परिवहन मंत्री के फैसले मातृशक्ति के लिए ऐतिहासिक पहल

  • सुरेश चंबियाल 
आजादी के जश्न का दिन सरकारों से लेकर आमजन के लिए ख़ास होता है इस दिन हम अपने देश की उन महान हस्तियों को तो याद करते ही हैं जिन्होंने जंगे  आजादी में बहुमूल्य योगदान दिया हो साथ ही साथ  यह सरकारों के लिए ख़ास दिन इसलिए भी होता है क्योंकि इस दिन हर सरकार जनहित में हर योजना को आरम्भ करती है।  हिमाचल प्रदेश में भी अलग अलग मंत्रियों ने  विब्भिन्न जिला हेडक्वार्टर पर  तिरंगा झंडा फहराने की रस्म अदा की साथ ही साथ अपने अपने मंत्रालयों की तरफ से जनहित  और प्रदेश की तरक्की से सबंधित कई घोषणाएं  की।

उद्द्योग मंत्री मुकेश अग्निहोत्री ने ऊना जिला के पंडोगा में 122 करोड़ के इंडस्ट्रियल कॉरिडोर की घोषणा की तो शिमला में वीरभद्र सिंह ने  कर्मचारियों एवं  पेंशनर्स होल्डर्स के लिए 6 % डी  ए की की घोषणा के साथ ट्राइबल इलाकों के लिए 8 नयी एम्बुलेंस देने के साथ लोकनिर्माण विभाग के 6 -7 दिहाड़ीदारों को पक्का किया।  बाकि मंत्री अपने विभाग की तरफ से कुछ ख़ास उपलब्धि आगे नहीं ला पाये।

इन सब से अलग परिवहन मंत्री मंडी में ऐसे गरजे की कार्यक्रम के बाद लोगों की जुबान पर बाली की ही  चर्चा थी।  मीडिआ ने भी उन्हें ख़ास तवज्जो दी।  बाली ने हिमाचल प्रदेश में ऐतिहासिक पहल करते हुए  इस बार का अपना सारा कार्यक्रम एवं योजनाये महिला शक्ति के नाम सपर्पित कर दी।

प्रदेश की आधी आबादी ,3,382,729 (2011 जनगणना)    महिलाओं को परिवहन मंत्री ने  आने वाले सोमवार यानि 17  अगस्त से  प्रदेश के अंदर सरकारी बसों के किराए में 25 %  छूट  की ऐतिहासिक घोषणा मंडी के सेरी मैदान से करते हुए आधी आबादी का दिल जीत लिया।  बाली यहीं नहीं रुके बल्कि उन्होंने मौजदा समय के सबसे ज्वलंत मुद्दे महिला सुरक्षा पर भी संज्ञान लेते हुए ,महिलाओं के ही एक ऐसे स्पेशल दस्ते की घोषणा कर दी जो महिलाओं से यात्रा के दौरान कोई बदतमीजी न कर सके इस बात का ख्याल रखेगा साथ ही साथ बस स्टॉप या खाना खाने के लिए जो भी  होटल आदि हैं वहां महिलाओं के लिए पर्याप्त स्वच्छ टॉयलेट फैसिलिटी  से सबंधित चेकिंग आदि भी देखेगा।

महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देते हुए परिवहन मंत्री की एक और पहल की  निगम महिलाओं को कौशल विकास भत्ते में सम्मिलित करते हुए  रोजाना दो घंटे की ड्राइविंग  ट्रेनिंग फ्री में देगा बहुत सराहनीय कदम है इस से निम्न माध्यम वर्ग और गरीब परिवारों की वो महिलाये फायदा उठा पाएंगी जो ड्राइविंग सीखने के अरमान तो पालती हैं परन्तु कमजोर आर्थिक स्थिति एवं ड्राइविंग स्कूल की हाई फीस उनके रास्ते रोके रखती है।
खैर सब से  परिवहन मंत्री की जिस घोषणा ने आकर्षित किया है वो है ड्राइवर कंडक्टर के लिए 2 लाख के बीमा  कवर की घोषणा  आये दिन हिमाचल  प्रदेश के दुर्गम इलाकों में  बसों की दुर्घटना चिंता का सबब है।  लोगों के साथ साथ ड्राइवर कंडक्टर भी जान  हथेली पर रखकर  दुर्गम इलाकों में सेवाएं दे रहे हैं उनके लिए यह एक सकारात्मक पहल है।
शिमला से जयपुर और धर्मशाला से श्रीनगर बस सेवा भी अपने आप में एक पहल है इस से पहले  शिमला से जयपुर  राजस्थान रोडवेज़ की एक आर्डिनरी बस सेवा है अगर हिमाचल परिवहन निगम इन रुट्स पर वोलोवो सर्विस  देता है तो निस्चय ही  पर्यटन के लिए यह फायदे का सौदा हो सकता है।  यह बसें इन दोनों राज्यों में हिमाचल प्रदेश की ब्रांड अम्बेस्डर हो सकती  हैं।
शिमला मंडी धमर्शाला  मनाली कुल्लू से चंडीगढ़ के लिए  10  सीटर सुपर लक्सेरी बसें भी अपने आप में एक पहला प्रयोग है। यह होना भी चाहिए था अक्सर देखा गया है की बड़ी बड़ी वोल्वो बसें आफ टूरिस्ट सीजन में खाली जाती हैं तेल की खपत ज्यादा और इनकम कम होती है ऐसे में टैक्सी या कैब की तरह छोटी बस फायदे का सौदा हो सकती है।  कुल मिलाकर स्वन्त्त्रता दिवस पर परिवहन मंत्रीं ने पुरे प्रदेश का ध्यान अपनी तरफ खींचा है और नए रिस्क के साथ लीक से हटकर फैसले लिए हैं जिनका प्रशंसा होना लाज़मी है।
(लेखक प्रदेश मुद्दों पर लिखते रहते हैं ) 

आखिर क्यों हम युवाओं के कंधों पर टिका है स्वच्छ भारत का सपना ?

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  • प्रज्ज्वल बस्टा।।

दुष्यंत  और शकुंतला के पुत्र भरत के नाम से जाने जाता हमारा देश भारत आज स्वतंत्रता के 67 साल बाद एक नई करवट ले रहा है। जब पिछले साल 15 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वछ भारत की कल्पना का दर्शन दिया तो वास्तव में पूरा देश एक नए प्रण के लिए उमड़ पड़ा।  सच में 2 अक्टूबर 2014  का दिन भारत के लिए महत्वपूर्ण था। महात्मा गांधी की जयंती, उनका स्वप्न और युवा पीढ़ी का उत्साह; सब कुछ अछा होता दिख रहा था, जब प्रधानमंत्री जी ने 9 स्वच्छता प्रहरी नियुक्त किए और वो भी युवा। मुझे वास्तव में विश्वास हो गया कि यह स्वछता अभियान अब जनांदोलन बन जाएगा, क्योंकि प्रधानमंत्री जी ने इसे सफल बनाने के लिए युवा पीढ़ी को चुना है।
  

आज का युवा आज का नागरिक है, जो नए भारत की तस्वीर है। जींस-टीशर्ट पहनकर या संजीदगी से इस्त्री किए हुए पहनावे में युवा वर्ग भारत की पहचान है। भारत ने जब-जब युवा पीढ़ी पर भरोसा किया, तब-तब इस देश ने वैभव को पाया है।  आखिर लाल बहादुर शास्त्री ने किस से एक समय भोजन की अपील की थी? आखिर लोक नायक जय प्रकाश  ने आपातकाल का विरोध  क्यों युवाओं के कंधे पर दिया था? आखिर कंप्यूटर के माउस पर थिरकते इन हाथों ने जब झाड़ू उठाया तो सोच समझकर ही उठाया है।
  
स्वच्छता से जहां देश की अवधारणा का सम्मान बढ़ेगा, वहीँ देशवासियों की सेहत का मान रखना भी हमारा ही कर्तव्य है। हम जानते है कि गंदगी और गरीबी का चोली दामन का साथ है।  स्वस्थ मन में स्वस्थ शरीर निवास करता है परन्तु स्वच्छ परिवेश में  स्वस्थ  शरीर ही नहीं, बल्कि स्वस्थ मन दोनों निवास  करते हैं। स्वछता से जहां पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा, वहीँ रोजगार के अवसर सृजित होंगे। जो सीधे सीधे युवा पीढ़ी को सम्बल देंगे , आखिर युवा जैसा खुद को देखना चाहता है वैसे ही अपने देश को भी देखना चाहता है, रोजगार और आर्थिक संबल से स्वयं को सशक्त कहीं पर्वत झुके भी हैं,  कहीं दरिया रुके भी हैं।

‘नहीं रुकती रवानी है, नहीं झुकती जवानी है’ – शायद इसी बात को देख कर यह अभियान युवा पीढ़ी ने अपने हाथों में लिया है।  हम गंदगी के कारण बढ़ते रोगों को अब देख नहीं सकते , हम कूड़े  के ढेर पर लिपटे अपने शहर को लज्जित होते कब तक देखेंगे , कब तक सांप सपेरों के देश की बात हम विदेशों से सुनते रहेंगे? 




अगर आज युवा पीढ़ी ने यह संकल्प हाथ में लेने से कोताही की तो घर घर गंदगी के ढेर लगे होंगे, हर शहर, हर क़स्बा कूड़े के ढेर में खोता हुआ दिखेगा। हमारे महानगर अपने अस्तित्व को धिक्कारते हुए नज़र आएंगे और तब,  हम अपने ही  साये से घबराने लगेंगे।  इसलिए समय रहते मित्रो हमे आगे आना ही होगा, इस अभियान को देश शहर परिवार और अपने लिए सफल बनाना ही होगा। आओ इस अभियान को जान आंदोलन बना सफल करें।
स्वच्छता वास्तव में व्यवहार है, जैसे नियमों का पालन व्यवहार है, सड़क पर बाएं चलना व्यवहार है, रोज घर में सफाई व्यवहार है। व्यवहार परिवर्तन एक दिन में नहीं हो सकता, जिनका बंद शौचालय में दम घुटता हो वो एक दिन में खुले में शौच की प्रथा छोड़ देंगे, यह सम्भव नहीं। परन्तु असंभव भी नहीं क्योंकि युवा असम्भव को सम्भव करना जनता है। समझता है उन तौर तरीकों को कि कैसे समाज में परिवर्तन लाया जा सकता है।
  
युवाओं को जब भी मौका मिला है, उन्होंने पूरे विश्व मैं अपनी क्षमता से अधिक परिणाम दिए हैं। अभी हाल ही में हॉन्ग-कॉन्ग का आंदोलन युवाओं ने ही तो लड़ा। स्वच्छता की बात करें तो बांग्लादेश में भारत की तरह ही खुले मैं शौच का चलन था, उसे ख़त्म करने के लिए युवा ही तो आगे आए थे। युवा प्रकृतिक तौर पर नेता होते हैं, सबको साथ लेकर चलना  युवाओं का महत्वपूर्ण गुण है।

हम अपने घरों में झांक कर देखेंगे तो पाएंगे कि युवा ही स्वच्छता की बागडोर संभाल रहा है। गांवों में बावड़ी और चश्मे गंदे हैं, सूखे है तो वे अपने युवा साथियों को निहार रहे हैं। आखिर यह सड़कें यह शहर यह कार्यालय भी तो युवा वर्ग से आस लगाए बैठें हैं कि कब नौजवान उठेगा और क्रांति आएगी। इंतजार है कि यह भारत फिर से आजाद हो जाएगा और यह आजादी गंदगी से होगी। यह आज़ादी  बीमारियों से होगी, यह आज़ादी खुले में शौच करने की आदत से होगी, यह आज़ादी व्यववहार से होगी। युवाओ के बारे में एक बात कहकर मैं अपनी बात समाप्त करना चाहूंगी-

‘हम वो पत्ते नहीं जो आंधियों के डर से शाख से गिर जाएं 
आंधियों को कहना कि अपनी औकात में रहे।’  


(लेखिका सामाजिक मुद्दों पर आवाज बुलंद करती रहीं हैं एवं हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी से लॉ कर रहीं हैं। उनसे  prajwalbusta@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

…तो जयराम ठाकुर और रविंदर रवि में से एक बन सकता है सीएम कैंडिडेट

  •  सुरेश चंबियाल
हिमाचल  बीजेपी  में घटनाक्रम  तेज़ी से करवटें ले रहा है।  2017 पास आते-आते हर योद्धा फील्डिंग सेट करने में जुटा है।  जेपी नड्डा के बढ़े हुए कद ने हिमाचल में नेतृत्व के विकल्पों को असमंजस में  डाल दिया है।  भाजपा की अंदरूनी कशमकश घेरे तो तोड़ना चाहती है लेकिन अनुशासन के बंधन आह भी बाहर नहीं आने दे रहे हैं।  शांता कुमार के लेटर बम को भुनाने के लिए धूमल गुट  ने कांगड़ा से एकमात्र जीत कर आए अपने योद्धा रविंदर सिंह रवि को किसी खास मकसद के साथ ही आगे किया होगा, लेकिन अनुशासन के डंडे ने सारा प्लान चौपट कर दिया। रविंदर रवि ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके शांता कुमार के ऊपर ताबड़तोड़ जो हमले किए, उसके कयास कई राजनीतिक पंडित लगा रहे हैं।
हाल ही के चुनावों और आने वाले बिहार चुनाव को देखें तो भाजपा बिना नेता दिखाए ही जनता से वोट मांग रही है।  चर्चा यह भी छिढ़ी है कि  केंद्र में 75 वर्ष की रिटायरमेंट लॉजिक को भाजपा ने राज्यों में 70 साल कर दिया है।  पार्टी चाहती है राज्यों की बागडोर युवा हाथों में सौंपी जाए ताकि  भविष्ये में किसी राज्य में नेतृत्व विहीनता का विकल्प न रहे जिससे भाजपा अक्सर ग्रसित रही है।  हिमाचल  में दो धड़ों में बंटती  आ रहे भाजपा  असंसजस की इस स्थिति में पड़ी है की आखिर 2017 में किसका कितना वजूद होगा।
रविंदर रवि (बाएं) और जयराम ठाकुर की चमक सकती है किस्मत
शांता खेमे की राजनीति सिर्फ धूमल विरोध पर आधारित है। ये लोग नहीं चाहते की धूमल फिर से नेतृत्व करें।  वहीं विपक्ष का नेता होने के बावजूद समीकरणों और पार्टी एजेंडों को देखते हुए खुद धूमल गुट भी असमंजस में है की क्या 2017 में 74  वर्ष के धूमल जी को पार्टी अपना नेता बनाएंगे, वह भी तब जब वीरभद्र धूमल परिवारों की आपसी लड़ाई से जनता त्रस्त है  साथ ही साथ पार्टी का युवा मुख्यमंत्री देने का एजेंडा भी महाराष्ट्र से लेकर हरियाणा झारखण्ड में क्रियान्वित  हो गया है।   धर्मशाला में अमित शाह भी पूछ चुके हैं की हम बाकी प्रदेशों में रिपीट हुए हिमाचल में क्यों नहीं और साथ ही साथ यह हींट भी दे गए की हम बिना नेता के जब जब लड़ें है परिणाम सुखद रहा है।
अमित शाह के इन कथनों से  धूमल गुट में  बेचैनी बढ़ी है।  हालांकि आधी से ज्यादा बीजेपी  इस सोच में चल रही है कि जेपी नड्डा अब प्रदेश का रुख करेंगे। मोदी और शाह के ख़ास नड्डा  अब  हिमाचल बीजेपी के केंद्र बिंदु हो गए हैं।  पार्टी काडर का मानना है टिकट आबंटन में सब से अहम रोल नड्डा का ही रहेगा  ताकि  शांता-धूमल गुट की लड़ाई में पार्टी को नुकसान न हो।
फिर भी कुछ लोगों का  मानना है की  जिस स्थिति में नड्डा अभी केंद्र  में है  और संग़ठन के महत्वपूर्ण धुरी नड्डा को क्या पार्टी आलाकमान एक छोटे  से प्रदेश हिमाचल में भजेगा जहां  से सिर्फ चार सांसद चुन कर आते हैं? या नड्डा चाहेंगे कि दिल्ली दरबार की शानोशौकत छोड़कर प्रदेश का रुख करें, जहां हर पांच साल बाद सत्ता परिवर्तन का इतिहास रहा है।  खैर यह सब अब नड्डा की सोच पर निर्भर करता है कि वो  क्या  चाहते हैं।  जहाँ तक नड्डा की बात है, नड्डा के पास हिमाचल का मुख्यमंत्री बनने  के लिए 10 साल का समय है। 55 साल के नड्डा 10 साल बाद भी 70  वाले फॉर्मूले में नहीं आ  रहे हैं। खैर अगर ऐसा हुआ तो क्या नड्डा अपने खास सिफालसार जयराम ठाकुर को कमान दे देंगे, जिन्हे शांता खेमे का भी बराबर का आशीर्वाद है। वह उसी राजपूत बिरादरी से आते हैं, जिसका हिमाचल की राजनीति में वर्चस्व है।
धुमल गुट भी हर समीकरण पर नजर रखे हुए है।  धूमल को डर है कहीं 74 के तकाजे में पार्टी गवर्नर का  पद  ना ऑफर कर दे या  आडवाणी जोशी की तरह मार्गदर्शक मंडल में ना डाल  दे।  इसलिए धूमल गुट ने भी अपना एक आदमी  रेस में आगे करने की पूरी तैयारी की है। धर्मशला के मैदान से शांता के ऊपर रविंदर रवि की दहाड़ इसी सोच  का नतीजा थी।  राजीव बिंदल के समय के साथ नड्डा के साथ पींगे बढ़ाने के कारण अब सिर्फ रविंदर रवि के ऊपर धूमल खेमे का विश्वास टिका हुआ है।
आम तौर पर शांत रहने वाले रविंदर सिंह रवि खुलकर मैदान में आ गए हैं।  चाहे कांगड़ा में शांता कुमार की किलेबंदी को चुनौती देने की कोशिश हो या धूमल समर्थन में वीरभद्र सिंह को घेरने की कवायद; रविंदर रवि अग्रिम पंक्ति में मोर्चा संभाले हुए हैं।  लगातार पांचवी बार जीत का परचम लहरा चुके रवि  धूमल के किन्ही कारणों से मुख्यमंत्री नहीं बन पाने के कारण पहली पसंद हो सकते हैं,  ऐसा राजनीतिक पंडितों का मानना है।
बाकी समय ही बताएगा क्या होगा परन्तु कुल मिलाकर धूमल गुट  विशेष परिस्थिति में कांगड़ा जिला से  रवि का नाम मुख्यमंत्री के लिए आगे कर के एक तीर से दो शिकार जरूर करना चाहेगा। पहला- हम  नहीं तो हमारा आदमी, दूसरा- शांता समर्थकों के उस दावे की हवा निकालना कि कांगड़ा की अनदेखी हो रही है। रविंदर रवि को शयद तैयार रहने का इशारा भी किया जा चुका है। कुल मिलाकर समीकरण ऐसे भी जा सकते हैं कि विशेष परिस्थितियों में जय राम ठाकुर या रविंदर रवि के हाथ में भी बटेर लग सकता है।

ऐसे होगा आपदा प्रबंधन? राजेंद्र राणा ने पीठ पर सवार होकर किया मुआयना

मंडी।।
राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के उपाध्यक्ष  राजेंद्र राणा मंडी के धर्मपुर में बरसात से हुई तबाही जायजा लेने के लिए पहुंचे, वह भी तीन दिन बाद। यानी तब तक आपदा बीत चुकी थी। मगर यहां जनाब को अपने जूते भीग जाने का इतना डर था कि एक युवक की पीठ पर सवार होकर मुआयना करते दिखे।
सोशल मीडिया पर वाइरल हुई तस्वीरों में दिख रहा है कि बाकी सब लोग तो टखनों तक के पानी पर चल रहे हैं, मगर राजेंद्र राणा को युवक ने पीठ पर उठाया हुआ है। न तो वह जख्मी थे और न ही इतने बुजुर्ग कि इन हालात में उन्हें किसी की इस तरह की मदद लेनी पड़ती। साफ है कि वह ठाठ से मुआयना करना चाहते थे।
गौरतलब है कि राजेंद्र राणा एक वक्त पूर्व सीएम प्रेम कुमार धूमल के मीडिया सलाहकार थे, मगर शिमला में होटल बुडविला के  कॉल गर्ल्स प्रकरण में उनका नाम आ जाने के कारण  आरोपों के चलते उन्हें पद से इस्तीफा देना पड़ा था। हालाँकि उसमे बाद में कुछ भी निकल कर नहीं आया था।  बाद में वह बागी हो गए। विधायक पद से इस्तीफा दिया और हमीरपुर से कांग्रेस के टिकट से अनुराग के खिलाफ चुनाव लड़ा।
इन चुनाव में बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा तो मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने उन्हें आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का उपाध्यक्ष बना दिया। यूं तो इस तरह से तुष्ट करने के लिए राजनीतिक नियुक्तियां करना नई बात नहीं है, मगर राजेंद्र राणा की पहले से ही आलोचना होती रही है। सोशल मीडिया पर लोग, खासकर युवा, राणा और सरकार की खासी आलोचना कर रहे हैं।

गौरतलब है यह प्राधिकरण निकम्मेपन की वजह से मीडिया के निशाने पर भी है। कई अखबारों की रिपोर्ट्स की मुताबिक अभी तक बादल फटने, फसलों को नुकसान पहुंचने या अन्य किसी आपदा के प्रबंधन की बात तो दर, अभी तक कहीं पर भी नुकसान का आकलन करने में इसे कामयाबी नहीं मिली है। आरोप है कि जनता के खून-पसीने की कमाई को सरकार ऐसे पदों पर अपने लोगों को बिठाकर लुटा रही है।

अनुराग पर कहे अपने शब्द वापस लेता हूं: वीरभद्र

शिमला।।
 
मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने ऊना जिले के धुसाड़ा में दिए भाषण को तोड़-मरोड़ कर पेश करने पर निराशा व्यक्त करते हुए कहा कि उनके भाषण के कुछ अंशों को इसकी मूल भावना से अलग कर बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है। उन्होंने कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल और सांसद अनुराग ठाकु र के सम्मान को ठेस पहुंचाने की उनकी कोई मंशा नहीं थी। दैनिक पत्र अमर उजाला में छपी खबर के अनुसार राजभवन में राज्यपाल के स्वागत में कार्यक्रम के दौरान वीरभद्र ने मीडिया से यह शब्द कहे। 

वीरभद्र ने कहा कि वह हर व्यक्ति विशेष की प्रतिष्ठा का पूर्ण सम्मान करते हैं। यदि उनके शब्दों से किसी की भावनाओं को ठेस पहुंची हो तो उन्हें अपने शब्द वापस लेने में कोई गुरेज नहीं है। मुख्यमंत्री ने मंगलवार को कहा कि राजनीतिक कारणों के चलते कुछ केंद्रीय परियोजनाओं के कार्यान्वयन में हो रहे विलंब पर चिंता के चलते उन्होंने कुछ कड़ी टिप्पणियां की थीं। उन्होंने अनुराग ठाकुर को सकारात्मक सोच अपनाने और लोगों के व्यापक हित के मद्देनजर अपने निर्वाचन क्षेत्र एवं प्रदेश के विकास के लिए कार्य करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि वह विपक्ष के नेताओं का पूरा सम्मान करते हैं। वीरभद्र सिंह ने कहा कि उनके ऊना दौरे के दौरान स्थानीय लोगों ने उन्हें जानकारी दी कि क्षेत्र के लिए विभिन्न केंद्रीय परियोजनाओं में जानबूझकर देरी की जा रही है। 500 करोड़ रुपये के इंडियन ऑयल डिपो का शिलान्यास रखने में काफ ी विलंब के कारण इसका कार्य अभी तक शुरू नहीं हो सका है जबकि प्रदेश सरकार ने इस परियोजना से संबंधित भूमि हस्तांतरण इत्यादि सभी औपचारिकताएं काफी पहले पूरी कर ली थीं।

13 साल का यह हिमाचली बच्चा है सेबों का गजब आढ़ती

शिमला।।

13 साल का नैतिक सुंटा गजब का आढ़ती है। वह बडे़-बडे़ आढ़तियों के बीच बोलियां लगाकर सेब की खरीद करता है। दैनिक पेपर पंजाब केसरी में छपी खबर के अनुसार  नैतिक पढ़ाई में तो अव्वल है ही, वह शिमला के भट्टाकुफर स्थित फल मंडी में भी कमाल दिखा रहा है। बताया जा रहा है कि पहले नैतिक को सेब खरीदने का महज शौक था, अब उसका ये शौक नशा बन चुका है। नैतिक को आई.ए.एस. अधिकारी बनना है। वहीं नैतिक ने बताया कि उसका स्कूल पौने 2 बजे लगता है। इससे पहले वह 10 से 12 बजे के बीच रोजाना भट्टाकुफर मंडी जाता है। वहां आढ़तियों के बीच बोलियां लगाता है। इतना ही नहीं छुट्टी वाले दिन तो वह मंडी में ही रहता है।
 
रविवार और सोमवार को नैतिक ने गुजरात के जामनगर की आढ़ती फर्म एलएएच के लिए सेब खरीदा। उसने कहा कि पिता संजीव सुंटा की गैरमौजूदगी में वह अकेले ही सेब बेचता है। पिता जी का सहयोग करने के लिए वह ऐसा करता है। नैतिक के पिता संजीव सुंटा ने बताया कि वह बचपन से ही सेब की खरीद कर रहा है। नैतिक के आईक्यू को देखते हुए ही उसे आढ़ती का ऑफर मिला था। उसका आईक्यू इतना तेज है कि वह पेटी खोलते ही सेब का रेट तय कर लेता है। इस कारण उसे बड़ी मंडियों के कामकाज की भी समझ है। 
 
गौरतलब है कि राज्य सरकार ने उसकी प्रतिभा को देखते हुए समय से पहले 5वीं कक्षा की परीक्षा देने की विशेष अनुमति दी थी। इसके बाद से नैतिक बिना रुके आगे बढ़ता रहा। वह अब शिमला की राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला संजौली में 11वीं में पढ़ रहा है जबकि उसकी उम्र के बच्चे अभी 8वीं या 9वीं कक्षा से आगे नहीं निकल पाए हैं। 
 
 
 
नैतिक सुंटा मूल रूप से रोहडू़ में नावर टिक्कर के पास खलावन गांव के निवासी हैं। उनके इलाके में भी सेब के बगीचों के लिए अतिक्रमण हुआ है

तकनीकी एवं उच्च शिक्षा के मामले में सुस्त और अदूरदर्शी रही है हिमाचल की पॉलिसी

मनीष कौशल।। शिक्षित राज्यों की लिस्ट पर अगर नजर दौड़ाई जाए तो हिमाचल प्रदेश का नाम प्रमुख  राज्यों की श्रेणी में आता है।  परन्तु शिक्षा का मतलब सिर्फ डिग्री लेना मात्र नहीं है बल्कि सही गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के साथ कम्पीटीशन के इस युग में अपने आप को दौड़ में रखना भी महत्वपूर्ण है।  जिसमे हिमाचल प्रदेश फिसड्डी पाया गया है और सबसे खराब बात यह है की बीते दशकों में नए से नए  संस्थान खोलने के अलावा प्रदेश सरकारें इस दिशा में ना कुछ सोच पायीं हैं ना कुछ कर पायीं हैं।

हिमाचल प्रदेश के पास शिक्षा के लिए ना कोई नीति है ना ही भविष्ये के लिए रोडमैप इसलिए बी टेक  जैसी जैसी बड़ी बड़ी डिग्रिया लेकर भी यहाँ बेरोजगारों की फौज घर बैठने पर मजबूर है।   हर अभिवावक  चाहते है  कि उनका बच्चा  अचछी शिक्षI ग्रहण  करे।    इसके लिए अभिवावक अपनी उम्र भर की पूंजी बच्चों की शिक्षा पर लगाने के लिए तैयार भी हैं परन्तु   शिक्षा   खास कर तकनिकी  शिक्षा के नाम पर प्रदेश में या तो निजी संगठन हैं जिनका मुख्य मक्सद पैसे  कमाना है या फ़िर ऐसी सरकारी  संस्थाये हैं जिनके पास तकनीकी  शिक्षा के लिये जरूरी बुनियादी सुविधाये   भी न के बराबर  हैं।

हम इसी से अंदाजा लगा  सकते हैं कि प्रदेश मे लग्भग 24000 इंजीनियरिंग की सीटें हैं  और इस बार के आंकड़ों के अनुसार आधी सीटें भी नहीं भर पायी हैं।  आखिर यह हुआ क्यों इसके लिए थोड़ा इतिहास पर नजर दौड़ाना  आवश्यक है।

1990 के दशक के प्रारम्भिक  वर्षों में भारतीय अर्थववस्था ने जब उदारीकरण की राह पकड़ी तो उसका असर दशक के उत्तरार्ध में दिखा।  आई टी सेक्टर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर एवं कम्युनिकेशन क्रांति के साथ देश में इंजीनियर्स की जरुरत पैदा हुयी।  सरकारी संस्थान जैसे आई आई टी  एवं राज्यों के इंजीनियरिंग कालेज इतनी मैनपॉवर  नहीं दे पा रहे थे इसलिए कुछ राज्यों ने जैसे कर्नाटक महाराष्ट्र आदि ने निजी संस्थानों के लिए इस क्षेत्र में रास्ते खोले।  `धीरे धीरे इंजीनियरिंग कालेजों में निजी क्षेत्र की भागीदारी पंजाब तक भी पहुंची।  उस दौर में  मैनपॉवर की इतनी मांग मार्किट से थी की  नए नए खुले संस्थान भी  इंजीनियरिंग में दाखिला  देने के लिए पहले भारी भरमक डोनेशन की मांग करते थे।  और दोयम दर्जे के कालेजों से पास आउट हुए छात्र भी ठीक ठाक पैकेज पर कार्य करते थे।  यह सब मार्किट और इनपुट में समन्वय के कारण था।

1990  के अंतिम  दौर में हिमाचल प्रदेश में  इंजीनियरिंग  करने के लिए  कालेज  के नाम पर सिर्फ  1987  में खोला  गया  संस्थान रीजनल इंजीनियरिंग कालेज हमीरपुर था। 2001 में हिमाचल प्रदेश की आबादी  60 लाख के करीब पहुँच गयी थी  मार्किट में  मांग जोरों पर थी परन्तु प्रदेश  के बच्चों का भविष्ये एक ही इंजीनियरिंग कालेज के सहारे चल रहा था बाद में वो भी केंद्रीय संस्थान  नेशनल इंस्टिट्यूट आफ टेक्नोलॉजी बन गया।

उस समय मार्किट की स्थिति की भांपते हुए पंजाब ने अपने यहाँ निजी इंजीनियरिंग कालेजों  के लिए रास्ते खोल दिए परन्तु हिमाचल प्रदेश की सरकार सोयी रहीं , हिमाचल के बच्चों को जो शिक्षा घर द्वार भी मिल सकती थी उसके लिए पंजाब का रुख करना पड़ा।  सारे पंजाब हरियाणा के कालेज हिमाचली बच्चों से भरे रहे परन्तु प्रदेश  में उन्हें सिर्फ 2 या तीन प्राइवेट  कालेज  मिले ।

2005-06 में जब रिसेशन का दौर आया अंतरास्ट्रीय स्तर पर मार्किट बिगड़ी  इंजीनियर बेरोजगार होने लगे।  तब हिमाचल सरकारें  उस क्षेत्र में सोचने लगी जो डूब रहा था और बाकी प्रदेश जो सोच 10  साल पहले ही  सोच चुके थे  आर कार्य करके फल ले चुके थे।  फिर भी देर सवेर  प्रदेश में  पहला सरकारी इंजीनियरिंग संस्थान जवाहर लाल नेहरू इंजीनियरिंग कालेज खुला।  जो कई वर्षों तक सिर्फ दो कोर्स एवं आधे अधूरे इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ चलता रहा या यूँ कहें अभी भी चल रहा है ।

इसके बाद तो मानों हिमाचल की सरकारों में क्रांति ही आ गयी हो पहले अदूरदर्शी बनकर सोयी रही सरकारें  आँख बंद करके रेवड़ियों की तरह इंजीनियरिंग संस्थान  बांटने लगीं।   ऐसे ऐसे लोग इंजीनियरिंग कालेज खोल कर बैठ गए जिन्हे सिर्फ सड़के और पुलिया  बंनाने में महरात थी कुछ को तो स्कूल तक चलाने का अनुभव नहीं था।  एक क्षेत्र विशेष में 5 -5  किलोमीटर के दायरे में डीम्ड यूनिवर्सिटी की बाढ़ आ गयी।  इंजीनियरिंग कालेज खोलना और घोषणा करना राजनीति का मुद्दा हो गया।

अभी सरकारी क्षेत्र का पहला  कालेज  (सुंदरनगर) बजट फैकल्टी और इंफ्रास्ट्रक्चर को तरस रहा था और अगली सरकार ने  शिमला के प्रगतिनगर में एक और इंजीनियरिंग  कालेज की घोषणा कर दी।

एक बार एक बच्चे  मुझे बताया की भाई प्रगतिनगर  कालेज की कक्षाएं जिस बिल्डिंग में लगती हैं उसमे एक ही छत है बाकी 8 -8  फ़ीट दीवारे देकर कमरों को डिवाइड किया गया है , हाल यह है की अगर एक तरफ टीचर बोलता है तो तीन  कमरों में सुनायी देता है।  आधी अधूरी कॉन्ट्रैक्ट फैवल्टी पर चलते हुए यह संस्थान जब सही का इंफ्रास्ट्रक्चर  नहीं दे पाये तो आगे की गुणवत्ता और बच्चों को मार्किट से माहोल से लड़ने की शिक्षा क्या दे पाते।  प्राइवेट संस्थान शोशण करते रहे लोग लुटे जाते रहे पर आखिर सरकार किस आधार और पैमाने पर उन्हें रोकती जब उसके खुद के सस्थान स्टैण्डर्ड मीट नहीं कर पा रहे थे।  हिमाचल के इंजीनियरिंग संस्थान नौकरी प्लेसमेंट देना तो दूर की बात इंफ्रास्टक्चरे में भी बाहरी राज्यों का मुक़ाबला नहीं कर पाये।

स्थिति यहीं नहीं थमी  उसके बाद कई प्राइवेट संस्थानों को परमिशन देने के  साथ सरकार ने नगरोटा और जेयूरी में भी भी इंजीनियरिंग कालेज खोल दिया। हिमाचल प्रदेश टेक्निकल  यूनिवर्सिटी  का गठन किया गया   जिसका अभी खुद का अपना भवन नहीं है।  कुल मिलाकर हिमाचल में अभी 4 सरकारी एवं दर्जनों प्राइवेट इंजीनियरिंग कालेज हैं जिनके पास 24000  सीटें हैं।  और आधी भी हर साल  नहीं भर पा रहीं हैं.  इनमे से अभी  तीन  सरकारी संस्थानों  की  मूल बिल्डिंग भी नहीं है।

यह सब हिमाचल में तब हो रहा है  जब देश में इंजीनियरिंग की मांग उतार पर थी फिर भी यह प्रशन सरकार के मन में नही आया की   इतने  इंजीनियर्स  बना के क्या करेगी अगर उनके पास प्रदेश में इंजीनियर्स को  नौकरी देने की ना खुद केपेसिटी है ना ही   मार्किट में अब मांग है।    इंजीनियरिंग की सीटें कालेज  बढ़ाने  से अच्छा होता सरकार  क्वालिटी एडुकेशन की तरफ ध्यान देती।    कुछ नियम कानून बनती उन्हें सही से लागू करती ताकि गुणवत्ता की शिक्षा सुनिश्चित होती  तब  प्रदेश के इंजीनियर्स चार  साल का कोर्स करके पैसा खर्च करके घरो में ना बैठे होते।

प्रदेश की जनसँख्या को देखते हुए अगर यहाँ  सरकारी प्राइवेट मिलाकर 10 इंजीनियरिंग संस्थान भी  होते और क्वालिटी एजुकेशन देते तो बहुत थे।   परन्तु हैरानी की बात है पिछले दो दशकों में आई प्रदेश सरकारों का क्या विज़न था ये कोई नहीं जानता।  आजकल इंजीनियरिंग की ये दशा है कि कोई भी अभिवावक  अपने बच्चो को इंजीनियरिंग नहीं  करवाना चाहता।   क्योंकि कॉलेज इंजीनियर्स नहीं बना रहे बस डिग्री दे रहे हैं।   स्टूडेंट्स में क्वालिटी नाम की चीज  ही नहीं तो जॉब कहाँ से मिलेगी।

हिमाचल सरकारों के विज़न का पता यहीं से चल जाता है की  निजी  संस्थानों की जो हालत है सो है।   पर 10 साल पहले खुले सरकारी इंजीनियरिंग कालेज में अभी स्टाफ पूरा नहीं कई कोर्स नहीं चलते  और तो और हॉस्टल की सुविधा नहीं परन्तु तीन तीन कालेज और खोल दिए गए हैं

क्या ऐसा नहीं किया जा सकता था की जेयूरी , नगरोटा प्रगतिनगर में  सस्थान खोलकर  थोड़ा थोड़ा पैसा वहां देने से  अच्छा होता अगर  सुंदरनगर इंजीनियरिंग  कालेज का ही वो बजट देकर  सेंटर फॉर एक्सीलेंस टाइप बनाया जात्ता  यहाँ कोर्स बढाए  जाते।    राष्ट्रीय संस्थानों के लेवल पर हिमाचल का एक   इंजीनियरिंग कालेज  तो  पहुँच पाता।  तकनिकी संस्थान कोई अस्पताल   तो हैं नहीं जो जगह जगह खोल दो   जनता की सुविधा के लिए. .  अरे भाई जब टेस्ट पास करके ही आना है तो सस्ंथान कहीं भी  क्या फर्क पड़ता है। इसमें आखिर क्या वोट बैंक है और अगर जनता भी अपने अपने इलाके में संस्थान खुल जाने से खुश है चाहे वहां पढ़कर बच्चों  भविष्ये लटक जाए तो जनता को भी आत्ममंथन  करना होगा।

यह सब  सिर्फ तकनिकी शिक्षा के हाल नहीं है हिमाचल प्रदेश सरकारों की यही अदूरदर्शिता  साइंस और बीएड एवं साइंस  के क्षेत्र में भी  रही।  जब प्रदेश से स्टूडेंट भारी संख्या में बी एड करते थे तब यहाँ दो ही बी एड कालेज हुआ करते थे।  हमारे लोगों को बीड करने जम्मू से श्रीनगर आगरा ग्वालियर जाना पड़ता था।  छोटे छोटे बच्चों को छोरड़कर माएं  बीएड  करने  प्रदेश से बाहर  जाती थीं।

किसी सरकार को यहाँ बीएड के लिए निजीकरण करने की सुध नहीं आई , बीएड की डिग्री  के लिए ऐसा क्या  आधारभूत ढांचा जरुरी था जिसके लिए हमें बाहर जाना पड़ता था।  और जब लोगों ने बी एड से मुंह मोड़ लिया तो तहसील लेवल पर निजी क्षेत्र को आगे लाकर सरकार  ने  घर द्वार बीएड कालेज खोल दिए।  तब करने वाले कोई नहीं थे यही काम हमारी सरकारों ने एमएससी आदि कोर्सेज के साथ किया। कुल मिलाकर स्कूली शिक्षा के आधार पर शिक्षा क्षेत्र में आयाम छूने का दावा करने वाले इस प्रदेश की सरकारें  हमेशा दूरदर्शिता  के मामले में फिसड्डी रहीं और अपने यहाँ  गुणवत्तापूर्ण  उच्च शिक्षा को  उचित समय पर पर कभी  बढ़ावा नहीं दे पायीं।

बहुत दूर से चलकर आते हैं पहाड़ों पर तबाही मचाने वाले बादल

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  • विवेक अविनाशी (vivekavinashi15@gmail.com)

हिमालयी क्षेत्रों में बरसने वाले बादल बंगाल की खाड़ी और अरबसागर से चलकर लगभग ढाई से तीन हजार किलोमीटर का आसमानी सफर तय करके यहां तक पहुंचते हैं और मूसलाधार बारिश से तबाही मचा देते हैं। वास्तव में जल कणों से भरपूर इन बादलो की राह में कोई व्यवधान  आता है, तभी ये टकराकर बरस पड़ते हैं। 
बरसात का शायद ही कोई ऐसा मौसम होगा जब हिमाचल में  बादल फटने और मूसलाधार बारिश से भू-स्खलन के कारण जानमाल  के नुकसान की  खबरें सुर्खियां न बनी हों। हाल ही में हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले में बादल फटने के बाद सोन खड्ड में बाद आ जाने से धर्मपुर में पांच लोगों को जान गंवानी पड़ी और करोड़ों की संपत्ति को नुकसान हुआ।  ऐसा हिमाचल में पहली बार नहीं हुआ है। 1970 में पहली बार बादल फटने की घटना का नोटिस लिया गया, जहां एक मिनट में 38.10 मिलीमीटर बारिश रिकॉर्ड की गई थी। शिमला जिले के चिड़गांव में 15 अगस्त ,1997 को 1500 लोग बादल फटने की घटना से हताहत हुए थे। किनौर, कुल्लू और मनाली से भी बादल फटने के समाचार यदा कदा आते रहते हैं।
मंडी शहर के अस्पताल रोड पर साल 1984 में भारी बारिश से करोड़ों का नुक्सान हुआ था। धर्मपुर क्षेत्र में भी वर्ष 2004 में बादल फटने के बाद बारिश का पानी 10 दुकानों में घुस गया था, जिससे दुकानों को भारी नुकसान हुआ था। तबाही वाले बादलों की जानकारी रखने वाले विशेषज्ञ ऐसे मूसलाधार बारिश करने वाले बादलों को ‘क्यूमोलोनिंबस’ बादल के नाम से पहचानते हैं। ये बादल गोभी की शक्ल के लगते हैं और ऐसा लगता है जैसे गोभी का फूल आकाश में तैर रहा हो।

गोभी जैसा बादल

क्यूमोलोनिंबस बादलों में एकाएक जब नमी पहुंचनी बंद हो जाती है या बहुत ठंडी हवा का झोंका इनमें प्रवेश कर जाता है तो ये सफ़ेद बादल एकदम काले हो जाते हैं। इसके बाद तेज गरज से वे उसी जगह अचानक बरस पड़ते हैं।

बादल फटने की यह घटना अमूमन पृथ्वी से 15 किलोमीटर की ऊंचाई पर होती है। इसके कारण होने  वाली बारिश लगभग 100 मिली मीटर की दर से होती है। वास्तव में पारिस्थितिक असंतुलन भी बादल फटने की घटनाओं  का एक कारण है। ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण धरती के तापमान में वृद्धि से भी मूसलाधार बारिश की सम्भावनाएं बढती हैं। एक अनुमान के अनुसार यदि धरती का तापमान एक डिग्री सेल्सियस बढ़ेगा तो वातावरण में जलकणों की मात्र 7 प्रतिशत बढ़ेगी। इसका अर्थ हुआ कि एक डिग्री तापमान बढ़ने से बारिश 4-6 फीसदी ज्यादा होगी।

हमारे देश में अभी ऐसे बादलों के बारे में भविष्यवाणी करना  सम्भव नहीं। जिला मंडी की जिला  आपदा प्रबंधन योजना-2012 में जारी सूचना के अनुसार प्रदेश का मंडी जिला प्राकृतिक आपदाओं की श्रेणी में उच्च अंकित किया गया है, इसलिए  इन आपदाओं से सबक लेकर प्रदेश सरकार ग्राम स्तर की आपदा  प्रबंधन समितियों को पूरी तरह सक्रिय कर सकती है, ताकि इस तरह की दुर्घटनाओं के समय जान-माल का नुकसान कम से कम हो।
(लेखक हिमाचल प्रदेश के हितों के पैरोकार हैं और जनहित के मुद्दों पर लंबे समय से लिख रहे हैं। इन दिनों ‘इन हिमाचल’ के नियमित स्तंभकार हैं।)

युवाओं के लिए प्रेरणा है शांता कुमार का व्यक्तित्व

  • विजय इंद्र चौहान (vijayinderchauhan@gmail.com)

मैं आठवीं कक्षा में था जब से मैंने शांता कुमार को जानना शुरू किया। यह 1992 की बात है जब शांता कुमार दूसरी बार हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। मुझे यह ठीक से याद नहीं कि मैं क्यों शांता कुमार के व्यक्तित्व की ओर आकर्षित हुआ, मगर शायद उस समय की उनकी सरकार की नीतियां सारे देश मे चर्चा में थीं। इस बात से मैं उनकी ओर आकर्षित हुआ। उनकी दो मुख्य बातें सबसे ज्यादा पसंद थीं- 1. व्यवस्था सुधारने के लिए कड़ा निर्णय लेना, चाहे उसका राजनीतिक परिणाम कुछ भी हो। 2.  भ्रस्टाचार के प्रति कड़ा रुख।

हमारे घर मे उन दिनों अंग्रेज़ी अख़बार द ट्रिब्यून आया करता था। अंग्रेज़ी अख़बार में स्थानीय राजनीतिक खबरें ज्यादा न होने के कारण मैं पड़ोस की दुकान में जा कर हिंदी का अख़बार पढ़ा करता था। अख़बार खंगालने का एक ही मतलब होता था कि शांता कुमार कि कोई खबर मिले और उसे बड़े ध्यान से पढ़ा जाए। समय के साथ मुझे पता चला कि हिमाचल के लोगों की कई मूलभूत समस्याओं का समाधान करने में शांता कुमार का बहुत महत्वपूर्ण योगदान रहा है। पिछली बार 1977 मे जब शांता कुमार मुख्यमंत्री बने थे तो उन्होंने घर-घर तक पीने का पानी पहुंचाकर महिलाओं की सबसे बड़ी समस्या का समाधान करवाया था। इससे पहले हिमाचल में पीने के पानी की ब्यवस्था का कोई भी समर्पित सरकारी विभाग नहीं था और महिलाओं को दूर से पानी उठाकर लाना पड़ता था।
हिमाचल में पहला कृषि विश्वविद्यालय स्थापित करने का श्रेय भी शांता कुमार को जाता है। यह विश्वविद्यालय पालमपुर में है और पालमपुर के विकास में इस विश्वविद्यालय का महत्पूर्ण योगदान है। मैं पालमपुर का निवासी हूं और समझता हूं कि बिना कृषि विश्वविद्यालय के पालमपुर आज कुछ नहीं होता।
एक पुरानी तस्वीर(साभार: PIB)
दूसरी बार के मुख्यमंत्री कार्यकाल में भी उन्होंने कई योजनाएं शुरू कीं जिनमें से कई पूरी हुई और कुछ सरकार बदलने के कारण लटक गई जो आज 23 साल बाद भी पूरी नहीं हो पाईं हैं या यूं कहें कि शुरू भी नहीं हो पाईं। पालमपुर संबंधित योजनाएं जो शांता कुमार सरकार के जाने से अधर मे लटक गईं, उनमें मुख्यतः हैं- पालमपुर में AIIMS के दर्जे का अस्पताल, पालमपुर बस स्टैंड और रोप-वे इत्यादि। शांता कुमार की जिन योजनाओं को सराहा गया था, उनमें से एक थी “वन लगाओ और रोजी कमाओ”। इस योजना से जहां खाली पड़ी जमीन पर पौधे लगाकर पर्यावरण संरक्षण का काम हुआ, वहीं स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिला। आज हिमाचल में जितने हरे-भरे जंगल दिखाई देते हैं, उसका श्रेय कुछ हद तक उनकी इस योजना को भी जाता है।
प्रदेश कि अर्थव्यस्था के उदारीकरण में भी शांता कुमार का योगदान उल्लेखनीय है। प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में निजी निवेश का रास्ता शांता कुमार ने ही खोला था। यातायात और बिजली उत्पादन मे निजी निवेश से न सिर्फ सरकार के राजस्व में वृद्धि हुई बल्कि रोजगार के अवसर भी पैदा हुए और लोगों को अतिरिक्त सुविधाएं भी मिलीं।
दूसरी बार के मुख्यमंत्री कार्यकाल में शांता कुमार अपनी कुछ नीतियों के कारण देश और विदेश में चर्चा में रहे। जब प्रदेश में विद्युत विभाग के कर्मचारी हड़ताल समाप्त नहीं कर रहे थे तो शांता कुमार ने “नो वर्क नो पे” नियम लागू कर दिया। जिसका मतलब था कि अगर आप काम नहीं करते हो तो आपको वेतन भी नहीं मिलेगा। हिमाचल में इस निर्णय का जितना विरोध हो सकता था हुआ, जबकि केंद्र सरकार और उच्चतम न्यायालय ने इस योजना की सराहना की। कुछ प्रदेशों और विदेशों ने इस योजना को अपने यहां लागू भी किया। मगर हिमाचल में चूंकि लगभग हर घर में एक सरकारी कर्मचारी था तो आने वाले चुनावों में शांता कुमार और सहयोगियों को बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ा। शांता कुमार मुख्यमंत्री होते हुए भी अपनी विधायक की सीट नहीं बचा पाए। लोग विकास भी भूल गए, शांता कुमार की दूरदर्शी नीतियों को भी भूल गए और शायद याद रहा तो “नो वर्क नो पे” और दूसरा शांता कुमार ने मेरा काम नहीं किया।
यह विडंबना ही है कि जिस व्यक्ति की नीतियों को देश और विदेशों में सराहा गया, उसे अपने घर के लोग ही नहीं समझ पाए। शायद शांता कुमार की नीतियां समय से बहुत आगे की थीं। यही नीतियां दस साल बाद आतीं तो शायद लोगों को समझ में आ जातीं।
अटल बिहारी वाजपेयी की केंद्र सरकार में शांता कुमार कैबिनेट स्तर के मंत्री भी रहे और खाद्य आपूर्ति और ग्रामीण विकास जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों का कार्य देखा। केंद्रीय मंत्री रहते हुए भी शांता कुमार की कुछ योजनाएं जैसे अंतोदय अन्न योजना बहुत ही लोकप्रिय हुई। जहां हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री रहते हुए शांता कुमार ने प्रदेश वासिओं के पीने के पानी की समस्या का समाधान किया वहीं केंद्र में मंत्री रहते हुए सारे देश के गरीबों के लिए पेट भर भोजन का प्रावधान किया। तमाम अच्छे कामों और लोकप्रिय योजनाओं के वावजूद शांता कुमार को वाजपेयी मंत्रिमंडल से अपने आदर्शों के साथ समझौता न करने और अपनी बात जनता में कहने,  चाहे वह किसी को अच्छी लगे या बुरी, के लिए इस्तीफा देना पड़ा।
आजकल जहां लोग आगे बढ़ने के लिए कोई भी समझौता करने को तैयार हैं, शांता कुमार एक प्रेरणा हैं। शांता कुमार चाहते तो कुर्सी में बैठे रहने के लिए अपने आदर्शों के साथ समझौता कर सकते थे पर उन्होंने आगे बढ़ने के बजाय अपने आदर्शों पर बने रहने को बेहतर समझा। आज जब भी शांता कुमार का नाम आता है तो यह जरूर कहा जाता है कि शांता कुमार, जो अपनी ईमानदारी के लिए जाने जाते हैं। शांता कुमार आज जब अपने राजनीतिक जीवन पर नजर डालते होंगे तो उनको इस बात का अफ़सोस नहीं होता होगा कि वह कुर्सी पे इतना समय नहीं रहे जितना रह सकते थे। बल्कि उनको संतुष्टि का आभास और आनंद होता होगा कि 60 साल से ज्यादा के राजनीतिक जीवन में उनके ऊपर भ्रष्टाचार का एक भी आरोप नहीं लगा और वह हमेशा अपने आदर्शों पर कायम रहे।
आज जब हर क्षेत्र में मूल्यों का पतन हो रहा है, शांता कुमार का जीवन युवाओं और खासकर राजनेताओं के लिए एक प्रेरणा है।

(लेखक एक मल्टिनैशनल कंपनी में कार्यरत हैं)

बादल फटने से धर्मपुर में तबाही; 5 की मौत, करोड़ों का नुकसान

मंडी।।

हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले में पड़ने वाले धर्मपुर में बादल फटने से भारी तबाही मची है। अभी तक 5 लोगों की मौत की खबर है, जबकि कई करोंड़ों का नुकसान होने की आशंका है। 5 बसों और 3 कारों के बहने की खबर सामने आई है, मगर बाद में संख्या बढ़ सकती है।

शुक्रवार रात को सोन खड्ड में अचानक बाढ़ आ गई। बादल फटने की वजह से आए पानी ने कुछ ही पलों के अंदर आसपास के इलाके में बने घरों और अन्य इमारतों को अपनी चपेट में ले लिया। बहुत से लोग अपनी जान बचाकर बच निकले, मगर कुछ लोगों के बारे में अभी तक कोई पता नहीं चल पाया है। आशंका जताई जा रही है कि इन लोगों की मौत हो गई है, मगर प्रशासन ने 5 मौतों की ही पुष्टि की है।

गौरतलब है कि सोन खड्ड किनारे कुछ ही फीट की रोक लगाकर नया बस अड्डा तैयार किया गया है। खड्ड की एक धारा वहां से भी बहा करती थी, जहां पर यह निर्माण हुआ है। शुक्रवार रात को आए सैलाब ने तटबंध को तोड़ दिया और बस अड्डे में खड़ी कई बसों को अपने आगोश में ले लिया। पूरा इलाका, कॉलेज ग्राउंड, कई दुकानें भी पानी में डूब चुकी थीं। काफी घंटों तक खड्ड उफनती रही। जब पानी उतरा तो पीछे तबाही के निशान छोड़ गया। कई बसें बुरी तरह से तबाह हो चुकी हैं और बस अड्डे का फर्निचर और कागजात भी नष्ट हो गए हैं।

अन्य दुकानों औऱ घरों में भी कीचड़ औऱ मलबा भर गया है। कई बसें बह गई हैं तो कई छोटी गाड़ियों का नामो-निशां तक बाकी नहीं रहा है। सही मायनों में इस आपदा से कितना नुकसान हुआ है, इसका पता एक दो दिन में ही चल पाएगा। अभी अफरा-तफरी जैसी स्थिति है और सही स्थिति का पता नहीं चल पा रहा।

देखिए, तबाही की कुछ और तस्वीरें:

पानी उतरा तो ये थे हालात:

(बसों वाली ये तस्वीरें अमर उजाला से साभार ली गई हैं)

इससे पहले ऐसे थे हालात: