आई.एस. ठाकुर।। भारतीय जनता पार्टी युवा मोर्चा के अध्यक्ष अनुराग ठाकुर ने जब जेएनयू पर भाषण दिया, समझ नहीं आया कि हंसा जाए या रोया जाए। क्योंकि एक तरफ तो वह देशभक्ति और देशद्रोह पर लंबा भाषण दे रहे थे, मगर दूसरी तरफ धर्मशाला में वह पाकिस्तान के साथ मैच करवाने को लेकर अड़े हुए हैं और वह भी शहीदों के परिवारों के विरोध के बावजूद।
यह बीजेपी के दोहरे मापदंड हैं या अनुराग के? एक तरफ तो वह पाकिस्तान से मैच करवाने को प्रतिष्ठा का विषय बनाए हुए हैं, मगर दूसरी तरफ राष्ट्रप्रेम की बातें कर रहे हैं। बीजेपी को भी क्या कोई और नेता नहीं मिला इस विषय पर भाषण देने को?
इस कदम से निस्संदेह पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचा है। जिन लोगों पर भारत विरोधी नारे लगाने का आरोप लगा है, उनके साथ खड़े होने को लेकर तो कांग्रेस पर वह हमला कर रहे थे। मगर पाकिस्तान की हरकतों को देखते हुए जिस आधार पर उसके साथ क्रिकेट संबंध तोड़ दिए जाते हैं, उसी आधार पर कायम न रहते हुए पूरी कोशिश में लगे थे कि मैच धर्मशाला में ही हो।
मेरा मैच से कोई विरोध नहीं है और न ही पाकिस्तान से। किसी भी समझदार शख्स को होना भी नहीं चाहिए। मगर यही अनुराग थे जो कश्मीर में झंडा फहराने के लिए यात्रा निकालते हैं और कहते हैं कि पाकिस्तान के क्रिकेट नहीं खेला जाना चाहिए। वही आज कहते हैं कि इसमें कोई बुराई नहीं। फर्क इतना है कि उस वक्त केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार थी, आज बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार है। सरकार बदलते ही विचारधारा और राष्ट्रप्रेम की परिभाषा भी बदल जाती है, यह अनुराग और बीजेपी को देखकर पता चलता है।
उम्मीद है जनता इस दोहरी राजनीति को समझेगी और ऐसी मौकापरस्ती को मुंहतोड़ जवाब देगी।
(लेखक ‘इन हिमाचल’ के नियमित स्तंभकार हैं। उनसे kalamkasipahi@gmail.com से संपर्क किया जा सकता है।)
हरियाणा में आरक्षण के लिए जाट कम्युनिटी द्वारा किये गए हिंसक आंदोलन के बीच हिमाचल प्रदेश के पालमपुर निवासी विजयेन्द्र चौहान ने प्रधानमंत्री को इस इशू पर एक पत्र भेजा है। आप भी पढ़िए और जानिये क्या लिखा है चौहान जी ने इस पत्र में।
आदरणीय प्रधानमंत्री जी,
पिछले कुछ समय से सामान्य वर्ग के कुछ लोग उनकी जाति के लिए आरक्षण की बहुत मांग करने लगे हैं। एक जाति का आंदोलन खत्म होता है तो दूसरी जाति वाले खड़े हो जाते हैं। कब तक हम एक के बाद एक आंदोलनों को बर्दाश करते रहेंगे। यह तो हम सभी को पता है कि जो लोग आंदोलन को शुरू करते है उनका आरक्षण से कोई लेना देना नहीं होता। उनको तो बस अपनी राजनीति की रोटीआं सेकनी होती है और फिर उसमे मासूमो की जान जाए तो जाए और देश की करोडो की सम्पति का नुक्सान होता है तो भी किसको फर्क पड़ता है।
हमारे देश में आरक्षण शुरुआत में उन जातिओं को दिया गया था जो सामाजिक रूप से बहुत पिछड़ी हुई थी और जो सदिओं से शोषण का शिकार थी। वैसे तो अब आजादी के 70 साल बाद तक जात पात का कोई भी भेदभाब नहीं होना चाहिए था और जाति के आधार पर दिया हुआ आरक्षण भी खत्म हो जाना चाहिए था पर अगर अभी तक हम इस जाति पे आधारित आरक्षण को खत्म नहीं कर पाए हैं तो कम से कम नई सामान्य वर्ग की जातिओं को तो इसमें शामिल न करें। सामान्य वर्ग के लोगों को जाति पर आधारित आरक्षण कैसे दिया जा सकता है न तो यह वर्ग सामाजिक रूप से कभी पिछड़ा रहा है और न ही उसका कभी शोषण हुआ है। सामान्य वर्ग में गरीबों को आर्थिक सहायता दी जानी चाहिए न की जाति पर आधारित आरक्षण।
फिर भी अगर सामान्य वर्ग के कुछ लोग जाति पर आधारित आरक्षण की मांग करते हैं और सरकार के पास आरक्षण देने के वजाए कोई चारा नहीं रहता है तो कुछ ऐसा किया जाना चाहिए जिससे यह लोग सामान्य वर्ग से हट कर किसी आरक्षित दलित जाति में चले जाए। आरक्षण तो मिलेगा ही साथ में वह जाति भी मिल जाएगी जिसको मूलतः आरक्षण दिया गया था। जन्म पर आधारित जाति और आरक्षण को खत्म कर कर दिया जाना चाहिए और जो लोग आरक्षण के लिए अपनी जाति छोड़ के पिछड़ी जाति में जाना चाहते है उन्हें जाने दिया जाए। फिर देखते हैं कितने उच्च वर्ग के लोग आरक्षण के लिए दलित या पिछड़ी जाति वाला कहलाना चाहेंगे।
धन्यवाद।
“लेखक पेशे से सॉफ्टवेयर सेक्टर के एम्प्लोयी हैं और अभी गुड़गावं में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में कर्यारत हैं। ”
निजी पत्राचार से अलग जब भी सरकार के दो विभिन्न मंत्रालयों, विभागों, अधिकारियों या कर्मचारियों द्वारा किसी ऑफिशल काम से पत्र भेजे जाते हैं, उसकी भाषा शैली अलग होती है। इनमें टू-द-पॉइंट बात की जाती है और आधिकारिक पद और नाम के साथ संबोधित किया जाता है। मगर लगता है कि हिमाचल सरकार में बैठे लोगों को नियम-कायदों की कोई परवाह नहीं है।
जब भी कोई पदाधिकारी अपने ऑफिशल लेटर हेड, जिसमें सरकार की मुहर लगी हो, से किसी को मेसेज भेजता है, वह पत्र कागज़ का टुकड़ा नहीं रहता। वह निजी पत्र भी नहीं होता, क्योंकि उसके साथ आपके पद और प्रदेश सरकार की गरिमा जुड़ जाती है। मगर पिछले दिनों मुख्यमंत्री के आईटी सलाहकार के तौर पर नियुक्त गोकुल बुटेल ने एक लेटर अपनी फेसबुक प्रोफाइल पर अपलोड किया है, जिसमें बहुत ही कैज़ुअल अप्रोच अपनाई गई है।
आप देख सकते हैं कि इसमे मंत्री को ‘बाली साहेब’ कहकर संबोधित किया गया है।
गोकुल बुटेल की टाइमलाइन से साभार।
हिमाचल प्रदेश सचिवालय में सीनियर पद पर बैठे एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि आधिकारिक रूप से पत्र में या तो मंत्री के पद के नाम से अड्रेस किया जाना चाहिए था या फिर उनका पूरा आधिकारिक नाम लिखा जाना चाहिए था। उन्होंने बताया, ‘अगर मुझे यह लेटर लिखना होता तो मैं शिष्टाचार के तहत ‘Respected Transport Minister’ लिखता या फिर ‘Respected G.S. Bali ji’ लिखता।’
अधिकारी ने बताया कि Dear शब्द के इस्तेमाल से बचा जाना चाहिए, मगर आजकल यह स्वीकार्य हो गया है। फिर भी आगे पूरा नाम लिखा जाना चाहिए, क्योंकि यह दो व्यक्तियों का आपसी संवाद नहीं है। उन्होंने कहा, ‘सरकारी लेटर हेड बहुत कम लोगों को मिलता है और जिन्हें मिलता है, उन्हें इसका सही से इस्तेमाल करना चाहिए।’
इस बीच इन हिमाचल ने सोशल मीडिया पर मौजूद हिमाचल प्रदेश के मंत्रियों के पेज टटोले और लेटर ढूंढने चाहे। ज्यादातर पेजों पर तो कोई ऑफिशल अड्रेस अपलोड नहीं मिला, मगर शांता कुमार के फेसबुक पेज पर दो पत्र मिले।
पीएम नरेंद्र मोदी को भेजा गया लेटर
लोकसभा स्पीकर को भेजा गया पत्र
एक पीएम मोदी को जन्मदिन की बधाई दे रहा था और दूसरे में लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन को संबोधित किया गया। भले ही इनमें से एक लेटर में जन्मदिन की शुभकामनाएं दी गई थीं, मगर दोनों पत्रों में हाथ से दोनों नेताओं का पूरा नाम लिखा गया, उपनामों का इस्तेमाल नहीं किया गया है।
गौरतलब है कि हिमाचल प्रदेश के कई विधायक और मंत्री भी इस तरह की भाषा इस्तेमाल करते रहे हैं। वरिष्ठ पत्रकार रामनाथ शर्मा बताते हैं कि मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह को ‘राजा साहब’ कहकर संबोधित करना न सिर्फ शिष्टाचार से खिलाफ है, बल्कि असंवैधानिक भी है। उन्होंने कहा कि राजशाही खत्म हो चुकी है और ऑफिशल पत्रों में इसे लिखना एक तरह से संविधान का उल्लंघन है। कल को कोई इस आधार पर केस तक कर सकता है।
हिमाचल में धूमल केंद्र में नड्डा अमित शाह की मीटिंग में निकला फार्मूला !
इन हिमाचल डेस्क
प्रदेश में जहाँ कांग्रेस तीन साल पुरे होने का जश्न मना रही थी। वहीँ भाजपा के दिग्गज अमित शाह के सामने सरकार बनाने पर चर्चा कर रहे थे। गौरतलब है की दिल्ली में भाजपा कोर ग्रुप की बैठक बुलाई गयी थी। ज्सिमे हिमाचल प्रदेश से नेता केंद्रीय मंत्री जे पी नड्डा , प्रतिपक्ष प्रेम कुमार धूमल पार्टी प्रेजिडेंट सतपाल सिंह सत्ती महामंत्री विपिन परमार , रणधीर शर्मा सांसद और अन्य कोर ग्रुप के नेताओं ने भाग लिया।
दिल्ली में जे पी नड्डा के निवास पर भारतीय जनता पार्टी हिमाचल के दिग्गज
मीटिंग में प्रदेश में चुनावों के लिए पार्टी को तैयारी करने के लिए पार्टी अद्यक्ष ने निर्देश दिया। सूत्रों की माने तो इस मीटिंग में शाह ने प्रदेश में नेरटिटव परिवर्तन की अटकलों पर विराम लगाते हुए यह निर्देश सबको दे दिया की। प्रदेश की कमान धूमल और केंद्र की नड्डा संभालेंगे। इसके बाद हिमाचल प्रदेश के सभी नेता जे पी नड्डा के निवास पर गए वहां चाय पान हुआ।
धर्मशाला में भारत पाक मैच का विरोध है या अनुराग ठाकुर का
आशीष नड्डा।
धर्मशाला में 19 मार्च को प्रस्तावित भारत पाकिस्तान मैच को लेकर हिमाचल में भूचाल आया हुआ है। संवेदनाओं से लेकर राजनीति में फोकस होते इस मैच के बारे में सोचकर मेरा भी मन कुछ लिखने का हुआ। इस मैच के बारे में बात करने से पहले हमें इन तथ्यों पर गौर करना होगा की हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर लोकसभा क्षेत्र से सांसद अनुराग ठाकुर जो इस समय बी सी सी आई के पदाधिकारी भी हैं , इस मैच के कारण विरोधियों के टारगेट बने हुए हैं। हालाँकि यह सच है की सत्ता के बाहर रहते हुए और अब सत्ता में आकर भारत पाक क्रिकेट के ऊपर अनुराग ठाकुर ने भी यू टर्न लिया है। कभी अपने ट्वीट के माध्यम से अनुराग ठाकुर यह कहते थे की पाकिस्तान के साथ मैच नहीं हो सकता क्योंकि आतंकवाद और क्रिकेट साथ नहीं चल सकते , वही अनुराग ठाकुर उसके ठीक डेढ़ साल बाद जब बी सी सी आई में पदाधिकारी हो जाते हैं तो पाकिस्तान के साथ क्रिकेट सीरज की बहाली के लिए सरकार को पत्र लिखते हैं। जब राष्ट्रीय स्तर पर इसका विरोध होता है तो वह ब्यान देते हैं की बी सी सी आई पदाधिकारी होने पर उन्हें यह पत्र लिखना पड़ा मतलब राष्ट्रीय मुद्दे पर भी उनका स्थायी विचार नहीं है वो कुर्सी के साथ बदल जाता है खैर।
ये तो रही रही द्विपक्षीय सीरीज की बात इसमें मेरा भी मानना है की जब तक पाकिस्तान के कर्म बेहतर नहीं होते हमें उनके साथ कोई ऐसे सीरीज में नहीं खेलना चाहिए जिससे उन्हें आर्थिक लाभ हो। इससे बचा जा सकता है और उन लोगों के बारे में मैं कुछ नहीं कह सकता जो यह तर्क देते हैं की क्रिकेट से हमारे बीच के मामले सुलझेंगे हम करीब आएंगे। हमारे मामले तभी सुलझेंगे जब मुंबई हमले , पठानकोट अटैक के कारदारों पर कड़ी कार्रवाई होगी जब सीमा पार से आतंक की खेप बंद होगी ऐसे दोनों देश दिन रात टेस्ट क्रिकेट भी खेलते रहें कोई फर्क नहीं पडने वाला।
धमर्शाला स्टेडियम जहाँ वर्ल्ड कप का मैच निर्धारित है
अब मैं वर्ल्ड कप के मैच की बात करता हूँ जिसमे मुझे लगता है संवेदनाओं के कंधे पर बन्दूक रखकर सीधे अनुराग ठाकुर पर निशाना साधा जा रहा है। इसमें कुछ लोग ऐसे हैं जो सच में निष्काम भाव से इमोशनल हैं जज्बाती हैं पर उनके मन में जो है वो सच है विरोध है मैच का तो है। परन्तु दूसरी तरह के लोग जो सुगबुगाहटों से या जमीनी स्तर पर आकर इस मैच के विरोध में झंडा बुलंद किये हुए हैं वो सैनिकों के परिवारों की आड़ लेकर सीधे अनुराग ठाकुर से अपनी दुश्मनी निकाल रहे हैं। चाहे यह अनुराग ठाकुर की राजनीति की जड़े हिलाने के लिए हो या अनुराग ठाकुर के वर्चस्व की कुंठा हो।
इस बात को इस नजरिये से देखा जाए की यह लोग सिर्फ इस बात पर क्यों टीके हैं की धमर्शाला में मैच न हो क्योंकि पठानकोट में शहीद होने वाले दो जवान हिमाचल के भी थे। अगर शहादत की संवेदनाओं की ही इन तथाकथित लोगों को फ़िक्र है फिर ये संवेदनाये क्षेत्रीय क्यों है ?? राष्ट्रीय क्यों नहीं है ?? पठानकोट हमले से पहले और उसमे भी हमारे जवानों ने शहादत पायी है। फिर यह लोग राष्ट्रीय स्तर की बात क्यों नहीं करते की मैच सिर्फ धर्मशाला नहीं हिन्दोस्तान की धरती पर नहीं हो ???
मेरा मानना है जब वैश्विक स्तर पर कोई भी राष्ट्र किसी भी संस्था का हिस्सा होते हैं तो आपको उस संस्था के सविंधान को मानना पड़ता है फिर चाहे आप यूनाइटेड नेशन की बैठकों की बात करें , ओलिंपिक में खेलों की बात करें या एशिया में सम्मलेन की बात करें। तुर्की और रूस क्या वर्ल्ड कप के फूटबाल मैच में आपस में नहीं भिड़ेंगे ??? । यह मैच आई सी सी का इवेंट है पठानकोट अटैक से पहले निर्धारित था। उसका विरोध सिर्फ अनुराग ठाकुर के प्रति रंजिस के कारण एक मुद्दा हथियाने के लिए हो रहा है ऐसा मेरा मानना है। जिसे सवँदनायों का तड़का दिया जा रहा है।
एक और बात माना अनुराग ठाकुर नाम का आदमी अगर बी सी सी आई में नहीं होता धमर्शाला क्रिकेट स्टेडियम के निर्माण का नाम अनुराग से नहीं जुड़ा होता तब भी क्या धर्मशाला में इस मैच का विरोध इसी स्तर पर होता ? यह भी गौर करने की बात है। जब विरोध संवेदनाओं के आधार पर पाकिस्तान के साथ है तो फिर कबड्डी कुश्ती से लेकर आपसी व्यापार सुई से लेकर सब्जी सब पर होना चाहिए।
ये इमोशन के ऊपर राजनीति हो रही है। जहाँ परिजन सोच भी नहीं रहे या नहीं सोचते थे वहां उनका नाम लेकर जबरदस्ती सोच पैदा की जा रही है कल को कोई कह देगा मोदी ने पाक से बात क्यों की शहीदों के परिजनों को दुःख हुआ कोई कहेगा की केजरी ने गुलाम अली को दिल्ली क्यों आने दिया शहीदों के परिजनों को दुःख होगा कोई कहेगा आतिफ असलम का गाना क्यों सुना शहीदों के परिजनों को दुःख होगा।
आखिर ये राजनीति क्षेत्र के लोग ही सबके दुःख निकाल कर क्यों लाते हैं , आज तक किसी शहीद के घर से कोई 70 साल में मैच के ऊपर गानों के ऊपर वार्ता के ऊपर नहीं बोला उनका भाव वहां था ही नहीं परन्तु राजनैतिक लोग अपने स्वार्थ के लिए सबके माई बाप और शुभचिंतक बन जाते हैं। वो भी शहीदों के नाम की आड़ लेकर यह दुखद है
कुल मिलाकर मेरा मानना है धमर्शाला में इंडिया पाक के वर्ल्ड कप मैच का विरोध संवेदनाओं के कन्धों पर बन्दूक रखते हुए अनुराग ठाकुर का विरोध ज्यादा है मैच का कम। बाकी सबकी अपनी अपनी राय है।
“ लेखक हिमाचल प्रदेश के निवासी हैं आई आई टी दिल्ली में रिसर्च स्कॉलर हैं और इन हिमाचल के नियमित स्तंभकार हैं ”
स्वास्थ्य क्षेत्र में मूलभूत सुविधाओं के लिए जूझ रहे प्रदेश के लिए इससे शर्मनाक क्या हो सकता है की खुद तो उसकी सरकार बजट का प्रावधान इस क्षेत्र में न कर पाये बल्कि दूसरे सोर्सेज से जो बजट आ रहा हो उसको भी समय से उपयोग न कर पाए। ऐसा उदाहरण कहीं और नहीं बल्कि हिमाचल प्रदेश में ही एक देखने को मिला है। गौरतलब है की भारत सरकार ने निजी एवं सार्वजानिक क्षेत्र की कम्पनियों के लिए कुछ नियम निर्धारित किये हैं। इन नियमों के अनुसार इन उपक्रमों को अपने कुल शुद्ध लाभ में से 2 % कॉर्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी के तहत देश में मूलभूत निर्माण कार्यों और जनहित से जुडी योजनाओं में खर्च करना है।
भारत सरकार समय समय पर यह देखती है की यह उपक्रम कहाँ अपने पैसे को खर्च कर रहे हैं वर्तमान में हिमाचल प्रदेश से भाजपा सांसद शांता कुमार उस कमेटी के चेयरमैन हैं। बतौर शांता कुमार उन्होंने हिमाचल प्रदेश के राजेंदर प्रसाद मेडिकल कालेज टांडा (कांगड़ा) में सराय के निर्माण के लिए NTPC से 2. 5 करोड़ रूपए स्वीकृत करवाये हैं परन्तु विगत छः महीने से कई बार पत्र लिखने के बावजूद प्रदेश सरकार की तरफ से शिलान्यास की तारिख फाइनल नहीं हुयी है। शांता कुमार का कहना है की कितने दुर्भाग्य की बात है की पैसा आने के बावजूद भी सरकार इसके बारे में उदासीन रूख अपना रही है।
डाक्टर राजेंदर प्रसाद मेडिकल कालेज टांडा कांगड़ा
सूत्रों की माने तो इस कार्य को लटकाने में स्वास्थ्य मंत्री कॉल सिंह का हाथ है। कॉल सिंह नहीं चाहते की भाजपा नेता शांता कुमार को ये क्रडिट मिले की उन्होंने फण्ड का इंतज़ाम करवाया है इसलिए वो इस शिलान्यास कार्यकर्म को ठन्डे बस्ते में डाले हुए हैं। हालाँकि इस बात में कितनी सच्चाई है कहा नहीं जा सकता पर यह दुर्भग्य की बात है की बाहरी संस्था से मिले हुए धन को भी प्रदेश सरकार प्रयोग नहीं कर पा रही है। जो निहायत ही शर्म का विषय है
वो सुबह पहले अपने घर का काम निबटाती हैं फिर जल्दी जल्दी गावं के स्कूल की तरफ रूख करती है। कुछ भी हो कोई भी परिस्थिति हो उन्हें स्कूल पहुंचना ही है क्योंकि वो नहीं पहुंचेगी तो उन बच्चों के लिए खाना कैसे बनेगा जो दिन का लंच स्कूल में बने भोजन से ही करते हैं। महीने की चार छ छुट्टियों को छोड़ दिया जाए तो इन औरतों की दिन की यही दिनचर्या है। इन्हे अपने अपने इलाकों में मिड डे मील वर्कर के नाम से जाना जाता है।
आप हैरान होंगे यह सब यह औरते कर रहे हैं सिर्फ 1000 रूपए मासिक पगार के लिए। आप समझ सकते हैं एक हजार रुपया क्या होता है हर आदमी के लिए एक हजार रूपए की अलग अलग कीमत है। वीकंड पर दो दोस्तों का पार्टी का मूड बन जाए तो दारु की एक अदद बोतल और च साथ में चिकन मटन पर ही एक हजार रुपया उड़ जाता है।
लेकिन 1000 रूपये की कीमत इन ग्रामीण गरीब औरतों से बेहतर कौन जान सकता है जिन्हे हर रोज बच्चों का खाना स्कूल में जाकर बनाना है उसे परोसना है पूरा महीना यह करने के बाद तब महीने के अंत में 1000 रुपया सरकार की तरफ से मिलता है। अब आप समझ सकते हैं 1000 रुपया कितना कीमती है किसी के लिए। इन सब के बीच दुःख का विषय और यहाँ आर्टिकल लिखने का कारण मुझे इसलिए लगा जब मुझे पता चला की पिछले चार महीनों से हमारी सरकार जो तीन साल पुरे करने का जश्न मना रही है 1000 रूपए सेलरी इन मिड डे मील वर्कर्स को नहीं दे पा रही है।
आप जान रहे होंगे 1000 रुपये के लिए इतनी जद्दोजहद और वो 1000 भी चार महीने से नहीं मिला है लेकिन कोई सुनने वाला नहीं है। मुख्यमंत्री जिनके पास खुद शिक्षा विभाग है दम्भ से मंचों से बड़ी बड़ी बाते करते हैं और उनके होनहार शिक्षा सचिव नीरज भारती उनके बारे में जितना कहा जाए कम है। यह सब काली भेड़ों की तलाश में हैं गरीब की आह पुकार इनके कानों में नहीं जाती है। शिक्षा विभाग में दिहाड़ी पर कार्यरत एक गरीब मिड डे मील वर्कर औरत को महीने का उसकी मेहनत का 1000 रूपया भी पिछले चार महीने से न मिला हो तो लोकतान्त्रिक रूप से चुनी गयी सरकार को तीन साल का जश्न मनाने से पहले आत्ममंथन करना चाहिए।
मिड डे मील परोसती कार्यकर्ता : सांकेतिक चित्र
यह हजार रुपया भी सरकार समय पर नहीं देती और मिड डे मील वर्कर महिलाओं से उम्मीद करती है की वो खाना बनाये और साथ में हर बच्चे की थाली भी साफ़ करें यानि 200 बच्चों को खाना भी बने और 200 थालियां भी रोज कोई साफ़ करे और महीने के अंत में 1000 रूपए के लिए भी तरस जाए। किसी स्कूल में 20 बच्चे पढ़ते है किसी स्कूल में 200 भी हैं पर महीना का मानदेय फिक्स है 1000 और वो भी समय पर नहीं मिलता।
मुख्यमंत्री जी कृपया काली पीली भेड़ों से फुर्सत मिले तो अपने प्रदेश के इंसानों की भी सुध लें। इस तरफ ध्यान दे शिक्षा विभाग आपने अपने पास रखा है। हो सकता है एक राजा के लिए 1000 रुापये की कोई कीमत न हो पर एक आशा के साथ इस कार्य में जुडी इन महिलाओं के लिए यह बहुत बड़ी रकम है। चार महीने का मानदेय समय पर देने की कृपा करें।
“लेखक आई आई टी दिल्ली में रिसर्च स्कॉलर हैं और प्रादेशिक मुद्दों पर लिखते रहते हैं इनसे aashishnadda@gmail.com पर संपर्क साधा जा सकता है। ”
जनवरी के अंतिम दिनों में दिल्ली से घर का चक्कर लगा। खुशगवार मौसम में घूमने फिरने की इच्छा जागी तो हमेशा की तरह दोस्तों के साथ पालमपुर का रूख किया। आप अगर पालमपुर जाएँ और चाय के बगीचों से होते हुए बंदला से नीचे सौरभ वन विहार के पास कल कल बहती नियुगल खड्ड के किनारे गुनगुनी धुप के बीच “झोल” ( चावल से बनने वाली पारम्परिक बियर ) का मजा न ले तो श्याद आपकी पालमपुर यात्रा अधूरी मानी जाएगी।
यू तो पिछले कुछ महीनों में कई बार पालमपुर का चक्कर लगा और नेउगल खड्ड के सानिध्य का भी मौका मिला पर इस बार पालमपुर में वो देखा जो पहले कभी नजर नहीं आया था।
बंदला से नीचे उतरते ही पुल के पास ओपन में कुछ टेबल चेयर लगी थी साथ में एक टेम्पो ट्रॅवेलेर खड़ी थी। वहां कार पार्क करने के बाद हमने जो देखा वो अलग ही था। सफेद रंग की टेम्पो ट्रेवलर में पूरा का पूरा किचन बना हुआ था। गाडी को इस तरह से मॉडिफाई किया हुआ था की रेस्टोरेंट की तरह हर तरह की आइटम का जायका आपको यहीं मिल जाता। बाकायदा दो लोग अंदर काम कर रहे थे।
इसी गाडी में है चलता फिरता किचन
कौतहूल में हमने भी कदम आगे बढाए पहले तो इस इनोवेटिव आईडिया को घूम फिर के चारों तरफ से देखा। और तो और अंदर तंदूरी आइटम्स बनाने के लिए बाकायदा तंदूर की भी व्यव्यस्था थी। बहुत सारे फोटो ग्राफ्स लेने के बाद हमने सोचा की चलो इस इनोवेटिव रेस्टोरेंट के मालिक से भी बात की जाए। परन्तु श्याद वो व्यक्ति वहां नहीं था. जो लोग काम कर रहे थे वो सैलरी पर रखे हुए थे वो उन प्रश्नों के उत्तर नहीं दे पा रहे थे जो हमें जानने थे।
लोगों के आर्डर पर कुकिंग करते हुए कुक
खैर झोल के साथ चिल्ली और तंदूरी दोनों तरह की आइटम का हमने भी स्वाद चखा और शाम वहां गुजारकर वापिस घर की ओर प्रस्थान किया। बेशक एहमदाबाद में पानी के अंदर रेस्टोरेंट खुल गया हो पर आप कभी भी पालमपुर आएं तो नेउगाल के किनारे खड़े इस चलते फिरते फ़ूड ट्रक का जायका लेना न भूलें।
(लेखक आई आई टी दिल्ली में रेसेरच स्कॉलर हैं और अक्सर अपने यात्रा वृत्तांत लिखते रहते हैं )
‘काली भेड़’, कितना प्यारा शब्द है यह। आजकल आए दिन हिमाचल के अखबारों में यह शब्द छप रहा है। कांग्रेस के नेता और खासकर मुख्यमंत्री इस शब्द को ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं। ये जो काली भेड़ों का जिक्र चला है, दरअसल यह इंग्लिश के मुहावरे Black Sheep का हिंदी रूपांतरण है। ब्लैक शीप का मतलब हुआ- वह एक सदस्य, जो पूरे ग्रुप या कम्यूनिटी पर कलंक है। नीरज भारती ने कांगड़ा जिला परिषद में अध्यक्ष न बन पाने का ठीकरा किसी काली भेड़ पर निकाला था। इसके बाद कांगड़ा दौरे पर आए मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह जहां भी गए, वहां उन्होंने काली भेड़ का जिक्र किया। बोले कि मुझे काली भेड़ का पता है और कार्रवाई होगी, मैं ऊन काटूंगा.. वगैरह-वगैरह।
कहा जाता है कि किसी की खिल्ली उड़ाने से अपने गिरेबान में जरूर झांक लेना चाहिए। जो भी शख्स आज प्रदेश में राजनीतिक आरोपबाजी के लिए इसे इस्तेमाल कर रहा है, वह आईना देखे तो खुद को भी काली भेड़ पाएगा। तो क्या इस मुहावरे को इस्तेमाल करने से पहले आईना देखा गया? मुझे लगता है कि नहीं। इस प्रदेश का हर वह राजनीतिक शख्स काली भेड़ है, जिसने जनता और प्रदेश के लिए कुछ करने के बजाय अपने हित के लिए चमचागिरी को अपना धर्म बना लिया है। कांग्रेस और बीजेपी ही नहीं, हर पार्टी में ऐसी काली भेड़े हैं। मैं तो कहता हूं कि रानजीति में ही ऐसी कई काली भेड़े हैं, जिन्होंने राजनीति को बदनाम करके रख दिया है।
चूंकि यह शब्द सत्ताधारी पार्टी के लोगों द्वारा ज्यादा इस्तेमाल किया जा रहा है, इसलिए आज बात इसी पार्टी की करूंगा। मैं सोशल मीडिया पर जुड़ा रहता हूं। देखा कि सबसे पहले काली भेड़ शब्द कांग्रेस के युगपुरुष नीरज भारती ने इस्तेमाल किया। वही महान नेता, जिन्होंने सोशल मीडिया पर अभद्र भाषा इस्तेमाल करने में नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं। जिन्होंने देश के प्रधानमंत्री तो क्या, अन्य बड़ी हस्तियों तक को नहीं बख्शा। जिसकी भाषा सोशल मीडिया पर मोहल्ले के बीड़ीबाज़ की तरह होती है। जो तर्क देता है कि मैं भाजपाइयों को उन्हीं की भाषा में जवाब दे रहा हूं। यानी राजनीति में वह उच्च मानक स्थापित नहीं करेंगे, बल्कि गिरे हुए स्तर पर जाकर कीचड़ उछालेंगे। यह है हिमाचल की राजनीति का भविष्य। सामने वाला बेवकूफी करे तो आप भी बेवकूफी करेंगे?
खैर, मुख्यमंत्री साहब को चाहिए था कि अभद्र भाषा इस्तेमाल करने वाले अपने विधायक को टोकें। परिवार के मुखिया की तो यही जिम्मेदारी होती है न। मगर जनाब ने हर मंच पर अपने इस बिगड़ैल विधायक की पीठ थपथपाई। वह कहते रहे कि गलत ही क्या है इसमें? मुख्यमंत्री की यह लापरवाही और विधायक की ढिठई क्या पार्टी के किसी वरिष्ठ नेता को नहीं अखरी? और तो और, अब जब नीरज भारती ने काली भेड़ा का जुमला इस्तेमाल किया, तो मुख्यमंत्री ने खुद ही इसे अपना लिया। दरअसल हिमाचल प्रदेश के ये खामोश रहने वाले नेता और कार्यकर्ता खुद काली भेड़ हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि वे गलत बातों पर खामोश रहकर स्वामिभक्ति दिखा रहे हैं। क्योकि उनके लिए प्रदेश और जनता बाद में, अपने हित पहले हैं।
प्रदेश में हो रही वाहियात राजनीति और परिवारवाद की धूम के लिए वे काली भेड़ें जिम्मेदार हैं, जो अपनी ऊन (अपना सबकुछ) अपने मालिकों को समर्पित कर देना चाहती हैं। जी हां, कुछ दिन पहले मेरे पड़ोस में रहने वाला 3 साल का बच्चा नर्सरी स्कूल में एक नई कविता (rhyme) सीखकर आया। वह कुछ इस तरह से है- Baa… Baa.. Black Sheep
इसका सार आपको बता देता हूं। काली भेड़ से पूछा जाता है कि क्या तुम्हारे पास ऊन है? भेड़ कहती है कि हां, तीन बैग हैं। एक हिस्सा मेरे स्वामी के लिए है, एक मालकिन के लिए और बाकी का बचा हिस्सा नन्हे बच्चे के लिए है।
ये मालिक-मालकिन और बच्चा क्या आपको किसी राजनीतिक परिवार की याद दिलाता है? आप समझदार हैं। तो इस कविता के हिसाब से काली भेड़ें दरअसल वे कार्यकर्ता और नेता हैं, जिन्होंने संगठन की ऐसी-तैसी करके इस परिवार की चमचागिरी में अपनी ऊन समर्पित कर दी है। हिमाचल प्रदेश में युवा बेरोजगारी से जूझ रहे हैं, सड़कें खस्ताहाल हैं, अस्पतालों में डॉक्टर नहीं हैं, स्कूलों में टीचर नहीं हैं, बच्चे ठंड में फटी टाटों पर बैठ रहे हैं और इधर फालतू की राजनीति हो रही है।
कांग्रेस हो या बीजेपी, दोनों पार्टियों की काली भेड़े शर्म करें। अपनी ऊन को बचाकर रखें और अपने लिए ही इस्तेमाल करें। क्यों ऐसे परिवारों के चक्कर में अपनी ऊन लुटा रहे हो, जो वक्त आने पर आपको काटने से भी पीछे नहीं हटेंगे।
(लेखक भूतपूर्व सैनिक हैं और मूलत: नाहन से हैं। इन दिनों देहरादून में एक निजी सिक्यॉरिटी फर्म चला रहे हैं। इनसे samreshpalsra59@yahoo.co.in पर संपर्क किया जा सकता है।)
केंद्र सरकार की नई रूफ टॉप सोलर पालिसी के तहत हिमाचल प्रदेश को स्पेशल श्रेणी राज्य के तहत 70 % सब्सिडी की कैटगरी में रखा गया हैं। 70 % सब्सिडी इस क्षेत्र में बहुत ज्यादा मानी जा रही है। इसी का फायदा लेने के लिए हिमाचल पथ परिवहन निगम भी आगे आ गया है।
परिवहन मंत्री जी एस बाली के अनुसार निगम के पास प्रयाप्त खाली स्पेस बस स्टैंड की छतों और वर्कशॉप में मौजूद है। निगम सोलर पावर जनरेशन प्लांट लगाने के लिए इस जगह का प्रयोग करेगा। निगम ने इसके लिए टेंडर प्रक्रिया भी आरम्भ कर दी है बतौर बाली पहले बस स्टैंड एवं वर्कशॉप के लोड को सोलर प्लांट से जोड़ा जाएगा इसके बाद अगर एक्स्ट्रा बिजली बचती है तो उसे ग्रिड में डाल कर बेच कर मुनाफ़ा कमाया जाएगा। गौरतलब है की की केंद्र सरकार के निर्देशों के अनुसार सोलर से पैदा होने वाली बिजली को सबंधित सरकार को खरीदना अनिवार्य है। हालाँकि इसमें नेट मीटरिंग पालिसी का प्रावधान भी है।
बाली ने कहा की अपनी खपत कम करने के लिए निगम बस स्टैंड और वर्कशॉप में LED लाइट्स लगाने जा रहा है। ताकि ज्यादा से ज्यादा बिजली ग्रिड को बेच कर मुनाफ़ा कमाया जा सके।