विडियो: हिमाचल में भयंकर भू-स्खलन की लाइव फुटेज

शिमला।।

कुछ दिन पहले हमने आपको हिमाचल प्रदेश का एक विडियो दिखाया था, जिसमें अचानक आई बाढ़ में एक शख्स बह गया था। प्रदेश में कुदरत कभी भी कैसे भयंकर रूप धारण कर लेती है, इसका एक और विडियो आपके लिए लेकर आए हैं।

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आकाश मेहता नाम के शख्स ने करीब 9 महीने पहले यह विडियो अपलोड किया है। इस विडियो के बारे में बताया गया है कि जब वे लोग किन्नौर जा रहे थे, तभी रामपुर में जोर की गड़गड़ाहट के साथ पहाड़ी की चोटी से चट्टानें और मलबा नीचे की ओर दरकने लगा। धूल का गुब्बार आसमान में उठ रहा था।


जोरदार गर्जना करता हुआ लैंडस्लाइड नीचे बढ़ रहा था, जबकि नीचे के गांव में लोग बेखबर थे। शुक्र मनाइए कि सबकुछ ऊपर ही रुक गया, वरना पूरा का पूरा गांव और कई घर इसके नीचे दब जाते। खुद देखिए यह विडियो और जानिए, खूससूरत प्रकृति कैसे जानलेवा भी बन सकती है।

विडियो: सिरमौर की शादी में सादगी भरा पारंपरिक नृत्य

शिमला।।

(अफसोस की बात है कि हमें एक लड़की की तरफ से यह विडियो हटाने की रिक्वेस्ट मिली थी। उनका कहना था कि इस विडियो में वह भी दिख रही हैं, इसलिए इसे हटा दो। उनके चाचा की शादी का विडियो था और चाचा ने ही यूट्यूब पर अपलोड किया था। हमने कहा कि कॉन्टेंट पब्लिकली उपलब्ध है, इसलिए हटाने का सवाल ही पैदा नहीं होता। बाद में संभवत: लड़की के चाचा (जिनकी शादी का विडियो था) ने यह विडियो हटा दिया, जिससे दिख नहीं पा रहा है।)

सिरमौर, हिमाचल के पहले मुख्यमंत्री और प्रदेश के निर्माता कहने जाने वाले डॉक्टर यशवंत सिंह परमार जी की जन्मभूमि है। यह जिला सांस्कृतिक रूप से बेहद समृद्ध है, मगर राजनीतिक उपेक्षा का शिकार रहा है। प्रदेश के दक्षिणी जिले के बारे में अन्य जिले के लोगों को बहुत कम जानकारी है। वहां के  गाने, रिवाज, संस्कृति कैसी है, कम ही लोगों को पता है। शादी का एक विडियो देखिए, जिसमें कितनी सहजता है। न तो ज्यादा बैंड-बाजे, न डीजे… बस शहनाई और ढोल है। लोग खुद गा रहे हैं और झूमते जा रहे हैं। इससे बढ़िया तरीका क्या हो सकता है जश्न मनाने का। विडियो:

काहे का धरना, काहे का आक्रोश? फोटो खिंचवाने का ही था जोश!

शिमला।।

कुछ दिन पहले शिमला में बीजेपी प्रदेश कार्यालय के बाहर प्रदर्शन करने आए युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं और बीजेपी कार्यकर्ताओं में भिड़ंत हो गई थी। जमकर मारपीट हुई थी और कई लोग जख्मी हुए थे। झड़प में जख्मी हुए एक बीजेपी कार्यकर्ता को अपनी आंख भी गंवानी पड़ी है। बीजेपी ने मंगलवार को शिमला में प्रदेश सरकार पर गुंडागर्दी करने का आरोप लगाते हुए और बीजेपी कार्यालय पर हुए ‘हमले’ के खिलाफ प्रदर्शन किया। मगर यह प्रदर्शन मजाक बनकर रह गया।

देखिए तस्वीरें और खुद तय कीजिए। धरना और विरोध आक्रोश यानी गुस्से में किया जाता है। उसमें तेवर होते हैं, जो चेहरे पर नजर आते हैं। मगर प्रदेश में राजनीतिक धरने-प्रदर्शन फॉरमैलिटी बनकर रह गए हैं। मानो फोटो खिंचवाने का मौका हो। सब नेता ऐसे ही नजर आए।

‘लो जी, जल्दी खींचो फोटो’
‘फोटो सही आनी चाहिए भाई’
‘मजे हैं, विधानसभा से वॉकआउट करते-करते बोरियत होने लगी थी ‘
‘ए ता बड़े लोग होई गै कट्ठे’
‘स्माइल प्लीज़’
‘अखबार में आना चाहिए’
‘बड़े नेता ही देखे थे ऐसे फोटो खिंचवाते, हम भी खिंचवाएंगी आज’
‘चलो, फोटो तो आई’
‘मेले टाइप की फीलिंग आ रही है’
विक्ट्री सिंबल क्यों बनाते हैं, पता नहीं है
‘चलो, एक और दिन कट गया’
‘मजा आ गया आज तो’

विडियो: माल मिलेगा?

MTV इंडिया का एक विडियो देखिए, जिसमें तीन दोस्त माल की तलाश में निकले हैं। जानिए, कैसा ‘माल’ चाहिए उन्हें..

सर्दियां लंबी खिंचने से सेबों की पैदावार पर असर

शिमला।।

सर्दियां लंबी खिंच जाने की वजह से हिमाचल प्रदेश के सेब इंडस्ट्री पर नुकसान के बादल मंडरा रहे हैं। गौरतलब है कि हिमाचल प्रदेश में हर साल सेबों का करीब 3,500 करोड़ रुपये का कारोबार होता है। मगर इस बार लगातार हो रही बारिश और ओले वगैरह गिरने की वजह से पैदावार में कमी देखने को मिली है।


सर्दियां लंबी खिंच जाने की वजह से सेब का आकार छोटा रह जाता है। जाहिर है, इससे बहुत नुकसान उठाना पड़ता है। इसके अलावा ओले गिरने और तेज बारिश होने से भी नुकसान हो जाता है। सर्दियां बढ़ने की वजह से पेड़ों को सही पोषण नहीं मिल पाता है, जिससे पैदावार घट जाती है।

हिमाचल के किसान आस लगाए बैठे हैं कि कब धूप निकले और उन्हें थोड़ी राहत मिले।

विचारधाराओं के चलते भिड़ती यंग ब्रिगेड का कर्ज चुका पाएंगी पार्टियां?

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हिमाचल प्रदेश का युवा भी अब सहनशीलता और उस भाईचारे की सीमा से बाहर जाता जा रहा है जो इस प्रदेश के गौरवशाली इतिहास और  यहाँ के मानुस की आज भी एक वैश्विक पहचान है। 

सुरक्षा के लिहाज से राजधानी को किसी भी प्रदेश का सब से चौक चौबंद सिटी माना जाता है।  पर हाल में ही सरकार और अफसरशाही की नगरी शिमला में घटित हुए  घटनाक्रमों ने मन को बहुत आहात किया है।  राजनैतिक लहरों पर सवार युवकों का आपस में भिड़ जाना और एक नौजवान का उसमे आँख गवां देना बहुत ही दुखद है।  और हैरानी की बात है की इस पर  अभी तक कोई कार्रवाई भी नहीं हो पायी है।  खैर यह तो प्रशाशन की नाकामी और लचरपन का साक्षात उदहारण है।  परन्तु एक सवाल मन में यह भी उठा विचारधारा के नाम पर जिस आम कार्यकर्ता ने अपनी आँख गवा दी उस कार्यकर्ता से सबन्धित  उसकी   राजनैतिक पार्टी कैसे  उसके  कर्ज और निष्ठां को चूका पाएगी। 

हिमाचल प्रदेश की राजनीति के अतीत में मैं झांकता हूँ तो  जाने कैसे लोगों को  विभिन पार्टी और उसके आकाओं ने  सिर्फ व्यक्तिगत निष्ठा के बदले विधानसभा टिकटों से अलंकृत किया है  जिनका मैं यहाँ वर्णन करना नहीं चाहता यहाँ तो लोगो ने संग़ठन निष्ठा पर क़ुरबानी दी है । जब कोई नेता स्वर्गवासी होता है उसके बच्चों बीवी को टिकट थम दिया जाता है चाहे वो राजनीति का क ख ग भी नहीं जानते हों।  और कहा जाता है फलां नेता बड़ा महान था इसलिए उसके घर वालों को आगे लेकर उसे सच्ची श्रन्द्जलि दी गयी है यह हिमाचल ही  नहीं हिन्दोस्तान की राजनीति का ऐतिहासिक और निरंतर चलता हुआ सत्य है।  
पार्टी संग़ठन के लिए सर फ़ुड़वाने वाले और आँख तक गवा देने वाले युवा  कार्यकार्तिओं को क्या उनका राजनितिक दल विधानसभा में जाने के लिए अपनी आवाज बुलंद करने के लिए टिकट थमा सकता हैं , मुझे व्यक्तिगत रूप से लगता है जब वो चापलूसों को  बिना किसी योग्यता के टिकट थमा सकते हैं तो उस युवा जोश का कर्ज भी उन्हें अदा करना चाहिए जिसने अपनी आँख गवाए है , यह आने वाला समय बताएगा पर हर पार्टी की रीढ़ यह युवा अपना हक़ नहीं  मांगेगे  तो इन्हे सिर्फ विरोध प्रदर्शनों में आने वाली भीड़ के रूप में ही गिना जाएगा। राजनैतिक घाघों और सरमायेदार लोगों को यह घटनाएँ सिर्फ एक राजनैतिक मुद्दा ही नजर आएँगी।  प्रशाहन की करवाई और  न्याय का तराजू  तो सत्ता के दबाब से तो किसी भी तरफ झुक जाता है।  पर आने वाला वक़्त यह   फैसला करेगा की आँख तक संग़ठन  के नाम पर गवां देने वाले एक साधारण कार्यकर्ता को उसकी पार्टी आंतरिक रूप से क्या न्याय दे पाएगी।  प्रशानिक न्याय  तो द्रोपदी का चीर है पर  आंतरिक न्याय तो  बनता है , दिया भी जा सकता है  क्या भविष्ये में  यह कहकर इस कर्ज को थोड़ा कम करने की कोशिश  नहीं की जा सकती   ???    संग़ठन  के लिए इतनी बड़ी क़ुरबानी पर ऐसे कार्यकर्ताओं  को क्यों ना  मौका दिया जाए  उन्हें अपने  गृह  क्षेत्र  से विधानसभा में आने का।  क्या  आम नौजवान इन वर्कर्स के लिए पार्टयों में इतनी संवेदना है या नौजवान यूँ ही भीड़ का हिस्सा हो रहा है उस दौर में जब वो अपनी इच्छाशक्ति   से  कुछ भी अलग कर सकता है 
इस लेख में लेखक और विचारक के तौर पर मेरी सवेदना  एवं  समर्थन  किसी  पार्टी या व्यक्ति विशेष से नहीं है  किसी को क्या मिले या न मिले  इस का निर्धारक मैं नहीं हो सकता ,   यह घटना तो मात्र एक  सूक्षम उदहारण  है पर मेरे मन में की  यह जिज्ञासा  सामरिक और वैश्विक और  हर राजनैतिक दल के लिए है मैंने तो  बस इतिहास  में  सरसरी निगाह  डालकर एक  सवाल खड़ा किया है  जिसका जबाब भविष्ये के गर्भ में है।
लेखक : आशीष नड्डा
लेखक हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिला से सबंधित हैं और राष्ट्रीय प्रीद्योगिकि संस्थान  डेल्ही में शोध छात्र हैं।
 पाठक हमें अपने लेख inhimachal.in@gmail.com पर मेल कर सकते हैं। 

माँ चिंतपूर्णी क्षेत्र में गिरे गोल्फ बाल आकार के ओले

माँ चिंतपूर्णी क्षेत्र में गिरे गोल्फ बाल आकार के ओले  : नीचले हिमाचल में भी कड़ाके की ठण्ड 


हिमाचल प्रदेश में मां चिंतपूर्णी मंदिर जाने वाले भक्तों के लिए एक खबर है। दरअसल, चिंतपूर्णी मंदिर में मां के दर्शन के लिए जाने वाले भक्तों को एतिहात बरतने की जरूरत है। क्योंकि यहां पर बर्फ के ओलों के चलते मौसम बेहद खराब हो गया है, जिस वजह से श्रद्धालुओं को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। 

मुबारकपुर से ले कर भरवईं तक के रास्तो में डेढ़ फुट बर्फ़ की चादर बिछ गई है जिस के कारण ट्रैफि़क जाम हो गया है। मौसम में अचानक आई इस तबदीली के साथ तापमान भी नीचे गिर गया है। पूरे इलाको में करीब आधे घंटे तक ओले गिरते रहे और गौलफबाल के आकार जितने बर्फ़ के गोले पूरी सड़क पर बिछ गए।


वैदिक भारतीय संस्कृति में नारी का स्थान और वर्तमान अवधारणा

भारत में नारी को शक्ति और दुर्गा का प्रारूप माना जाता रहा है इसका एक कारण यह भी हो सकता है की अगर पुरुष के पौरुष की बात की जाए उसके शक्तिशाली व्यकतित्व की बात की जाए उसमें भी माँ  द्वारा  नौ महीने तक बच्चे को गर्भ में रखने और अबोध बालक के रूप में एक पुरुष  का लालन पालन पोषण करने में सब से बड़ा योगदान है।  आज भारतीय समाज में भी इस विषय पर चर्चा चल जाती है की हम महिलाओं को बराबरी पर नहीं ला पाये हैं वर्तमान परिपेक्ष में यह सच भी है परन्तु समाज का एक एलिट क्लास तबका जब द्रौपदी सीता का आदि महान नारियों का उदाहरण देकर यह सिद्ध करने की कोशिश करता है की हम प्राचीन काल से नारी शोषित कर रहे हैं यह भारतीय संस्कृति पर एक मिथ्या आरोप हो सकता है।  हमारे एक पाठक अश्वनी कुमार वर्मा  ने हमें ऐसा ही एक संस्मरण भेजा हैं जिसमे उन्होंने काफी प्रभावी शब्दों में प्राचीन भारत की संस्कृति और नारीवादी सोच को छद्दम एलिट क्लास लोगों के बीच विस्तार से अथ्यों के साथ  परिभाषित किया उन्ही की जुबानी पढ़ें यह लेख। … 
” दिल्ली यूनिवर्सिटी(डीयू) का मिरिंडा हाउस प्रगतिशील महिलाओं के लिए मशहूर हैं| भारत की सबसे सशक्त व जागरूक महिलाएँ यहीं मिलती हैं| एक बार मैंने यहीं की एक महिला को महिला सशक्तिकरण के ऊपर बोलते सुना, हालांकि उन्होने भारतीय महिलाओं की जो समस्याएँ गिनाई ,उससे पूर्णरुपेण सहमत था, उनका कहना था कि भारतीय समाज में एक लड़की को अपनी पसंद का लड़का चुनने का अधिकार नहीं दिया जाता, उसका वस्तुकरण कर दिया है अपने समाज ने, लड़की पढ़ना चाहे तो आज भी बहुत से रोड़े हैं| आदि आदि इत्यादि ! लेकिन तभी उन्होने बोला कि भारत में ये कुरीति यहाँ के संस्कृति के कारण हैं ,जहाँ राम कथा व रामायण का पाठ होगा ,वहाँ महिलाओं के साथ सीता जैसा ही अन्याय किया जाएगा| भारतीय महिलाओं को यूरोपीय महिलाओं की तरह समानता चाहिए|उनका लेक्चर चल रहा था |मुझसे रहा नहीं गया ! 
मैंने उनसे बोला कि आपको मालूम नहीं है क्या कि सीता जी स्वयंवरा थी ? सीता जी ही नहीं ,अपने प्राचीन भारतीय संस्कृति में स्वयंवर के अनेकों उदाहरण हैं| दूसरे वो एक विदुषी महिला थी| इतना ही नहीं अपने देश में गार्गी ,अपाला, घोषा, लोपामुद्रा,निवावरी आदि अनेकों विदुषी महिलाएँ हुई ऋग्वेद में जिनके प्रमाण मौजूद हैं और ये मैं नहीं कहता ,स्वयं वामपंथी इतिहासकारों ने इसे लिखा है|

हो सकता है आप को सीता जी की अग्निपरीक्षा न रास आई हो ,लेकिन आप भूल गयी कि अग्निपरीक्षा के बाद श्रीराम ने उन्हे स्वीकारा तो सही लेकिन समाज की महिलाएँ व्यभिचार में लिप्त होने लगी और उन्होने श्रीराम से न्याय माँगना शुरू किया ये बोलकर जब सालों रावण के पास रहकर आई सीता का वरण राम कर सकते हैं तो हमारे पति हमारा क्यों नहीं ? सीता की पवित्रता जानते हुए भी ,अगाध प्रेम के बावजूद केवल राजधर्म निभाने के लिए राम ने सीता का त्याग किया ! 


दुख: इस बात का है कि अनिर्णय कि स्थिति में भी व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर निर्णय लेकर भविष्य के लिए राजधर्म की मिसाल कायम करने वाले श्रीराम को अन्यायी कहा जाता है| ये बिल्कुल ठीक हैं कि वर्तमान भारतीय समाज में महिला की स्थिति ठीक नहीं हैं ,वो भी इसीलिए क्योंकि यहाँ पाखंडी बहुत हैं ,श्री राम,रामायण में आस्था रखते हैं , लेकिन अपनी ही बेटे -बेटी को कसम खिला देते हैं कि यदि अपनी मर्जी से विवाह किया,तो एक रिश्ते कि कीमत तुम्हें सभी रिश्तेदारों व नातेदारों के रिश्ते से चुकनी होगी !माँ-बाप तुम्हारे लिए मर जाएँगे ,कभी मुँह नहीं देखेंगे आदि आदि ! नतीजा -प्रेम किसी से ,शादी किसी से और जीवन नर्क ! यहाँ रामायण सिर्फ सिधान्त में है ,व्यवहार में नहीं ! लेकिन जिस पश्चिमी संस्कृति कि हिमायत आप कर रही हैं ,वहाँ क्या स्थिति है? एक ही महिला के ज़िंदगी में 5 विवाह और हर पति से बच्चे और सारे बच्चो का पालन पोषण कान्वेंट (यानि अनाथालय जहाँ शिक्षा दीक्षा,देख रेख होती है) में ? क्या इसमें आपको अच्छाई दिख रही है ? संपन्नता के बावजूद भी कान्वेंट कल्चर के कारण ही यूरोप में अपराध दर किसी भी विकासशील देश से ज्यादा है| सैद्धांतिक रूप से अपनी संस्कृति तो यही है कि विवाह के रिश्ते अपनी मर्जी से वरण हो और एक बार वरण हो जाये तो आजीवन निभाना है, जबकि यूरोप में अपनी मर्जी से वरण के बावजूद भी रिश्ते में केवल भोगवाद होता है ,एक से मजा खत्म तो दूसरा ढूँढ लो ! भारत स्वतन्त्रता में यकीन करता है और यूरोप स्वछंदता में !

अतः हमें किसी से सीखने कि जरूरत नहीं है ,बस केवल पाखंड से बाहर निकलकर सनातन संस्कृति के वास्तविक मूल्यों को वरण करना है, नारी सशक्तिकरण इसी में निहित है “

लेखक : अश्वनी कुमार वर्मा
लेखक नेशनल थर्मल पावर कारपोरेशन (NTPC) के विध्यांचल प्लांट में प्रबंधक के पद पर सेवा दे रहे हैं

हर्षवर्धन के ऐतिहासिक फैसले को रद्द करने पर पकड़ा गया जे पी नड्डा का सफ़ेद झूठ

केंद्रीय स्वास्थ्यं मंत्री जगत प्रकाश नड्डा ने अपने ही मंत्रालय की उस ऐतिहासिक अधिसूचना को रद्द  कर दिया है , जो पूर्व मंत्री डाक्टर हर्षवर्धन के कार्यकाल में जारी हुयी थी।  उस ऐतिहासिक अधिसूचना में तम्बाकू सिगरेट बना ने वाली कंपनियों को सख्त निर्देश दिए गए थे की।  बीड़ी सिगरेट तम्बाकू आदि के पैकेट पर 85 % भाग में  वैधनिक चेतावनी के साथ साथ कैंसर से होने वाले नुक्सान के फोटो भी अंकित रहेंगे।  गौरतलब है की भारत में हर साल लगभग दस लाख लोग इन उत्पादों से होने वाले कैंसर से मर जाते हैं।  हर्षवर्धन के कार्यकाल में आई इस अधिसूचना की देश और अंतरास्ट्रीय मंचों पर भी बहुत वाहवाही हुए थी। सूत्रों के मुताबिक़ मंत्रालय ने एक शुद्धि पत्र जारी किया है जिसमे यह कहा गया है की एक  अप्रैल से अब यह नियम लागू नहीं होगा हालाँकि किसी नयी तारीख का जिक्र भी नहीं किया गया है। नड्डा के दस्तखत के बाद इसे अब लागू करने के लिए गजट में छापने के लिए भेजा  गया है।  हालाँकि हस्तक्षार करने के बावजूद भी नड्डा  ने मीडिया के सामने इस बात से साफ़ इंकार कर दिया मंगलवार को अधिसूचना को टाले जाने की सम्भावना पर मीडिया द्वारा पूछे प्रशन में उन्होंने साफ़ इंकार कर दिया की मंत्रालय का ऐसा कोई विचार नहीं है।  उन्होंने कहा की इस बारे में कोई आपत्ति आने पर मंत्रालय इस पर विचार  करेगा हालाँकि उस से पहले ही वो हस्ताक्षर कर चुके थे।  जनहित से जुडी यह अधिसूचना  उन्हें वापिस क्यों लेनी पड़ी इस पर तरह तरह के कयास लगाये जा रहे हैं पहले  भी मीडिया में यह खबरे आती रहीं हैं की   ही तम्बाकू और दवा माफिया के दबाब से  सख्त फैसले लेने वाले  मंत्री डाक्टर हर्षवर्धन को इस मंत्रालय से हटाया गया था।  तो क्या नड्डा उस दबाब के आगे झुक गए हैं इस पर तरह तरह की चर्चा हो रही है। 

आसान नहीं थी कंगना रणौत के बॉलिवुड ‘क्वीन’ बनने की राह

इन हिमाचल डेस्क।।

कंगना रणौत भले ही फिल्मफेयर और नैशनल अवॉर्ड जीतने के बाद बॉलिवुड की क्वीन बन गई हों, लेकिन उनके लिए मायानगरी का सफर जरा-भी आसान नहीं रहा है। अपने ख्वाब को पूरा करने के लिए कंगना को बहुत कुछ करना पड़ा और बहुत दर्द भी सहने पड़े। आइए, डालते हैं कंगना के उस सफर पर नजर जो कभी फिल्मों के रुपहले पर्दे पर नजर नहीं आया…


दो नैशनल अवॉर्ड जीत चुकीं कंगना रणौत का जन्म 23 मार्च, 1987 को हिमाचल प्रदेश के मंडी जिला के भाम्बला गांव में हुआ, कंगना की मां आशा स्कूल टीचर और पिता अमरदीप व्यापारी हैं। कंगना बचपन से ही बोल्ड खयालातों की थीं। कंगना ने एक इंटरव्यू के दौरान बताया था कि उनके पापा जब उनके भाई के लिए प्लास्टिक गन और कंगना के लिए बॉल लाकर देते थे तो वह सवाल कर देती थीं कि यह फर्क क्यों किया जा रहा है।  कंगना के परिवार वाले चाहते थे कि वह साइंस की पढ़ाई करें, लेकिन कंगना बेहद इमोशनल और सेंसिटिव थीं।


बॉम्बे टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जब कंगना 15 साल की थीं, तब उनके पिता ने पहली बार उन्हें झापड़ मारा। इस पर रोने या बिलखने की बजाय कंगना ने कह दिया था कि अगर दोबारा उनके पापा ने थप्पड़ मारा तो वह भी उन्हें थप्पड़ मार देंगी।

बॉम्बे टाइम्स के मुताबिक, कंगना की उनके पापा से नहीं बनी। झापड़ वाली बात के बाद उनके पापा ने कंगना से घर छोड़ने को कह दिया और कंगना भी सामान पैक करके अपने 10 साल बड़े एक दोस्त जसप्रीत के घर चली गईं। इसके बाद कंगना ने मॉडलिंग शुरू की और अस्मिता थियेटर ग्रुप से भी जुड़ गईं। कंगना ने यह भी कहा था कि उन्होंने खाने और रहने के लिए वह सब कुछ किया जो वह कर सकती थीं।

बॉम्बे टाइम्स के मुताबिक, जब कंगना अकेले रहने लगीं तो उनके पापा उन्हें 50 हजार रुपये देने गए ताकि उनका खर्च चल सके लेकिन कंगना ने पैसे लेने से मना कर दिया। इसके बाद, बाप-बेटी का रिश्ता और भी तल्ख हो गया।

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कंगना रणौत को उनकी पहली फिल्म गैंगस्टर किस्मत से मिली। कंगना ने अनुपम खेर के एक शो कुछ भी हो सकता है में खुलासा किया कि फिल्म हजारों ख्वाहिशें ऐसी के बाद शाइनी आहूजा हिट हो गए थे और भट्ट कैंप उन्हें गैंगस्टर के लिए साइन कर चुका था। शाइनी के साथ कंगना उम्र में काफी छोटी लग रही थीं इसलिए चित्रांगदा को साइन कर लिया गया। लेकिन फिर भाग्य पलटा और चित्रांगदा ने उसी दौरान फिल्म इंडस्ट्री को अलविदा कहने का मन बना लिया। फिर क्या था, कंगना को मेकअप से बड़ा किया गया और उन्हें सुपरहिट शुरुआत मिल गई।

जब कंगना ने गैंगस्टर में इमरान हाशमी के साथ बोल्ड किसिंग सीन दिया, तो उनके परिवार को गहरा धक्का पहुंचा। उनके दादा ने तो उन्हें यहां तक मेसेज कर दिया कि वह अपना सरनेम ही बदल लें।

बॉम्बे टाइम्स को दिए एक इंटरव्यू में कंगना ने बताया था कि उन्हें अपनी बहन रंगोली से बहुत प्यार है, जो कि एसिड अटैक का शिकार हो गई थीं। रंगोली के इलाज के लिए कंगना ने सब कुछ दांव पर रख दिया। बेस्ट जगहों पर रंगोली का इलाज करवाया। क्योंकि इस दौरान कंगना के पास काम भी नहीं था तो उन्होंने सिर्फ पैसे के लिए जगह-जगह गेस्ट बनकर जाना शुरू कर दिया।



यह बात भी आपको हैरान कर देगी कि कंगना खुद भले ही फिल्मों की क्वीन बन चुकी हों लेकिन एक वेबसाइट को दिए इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि उन्होंने सिर्फ 10 फिल्में देखी हैं। फिल्मों की जगह कंगना को किताबों और म्यूजिक का साथ पसंद है।