार के अन्य वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।

बता दें कि डॉ. रचना की नियुक्ति के बाद अब आयोग में अध्यक्ष के अलावा सदस्यों की संख्या चार हो गई है। अब भी एक पद रिक्त है, जिसे भरने के लिए सरकार जल्द फैसला ले सकती है।

दरअसल पिछली वीरभद्र सरकार के दौरान लोक सेवा आयोग में सदस्यों की नियुक्ति पर भी सवाल उठे थे। ‘द वायर’ के मुताबिक हिमाचल प्रदेश के आरटीआई ऐक्टिविस्ट देव आशीष भट्टाचार्य ने आरटीआई से जानकारी जुटाई थी कि चेयरपर्सन नियुक्त किए गए मेजर जनरल धर्म वीर सिंह राणा (रिटायर्ड) और सदस्य नियुक्त मीरा वालिया ने इन पदों के लिए आवेदन ही नहीं किया था। साथ ही इन पदों के लिए अन्य लोगों के नामों पर विचार नहीं किया गया। गौरतलब है कि वालिया रिटायर्ड IAS ऑफिसर सुभाष आहलुवालिया की पत्नी हैं, जो कि पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र के प्रिंसिपल प्राइवेट सेक्रेटरी भी थे।

द वायर के मुताबिक इस मामले में भट्टाचार्य का कहना था कि पता चलता है कि ततकालीन हिमाचल प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का सम्मान नहीं किया था। उन्होंने कहा था कि हिमाचल के मुख्यमंत्री और ब्यूरोक्रैट्स को अदालत की अवमानना करने में कोई डर नहीं है। गौरतलब है कि 15 फरवरी 2013 को दिए गए फैसले (State of Punjab vs Salil Sabhlok) में जस्टिस ए.के. पटनायक कऔर जस्टिस मदन बी. लोकुर ने कुछ गाइडलाइन्स तय की थीं। जस्टिस लोकुर ने ऑर्डर में लिखा था कि पंजाब सरकार चेयरपर्सन और सदस्यों के चयन के लिए प्रक्रिया और दिशानिर्देशों को तय करे ताकि पंजाब पब्लिस सर्विस कमिशन में मनमर्जी से नियुक्तियां न की जा सकें।

भट्टाचार्य द्वारा 17 मई 2017 को डाली गई आरटीआई से पता चला था कि राणा और वालिया की नियुक्ति में हिमाचल सरकार ने ऐसा कुछ नहीं किया। उन्होंने कहा था, ‘दोनों की केसों में अडिशनल चीफ सेक्रेटरी (पर्सनल) तरुण श्रीधर के ऑफिस से नोट चला जिसमें मुख्यमंत्री और चीफ सेक्रेटरी से नियुक्तियों पर फैसला लेने के लिए कहा गया था। चीफ सेक्रेटरी ने अप्रूवल दिया और मुख्यमंत्री ने मीरा वालिया और मेजर जनरल धरम वीर सिंह का नाम सुझा दिया। उसी दिन राज्यपाल ने भी साइन कर दिए।’

आरटीआई ऐक्टिविस्ट का कहना था कि यह सिलेक्शन पूरी तरह गैरकानूनी है और सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन है। ऐसे में इस बार जिस तरह से डॉक्टर रचना गुप्ता की नियुक्ति हुई है, उसे लेकर भी प्रश्न खड़े हो सकते हैं।

जब फोन का रिसीवर किनारे रखकर सोता मिला 100 नंबर वाला कर्मचारी

शिमला।। क्या कभी आपने पुलिस स्टेशन को कॉल किया है और पाया है कि नंबर नहीं लग रहा? अक्सर ऐसा होता है तो समझ लीजिए मामला सिर्फ तकनीकी गड़बड़ी का नहीं है। हो सकता है ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मी फोन का रिसीवर टेबल पर रखकर सो गया हो। अभी जंजैहली अस्पताल की नर्स का वाकया सामने आया है जो विभिन्न नंबरों पर कॉल करती रही, मगर मदद नहीं मिली।

पिछले हफ्ते ही एसपी सिरमौर ने नाहन पुलिस स्टेशन का औचक निरीक्षण किया था तो पाया कि 100 नंबर वाले कर्मचारी ने रिसीवर किनारे रखा है और खुद सो गया है। एसपी रोहित मालपानी ने कर्मचारी की क्लास लगाने के साथ ही विभागीय कार्रवाई के भी आदेश दे दिए हैं। जानकारी मिली है कि कर्मचारी की एक महीने की सैलरी काटी जाएगी।

लेकिन सवाल उठता है कि क्या एक महीने की सैलरी काटना काफी है? ऐसे लोगों को तो नौकरी से ही निकाल देना चाहिए क्योंकि आम जनता जब बहुत मुश्किल में होती है, तभी पुलिस को फोन करती है। वरना कोई शौक से पुलिस के पास नहीं जाना चाहता। पुलिस की छवि पहले से ही खराब है और फिर ऐसे लोगों से नरमी से पेश आना विभाग के आला अधिकारियों की गंभीरता पर भी सवाल खड़ा करता है।

जब तक पुलिस सिस्टम की मानसिकता और तौर-तरीके नहीं बदले जाएंगे, कुछ नहीं बदलेगा। नई सरकार को समझना हेगा कि गुड़िया हेल्पलाइन बनाने मात्र से कुछ नहीं होगा। डीजीपी बदलने से भी खास फर्क नहीं पड़ेगा, जरूरी है व्यवस्था में बदलाव लाना और वह तभी हो सकता है जब सरकार खुद सक्रिय होकर ऐसे मामलों पर कड़ी कार्रवाई करके संदेश दे कि अब ढिलाई नहीं चलेगी।

CM के इलाके में रात भर मदद मांगती रही नर्स, नहीं आई पुलिस: गुड़िया हेल्पलाइन भी फेल

मंडी।। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के विधानसभा क्षेत्र सिराज के जंजैहली सिविल हॉस्पिटल में नाइट ड्यूटी पर तैनात नर्स के लिए 14 जनवरी की रात बहुत भयावह रही। कथित तौर पर चार शराबी अस्पताल में हंगामा करते रहे, नर्स एक घंटे तक थाने का नंबर घुमाती रही, निर्भया हेल्पलाइन पर 22 बार और 100 नंबर 27 बार कॉल किया मगर पुलिस नहीं आई। नर्स ने इस पूरे वाकये को अस्पताल की डायरी में दर्ज किया है।

नर्स ने लिखा है कि रात को शराब पीकर चार लोग एक मरीज लेकर आए जिसके चेहरे पर कट थे। नर्स ने फर्स्ट एड देकर अन्य अस्पताल को रेफर करना चाहा क्योंकि डॉक्टर नहीं था। ध्यान दें, अस्पताल में रात को डॉक्टर नहीं था। नर्स ने टांके लगाने के लिए बगस्याड़ रेफर किया मगर चारों लोग कहने लगे कि थुनाग या जुंजैहली में ही इलाज हो। वे जिद करने लगे कि या फिर 108 ऐंबुलेंस ही उन्हें बगस्याड़ लेकर जाए और वापस भी लेकर आए। नर्स के मुताबिक चौकीदार, फार्मसिस्ट और ड्राइवर से भी दुर्व्यवाहर किया गया। हंगामा करने वालों ने उद्घाटन पट्टिका उखाड़ने की कोशिश की और आग लगाने की धमकी दी।

इस घटनाक्रम से अंदाजा लगाया जा सकता है कि रात को क्या माहौल रहा होगा। मदद न मिलने से निराश नर्स ने लिखा है कि या तो सुरक्षा का इंतजाम किया जाए और पूरा स्टाफ तैनात किया जाए, वरना इस तरह से मेरी ड्यूटी न लगाई जाए।

एक अखबार से बातचीत में मंडी के एसपी अशोक कुमार ने कहा है कि बेशक दोनों पक्षों में समझौता हो गया है मगर फोन न उठाना और कार्रवाई न करना गंभीर लापरवाही है और दोषी पाए जाने पर कार्रवाई होगी। उन्होंने कहा कि 100 नंबर न लगने की वजह तकनीकी खामी भी हो सकती है। स्वास्थ्य मंत्री विपिन सिंह परमार ने भी मामले को गंभीर बताते हुए स्वंय देखने की बात कहूी है।

मगर नर्स का दावा यदि सही है तो निर्भया हेल्पलाइन और पुलिस हेल्पलाइन नाकाम साबित होती दिखती है। नई सरकार बनने के बावजूद व्यवस्था जस की तस बनी हुई है।