यात्रियों की जान खतरे में डाल रहे HRTC के अधिकारी
हर तरह के फोक म्यूजिक को आगे लाना चाहते हैं आकाशदीप सिंह
दिल्ली में रहने वाले हमारे एक नियमित पाठक आशीष नड्डा ने हमें एक विडियो भेजा है। उनके अनुसार पिछले दिनों वह अपने कुछ मित्रों के साथ डिनर करने नोएडा के एक होटेल में गए थे। डिनर के साथ साथ वहां संगीत संध्या का भी आयोजन था। लोग खाने के आनंद के साथ साथ गजल भी सुन रहे थे। आशीष के ग्रुप में एक लड़का था- आकाश, जो संगीत का शौक रखता है और हिमाचल और पंजाब से सटे सीमावर्ती इलाके से है।
इन लोगों ने मैनेजर से आकाश से भी गाना गवाने के लिए रिक्वेस्ट की। मैनेजर ने काफी ना-नुकर के बाद दो मिनट का समय दिया। आकाश ने दो मिनट में क्या गाया, वह आप इस विडियो में देख सकते हैं।
आकाश सिंह आईआईटी दिल्ली से एम.टेक कर रहे हैं। उनकी बी.टेक पंजाब इंजिनियरिंग कॉलेज चंडीगढ़ से हुई है। समाज के पिछड़े तबके की शिक्षा के लिए काम करने के साथ साथ आकाश म्यूजिक में भी दिलचस्पी रखते हैं। क्लासिकल और सूफी फोक, हर तरह के म्यूजिक को जानना-समझना उन्हें रोमांचित करता है।
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| आकाशदीप सिंह |
भविष्य में आकाश हिमाचली, डोगरी, पहाड़ी, पंजाबी, हर तरह के पारम्परिक फोक म्यूजिक को, जो कि आज विलुप्त होने के कगार पर है, एक्स्प्लोर करके आगे लाना चाहते हैं। इन हिमाचल की तरफ से आकाश सिंह को इस कार्य के लिए शुभकामनाएं।
(अन्य पाठक भी ऐसी किसी घटना के संस्मरण हमें मेल कर सकते हैं। हमारी ई-मेल आई डी है-
inhimachal.in@gmail.com)
कठुआ आतंकी हमले में हिमाचल निवासी की मौत
जम्मू-कश्मीर के कठुआ में शुक्रवार को हुए आतंकी हमले में हिमाचल प्रवेश निवासी एक शख्स की भी मौत हुई है। रणधीर सिंह नाम का यह शख्स नूरपुर का रहने वाला था। आतंकियों ने इसी शख्स की गाड़ी से लिफ्ट मांगी थी।
बताया जा रहा है कि नूरपुर के रहने वाले रणधीर सिंह और उनके साथी जम्मू मंडी से फल बेचकर महिंद्रा जीप से वापस आ रहे थे। रास्ते में सेना की वर्दी में खड़े आतंकियों ने लिफ्ट मांगी। सैनिक समझकर रणधीर ने लिफ्ट तो दी, लेकिन उन्हें नहीं मालूम था कि ये लोग मौत के सौदागर हैं।
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| फाइल फोटो |
आतंकियों ने इसी गाड़ी को इस्तेमाल किया और पुलिस स्टेशन में पहुंचकर हमला किया। उन्होंने बंधक बनाए रणवीर की भी हत्या कर दी। इस आतंकी हमले में 3 सुरक्षाकर्मी भी शहीद हुए थे। दोनों आतंकियों को सुरक्षा बलों ने मार गिराया था।
पूरे भारत के लिए मिसाल है हिमाचल का यह गांव और यहां की प्रधान

हिमाचल प्रदेश के सोलन की शकुंतला देवी ग्राम पंचायत शमरोड़ की मुखिया हैं। उनका क्षेत्र वाईएस परमार यूनिवर्सिटी ऑफ हॉर्टिकल्चर ऐंड फॉरेस्ट्री के पास ही है। शकुंतला जी से मिलना मेरे लिए एक सरप्राइज़ ही था। हॉर्टिकल्चर यूनिवर्सिटी में ही मेरे ठहरने का इंतजाम था। रात को ख़्याल आया कि क्यों न इसी यूनिवर्सिटी के आस-पास के गांवों पर भी एक-दो स्टोरी कर ली जाएं। इसी विचार से मैं अपनी टीम के साथ गांवों की ओर बढ़ चला। वहां एक चाय की दुकान पर एक शख्स ने शकुंतला देवी जी के बारे में बताया और कहा कि वह मेरी मदद कर सकती हैं। मुझे बताया गया कि शमरोड़ गांव के ‘पंचायत भवन’ में मेरी उनसे मुलाक़ात हो सकती है। मैं शमरोड़ गांव की ओऱ बढ़ चला। पहाड़ी गांव होने के चलते रास्ता चढ़ाई से भरा था, लेकिन रास्तों में सुविधा का पूरा ख़्याल रखा गया था। पगडंडियों पर टाइल्स लगी हुईं थीं। ख़तरनाक ढलानों पर सीढ़ियां बना दी गईं थीं। गांव के भीतर घुसने ही वाला था कि एक बोर्ड दिखाई दिया। जिस पर लिखा था – ‘यदि कोई व्यक्ति खुले में शौच करता पाया गया तो उस पर 100 रुपये से 500 रुपये तक का जुर्माना किया जा सकता है।’ पॉलिथीन या कूड़ा-कर्कट फेंकने या गांव में सरेआम धूम्रपान करने पर भी जुर्माने का प्रावधान था।

प्राकृतिक सौंदर्य के बीच बसे इस गांव में इस तरह की कोशिश देखकर मेरा मन और हरा-भरा हो गया। हालांकि, मैंने आसपास मुआयना किया कि कहीं बोर्ड के आस-पास गंदगी तो नहीं फैली है लेकिन मुझे दूर-दूर तक कुछ भी दिखाई नहीं दिया। अलबत्ता रास्तों में सोलर लाइटें दिखाई दीं, ठीक वैसे ही जैसे शहरों में स्ट्रीट लाइट्स दिखाई देती हैं। पहाड़ों पर चढ़ते-चढ़ते सांस उखड़ चुकी थी मगर गांव की इन व्यवस्थाओं ने मुझे ऊर्जा से लबरेज कर दिया था। शमरोड़ गांव पहुंचने पर पता चला कि ग्राम प्रधान शकुंतला देवी पंचायत भवन में मीटिंग कर रही हैं। पंचायत भवन! मीटिंग! मैं थोड़ा सा हैरान था। इतने अर्से से मैदानी इलाकों में घूमता रहा हूं, लेकिन किसी भी गांव में ऐसा नहीं देखा कि पंचायत भवन का सही इस्तेमाल हो रहा हो। अधिकांश जगहों पर पंचायत भवन का सिर्फ ढांचा ही दिखाई देता है, जिनमें भेड़-बकरियां बैठी रहती हैं। इंसान के नाम पर जुआरी या शराबी मिलेंगे।
हालांकि शमरोड़ के पंचायत भवन में बाकायदा बैठक चल रही थी। पंचायत भवन के हॉल में से लोगों की चर्चा सुनाई दे रही थी। मीटिंग खत्म होने के बाद मैं शकुंतला जी से मिलने हॉल के अंदर दाखिल हुआ, तो वहां पर नज़ारा बिल्कुल अलग था। सेक्रेटरी साहब कंप्यूटर लिए बैठे हुए थे। ठीक वैसे ही, जैसे दूसरे ऑफिसों में कर्मचारी बैठे रहते हैं। पंचायत सदस्य लाइन से कुर्सी लगाए बैठे थे और शकुंतला जी एक बड़ी सी कुर्सी पर बैठी थीं। इस दौरान बातचीत करते हुए पता चला कि पंचायत सदस्य गांव के बजट पर चर्चा कर रहे थे। शकुंतला जी की पंचायत में 6 गांव आते हैं। इन्हीं गांवों में से एक ‘धारों की धार’ गांव के सरकारी स्कूल से एक अध्यापक भी मौजूद थे। अध्यापक महोदय स्कूल में मिड-डे मील के मेन्यु को लेकर कुछ बात कर रहे थे।
शकुंतला देवी रोज पंचायत भवन में 9 बजे से 12 बजे तक बैठतीं हैं। इस दौरान सभी 6 गांव के लोग अपने जरूरी कागजों को सत्यापित कराने या फिर दूसरे शिकायतों को लेकर पहुंचते हैं जिनका वह समाधान निकालने की कोशिश करती हैं। शकुंतला जी ने महिलाओं के लिए ‘स्वयं सहायता समूह’ का भी गठन किया है। इसके तहत महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए ट्रेनिंग दी जाती है। संगठन से जुड़ी महिलाएं सिलाई-कढ़ाई के अलावा आचार बनाने और घर बैठे बाकी प्रफेशनल काम करती हैं। इस समूह की सदस्या के लिए फीस भी तय है। हर महीने सभी महिला सदस्य को 200 रुपये देने होते हैं। जब किसी महिला के घर शादी या कोई आयोजन होता है, तो सभी मिलकर उसकी आर्थिक मदद करती हैं। इन महिला समूहों ने एक बैंक भी बना लिया है, जो 2 पर्सेंट के ब्याज पर समूह की बाकी औरतों को लोन भी मुहैया करता है।
शमरोड़ गांव के सभी घरों में टॉइलट हैं और जिसके पास टॉइलट बनाने के पैसे नहीं हैं, उसकी मदद पंचायत और ‘स्वयं सहायता समूह’ करता है। शकुंतला जी ने मुझे बताया कि जब उनकी शादी हुई तब उनके घर में टॉइलट नहीं था। शौच के लिए उन्हें बाहर जाना पड़ता था। उन्होंने अपने पति से इसका विरोध किया। शकुंतला जी के पति को उस वक्त यह बात उतनी महत्वपूर्ण नहीं लगी। ऐसे में उन्होंने अपने मायके चले जाना ही उचित समझा और वापस तभी लौटीं जब उनके पति ने घर में शौचालय बनवा दिया। शकुंतला जी ने तब इसे एक मुहिम की शक्ल दे दी और यहीं से उनकी सामाजिक और राजनीतिक गतिविधि शुरू हो गई।

उस दौर में उन्होंने अपनी चार-पांच महिला साथियों के साथ मिलकर शौचालय के लिए अभियान चलाया। उन्होंने बताया कि सुबह-सुबह ही वह अपनी महिला साथियों के साथ पहाड़ी के ऊपर चढ़ जातीं और जो भी खुले में शौच करता दिखाई देता उस पर कंकड़ मारतीं। शुरू में मामला काफी तनातनी वाला रहा। लोगों ने उनके पति से शिकायत भी की लेकिन बाद में धीरे-धीरे लोगों ने समझना शुरू किया। जिनके पास पैसे थे, वे लोग अपने घरों में शौचालय बनाने लगे लेकिन ग़रीब तबके के लिए यह एक चुनौती थी। उसी दौरान शकुंतला जी ने पंचायत का चुनाव लड़ा और अच्छे अंतर से जीत भी दर्ज की। ग्राम प्रधान बनते ही उन्होंने सबसे पहले गरीब तबके के लिए शौचालय बनवाने का काम किया। इस दौरान जब पैसों की कमी हुई, तो गांव के ही लोगों ने चंदा देकर मदद की।
आज की तारीख़ में यह गांव न सिर्फ हरा-भरा है, बल्कि साफ-सुथरा भी है। शकुंतला जी के साथ महिलाओं का एक बड़ा समूह काम करता है। इन लोगों ने पहाड़ी के जल-स्रोतों का बेहतर इस्तेमाल ढूंढ निकाला है। सभी की कोशिशों की वजह से गांव के ऊपरी हिस्सें पर एक टैंक बनाया गया है, जहां पानी इकट्ठा किया जाता है। यहां से हर गांव में पानी की सप्लाई पंहुचाई गई है। मैंने शकुंतला जी और बाकी महिलाओं से पूछा भी कि जब वे सभी सामाजिक कामों में लगी रहती हैं, तो उनका घर कैसे चलता है? परिवार के बाकी सदस्य ख़ासकर पति इसका विरोध नहीं करते? जवाब था कि वे नौकरियों में व्यस्त रहते हैं या फिर खेतों में काम करते हैं। बाकी घरेलू काम वे लोग इसी दौरान मैनेज कर लेती हैं। उल्टा इस काम के लिए उनके पतियों का उन्हें पूरा समर्थन हासिल है और यह सिर्फ शमरोड़ ही नहीं, बल्कि सोलन ज़िले के अधिकांश घरों में देखने को मिल जाएगा। हालांकि कमाल की बात यह भी है कि उनके पतियों से खटपट उसी तरह से होती है, जो देश के आम दंपति में होती रहती है।
शमरोड़ के अलावा मैंने उनसे दूसरे गांवों में भी जाने की बात कही। मेरे साथ मेरे और भी साथी थे। हम सभी शकुंतला जी के साथ सोलन ज़िले के सबसे हाइट पर बसे गांव ‘धारों की धार’ की ओर चल दिए। धारों की धार गांव उनकी पंचायत के सबसे आखिरी छोर पर बसा गांव है इसलिए हम लोगों ने पहले अपनी गाड़ी से फिर वहां से पैदल जाने का निश्चय किया। शकुंतला जी का एनर्जी लेवल भी कमाल का था। एक गांव से दूसरे गांव की दूरी वह पैदल ही तय कर लेती हैं। मेरे जैसा युवा आदमी हांफते-फिसलते रास्ता तय कर रहा था मगर उन्हें जंप लगाते और टापमटाप कदमों से चढ़ाई चढ़ते देख मैं हैरान था। ऐसे में रहा नहीं गया और नैतिकता का लबादा फेंक उनसे उनकी उम्र पूछने का दुस्साहस कर बैठा। कई बार मुझे टोका जा चुका है कि महिलाओं से उनकी उम्र पूछना नैतिक रूप से ग़लत है, भले ही वह महिला 70 साल की बुढ़िया ही क्यों ना हो। मेरे सवाल पर शकुंतला जी मुस्कुराईं और पूछा, ‘आप यह क्यों पूछ रहे हैं?’ मुझे उनके इस सवाल की पहले से ही उम्मीद थी, ऐसे में बिना देर किए मैंने उनकी बढ़ाई में ताबड़तोड़ कई बातें रख दीं। इस दौरान वह हंसती रहीं और गेस लगाने की बात कहकर सवाल टाल गईं। बस इतना बताया कि उनके बेटे-बेटियां कॉलेज में पढ़ते हैं।
‘धारों की धार’ पहुंचकर हम लोग वहां के जूनियर हाई स्कूल के पास खड़े थे। यहां एक और प्यारी सी बात दिखाई दी। स्कूल जाता हुआ हर स्टूडेंट हमें ‘नमस्ते जी’ बोलकर आगे बढ़ रहा था। मैंने इस विलुप्त होते आचरण के बारे में वहां के बाकी लोगों से पूछा। लोगों ने बताया कि इनके अध्यापकों ने इन्हें इसकी शिक्षा दी है। मैं हैरान था कि सिलेबस के अलावा नैतिक शिक्षा भी दी जाती है और वह भी सरकारी स्कूल में! बच्चों के इस आचरण ने हमारे सभी साथियों को गदगद कर दिया था। जानकारी के लिए बता दूं कि हमारी टीम के सभी साथी दिल्ली या फिर एनसीआर में रहते हैं।

स्कूल में गया तब प्रार्थना-सभा चल रही थी। वहां, बच्चों की संख्या लगभग 60 के आसपास थी। प्रार्थना के बाद छात्रों में से ही एक छात्र देश-विदेश के मुख्य समाचारों को लेकर हाजिर हुआ। इसके बाद दौर शुरू हुआ जीके के प्रश्नों का। यह दृश्य देखकर वाकई मज़ा आ गया। एक तरफ लड़कों की कतार थी और दूसरी तरफ लड़कियों की। जीके के सवालों का दौर 15 मिनट चला। इसके बाद सभी छात्र अपनी-अपनी कक्षाओं में चले गए। स्कूल के प्रधानाध्यापक ने बताया कि प्रार्थना सभा के बाद रोज न्यूज़ रीडिंग के बाद सब्जेक्ट आधारित 15 मिनट की एक प्रतियोगिता होती है।
सरकारी स्कूल में ऐसी पढ़ाई देखकर मन सोच रहा था कि काश! यह सुविधा देश के बाकी सभी हिस्सों में हो जाती। अक्सर मैं स्कूलों की इमारतों में घोटाले देखता हूं, मगर यहां की इमारत काफी अच्छी थी। यहां एक पार्क सा भी बनाया गया था, जहां पर बच्चों के खेलने का सारा साजो-सामान था।
बतौर ग्राम प्रधान शकुंतला जी ने अपने गांव में शिक्षा स्तर को बेहतर बनाने के लिए अध्यापकों के साथ बैठकर ही समाधान निकाला। पंचायत के सभी स्कूलों के अध्यापकों ने शकुंतला जी का साथ दिया और शकुंतला जी ने उनका। रिजल्ट मेरे सामने था। जहां मैदानी इलाकों के सरकारी स्कूलों में बच्चों को ठीक ढंग से अपना नाम और पता लिखना नहीं आता है। वहीं, सोलन के इस सरकारी स्कूल के बच्चे हिंदी और अंग्रेजी में निबंध लिख ले रहे थे। मैं यूपी, बिहार, मध्यप्रदेश और हरियाणा के गांवों में स्थित कई सरकारी स्कूलों में गया, लेकिन वहां छात्र एनरोलमेंट के हिसाब से मौजूद भी नहीं थे। कई जगहों पर एक ही अध्यापक एक से पांचवी कक्षा तक के छात्रों को पढ़ाने की खानापूर्ति कर रहा था लेकिन यहां पर सभी विषय के लिए अलग-अलग अध्यापक मौजूद थे।
अपने विषयों को लेकर भी बच्चे काफी जागरूक थे। कहा जाता है कि जैसा समाज होता है, लोगों पर भी उसकी वैसी ही छाप होती है। सोलन के गांवों में यह देखने को बखूबी मिला। सोलन के अलावा हिमाचल की अधिकांश जगहों पर घूमने के बाद यही अनुभव हुआ कि यहां का समाज शांतिप्रिय और संजीदा है। यहां के अधिकांश कार्यों में महिलाओं की भागीदारी मैदानी इलाकों से कहीं ज्यादा है। यही वजह है कि एक महिला ग्राम-प्रधान ना सिर्फ अपने घर में भी सम्मान और समर्थन पाती है, बल्कि अपने पंचायत क्षेत्र में भी उसे बराबरी का सम्मान और समर्थन मिलता है।
‘धारों की धार’ से निकलने के बाद मैंने शकुंतला जी से विदा ली और उन्हें जीवन में और अहम पद मिले, इसकी शुभकामना देकर चल दिया। पहाड़ी घुमावदार रास्तों के साथ-साथ मेरे दिमाग में भी कई विचार उमड़-घुमड़ रहे थे। आख़िर कब मैदानी इलाकों ख़ासकर उत्तर भारत में महिलाएं इस तरह से सबल होंगी? कब पुरुष समाज उनके अंतर्गत काम करना अपनी हेठी नहीं समझेगा? कब महिलाएं ‘फलाने की पत्नी’ की टैग-लाइन से छुटकारा पाएंगी?

लेखक: अमृत कुमार तिवारी, प्रड्यूसर: Green TV, ईमेल: amrit.writeme@gmail.com
मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने पेश किया पॉप्युलिस्ट बजट
मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने बुधवार को
साल 2015-16 के लिए हिमाचल प्रदेश विधानसभा में बजट पेश किया। सीएम ने 18वीं बार बजट पेश किया, जिसके प्रमुख बिंदु इस तरह से हैं:- दैनिक दिहाड़ी बढ़ाकर 180 रुपये की गई
- 31 मार्च तक पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा करने वाले अनुबंध कर्मचारी होंगे नियमित
- विधायक निधि 50 लाख से बढ़ाकर 70 लाख रुपये
- डिजिटल राशन कार्ड बनेंगे
- दुर्घटना संभावित क्षेत्र सड़कों में स्टील क्रेश के लिए 50 करोड़ रुपये
- पर्यटकों की सुविधा हेतु चंडीगढ़ से शिमला हैलीकाप्टर सेवा उपलब्ध होगी
- 100 राजकीय वरिष्ठ विद्यालय में व्यवसायिक प्रशिक्षण आरम्भ होगा और 200 व्यवसायिक शिक्षक भर्ती होंगे
- राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त शिक्षकों को दो वर्ष का सेवा विस्तार और नकद पुरस्कार के एवज में अतिरिक्त वेतन वृद्धि मिलेगी
- सांस्कृतिक कार्यक्रम के आयोजन के लिए जिला स्तर पर अंतरंग भवनों का निर्माण कुल 25 करोड़ का बजट जारी होगा
- सभी एक्रीडेडिट पत्रकारों को पांच लाख और मान्यता प्राप्त पत्रकारों को तीन लाख रुपये का दुर्घटना बीमा कवर
- प्रेस क्लबों के निर्माण के लिए एक करोड़ रुपये का प्रावधान
- अंशकालिक जलवाहकों का मानदेय 1500 से बढ़ाकर 1700 रुपये
स्वाइन फ्लू ने अब तक हिमाचल में ली 20 की जान
शिमला।।
हिमाचल प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री कौल सिंह ठाकुर ने मंगलवार को विधानसभा में बताया कि प्रदेश में अब तक स्वाइन फ्लू से 20 लोगों की जान जा चुकी है। सबसे ज्यादा 7 लोगों की मौत शिमला में हुई है।
कौल सिंह ने कि सोमवार की रात शिमला के इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (आईजीएमसीएच) में स्वाइन फ्लू से पीड़ित दो लोगों ने दम तोड दिया। उन्होंने कहा कि 13 लोगों ने आईजीएमसी में दम तोड़ा है, जबकि कांगडा जिले के टांडा स्थित राजेंद्र प्रसाद मेडिकल कॉलेज में सात लोगों की मौत हुई है।
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कौल सिंह ने कहा कि राज्य में स्वाइन फ्लू के 302 संदिग्ध नमूने इकटे किए गए थे, जिनमें से 79 की जांच के नतीजे पॉजिटिव आए। उन्होंने कहा कि 50 लोगों में स्वाइन फ्लू के लक्षण पाए गए हैं, जिनका इलाज किया गया है।
वॉट्स ऐप पर 15 मिनट की कॉलिंग पर खर्च हो रहा 12 एमबी डेटा
इन हिमाचल डेस्क।।
उम्मीद है आप सब वॉट्सऐप का कॉलिंग फीचर इस्तेमाल कर रहे होंगे। जिन लोगों ने डाउनलोड नहीं किया है, वे यहां पर क्लिक करके लेटेस्ट वर्ज़न डाउनलोड करें और उसे इन्स्टॉल करें। फिर आपको अपने नंबर पर किसी ऐसे शख्स से वॉट्सऐप कॉल करवाना होगा, जिसके मोबाइल पर पहले से यह फीचर ऐक्टिवेट है।
बहरहाल, बहुत से लोगों के मन में यह शंका है कि आखिर वॉट्सऐप से कॉल करना सस्ता पड़ेगा, या महंगा। अगर आपके आपके मोबाइल पर अनलिमिटेड डेटा प्लान है, तब तो आप चिंता करना छोड़ दीजिए। वाई-फाई पर भी अनलिमिटेड इंटरनेट यूज कर रहे हैं, तो भी दिक्कत वाली कोई बात नहीं है। मगर आप अगर लिमिटेड डेटा इस्तेमाल करते हैं, तो आपका बता दें कि 15 मिनट की वॉइस कॉलिंग 12 एमबी डेटा खर्च कर रही है।
बिना डेटा प्लान के लुट जाएंगे आप
इन हिमाचल ने एयरटेल कनेक्शन वाले फोन से करीब दो बार 15-15 मिनट के कॉल किए। हमने पाया कि इस दौरान औसतन 12 एमबी डेटा खर्च हुआ। मान लीजिए आपने कोई डेटा प्लान नहीं लिया है, तब आपको 4 पैसे प्रति 10केबी (10paise/10KB) के हिसाब से चार्ज लगेगा। इस तरह से आपको 1 एमबी डेटा के लिए 4 रुपये से ज्यादा चुकाने होंगे। और 12 एमबी के लिए चुकाने होंगे 12×4=48 रुपये। यानी कुलमिलाकर 50 रुपये के करीब।
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डेटा प्लान पड़ेगा सस्ता
अक्सर हम लोग डेटा प्लान ही लेते हैं। मान लीजिए आपने एयरटेल का 1 जीबी प्लान लिया है, जो कि 250 रुपे में आता है। इस हिसाब से देखें तो आप 1 एमबी डेटा के लिए 25 पैसे से भी कम चुकाते हैं। तो 15 मिनट बात करने के लिए जो 12 एमबी डेटा खर्च होगा, उसके लिए आपके 3 रुपये से भी कम खर्च हो रहे हैं। यानी डेटा प्लान लेने में भी समझदारी है।
विडियो: बादल फटा, सैलाब आया और एक शख्स को बहा ले गया
(अगर किसी पाठक को इस विडियो को अपलोड करने वाले शख्स की जानकारी है, तो कृपया कॉमेंट करे। हम क्रेडिट जरूर देंगे।)
धर्मशाला को एक भी आईपीएल मैच क्यों नहीं दिलवा पाए अनुराग?
धर्मशाला।।
क्रिकेट प्रेमियों में यह चर्चा है कि एचपीसीए चीफ अनुराग ठाकुर भले ही हाल में बीसीसीआई के सेक्रेटरी बने हैं, लेकिन इससे पहले भी बोर्ड में उनका काफी रसूख था। सवाल उठ रहे हैं कि बावजूद इसके धर्मशाला को मैच क्यों नहीं मिल पाए।
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| क्यों नहीं मिला हिमाचल को एक भी मैच? |
प्रदेश सरकार जिम्मेदार?
यह जगजाहिर है कि एचपीसीए स्टेडियम को लेकर राज्य सरकार और एचपीसीए में विवाद चल रहा है। अनुराग और वीरभद्र एक-दूसरे पर तीखी टिप्पणियां भी करते रहे हैं। माना जा रहा है कि सिक्यॉरिटी व अन्य एनओसीज़ को लेकर सहमति न बन पाने की वजह से बोर्ड ने धर्मशाला से किनारा करना ही ठीक समझा। मगर सरकार इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं है।
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शुभ-अशुभ का चक्कर?
चर्चा ऐसी भी है कि किंग्स इलेवन पंजाब के ऑनर धर्मशाला मैच को शुभ नहीं मानते। धोनी द्वारा छक्के मारकर मैच जीतने का वाकया अभी भी यहां आए दर्शक भूल नहीं पाए हैं। हो सकता है कि इस वजह से धर्मशाला को शेड्यूल से बाहर रखा गया हो।
मौसम ने कर दिया खेल?
कुछ लोगों का यह भी मानना है कि सर्दियों के लंबी खिंच जाने की वजह से भी ऐसा फैसला लिया जाना संभव है। गौरतलब है कि हिमाचल प्रदेश में बारिश और बर्फबारी का दौर अभी थमा नहीं है। वैसे भी धर्मशाला वह स्थान है, जहां पर प्रदेश में सबसे ज्यादा बारिश होती है।
बीसीसीआई की आंतरिक राजनीति
चर्चा यह भी है कि जिस वक्त आईपीएल का शेड्यूल बनाया जा रहा था, बीसीसीआई में पॉलिटिक्स चरम पर थी। चूंकि अनुराग ठाकुर सीधे तौर पर श्रीनिवासन खेमे के लिए चुनौती समझे जा रहे थे, ऐसे में उन्हें नजरअंदाज करते हुए हिमाचल को मैच नहीं दिए गए।
ये सब तो अटकलें हैं और सच क्या है, शायद यह बात सामने नहीं आ पाएगी। सीजन 3 के बाद से भारत में हुए आईपीएल के हर सीज़न के मैच धर्मशाला में हुए हैं। मगर इस बार ऐसा नहीं हो पाएगा, जिससे क्रिकेट प्रेमी थोड़े निराश जरूर हैं।
हिमाचल की सड़कों पर जल्द दौड़ेंगे प्रदूषण रहित ई-रिक्शा
जल्द ही हिमाचल प्रदेश की सड़कों पर दिल्ली और अन्य मैदानी राज्यों की तर्ज पर बैटरी से चलने वाले ई-रिक्शा नजर आएंगे। परिवहन विभाग ने प्रदूषण रहित रिक्शा को परमिट देने का प्रस्ताव तैयार किया है, जिसे मंजूरी के लिए कैबिनेट के पास भेजा जाएगा।
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आज से 11 साल पहले 2004 में हिमाचल प्रदेश सरकार ने प्रदूषण की वजह से ऑटो रिक्शा की परमिट देने पर रोक लगा दी थी। इस वजह से आज भी मंडी, सोलन, कुल्लू और बिलासपुर जैसे और कई कस्बों में पुरानी परमिट वाले ऑटो दौड़ते दिख रहे हैं। मगर अब सरकार चाहती है कि ई-रिक्शा उतारे जाएं।
प्रदेश के परिवहन मंत्री जी.एस. बाली ने भी इस खबर को सही बताते हुए कहा कि राज्य सरकार हिमाचल में प्रदूषण रहित ऑटो चलाने पर विचार कर रही है। उन्होंने कहा कि इस मामले में जल्द फैसला लिया जाएगा।
सूत्रों के मुताबिक पहले चरण में ऊना, बिलासपुर और हमीरपुर जैसे अन्य मैदानी जिलों में ये परमिट दिए जाएंगे। अभी भी कई शहरों में परमिट पेंडिंग हैं, तो कुछ जगहों पर ये चल भी रहे हैं।










