कोर्ट ही बचा सकता है हिमाचल को ड्रग्स के मकड़जाल से

0

हिमाचल प्रदेश में भी नशे का कारोबार बढ़ता जा रहा है। पहले भांग के उत्पादों के लिए हिमाचल बदनाम था ही, युवा पीढ़ी कैपसूल और इंजेक्शन जैसे नशे भी करने लगे हैं। अखबार ऐसी खबरों से भरे पड़े हैं। ऐसे में इस विषय पर लेखक ने प्रदेश के मुख्य न्यायाधीश को एक पत्र लिखा है, जिसे उन्होंने हमें भी भेजा है। हम इसे यथावत प्रकाशित कर रहे हैं।

श्री मंसूर अहमद मीर जी,
माननीय मुख्य न्यायाधीश
हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय।

विषय: नशे से सबंधित मामलों के लिए अलग फास्ट ट्रैक कोर्ट के गठन हेतु।

श्रीमान,
बहुत दुःख के साथ आपको यह सूचित करना पड़ रहा है की नशे के सौदागरों ने हिमाचल जैसे शांत प्रदेश में भी अपनी पकड़ बना ली है। पिछले दिनों से प्रदेश के अखबार इन्ही खबरों से भरे हुए हैं की नशे की भारी खेप अलग अलग स्थानों पर पकड़ी जा रही है। चिंता की विषय यह हो गया है की नशे के यह सौदागर नाबालिगों और छात्रों को अपना शिकार बनाने में लगे हैं। स्कूल जाते बच्चों तक को प्रतिबंधित दवाइयों कैप्सूलों और चरस की सप्लाई मोहल्ले गांव तक करने तक करने के लिए नेटवर्क बन चुका है।

श्रीमान हिमाचल प्रदेश मध्यम आय वाले नागरिकों का प्रदेश हैं। यहाँ खेती बाड़ी से भी लोगों को इतनी आय नहीं है। अभिवावक अपनी मेहनत की जमा पूंजी से बच्चों को शिक्षण संस्थानों में भेज रहे हैं ताकि वो अच्छी शिक्षा के साथ नौकरी लेकर अपना जीवन यापन सम्मान पूर्वक कर सकें। परन्तु अभी पिछले कुछ मामलों में देखा गया की यही शिक्षण संस्थान नशे के सौदागरों के लिए मार्किट बन गए हैं। ऐसे हालात में तो प्रदेश की युवा पीढ़ी बर्बाद हो जाएगी। नशे की गर्त में फंसा युवा नशे की आपूर्ति के लिए गैरकानूनी रूप से धन कमाने की तरफ भी आकर्षित होगा। जिससे सभ्य समाज के ढांचे और शांति जिसके लिए प्रदेश को माना जाता रहा है उसका भी पत्तन होगा।

Drugs

महोदय प्रदेश का जिम्मेदार नागरिक होने के नाते मैं आपसे दरसखवात करता हूँ की प्रदेश में ऐसे कुकृत्यों में सलिम्पत अपराधियों को जल्द से जल्द सज़ा मिले इसके लिए अलग से एक फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन किया जाए जो इन मामलों में सुनवाई करे । समाज को पंगु और पीढ़ी को बर्बाद करने पर तुले ऐसे अपराधियों को कम समय के अंदर कड़ी सजा मिलेगी तो समाज में एक सन्देश जाएगा। कुछ दिन पहले मंडी जिला न्यायालय के फैसले को बदलते हुए माननीय उच्च न्यायालय की पीठ ने नशे के कारोबार में सलिम्पत आरोपियों को 15 से बीस साल की सज़ा का जो ऐतिहासिक फैसला सुनाया है उस फैसले से अपराधियों और इस गोरखधंदे से जुड़े लोगों के बीच अवश्य ऐसा ही सन्देश गया होगा।

मुझे उम्मीद है आप जनहित से जुड़े इस विषय पर अवश्य संज्ञान लेंगे।

भवदीय,
हिमाचल प्रदेश का नागरिक
आशीष नड्डा।

(लेखक आईआईटी दिल्ली में रिन्यूएबल एनर्जी की फील्ड में रिसर्च कर रहे हैं। मूलत: हिमाचल के बिलासपुर से हैं और प्रदेश से जुड़े मामलों पर लिखते रहते हैं। उनसे aashishnadda@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

लाहौल-स्पीति की बेटी रवीना ठाकुर छू रही हैं आसमान

शिमला।।

हिमाचल का खूबसूरत जिला लाहौल-स्पीति टैलंट के मामले में किसी भी फील्ड में हिमाचल और देश के अन्य हिस्सों से पीछे नहीं है। यहां एक ऐसा गांव है, जहां के लगभग हर घर से प्रसाशनिक सेवा में लोग मौजूद हैं। यह ऐसा जिला है, जहां लिंग अनुपात में बेटियां बेटों से आगे हैं। बर्फीले रेगिस्तान की धरती पर छोटे-छोटे खेतों में हरी सब्जियां उगाते मेहनतकश लोगों की बात की जाए तो भी लाहौल-स्पीति ने हिमाचल प्रदेश को हमेशा गौरवान्वित किया है।

इसी जिले से एक बेटी रवीना ठाकुर कमर्शल पायलट के लाइसेंस के साथ आसमान में उड़ान भरती हैं। इंडिगो एयरलाइन्स में बतौर पायलट कार्यरत रवीना ठाकुर प्रदेश की बेटियों के लिए एक प्रेरणा स्रोत है। रवीना ठाकुर का जन्म 6 जुलाई 1988 को रवि ठाकुर के घर में हुआ, जो वर्तमान में लाहौल स्पीति से विधायक भी हैं।


रवीना ठाकुर ने अपनी मूल शिक्षा मनाली शिमला और दिल्ली से ली उसके बाद उन्होंने अमेरिका में कमर्शल पायलट का कोर्स किया। रवीना ठाकुर अपने नाम के साथ सोशल मीडिया पर अपने जिले का नाम जोड़ के रखती हैं। अक्सर पारम्परिक वेशभूषा में लाहुल स्पीति के लोगों से मिलते हुए उन्हें देखा जा सकता है।

दलाई लामा के साथ रवीना।
दलाई लामा के साथ रवीना।

उनकी दादी स्वर्गीय लता ठाकुर 1972 में हिमाचल प्रदेश विधानसभा में कांग्रेस की तरफ से जीत कर आईं थीं ट्राइबल हिमाचल से एक महिला को राजनीति में आगे आना बहुत बड़ी बात थी। हालंकि दुनिया का सोचना था कि ट्राइबल इलाकों के लोग बहुत कंजर्वेटिव होते हैं, परन्तु हिमाचल का ताज लाहौल-स्पीति हमेशा इसका अपवाद रहा और यहाँ के लोगों ने बेटियों को हमेशा आगे रखा है। गौरतलब है की प्रदेश की पहली महिला पायलट अपराजिता लाल भी लाहौल स्पीति से सबंध रखती हैं।

पूर्व मुख्यमंत्री धूमल के छोटे बेटे अरुण ने DGP और अधिकारियों को धमकाया

शिमला।।

सरकार अभी बदली नहीं, मगर नेता पुत्रों के तेवर अभी से बदल गए हैं। पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के छोटे बेटे और अनुराग ठाकुर के भाई अरुण ने फेसबुक पोस्ट पर डीजीपी और अन्य पुलिस अधिकारियों को धमकाने वाली भाषा इस्तेमाल की है। उन्होंने पहले तो यह लिखा कि मुख्यमंत्री पुलिस अधिकारियों पर हमारे ऊपर केस बनाने का दबाव डाल रहे हैं, फिर पुलिस अधिकारियों को चेतावनी दे डाली।

अरुण ने फेसबुक पोस्ट में लिखा है, ‘मुख्यमंत्री जी पिछले दो तीन दिन से लगातार पुलिस अधिकारियों पर दवाब बना रहें हैं जैसे तैसे धूमल जी अनुराग जी और मुझ पर कोई भी केस बनाया जाए।

मैं इसका स्वागत करता हूँ और चुनौती देता हूँ अधिकारियों को कि केस बनायें पर उनका हश्र क्या होगा इसको ध्यान में रखें। मुख्यमंत्री का ख़ुद का क्या हाल हुआ है पिछले केस बना कर उसको देख लें। मुख्यमंत्री केवल चंद दिनों के मेहमान हैं उसको बाद अपना हाल सोच कर ही कोई क़दम उठाएँ

और DGP संजय जी को एक सुझाव-धृतराष्ट्र और दुर्योधन के संजय ना बने। जीत हमेशा सत्य की होती है, संजय की नहीं। संयम में रहें।

राजनीतिक बयानबाजी नई चीज नहीं है और पुलिस अधिकारियों पर पहले भी राजनेता सत्ता के दबाव में काम करने का आरोप लगाते रहे हैं। मगर पुलिस अधिकारियों को अंजाम देखने की खुलेआम धमकी देना शायद पहली बार हुआ है। मुख्यमंत्री को चंद दिनों का मेहमान बताते हुए पुलिस को ‘हश्र’ और ‘हाल’ देख लेने की धमकी देना क्या खुद पुलिसवालों पर दबाव बनाना नहीं है?

राजनीतिक गलियारों में चर्चा चल रही है कि इस तरह की बयानबाजी बीजेपी को भारी पड़ सकती है। मंडी से बीजेपी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री ने नाम न छापने की शर्त पर ‘इन हिमाचल’ को बताया कि डीजीपी प्रदेश पुलिस का मुखिया होता है और महकमे का सबसे बड़ा अधिकारी होता है। उसे इस तरह से धमकी नहीं दी जानी चाहिए। मुझे यह जानकर अफसोस हुआ कि शिमला से ही हमारी पार्टी के वरिष्ठ मंत्री रहे एक नेता के बेटे ने भी इस पोस्ट पर कॉमेंट किया है, जो प्रोत्साहन की तरह है। व्यक्तिगत लड़ाई में पार्टी का नुकसान हो जाए, यह बात ठीक नहीं।’

बहरहाल, सवाल ये भी उठ रहे हैं कि अगर किसी मामले में अरुण के खिलाफ जेनुइन यानी असली केस भी होता है, तो भी क्या वह हाल सोचने की धमकी देंगे? क्या अरुण यह साबित करना चाहते हैं कि अगर उनकी पार्टी की सरकार बनती है तो पुलिसकर्मियों को प्रताडि़त किया जाएगा? क्या उनके पिता पहले भी ऐसे ही अधिकारियों सो प्रताड़ित करते रहे हैं, जिससे कि वह इस बार भी धमकी दे रहे हैं?

Arun

गौरतलब है कि अनुराग ठाकुर के साथ-साथ अरुण पर भी एचपीसीए केस में कई आरोप लगते रहे हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अगर सरकार बदलती है तो क्या पुलिस अधिकारी ऐसे ही किसी मामले की निष्पक्ष जांच कर पाएंगे या उसे रफा-दफा कर दिया जाएगा? बहरहाल, अभी सरकार बदली नहीं है और यह भी तय नहीं है कि अगला सीएम कौन होगा। नड्डा के आने की अटकलें भी तेज हैं। मगर सोशल मीडिया पर चर्चा है कि इस तरह की बयानबाजी दिखाती है कि प्रदेश की राजनीति किस तरह से चलती है और अधिकारियों पर कितना दबाव रहता होगा।

इस बीच कानून के जानकारों का कहना है कि और मामलों में पुलिस अरुण के खिलाफ केस बनाए या न बनाए, मगर इस पोस्ट के आधार पर उनके खिलाफ न सिर्फ केस हो सकता है, बल्कि कार्रवाई भी हो सकती है। सरकारी कर्मचारियों को धमकी देने समेत कई धाराओं में पुलिस न सिर्फ मामला दर्ज कर सकती है, बल्कि जरूरत पड़ने पर गिरफ्तार भी कर सकती है।

बीजेपी में शांता-धूमल की तरह कभी नहीं होगा नड्डा-धूमल शीतयुद्ध!

  • सुरेश चंबयाल

प्रदेश की अखबारें केंद्रीय मन्त्री जेपी नड्डा के शिमला दौरे के बाद से कई अटकलों एवं चर्चाओं से अटी पड़ी हैं। कुछ लिखते हैं यह बीजेपी में शांता-धूमल के बाद तीसरे युग का सूत्रपात है तो कुछ लिखते हैं नड्डा के इर्द-गिर्द धूमल समर्थकों का घूमना भी इस बात को पुख्ता करने लगा है कि आने वाले चुनावों की दिशा क्या रहेगी। कुल मिलाकर हर राजनीतिक पंडित इसे नड्डा युग के आगाज में रूप में दिखा रहा है।

कुछ लोगों का मानना है कि पूर्व मुख्यमन्त्री प्रेम कुमार धूमल की प्रदेश राजनीति में मंडल स्तर तक जो पकड़ है, उसे दरकिनार करते हुए नड्डा के हाथ कमांड देना पार्टी को महंगा भी भी पड़ सकता है। कुछ लोग इसे शांता-धूमल शीत युद्ध के बाद नड्डा -धूमल शीत युद्ध के तौर पर देख रहे हैं। निश्चित तौर पर धूमल की पकड़ को नकारा नहीं जा सकता, मगर जहां तक शीतयुद्ध की बात है, अगर नड्डा को कमान मिल भी जाती है, तब भी शांता-धूमल टाइप शीतयुद्ध देखने में नहीं आएगा।

क्यों नहीं आएगा, इस पर चर्चा करने से पहले हमें 90 के दौर में जाना होगा। बाबरी-मस्जिद विध्वंस के बाद जब शांता कुमार सरकार गिरी, उस वक्त प्रेम कुमार धूमल प्रदेश बीजेपी के अध्यक्ष थे। उन्हें हमीरपुर से शांता कुमार ने कद्दावर नेता ठाकुर जगदेव चंद को काउंटर करने के लिए इतने बड़े औहदे पर खुद ही बिठाया था। 1993 चुनावों में शांता कुमार की खुद की हार के बाद जगदेव ठाकुर इकलौते नेता बचे जो पार्टी में सबसे सीनियर थे और जीत कर भी आए थे परन्तु चुनावों के हफ्ते भर बाद उनका अकस्मात निधन हो गया। अब प्रदेश बीजेपी फिर शांता कुमार पर केंद्रित थी। धूमल प्रदेश अध्यक्ष थे और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रदेश प्रभारी। ज्ञात हो कि उस समय धूमल विधानसभा में नहीं थे। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष जेपी नड्डा थे।

Nadda Dhumal

धीरे-धीरे अपनी संगठन कुशलता एवं मृदु सवभाव से धूमल प्रदेश बीजेपी में लोकप्रिय होने लगे। बाबरी मस्जिद पर पार्टी स्टैंड से अलग स्टैंड रखने वाले शांता कुमार उस समय संघ और बीजेपी के बड़े नेताओं की आंख की किरकरी भी बन चुके थे साथ ही उनकी कर्मचारी विरोधी छवि से बुरी तरह हारी बीजेपी 1998 का चुनाव शांता कुमार के नेतृत्व में लड़ने से डर रही थी। प्रदेश प्रभारी नरेंद्र मोदी का झुकाव भी धूमल की तरफ ही था।

1998 चुनावों की घोषणा के साथ ही शांता-धूमल का शीत युद्ध शुरू हो गया। कांगड़ा के अधिकतर नेता शांता कुमार के साथ थे तो धूमल के साथ भी अच्छा खासा समर्थन था। टिकट आवंटन की मीटिंग में ज्वालाजी गेस्ट हॉउस में ऐसी नौबत आ गई कि शांता और धूमल समर्थक नेता आपस में हाथापाई तक उलझ गए थे, जिसे प्रदेश बीजेपी के इतिहास में ज्वालाजी कांड कहा जाता है। 1998 में शांता को किनारे कर धूमल मुख्यमंत्री भी बन गए, परन्तु शांता-धूमल समर्थक गुटबाजी में उलझी भाजपा कभी इस से बाहर नहीं आ पाई। लेकिन हां, ऐसा जरूर हुआ की शांता कुमार के समर्थक नेता धीरे-धीरे धूमल के साथ अपना भविष्य जोड़ते गए।

केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिए जाने के बाद शांता कुमार राजनीतिक रूप से और कमजोर हुए। एक दशक के अंदर 2007 तक धूमल के पास प्रदेश राजनीति में ऐसे समर्थक विधायकों की फौज हो गई जो उनके समर्थन में कुछ भी कर सकती थी, जैसे वीरभद्र समर्थक नेता करते हैं। इसीलिए 2007 में जब शांता कुमार की प्रदेश राजनीति में लौटने की सुगबुगाहट हुई, तब इन्ही समर्थकों के भार से वो आवाज कहीं दब गई। परन्तु जब भी प्रदेश में चुनाव होता टिकट आवंटन पर शांता -धूमल शीतयुद्ध हावी रहता। खासकर कांगड़ा में 2012 में जो नतीजे आए वो सब जानते हैं।

2007 से 2012 तक के कार्यकाल में धूमल अपनी रणनीति से शांता समर्थकों को या तो अपने साथ ला चुके थे या फिर राजनतिक हाशिये पर धकेल चुके थे। सरवीण चौधरी रविंद्र रवि आदि नेता अब धूमल के ज्यादा नजदीक थे। वहीं महेश्वर सिंह , महिंदर नाथ सॉफ्ट किशन कपूर रमेश धवाला आदि नेता राजनीतिक हाशिये पर धकेले जा रहे थे। इसी बीच अब तक किसी गुट में नहीं रहे और अपनी स्वतंत्र छवि बरकरार रखे हुए जेपी नड्डा ने 2003 का चुनाव हारने के बाद 2007 में 19 000 के मार्जन से फिर जीत दर्ज करते हुए जबरदस्त वापसी की। शांता के वर्चस्व को धूमिल करने के बाद धूमल का टारगेट अब नड्डा थे।

उस वक़्त प्रदेश राजनीति में धूमल का दबदबा भी जोरों पर था। सीनियर नेता होने के बावजूद नड्डा को लोक निर्माण, सिंचाई एवं जनस्वस्थ्य, हेल्थ , उद्योग और शिक्षा आदि महत्वपूर्ण पोर्टफोलियो से अलग रखकर वन विभाग दिया गया, जो सीधे तौर पर जनता से नहीं जुड़ा था। यहां से नड्डा और धूमल के बीच अघोषित युद्ध शुरू हुआ। स्थिति यहां तक आ गई कि नड्डा ने मंत्रिपद छोड़कर प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष बनने की इच्छा जाहिर कर दी, परन्तु उनकी जगह खीमी दी गई। इसी के साथ चुनावी वर्ष 2012 के पहले पखवाड़े में ही नड्डा मंत्रिपद से त्यागपत्र देकर गडकरी की टीम का हिस्सा बनकर दिल्ली आ गए और मिशन मोदी की रीढ़ बन गए। 2012 के चुनावों में फिर शांता -धूमल शीत युद्ध में फंसी बीजेपी बुरी तरह हारी।

उधर केंद्र में नड्डा मजबूत होते गए। संगठन के रास्ते बढ़ते-बढ़ते नड्डा पार्टी की सबसे बड़ी इकाई केंद्रीय पार्लियामेंट्री बोर्ड चुनाव सीमिति का हिस्सा तो बने ही, साथ ही केंद्रीय स्वास्थ्य मन्त्री बनकर मोदी की कैबिनेट में शामिल हो गए।

अब नड्डा प्रदेश का रुख करते भी हैं या सोचते भी हैं , तब भी शीतयुद्ध नहीं हो सकता क्योंकि युद्ध समर्थकों के दम पर लड़ा जाता है। और बेशक धूमल समर्थक नेता प्रदेश में हों, परन्तु वे न तो खुलकर नड्डा के साथ हो न सकते हैं और नही इस मामले में धूमल का समर्थन कर सकते हैं। नड्डा का रुतबा पार्टी में अब इतना बड़ा है कि कोई चाहकर भी यह नहीं जता पाएगा कि वह नड्डा के प्रदेश में आने से खुश नहीं है। केंद्रीय चुनाव सिमिति और पार्लियामेंट्री बोर्ड में बैठे व्यक्ति से कोई भी मंझा हुआ नेता टकराव नहीं पालना चाहेगा। ऊपर से नड्डा अभी 55 साल के हैं। वो मुख्यमंत्री बनकर आएं या न आ पाएं, परन्तु उनसे घोषित टकराव करके कोई भी धूमल समर्थक भविष्य के लिए रार नहीं पालना चाहेगा। शांता विरोधियों को धूमल की शरण मिल जाती थी परन्तु नड्डा का सरेआम विरोध करके धूमल की शरण कब तक बचा पाएगी, इसपर हर कोई सोचेगा। तब शांता कुमार वृद्धावस्था की तरफ बढ़ रहे थे और अब धूमल बढ़ रहे हैं।

शिमला में नड्डा के आसपास धूमल समर्थकों की फौज इसलिए यही दिखाने के लिए दिखी कि हम पार्टी के आदमी हैं और उसके हर फैसले का सम्मान करेंगे। नड्डा ने अपना रुतबा इतना बड़ा कर लिया है कि धूमल -नड्डा शीतयुद्ध अब संभव नहीं हैं। नड्डा वैसे भी प्रतिक्रिया देने वाले नेता नहीं जाने जाते। वह प्रदेश राजनीति में आएंगे या वर्तमान हालात का लुत्फ उठाते रहेंगे, यह राज वही जानते हैं। जब तक वह खुद पत्ते नहीं खोलेंगे, तब तक अटकलों के बाज़ार यूं ही गर्म रहेंगे। मगर शीतयुद्ध की संभावना न के बराबर है।

(लेखक हिमाचल प्रदेश से जुड़े विभिन्न मसलों पर लिखते रहते हैं। इन दिनों इन हिमाचल के लिए नियमित लेखन कर रहे हैं।)

DISCLAIMER: लेख में लिखी बातों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी है।

हिमाचल की जमीन पर जम्मू-कश्मीर का दावा, लद्दाख के लोगों ने बना ली दुकानें

इन हिमाचल डेस्क।।

हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के बीच सीमा विवाद उभरता हुआ नजर आ रहा है। लाहौल-स्पीति से विधायक रवि ठाकुर का आरोप है कि जम्मू-कश्मीर के बाशिंदों ने सारचू (केलॉन्ग से 100 किलोमीटर दूर) में हिमाचल के अंदर अस्थायी ढांचे खड़े कर दिए हैं। एक अन्य जगह पर भी इसी तरह के हालत देखने को मिल रहे हैं।

जम्मू-कश्मीर से हिमाचल के तीन जिलों- कांगड़ा, चंबा और लाहौल-स्पीति की सीमाएं लगती हैं। विधायक रवि ठाकुर ने इस मामले में नैशनल कमिशन फॉर शेड्यूल्ड ट्राइब्स का ध्यान खींचते हुए दावा किया है कि लद्दाख प्रशासन ने तो इस जमीन पर अपना दावा बता दिया है और अपने लोगों को हिमाचल की सीमा के अंदर टूरिस्ट सीजन में अपनी दुकानें वगैरह खोलने दी हैं।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक विधायक ने आशंका जताई है कि अगर मामला जल्द नहीं सुलझा तो इस तरफ के लोगों की नाराजगी से तनाव और बढ़ सकता है। लद्दाख और लेह के द्वार पर हिमाचल प्रदेश टूरिजम डिवेलपमेंट कॉर्पोरेशन का काफी कुछ दांव पर लगा होता है, क्योंकि मनाली-लेह हाइवे होते ही टूरिस्ट यहां से जम्मू-कश्मीर में जाते हैं।

ठाकुर ने कहा कि हिमाचल और जम्मू-कश्मीर की सीमाओं को दर्शाने के लिए तांबे के पिलर भी लगे हैं, मगर पड़ोसी जम्मू-कश्मीर मामले को सुलझाने के मूड में नहीं है। रवि नैशनल कमिशन फॉर शेड्यूल ड्राइब्स के वाइस चेयरमैन हैं और उन्होंने दोनों राज्यों के ऑफिशल्स को समन किया था। मगर ठाकुर का कहना है कि लद्दाख प्रशासन ने इस मीटिंग के लिए निचले स्तर के अधिकारी भेजे थे, जिन्होंने इस मामले पर साफ कुछ भी नहीं बताया।

हिमाचली संगीत और मॉडर्न म्यूजिक का शानदार फ्यूज़न- ढाटू

0

इन हिमाचल डेस्क।।

हिमाचल के सिंगर और म्यूजिक प्रड्यूसर ललित सिंह एक नया म्यूजिक विडियो लेकर आए हैं। इसका टाइटल ‘ढाटू’ (Dhattu) रखा गया है। इस गाने को उन्होंने अपनी मां, हिमाचल प्रदेश और पहाड़ी लोगों के लिए समर्पित किया है। ढाटू या ढाठू दरअसल एक तरह का स्कार्फ है, जिसे हिमाचल में महिलाएं सिर पर बांधती हैं।

ललित शिमला से हैं और इन दिनों The Pahari Project नाम से एक प्रॉजेक्ट पर काम कर रहे हैं। ललित ने बताया कि यह प्रॉजेक्ट दिनोदिन लोकप्रिय होता जा रहा है। इस प्रॉजेक्ट में वह हिमाचली संगीत को मॉडर्न म्यूजिक के साथ मिलाकर फ्यूज़न तैयार कर रहे हैं।

Dhattu

इस विडियो को RCH फिल्म्स ने तैयार किया है। भविष्य की योजनाओं पर बात करते हुए ललित ने इन हिमाचल को बताया कि आगे वह और भी गने लेकर आ रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘मैं बस यही कोशिश कर रहा हूं कि हिमाचल में एक नई तरह का म्यूजिक लेकर आऊं। हिमाचल के ट्रेडिशन का मॉडर्न म्यूजिक के साथ फ्यूज़न करूं , जैसे कि इस गाने में मैंने हिंदी इंग्लिश मिक्स किया है।’

इस खूबसूरत गाने में गायक को जीवन में आगे बढ़ने और लक्ष्यों के पाने की राह में बढ़ते वक्त मां का ढाटू प्रेरित करता है। खुद देखें यह विडियो….

 

तो क्या जल्दी चुनाव करवा रहे हैं वीरभद्र सिंह?

सुरेश चंबयाल

प्रदेश में हालांकि चुनावों में वक़्त है परन्तु राजनीतिक खींचतान देखकर लगता है प्रदेश राजनीति के चाणक्य वीरभद्र सिंह अपने जीवन के अंतिम दांव के तहत चुनाव जल्दी करवा सकते हैं। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के दौरे और हर क्षेत्र में राष्ट्रीय राजमार्गों की घोषणा के बाद बीजेपी में जहां नई फुर्ति का संचार हुआ है वहीं सीबीआई द्वारा की जा रही पूछताछ के बाद मुख्यमंत्री के तेवर बदले बदले से लग रहे हैं। सीबीआई की पूछताछ के बाद जब वीरभद्र दिल्ली से लौटे थे, वह आक्रामक नजर आए थे। उन्होंने दर्शा दिया है कि उम्र चाहे जो भी कहती हो, अगला चुनाव हर हाल में वह अपने नेतृत्व में लड़ेंगे। इसीलिए कई पदों पर भर्तियां निकाली गई हैं और हर जगह कोई न कोई नया ऐलान हो रहा है।

Virbhadra

राजनीतिक पंडितों को इसका एहसास इस बात से भी होने लगा है की जिस तरह से मुख्यमंत्री के कांगड़ा, मंडी, सिरमौर और कबायली क्षेत्रों के दौरे बढ़े हैं, इसमें जरूर कुछ स्कीम है। इन क्षेत्रों को मिला कर लगभग 30 से ऊपर विधानसभा सीटें बनती हैं। सिरमौर कांग्रेस का गढ़ रहा था, मगर उसे छोड़कर हर क्षेत्र में कांग्रेस की अब मजबूत पैठ है। सीबीआई के कसते शिकंजे के बाद वीरभद्र लम्बा समय चुनाव के लिए नहीं देना चाहेंगे। वह नहीं चाहेंगे कि सीबीआई की इन्क्वायरी किसी मोड़ तक आए और अपनी ही पार्टी में उनकी जगह रिप्लेसमेंट की आवाज उठे।

कांगड़ा में बाली का घेराव
उम्रदराज होने के बावजूद बुशहर का यह राजा अंदर-बाहर हर मोर्चे पर खुद ही लड़ रहा है। इसी नीति के तहत अपनी पार्टी में मुख्यमंत्री के लिए कांगड़ा की आवाज बन रहे परिवहन मंत्री जीएस बाली के पर कतरने के लिए हड़ताल के शिगूफे में भी कहीं न कहीं राजनीति की बू आ रही है। साथ ही नगरोटा बगवां जिस सीट से बाली जीत कर आते रहे हैं और जहां चौधरी समुदाय की भरमार है, वहां चौधरी समुदाय का सम्मेलन आयोजित हुआ। खास रणनीति के तहत चौधरी समुदाय के नेता चन्द्र कुमार के बेटे वर्तमान विधायक नीरज भारती की गर्जना इस सम्मेलन में करवाई गई।

गडकरी के दौरे में नड्डा का बाली को पार्टी में आने का आमंत्रण और वीरभद्र का यह कहना कि बाली जाना चाहे तो जा सकते हैं, दिखा रहा है कि सुखराम और स्टोक्स के बाद वीरभद्र सिंह अब बाली को ही अपना प्रतिद्वंद्वी मानकर चल रहे हैं। बाली को कंट्रोल करने के लिए उन्होंने कांगड़ा किले के मोर्चों पर घेराबंदी भी कर दी है। नीरज भारती और संजय रतन के साथ पवन काजल भी इस कार्य को बखूबी निभा रहे हैं। नीरज भारती को तो मुख्यमंत्री ने खुली छूट भी दे रखी है।

बीजेपी नहीं है तैयार
वीरभद्र सिंह मान रहे हैं कि प्रदेश बीजेपी अभी चुनावी रूप से तैयार नहीं है। धर्मशाला नगर निगम चुनाव में जिस तरह पूरा कुनबा लगाने के बावजूद भाजपा की करारी हार हुई है, यह कहीं न कहीं मुख्यमंत्री को राहत दे रहा है। धूमल-शांता और अब नड्डा गुटों में बंटी भाजपा किसके लीडरशिप में चुनाव लड़ेगी, यह अभी तय नहीं है। पूर्व मुख्यमंत्री धूमल इस कड़ी में दिल्ली का चक्कर लगा चुके हैं परन्तु शाह मॉडल पर चल रही बीजेपी कोई ग्रीन सिग्नल उन्हें नहीं दे रही है। वीरभद्र सिंह मानकर चल रहे होंगे कि बीजेपी जब तक अपना संगठन और नेता तय करे, उससे पहले ही प्रदेश में चुनाव की घोषणा कर दी जाए, जिससे बीजेपी के अंदर नेतृत्व के लिए जो भी आक्रोश पनपे, उसका फायदा लिया जाए। हालांकि कांग्रेस के सभी मंत्री-संत्री अपने विधानसभा क्षेत्रों में डट चुके हैं। देश में हालिया हुए चुनावों से कांग्रेस की जो हालत पतली हुई है, उसी डर के कारण कांग्रेसी सत्ता सुख छिन जाने के भाव से डरे हुए हैं।

राहुल की नाराजगी
सूत्रों की मानें तो कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी पार्टी में परिवर्तन चाहते हैं और पुराने नेता, जो किसी भी तरह सत्ता से चिपके रहना चाहते हैं, राहुल के फॉर्मूले में सेट नहीं बैठ रहे। राहुल अब युवा लोगों को आगे लाना चाहते हैं ताकि भविष्य में कांग्रेस का कुछ हो सके। उनके फॉर्मूले में वीरभद्र सिंह सेट नहीं बैठ रहे हैं। पिछली बार भी वीरभद्र सिंह कड़े तेवर लेकर प्रदेश में लौटे थे, परन्तु इस बार हालत अलग है। इस बार सत्ता विरोधी लहर कांग्रेस के लिए होगी, न कि भाजपा के लिए।

परिवार की चिंता
सीबीआई के शिकंजे के बावजूद सत्ता में बने रहने की हर हाल में जो मजबूरी मुख्यमंत्री की है उसमे परिवार का भी रोल है।प्रतिभा सिंह की मंडी से हार से वीरभद्र सिंह को झटका लगा है। अगले कुछ वर्षों में उन्हें प्रतिभा से लेकर बेटे विक्रम को भी राजनीति में सेट करना है, इसलिए वीरभद्र सोच रहे हैं कि अगले पांच साल फिर सत्ता मिल जाए तो वह हर काम बखूबी कर सकते हैं। और अगर सत्ता का कंट्रोल हाथ से गया तो सबकुछ बिखर भी सकता है।

पहले भी जल्दी चुनाव करवा चुके हैं वीरभद्र
ऐसा नहीं है कि वीरभद्र सिंह पहली मर्तबा ऐसी सोच रख रहे होंगे। इससे पहले भी अपने खास ज्योतिषी प्रेम शर्मा की सलाह पर वीरभद्र सिंह ऐसा कर चुके थे परन्तु उस समय हार का सामना करना पड़ा था। मगर वह हार सुखराम फैक्टर से हुई थी। हालांकि राजा साब की कैलकुलेशन उस समय भी सही थी। पंजाब में अकाली-भाजपा विरोधी लहर है। इस बात को ध्यान में रखते हुए वीरभद्र सिंह हिमाचल में भी समय पूर्व चुनाव करवाने का अपना दांव खेल सकते हैं।

पढ़ें: हिमाचल में सीएम कैंडिडेट कौन होगा, इसपर क्या कहा बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष सतपात सत्ती ने

(लेखक हिमाचल से जुड़े मसलों पर लंबे समय से लिख रहे हैं। इन दिनों In Himachal के लिए लेख लिख रहे हैं)

मैंने नहीं कहा कि धूमल ही होंगे सीएम कैंडिडेट: सतपात सत्ती

शिमला।।

हिमाचल प्रदेश में अगले साल होने जा रहे चुनावों में बीजेपी की सीएम कैंडिडेट कौन होगा, इसे लेकर अटकलों का दौर जारी है। मीडिया के कुछ हिस्सों में खबर आई थी कि बीजेपी के प्रदेशाध्यक्ष सतपात सिंह सत्ती ने धूमल की पैरोकारी की है। मगर न्यूज पोर्टल ‘समाचार फर्स्ट’ के मुताबिक सत्ती ने इस तरह का कोई बयान देने से इनकार किया है।



समाचार फर्स्ट के मुताबिक सतपाल सत्ती ने बताया कि उन्होंने कभी भी सीएम कैंडिडेट के संबंध में बात ही नहीं की है। प्रदेश के एक नामी अखबार पर आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा कि अपना नाम बनाने के लिए अखबार ने झूठा बयान लिखा। सत्ती ने कहा, ‘कुल्लू में दिए गए मेरे बयान की रेकॉर्डिंग इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पास है। उसको भी चेक किया जाए। मैंने इस संबंध में कुछ कहा ही नहीं है।’

Satpal satti

यह पूछे जने पर कि वह जेपी नड्डा को बेहतर मानेंगे या फिर प्रेम कुमार धूमल को, सत्ती ने कहा कि यह तय करना पार्टी आला कमान का काम है और हमारा काम उनके निर्देशों को पूरा करना है। इस बीच बीजेपी के सीनियर नेता राजीव बिंदल ने भी गुटबाजी की खबरों को गलत बताते हुए कहा कि पार्टी एकजुट है और यह सुनिश्चित करने में जुटी है कि अगला सीएम बीजेपी का ही हो।

लेख: निर्लज्ज भारती की वजह से शर्मिंदा हैं हम जवाली निवासी

0
  • संदीप चौधरी

आज सुबह अपनी फेसबुक फीड में नीरज भारती से जुड़ी एक पोस्ट दिखी, जिसमें कहा गया था वह अनाप-शनाप पोस्ट करते हैं। कई सालों से पुणे में हूं, इसलिए राजनीति पर ज्यादा ध्यान नहीं देता। कई बार मैंने परिजनों और दोस्तों को इस बारे में बात करते सुना, मगर ध्यान नहीं दिया। खुद ज्वाली का रहने वाला हूं, इसलिए आज सुबह जिज्ञासावश नीरज भारती की प्रोफाइल देखने चला गया। देखकर हैरान हो गया कि उसमें कितनी वाहियात पोस्ट्स हैं। प्रधानमंत्री को भौंकेंद्र मोदी, रामदेव को हरामदेव कानिया… और भी न जाने क्या-क्या।

neeraj

इतनी गिरी हुई भाषा? कैसी मानसिकता है, यहां पर एक चुना हुआ नुमाइंदा इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल कर रहा है। राजनीतिक विरोध अपनी जगह है, मगर ऐसी भाषा तो वही इस्तेमाल कर सकता है, जिसकी मानसिक स्थिति ठीक न हो। शिक्षित व्यक्ति भी असभ्य हो सकते हैं, इसका प्रमाण देखने को मिल गया। यकीन नहीं हुआ कि यह एक चुने हुए जन प्रतिनिधि की प्रोफाइल है।

विरोधी नेताओं को गलत नामों से पुकारना और उनकी शारीरिक विकृति का मजाक बनाना किसी भी समझदार व्यक्ति की निशानी नहीं है। बाबा रामदेव को ‘कानिया’ इसलिए कहा गया, क्योंकि उनकी एक आंख सामान्य नहीं है। इससे पता चलता है कि विकलांगों को किस नजर से देखते हैं यह जनाब। ऊपर से जनाब से अपनी पोस्ट्स में जस्टिफाई किया था कि बीजेपी वालों को उन्हीं की भाषा में जवाब दिया जा रहा है।


edu
ऐसी बातें वही कर सकता है, जिसकी समझ का स्तर मोहल्ले के उन गंजेड़ी लड़कों सा हो, जिनका परिवार, समाज, संस्कार और मर्यादाओं से कभी पाला नहीं पड़ा। इसमें कोई दो राय नहीं है कि बीजेपी समर्थक भी कांग्रेस नेताओं के प्रति ऐसी भाषा इस्तेमाल करते रहे हैं। मगर इसका मतलब यह नहीं कि उनसे दो कदम आगे बढ़कर उनसे भी गिरा हुआ व्यवहार करने लग जाएं।
 
यही फर्क होता है एक समझदार और बेवकूफ में। यह समझदारी परिवार, समाज और दोस्तों की संगत से मिलती है। पढ़ने को यह भी मिला कि नीरज भारती के पिता ने कहा कि उनका बेटा कुछ भी गलत नहीं कर रहा। इससे पता चलता है कि नीरज भारती ऐसे क्यों हैं।

हैरानी यह भी हुई कि इस घटिया इंसान की प्रोफाइल में मुझे कुछ म्यूचुअल फ्रेंड्स भी दिखाई दिए। यही नहीं, इन लोगों ने नीरज भारती की पोस्ट्स जो लाइक भी किया था। पिछले दिनोंं एक कार्टून नजर आया, जिसमें नीरज भारती के व्यवहार को जस्टिफाई किया गया था। हैरानी हुई कि यह कार्टून ऐसे शख्स ने बनाया था, जिसे हिमाचल में बहुत से लोग एक प्रबुद्ध व्यक्ति मानते हैं। वैसे तो वह जनाब प्रदेश के हर मुद्दे पर राजनेताओं को घेरते हैं, मगर न जाने क्यों उन्हें नीरज भारती का व्यवहार पसंद आया। खैर, यह उनकी निजी सोच है, मगर निजी सोच ऐसी है तो उन्हें खुद को हिमाचल के हितों का पैराकार दिखाना बंद कर देना चाहिए।
जब कभी जवाली आता हूं, अपने गुरुजनों और अन्य प्रबुद्ध लोगों से मिलता हूं तो वे नीरज भारती को धिक्कारते हैं। उनका कहना होता है कि नीरज भारती की वजह से प्रदेश के अन्य हिस्सों के लोग उन्हें ताने मारने लगे हैं कि आप कैसे लोग चुनते हैं। यह सही है कि एक व्यक्ति विधायक को नहीं चुन सकता, मगर किसी के चुने जाने का मतलब ही यही है कि अधिकतर लोगों ने उसे अपने प्रतिनिधित्व लायक समझा है। और इसी वजह से ज्वाली के अन्य बुद्धिजीवी ही नहीं, सामान्य लोग भी शर्मिंदा हैं।नाम बदलने का इतना ही शौक है तो नीरज भारती को सबसे पहले अपना नाम बदलकर निर्लज्ज भारती रख लेना चाहिए। उन्हें ही नहीं, उनकी पार्टी INC को अपने नाम की फुलफॉर्म इंडियन निर्लज्ज कांग्रेस कर लेना चाहिए, क्योंकि इतना कुछ होने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं की ज रही। वीरभद्र सिंह वैसे तो पूरे प्रदेश में घूमकर भाजपाइयों वगैरह को ज्ञान देते रहते हैं, मगर अपने संसदीय सचिव को दो घूंट नसीहत नहीं दे सकते। हाल ही में मूंछें रखकर खुद को सख्त दिखाने की कोशिश करने वाले यूथ कांग्रेस वैसे तो बहुत आक्रामक रहते हैं, मगर अपनी पार्टी की खराब होती छवि को बचाने के लिए नीरज भारती से बात नहीं कर रहे।

फेसबुक वगैरह पर कुछ भी करना, किसी को अपमानित करना, धमकी देना या किसी भी तरह का अपराध आईटी ऐक्ट के दायरे में आता है। आए दिन हिमाचल सरकार द्वारा किए जा रहे कामों का क्रेडिट लेने वाले मुख्यमंत्री के तथाकथित आईटी सलाहकार भी नीरज भारती की फ्रेंड लिस्ट में हैं (अब नहीं हैं, संभवतः उन्होंने अन्फ्रेंड कर दिया हो) और उनके कई स्टेटसों को लाइक करते हैं। मगर वह अपने सीएम के चहेते को यह नहीं बता रहे कि आईटी ऐक्ट की किन धाराओं के तहत मामला दर्ज हो सकता है और जो किया जा रहा है, वह कितना गलत है।

इसी को कहते हैं सत्ता का दुरुपयोग। यह दिखाता है कि हम सरकार में हैं, आप जो मर्जी कर लें। केंद्र पर सीबीआई के दुरुपयोग का आरोप लगाने वाले कांग्रेसी नेताओं को यह नहीं दिखता कि कैसे उनका एक नेता अपने पद का दुरुपयोग कर रहा है। मगर इन लोगों को शर्म नहीं आएगी। मोटी चमड़ी वाले नेता अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकते रहेंगे। शर्म आएगी हम जैसे लोगों को, जिनका सिर नीचा हुआ पड़ा है।

पिछले दिनों मैंने देखा कि कुछ लोग कॉमेंट करते हैं कि ‘इन हिमाचल’ क्यों बार-बार इस शख्स की खबरें उठा रहा है और क्यों तवज्जो दे रहा है। मैं इन हिमाचल को साधुवाद देता हूं कि वह ऐसी खबरों उठा रहा है। इसीलिए मैंने अपना यह आर्टिकल भेजा, क्योंकि इन हिमाचल का मैं समर्थन करता हूं कि किसी एक व्यक्ति की वजह से अगर प्रदेश बदनाम हो रहा हो, तो उसपर कार्रवाई होनी चाहिए। वीरभद्र कार्रवाई करे या न करे, उनकी सारा ध्यान तो अपने ऊपर हो रही कार्रवाई से बचने पर फोकस है। मगर ज्वाली की जनता में आक्रोश पनप रहा है और वह कार्रवाई जरूर करेगी। चुनाव आने को हैं। पहले मैंने सोचा कि नाम बदलवा दिया जाए, क्योंकि मेरी माता शिक्षा विभाग मे कार्यरत हैं और हो सकता है कि राजनीतिक दुर्भावना के तहत शिक्षा विभाग के संसदीय सचिव कोई कदम उठाएं। मगर सच कहने में डर कैसा। मैंने कुछ भी गलत नहीं कहा।

(लेखक पुणे में आईटी इंजिनियर हैं, मूलरूप से कांगड़ा के जवाली के रहने वाले हैं।)

दियोटसिद्ध में बाबा बालकनाथ की गुफा में आकर बैठा मोर

हमीरपुर।।

दियोटसिद्ध में बाबा बालकनाथ जी के मंदिर में हुई एक घटना सोशल मीडिया पर छाई हुई है। मंगलवार को एक मोर उड़कर आया और बाबा बालकनाथ जी की गुफा में उनकी प्रतिमा के सामने बैठ गया। गौरतलब है कि मोर को बाबा बालकनाथ का वाहन माना जाता है।

13435586_1047803771973677_8369463454912356661_n
दियोटसिद्ध के जंगलों में मोर रहते हैं और मान्यताओं के अनुसार बाबा बालकनाथ मोर के जरिए ही शाहतलाई से इस गुफा तक आए थे। मंगलवार को गुफा तक आया मोर बेहद शांत था। चारों तरफ इस घटना की चर्चा है, क्योंकि मोर शर्मीला पक्षी होता है। यह इंसानों से दूरी बनाकर रखता है। मंदिर में भीड़भाड़ वाली जगहों पर इसके आने से लोग हैरान हैं।
13450850_1047803791973675_5274747842691075410_n
बाबा बालकनाथ के नाम पर बनाए एक फेसबुक पेज पर तस्वीरें डाली गई हैं और बताया गया है कि कैसे मोर गुफा तक आ  गया। यही नहीं, पुजारी ने मोर को अपनी गोद में उठाया और मोर शांत बैठा रहा। इस घटना को लोग शुभ मान रहे हैं।

https://www.facebook.com/permalink.php?story_fbid=1047803838640337&id=420428951377832