लेख: सरकार बनाकर हिमाचल के लिए क्या नया कर देगी बीजेपी?

आई.एस. ठाकुर।। हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव प्रचार के लिए कांग्रेस की तरफ से जहां अकेले मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने ही मोर्चा संभाला हुआ है, बीजेपी अपनी पूरी ताकत झोंकती हुई नजर आ रही है। प्रेम कुमार धूमल के अलावा केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा तो हिमाचल में डटे ही हुए हैं, बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह भी यहां आकर रैली पर रैली किए जा रहे हैं। योगी आदित्यनाथ से लेकर नितिन गडकरी समेत कई नेता हिमाचल आ-जा रहे हैं। जहां वीरभद्र सिंह जनता के बीच जाकर अपनी सरकार की उपलब्धियां गिना रहे हैं और अपने ऊपर चल रहे मामलों के लिए बीजेपी नेताओं को जिम्मेदार बता रहे हैं, वहीं बीजेपी के नेता केंद्र सरकार की उपलब्धियों को गिनाते हुए हिमाचल सरकार और खासकर यहां के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह को करप्ट बताने में लगे हुए हैं।

वही घिसे-पिटे डॉयलॉग वाले भाषण
अमित शाह अपने भाषणों में कांग्रेस के कार्यकाल में हुए घोटालों को गिना रहे हैं और वादा कर रहे हैं कि बीजेपी की सरकार आएगी तो जिस तरह के नरेंद्र मोदी सरकार पर घोटाले का एक भी दाग नहीं लगा, वैसे ही हिमाचल में बीजेपी की सरकार ईमानदारी से काम करेगी। कई तरह की बातें उनके भाषणों में हैं और कई तरह के वादे हैं। मगर अमित शाह और बीजेपी नेताओं के भाषणों को नजर डालें तो ये कोई नए भाषण नहीं हैं। पिछले कुछ सालों में पूरे देश में जहां कहीं भी विधानसभा चुनाव हुए हैं, अमित शाह के भाषण का विषय यही रहा है, उसकी सामग्री यही रही है और वादे भी यही रहे हैं। झारखंड, हरियाणा, उत्तराखंड, यूपी… सब जगह यही रणनीति बीजेपी अध्यक्ष और अन्य नेताओं ने अपनाई। बस हर जगह राज्य बदल गया।

अपनी राज्य सरकारों की उपलब्धि ही गिना देते
चंबा में अमित शाह ने कहा कि जैसे महाराष्ट्र, यूपी, उत्तराखंड, झारखंड आदि राज्यों मे ंबीजेपी की सरकार आई है, वैसे ही हिमाचल में बीजेपी की सरकार बनेगी। मगर जनाब, जिन राज्यों में आपकी सरकार बनी है, वहां पर क्या न या हो गया? आपने कौन सी क्रांति ला दी? सरकारी दफ्तरों में करप्शन की स्थिति वही है, सामाजिक मुद्दे जस के तस हैं और रोजगार, शिक्षा स्वास्थ्य के मामले में कोई अभूतपूर्व काम नहीं हुआ। आप अपने भाषणों में उदाहरण ही दे देते कि फ्लां राज्य में पहले ऐसी हालत थी, हमारी सरकार आने के बाद यह हुआ है। मगर आप ऐसा न करके हवा-हवाई जुमलेबाजी वाला भाषण दे रहे हैं। आप ऐसा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि आपके पास उपलब्धियां ही नहीं हैं गिनाने को।

विज़नहीन है आपका विज़न डॉक्युमेंट
इन तमाम राज्यों में सरकारी शिक्षण संस्थानों की हालत, अस्पतालों की हालत, जनसुविधाओं की हालत, सड़कों की हालत… वैसी ही है जैसी पहले की सरकारों में थी। इन प्रदेशों में सिर्फ सत्ता परिवर्तन हुआ है। पहले अन्य पार्टियों की सरकार थी, अब आपकी पार्टी की है। मगर व्यवस्था जस की तस बनी हुई है। आप वादे तो कर रहे हैं कि हिमाचल में हम सुशासन देंगे। मगर आपके विज़न डॉक्युमेंट में कुछ विज़न ही नहीं है। विज़न डॉक्युमेंट के नाम पर आपने सिर्फ जनभावनाएं भुनाने की कोशिश की है। एक होशियार हेल्पलाइन बनाने की बाद कह दी एक गुड़िया हेल्पलाइन बनाने की बात कह दी। अजी हेल्पलाइन बनने से क्या होगा? काम तो जमीन में पुलिस और महकमों को ही करना होगा? कॉल सेंटर खोल देने से समस्याएं हल नहीं होतीं। आप बताते कि आप पुलिस और प्रशासन में क्या रिफॉर्म लाना चाहते हैं जिससे माफिया पर नकेल कसेगी और महिलाएं सुरक्षित होंगी। मगर नहीं, विजन ही नहीं है।

प्लान ऑफ ऐक्शन क्या रहेगा आपका?
तुष्टीकरण यानी लोगों को खुश करने वाली आदत गई नहीं। चार धाम भी अब सरकार करवाएगी? बेहतर होता कि बुजुर्गों के लिए अच्छी स्वास्थ्य सुविधाओं को निशुल्क देने की बात की जाती। आप बताते कि डॉक्टरों के खाली पड़े पद भरे जाएंगे और कहीं कमी नहीं रहेगी। आपके विज़न डॉक्युमेंट में शिक्षा के स्तर को ऊपर उठाने के लिए कोई प्लानिंग नहीं है। नौकरियों में पारदर्शिता लाने के लिए प्लान ऑफ ऐक्शन का जिक्र नहीं। हिमाचल में टूरिज़म का विकास कैसे किया जाएगा, वह आपने बताया नहीं। होम स्टे तो पहले से ही चल रहा है, इसे कैसे और कहां बढ़ावा देंगे आपने बताया नहीं।

करप्शन बातों से ठीक नहीं होगा

आपने यह नहीं बताया कि जो जिले उपेक्षित हैं, वहां के लिए आपकी क्या योजना है। आपने बताया नहीं कि रोजगार के सृजन के लिए आप क्या करेंगे। आपने यह भी नहीं कहा कि हिमाचल के सिर पर बढ़ रहे कर्ज के बोझ को कैसे कम करोगे और कैसे राजस्व बढ़ाओगे। मौजूदा व्यवस्था ठेकेदारों और अधिकारियों को करप्शन के मौके देती है। आपने बताया नहीं कि उसपर कैसे लगाम लगाएंगे। बस आपने हल्के में चार मांगें उठाईं, हवा-हवाई बातें कीं और हो गया विजन डॉक्युमेंट जारी।

विज़न का मतलब है दूरदृष्टि। सत्ता में आते ही घोषणनाएं और योजनाएं चला देना विज़न नहीं है। बल्कि दूर की सोचना विज़न कहलाता है कि लॉन्ग टर्म में किससे क्या फायदा होगा। मगर अफसोस, आपने तो भाषण देने हैं। योगी को बुलाना, गडकरी को बुलाना है, हिमाचलियों के इमोशंस से खेलना है। कभी फौजी भाइयों को अपने पक्ष में करने के लिए डायलॉग मारने हैं तो कभी यह कहना है कि मोदी जी का हिमाचल से नाता रहा है।

हिमाचल प्रदेश डॉयलॉग सुनकर वोट नहीं देता

हिमाचल को आप समझ नहीं पाए
बीजेपी के नेताओं, आजकल टीवी हर घर में है। आप जो हिमाचल में आकर भाषण दे रहे हैं, आपके वे सारे भाषण पुराने हैं और कभी बिहार से सुन लिए गए हैं तो कभी यूपी से। हिमाचल में भी वही घिसी पिटी बातें सुनाने से काम नहीं चलेगा। यहां के लोग अगर सत्ता परिवर्तन चाहते हैं तो वे दरअसल व्यवस्था परिवर्तन चाहते हैं। और इसमें बात कांग्रेस की ही नहीं, बीजेपी की भी है। हिमाचल की जनता को आज तक न तो कांग्रेस का रूल करने का तरीका पसंद आया है और न ही बीजेपी का। इसीलिए इनमें से किसी की सरकार रिपीट नहीं हुई। आपको अगर लगता है कि मोदी जी के इमोशनल भाषण सुनकर जनता बीजेपी के उम्मीदवारों को वोट दे देगी तो आप मुगालते में हैं। यह हिमाचल है जनाब, लगता है मोदी जी लंबे समय तक यहां रहकर भी इसे नहीं समझ पाए।

लेखक मूलत: हिमाचल प्रदेश के हैं और पिछले कुछ वर्षों से आयरलैंड में रह रहे हैं। उनसे kalamkasipahi @ gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

फर्जी हैं मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के 92 पर्सेंट ट्विटर फॉलोअर?

इन हिमाचल डेस्क।। पिछले दिनों कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी पर आरोप लगे कि ट्विटर पर उनके ट्वीट्स के फर्जी रीट्वीट्स होते हैं। वैसे यह फर्जी वाला सिलसिला हिमाचल में भी चल रहा है। 2014 में इन हिमाचल ने बताया था कि किस तरह से मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के ट्विटर अकाउंट के ज्यादा फॉलोअर रूस और अरब देशों से थे। 7 जुलाई, 2014 को इन हिमाचल ने बताया था कि 11.7K यूजर्स में से कुछ ही यूजर्स असली थे। 10 से ज्यादा यूजर्स फर्जी थे। इनमें कुछ के हैंडल रूस के लोगों के थे तो कुछ अरब के देशों के। भला रूस या अरब के लोग इतनी बड़ी संख्या में हिमाचल के सीएम को क्यों फॉलो करेंगे?

तीन साल बीत गए हैं और अब मुख्यमंत्री के ट्विटर फॉलोअर्स की संख्या 66.6K यानी 66 हज़ार 600 हो गई है। मगर यह इजाफा फर्जी फॉलोअर्स के दम पर ही हुआ है। फर्जी ट्विटर फॉलोअर का पता लगाने वाले टूल ‘ट्विटर ऑडिट’ पर मुख्यमंत्री के हैंडल को डालें तो यह दिखाता है कि सिर्फ 8 पर्सेंट यूजर्स ही असली हैं और बाकी संदिग्ध। नीचे देखें या यहां क्लिक करें:

ट्विटर ऑडिट का एल्गॉरिदम दरअसल 5000 फॉलोअर्स के सैंपल को स्टडी करता है, उनकी ऐक्टिविटी वगैरह को देखता है और फिर इस तरह के नतीजे देता है। इसी आधार पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ऑडिट स्कोर 37 फ़ीसदी है यानी उनके इतने पर्सेंट फॉलोअर ही असली हैं और बाकी संदिग्ध।

कहां से आए ये फॉलोअर
तीन साल पहले जब हमने वीरभद्र सिंह के ट्विटर फॉलोअर्स का मुआयना किया था, उसमें रूस और अरब के लोग मिले थे। इन लोगों ने एक भी ट्वीट नहीं किया था और बस लोगों को फॉलो किया हुआ था। साफ था कि ये फर्जी प्रोफाइलें थीं।

मुख्यमंत्री के फॉलोअर्स पर जाकर स्क्रॉल करें तो आखिर में रूसी फॉलोअर दिखने शुरू हो जाते हैं।

और इस बार जब हमने बढ़े हुए फॉलोअर्स की वजह जानने के लिए उनके फॉलोअर्स देखे तो पता चला कि असंख्य फर्जी प्रोफाइलों ने उन्हें फॉलो किया हुआ है। इन प्रोफाइलों के नाम अजीब हैं, प्रोफाइल पिक्चर नहीं लगी है, एक भी ट्वीट नहीं किया गया और सिर्फ बड़ी हस्तियों को फॉलो किया गया है। आप खुद उनके फॉलोअर्स वाले टैब पर क्लिक करके स्क्रॉल करके देख सकते हैं या फिर यहां क्लिक करें. ट्विटर ऑडिट जैसे टूल गलती कर सकते हैं मगर आप खुद अपनी आंखों से देख सकते हैं कि फॉलोअर असली हैं नकली।

इन सभी ने कोई भी ट्वीट नहीं किया है, सिर्फ वीरभद्र समेत कुछ अन्य राजनेताओं को फॉलो किया है।

एक्सपर्ट बताते हैं कि दरअसल ये फेक प्रोफाइल्स हैं और इन्होंने जिन लोगों को फॉलो किया हुआ है, उन लोगों ने दरअसल फॉलोअर्स खरीदे हैं। यानी बहुत सी एजेंसियां ऐसी हैं जो ऐसी बॉट्स और फर्जी प्रोफाइल्स बनाती हैं और फिर आपको फॉलोअर्स बेचती हैं। इसीलिए वीरभद्र सिंह के इन फर्जी फॉलोअरों की फॉलो लिस्ट चेक करें तो इन्होंने कई नेताओं और पॉलिटिकल पार्टियों को फॉलो किया है। यानी इन सभी लोगों और पार्टियों ने फॉलोअर खरीदे हैं।

ऐसे हैं ये संदिग्ध ट्विटर हैंडल

पिछली बार तो हमने ट्वीट करके मुख्यमंत्री से पूछा था कि रूस के फॉलोअर्स पर उनका क्या जवाब है मगर उत्तर नहीं आया था। कहने को कहा जा सकता है कि मुझे क्या पता कहां से फॉलोअर आए और फर्जी फॉलोअर खरीदने की बातों को झूठा भी बताया जा सकता है। मगर फेसबुक लाइक्स खरीदना और ट्विटर फॉलोअर खरीदना कोई छिपी हुई बात नहीं है और खासकर हर पार्टी के नेता इस काम करते रहे हैं। हाल ही हिमाचल सरकार के एक मंत्री के पेज के लाइक रातो-रात 5 हजार से 5 लाख हो गए थे। पेड प्रमोशन करके जेनुइन लाइक्स भी इतनी जल्दी नहीं आ सकते।

इसमें मुद्दा कोई और नहीं, बस नैतिकता का है। बाकी चाहे कोई लाइक्स खरीदे या पेड प्रमोशन करे यह उसका मामला है। मगर फर्जी लाइक्स खरीदने का मतलब क्या है? इसका एक ही मतलब है कि आप माहौल बनाना चाहते हैं कि मेरे इतने फॉलोअर हैं। आपका इरादा असली लोगों तक पहुंच बनाने का, उनसे जुड़ने का नहीं है। अगर किसी को इसमें ही सुख मिलता हो तो यही सही।

जब अर्की में वीरभद्र ने कहा था- अब कोई घोषणा नहीं करूंगा

सोलन।। चुनाव का मौसम है तो तरह-तरह की बातें सामने आ रही हैं। मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह शिमला रूरल सीट अपने बेटे के लिए छोड़ने के बाद पहले ठियोग गए और अब अर्की से चुनाव लड़ रहे हैं। मगर उनके विरोधी पक्ष के बहुत से लोग 3 साल पहले की उस घटना को जनता को फिर से याद दिला रहे हैं, जब मुख्यमंत्री ने नाराज होकर कहा था कि मैं बहुत सी घोषणाएं करने वाला था अर्की के लिए मगर अब नहीं करूंगा।

 

दरअसल मामला है सितंबर 2014 का। यहां पर जिला स्तरीय सायर मेला होता है। उसेके उद्घाटन के लिए मुख्यमंत्री पहुंचे थे। भाषणों का दौर लंबा चला तो लोगों में बेचैनी हो गई और उन्हें शोर-शराबा और हूटिंग शुरू कर दी। इससे नाराज मुख्यमंत्री ने भाषण बीच मे ही छोड़ दिया। उस दौरान मुख्यमंत्री ने कहा था, “अर्की के विकास के लिए मैंने बहुत-सी घोषणाएं करनी थीं लेकिन अब मैं कोई घोषणा नहीं करूंगा।(स्रोत)”

 

ये शब्द कहने के बाद उन्होंने अपने भाषण को विराम दे दिया था और चुप बैठ गए थे। इसके बाद मंच में और जनता में खामोशी छा गई थी। स्थानीय लोगों और प्रशासन ने लोगों ने उन्हें मनाने की कोशिश की थी, मगर वह नहीं माने। वैसे उनका यह व्यवहार उस वक्त भी सवालों के घेर में नहीं आया था क्योंकि अर्की के विकास के लिए वह कुछ अपनी जेब से तो देने नहीं वाले थे। इसलिए अगर वह सिर्फ अपनी नाराजगी के लिए किसी जगह के लिए विकास योजनाओं की घोषणा करके उन्हें रोकते हैं तो यह और गलत है।

बहरहाल, अब लोग फिर उन खबरों को शेयर कर रहे हैं और इसे चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहे हैं:

अब यह देखना दिलचस्प होगा कि मुख्यमंत्री लोगों की नाराजगी दूर करने में कामयाब हो पाते हैं या बीजेपी इस मुद्दे को लेकर जनता को वीरभद्र के खिलाफ करने में सफल हो पाती है।

डॉक्टर यशवंत सिंह परमार के पैतृक गांव की सड़क अब भी कच्ची

शिमला।। हिमाचल प्रदेश निर्माता डॉक्टर यशवंत परमार का सियासी इस्तेमाल तब तक किया गया, जब तक राजनेताओं ने उनके नाम पर खुद को स्थापित नहीं कर लिया। मगर किसी ने उनके इलाके के विकास की तरफ ध्यान नहीं दिया। सिरमौर के कई इलाके आज प्रदेश में सबसे पिछड़े और उपेक्षित हैं।

 

अब चुनाव के बहाने ही सही, ऐसी-ऐसी बातें सामने आ रही हैं जो दिखाती हैं कि हमारे राजनेता, हमारी सरकारें डॉक्टर परमार के प्रति कितनी उदासीन हैं। डॉक्टर परमार के गांव तक जाने वाले सड़क आज भी कच्ची है। इस मामले को उठाया है अमर उजाला ने और बताया है कि खस्ताहाल सड़क पर जगह-जगह गड्ढे पढ़े हुए हैं।

डॉक्टर यशवंत सिंह परमार

डॉक्टर परमार की जन्मभूमि चन्हालग की हालत सिरमौर की अन्य कई सड़कों की तरह खस्ताहाल है। बनेठी, बागथन, राजगढ़, चंदोल सड़क 50 साल बाद भी खस्ताहाल है। इसका कुछ हिस्सा पक्का नहीं हो पाया है और जो पक्का हो चुका था, उसकी टारिंग भी अब निकलने लगी है।

होशियार मामले की सीबीआई जांच क्यों नहीं चाहती थी सरकार?

मंडी।। वन रक्षक होशियार सिंह की संदिग्ध हालात में मौत पर सीबीआई के एफआईआर दर्ज करने के बाद एक बार फिर यह मामला सुर्खियों में आ रहा है। जिस दौरान वनरक्षक होशियार सिंह का शव संदिग्ध हालात में पाया गया था, पुलिस बार-बार जांच टीम या जांच अधिकारी बदल रही थी। मामले को हत्या से आत्महत्या में तब्दील करने को लेकर भी जनता अंसतुष्ट थी और सीबीआई जांच की मांग कर रही थी। मगर सरकार ने ऐसा नहीं किया और स्टेट सीआईडी पर ही भरोसा जताया। बाद में हाई कोर्ट ने संज्ञान लिया और राज्य पुलिस की जांच से असंतुष्ट होने के बाद सीबीआई को मामला सौंप दिया। अब इस बात को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि सरकार क्यों सीबीआई जांच नहीं चाहती थी।

 

दरअसल कोर्ट में गृह सचिव की ओर से दिए गए 170 पन्नों के ऐफिडेविट से पता चला है कि कैबिनेट नहीं चाहती थी केस सीबीआई के हवाले किया जाए। इसे लेकर जागरण की रिपोर्ट कहती है- ‘होशियार हत्या मामले में सरकार की मुश्किलें बढ़ गई हैं। शपथपत्र में खुलासा हुआ है कि कैबिनेट नहीं चाहती थी कि मामले की सीबीआई जांच हो। प्रदेश सरकार को सर्वोच्च जांच एजेंसी के बजाय स्टेट सीआईडी पर ज्यादा भरोसा रहा, लेकिन सरकार की नीयत और जांच एजेंसी भी सवालों के घेरे में आ गई है।’

 

पुलिस की जांच पर पहले से उठे थे सवाल
डीजीपी ने कोर्ट में सौंपे 168 पन्नों के शपथपत्र में कहा था कि होशियार मामले की जांच पूरी हो चुकी है और जल्द ही ट्रायल कोर्ट में अंतिम जांच रिपोर्ट पेश की जाएगी। उन्होंने ही सीआइडी की एसआइटी गठित की थी, जबकि सरकार ने इससे पहले पुलिस की एसआइटी गठित की थी।

 

23 जून को मंडी के तत्कालीन एसपी प्रेम ठाकुर ने कोर्ट में शपथपत्र दायर किया था। इसमें कहा है कि होशियार पांच जून से लापता था। पुलिस ने सर्च पार्टी गठित की। इसमें कुथेड़ पंचायत के प्रधान, उपप्रधान जीतराम शामिल थे। सात जून को सुबह 10 बजकर 36 मिनट पर रेंज अधिकारी तेज राम शर्मा, वनरक्षक अंकित कुमार ने करसोग थाने में रिपोर्ट की। पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की।

 

वन विभाग ने ‘ह्यू एंड क्राई’ नोटिस जारी किया। नौ जून को गडरिये ने वन अधिकारी को सूचना दी कि गरजब के जंगल में एक व्यक्ति देवदार के पेड़ से उलटा लटका है। इसके आधार पर होशियार सिंह के चाचा परस राम भी पुलिस के साथ मौके पर गए। पुलिस ने मौके पर कपड़े और बैग बरामद किया, लेकिन वहां बैग की तलाशी नहीं की।

 

घटनास्थल पर हालातों को देखकर पुलिस ने हत्या का मामला दर्ज किया। फॉरेंसिक टीम भी मंडी से मौके पर बुलाई। अगले दिन बैग की तलाशी की। इसमें हैमर इन्सेक्टीसाइड (जहर) और सुसाइड डायरी बरामद हुई। इसमें घनश्याम दास, हेतराम, अनिल कुमार , लोभ सिंह, तेज सिंह के नाम लिखे थे। पुलिस ने एक दिन बाद ही धारा बदल दी। दफा 302 का मामला 306 यानी आत्महत्या के लिए विवश करने में तबदील कर दिया।

 

इससे पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे। पहले दिन ही बैग की तलाशी ली होती तो फिर इसकी नौबत न आती। अब यही लापरवाही सीबीआई जांच में भारी पड़ सकती है।

 

इस बीच सीबीआई ने जांच शुरू कर दी है। जल्द ही जांच टीम घटनास्थल का दौरा करेगी। गिरफ्तार आरोपियों, पुलिस, सीआइडी के अधिकारियों से भी पूछताछ होगी। पुलिस ने आत्महत्या को लेकर घनश्याम, हेतराम, अनिल कुमार, लोभ सिंह, तेज सिंह, गिरधारी लाल को गिरफ्तार किया था।

होशियार सिंह मामले में सीबीआई ने दर्ज की एफआईआर

शिमला।। वनरक्षक होशियार सिंह केस में आखिरकार सीबीआई ने एफआईआर दर्ज कर ली है। शिमला स्थित भ्रष्टाचार रोधी ब्रांच में अज्ञात लोगों के खिलाफ तीन एफआईआर दर्ज की हैं। खबर है कि एक एफआईआर होशियार की हत्या, दूसरी अवैध कटान और तीसरी लकड़ी चोरी के संबंध में है।

 

बता दें कि इसी साल नौ जून को मंडी जिले के करसोग में वनरक्षक होशियार का शव संदिग्ध हालात में पेड़ पर उल्टा लटका मिला था। इससे पहले वह लापता था। पुलिस ने पहले हत्या का माम दर्ज किया था फिर तुरंत इसे आत्महत्या में बदल दिया। जनता में नाराजगी हुई और विरोध प्रदर्शन हुए।

 

मामले का हाई कोर्ट ने संज्ञान लिया था जिसके बाद पुलिस की जांच से असंतुष्ट होने के बाद 13 सितंबर को हाई कोर्ट ने सीबीआई को मामला सौंपा था। अब देर से ही सही, सीबीआई ने इस मामले की जांच के लिए एक टीम बनाई है, जिसमें 15 अधिकारी और कर्मचारी बताए जा रहे हैं।

 

कोटखाई में स्कूल के बाहर से छात्रा का अपहरण, टीचर ने पीछा करके छुड़ाया

शिमला।। हिमाचल प्रदेश के कोटखाई का चर्चित रेप ऐंड मर्डर केस अभी भी हल नहीं हो पाया है मगर इसी इलाके में एक बार फिर इसी तरह की वारदात को दोहराने की कोशिश हुई है। ईनाडू के मुताबिक कोटखाई में एक छात्रा को किडनैप करने की कोशिश की गई। यह तो भला हो टीचर का, जिन्होंने गाड़ी का पीछा करके छात्रा को बचा लिया। तीनों आरोपी पुलिस की गिरफ्त में हैं। (कवर इमेज प्रतीकात्मक है)

 

घटना गुरुवार की बताई जा रही है। शाम को स्कूल से छुट्टी होने के बाद घर जा रही छात्रा को तीन युवक जबरन गाड़ी में बिठाने की कोशिश करने लगे, जिससे छात्रा ने चिल्लाना शुरू कर दिया। आवाज सुनकर एक अध्यापक वहां पहुंचे। उन्होंने देखा कि कुछ लोग छात्रा को गाड़ी में बिठाकर ले गए हैं। उन्होंने गाड़ी का पीछा किया और पुलिस को जानकारी दी।

प्रतीकात्मक तस्वीर

जानकारी के मुताबिक टीचर ने काफी दूर तक पीछा किया और वह छात्रा को आरोपियों से छुड़ाने में कामयाब रहे। इसी बीच पुलिस भी मौके पर पहुंच गई और तीन युवकों को गिरफ्तार कर लिया गया। ईनाडू के मुताबिक एसपी सौम्या सांबशिवन ने इस तरह की घटना होने की पुष्टि की है। पुलिस अभी जांच कर रही है कि मामला क्या है।

विक्रमादित्य सिंह की संपत्ति को लेकर आक्रामक हुई बीजेपी

शिमला।। मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने साल 2012 विधानसभा चुनाव के दौरान नामांकन के वक्त जो हलफनामा दिया था, उसमें अपने साथ-साथ परिजनों की संपत्ति का जिक्र भी किया था। उस हलफनामे में वीरभद्र सिंह के बेटे विक्रमादित्य सिंह की संपत्ति 1.19 करोड़ रुपये बताई गई थी। मगर ठीक पांच साल बाद होने जा रहे चुनावों में संपत्ति बढ़ गई है। बीजेपी ने इसे मुद्दा बना लिया है।

 

विक्रमादित्य सिंह ने शिमला रूरल से कांग्रेस के उम्मीदवार के तौर पर नामांकन दाखिल किया है। उन्होंने इस बार अपनी संपत्ति 84 करोड़ रुपये बताई है। चल संपत्ति 4.50 करोड़ है जबकि अचल संपत्ति 79.82 करोड़ रुपये है। उनके बैंक खातों में 10.94 लाख रुपये जमान हैं।

 

इसके अलावा उन्होंने शेयरों में 38 लाख रुपये, गहनों में 10.26 लाख रुपये और अन्य वाहनों का जिक्र हलफनामे में किया है। इस तरह से वीरभद्र के 2012 में दिए हलफनामे में बताई गई संपत्ति की तुलना इस साल विक्रमादित्य के हलफनामे में बताई गई संपत्ति से की जाए तो यह उछाल 70 प्रतिशत का है। यानी पांच सालों में विक्रमादित्य की संपत्ति 70 गुना बढ़ी है।

 

इस मामले को लेकर बीजेपी भी आक्रमाक हो गई है। बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा ने वीरभद्र पर प्रदेश में विक्रमादित्य मॉडल ऑफ डिवेलपमेंट लागू करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि 2012 में वीरभद्र सिंह के डिपेंडेंट रहे विक्रमादित्य की तब की 1.19 करोड़ की संपत्ति पांच साल में बढ़कर 84 करोड़ तक पहुंच गई। उन्होंने कहा कि वीरभद्र प्रदेश का नहीं बल्कि विक्रमादित्य का विकास करवा रहे हैं।

लेख: यह 2017 है, 1947 नहीं, राजशाही से मोह छोड़ें वीरभद्र

आई.एस. ठाकुर।। वीरभद्र सिंह जी का बयान पढ़ा कि मैं 122वां राजा हूं, कोई खानाबदोश नहीं और टूट सकता हूं मगर झुक नहीं सकता। इस बयान के दूसरे हिस्से से तो बड़ी प्रेरणा मिलती है। कितनी अच्छी बात है कि कोई कहे कि मैं टूट सकता हूं, मगर किसी तरह के दबाव के आगे झुक नहीं सकता। वीरभद्र सिंह ने यह बात उनके खिलाफ चल रहे मामलों के संदर्भ में कही। यह जताने के लिए कि वह संपन्न हैं और उन्हें भला करप्शन करने की क्या जरूरत।

 

उन्हें हक है अपना बचाव करने का क्योंकि अभी तक एक भी मामला अदालत में उनके खिलाफ साबित नहीं हुआ है। वह आरोपी हैं, दोषी नहीं। मगर उनके इस बयान का पहला हिस्सा निराश करने वाला है- मैं 122वां राजा हूं, कोई खानाबदोश नहीं। निराश इसलिए करता है, क्योंकि जो शख्स लोकतंत्र में जनता के वोटों सो चुना जाता रहा हो और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत 6 बार मुख्यमंत्री रहा हो, वह अब भी अपने बीते हुए शाही इतिहास से क्यों चिपका हुआ है?

 

मुख्यमंत्री कई बार बयान दे चुके हैं कि वह राजा हैं, शाही हैं, ऐसा है, वैसा है। आज उनका पंजाब केसरी पर जो बयान पढ़ा, उसपर जवाब दिया जाना चाहिए। और यह जवाब लोकतांत्रिक देश के एक नागरिक होने के नाते संवैधानिक अधिकार के तहत दिया जा रहा है। पहले तो उनका बयान पढ़िए-

भाजपा सरकार ने मेरी संपत्ति को लेकर एक ही मामले में 3-3 जांचें बिठाई हैं ताकि वह मुझे परेशान करके सत्ता साहिल कर सके लेकिन ऐसा नहीं होगा, क्योंकि मैं टूट सकता हूं लेकिन झुक नहीं सकता। मैं कोई खानाबदोश नहीं हूं, 122 वां राजा हूं। सीलिंग एक्ट के समय मेरे परिवार द्वारा कई करोड़ों रुपयों की जमीनें सरकार को दी गई।

खानाबदोशों का कोई सम्मान नहीं होता क्या?
उनके इस बयान को देखें तो यही है कि वह कह सकते हैं कि वह कठोर हैं और झुक नहीं सकते। मगर उनके इस बयान से सामंतवाद की बू आती है। वह कहते हैं कि मैं खानाबदोश नहीं हूं। तो क्या खानाबदोश लोगों का आत्मसम्मान नहीं होता? खानाबदोश लोग मामूली लोग होते हैं? क्या वे जल्दी से झुक जाया करते हैं? देश-दुनिया में करोड़ों खानाबदोश हैं। वे एक जगह से दूसरी जगह घूमते रहे हैं। आज बहुत से लोग जो खानाबदोश नहीं भी हैं, वे भी एक समय खानाबदोश थे। हिमाचल के बहुत से राजे-रजवाड़े खुद इधर-उधर से आए हैं। बल्कि हिमाचल ही नहीं, पूरी मानव सभ्यता का इतिहास खानाबदोशी का रहा है। मुख्यमंत्री को न जाने क्यों अपमानजनक तुलनाएं करने की आदत है। जैसे पिछले दिनों गद्दी समुदाय को लेकर की थी। कभी सफाई कर्मचारियों को की थी तो कभी अन्य नेताओं को की थी।

122वें राजा हैं तो क्या हुआ?
बुशहर रियासत के 121वें शासक पद्म सिंह और उनकी नौवीं पत्नी शांति देवी की संतान हैं वीरभद्र सिंह। पद्म सिंह का निधन अप्रैल 1947 में हो गया था। उस वक्त वीरभद्र सिंह नौ साल के थे। इसी साल अगस्त में देश आजाद हो गया और लोकतांत्रिक व्यवस्था लागू हो गई। सिंबॉलिक रूप से भले ही वीरभद्र सिंह राजा मानते रहें खुद को, मगर वह राजा नहीं हैं और न ही राजा के तौर पर खुद को पेश कर सकते हैं। वीरभद्र क्यों भूल जाते हैं कि आज वह जो कुछ हैं, वह जनता के कारण हैं न कि राजशाही के कारण? अगर वह कहते हैं कि मैं सातवीं बार मुख्यमत्री बनूंगा तो यह मुख्यमंत्री पद उन्हें इसलिए नहीं मिलेगा कि वह अपने वंश के 122वें राजा हैं। यह पद तभी मिल पाएगा जब इन चुनावों में प्रदेश की जनता कांग्रेस के पक्ष में मतदान करके उसे बहुमत देती है और फिर चुने हुए प्रतिनिधि और पार्टी उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपती है। यह बात अलग है कि वह ‘मैं राजा हूं’ के दम पर कुछ मासूम लोगों को प्रभावित करके उनका फायदा चुनावों में उठाते हों।

 

‘करोड़ों की जमीनें मेरे परिवार ने सरकार को दी है’
क्या वीरभद्र का राजवंश आसमान से इन जमीनों को अपने नाम लिखवाकर लाया था? जमीन तो जमीन है। जमीन पर किसी का नाम नहीं लिखा होता, जमीन जरूर किसी के नाम लिख जाती है। अगर वीरभद्र सिंह के राजवंश ने करोड़ों की जमीनें सरकार को दी हैं तो महान कार्य नहीं किया। देश-प्रदेश के लाखों लोगों की तय सीमा से अधिक जमीन सरकार के पास गई है। फर्क इतना है कि जिन सामंतों और रजवाड़ों ने ज्यादा जमीन कब्जाई थी, उनकी ज्यादा गई। तो यह जमीन कहां से आई थी उनकी पास और किसकी थी? लोकतंत्र सबको समानता देता है। पूरे देश के रजवाड़ों को दर्द ही इसलिए हुआ था कि उन्होंने कई पीढ़ियों से जो जनता की जमीन कब्जाई थी, वह सरकार ने उनसे छुड़ाई और भूमिहीनों को दी। पहले के दौर में तो जितनी रियासत थी, वो सारी की सारी ही राजा की होती थी। तो क्या उस पूरी जमीन का ही मालिक रजवाड़ों को बनाकर रख दिया जाता? और जमीन देकर महानता ही साबित करनी है तो वीरभद्र सिंह अपने सेब के बागीचों को क्यों नहीं सरकार को दान कर देते, जिनपर यह ऐक्ट लागू नहीं होता।

 

राजा होना कोई महान काम नहीं था
मुख्यमंत्री से गुजारिश है कि वह इस सोच को अब तो छोड़ दें। प्रदेश के सबसे अनुभवी नेता हो और लोकतांत्रिक व्यवस्था से चुने जाते रहे नेता हो। फिर दूसरों को नीचा दिखाने और खुद को शाही दिखाने की आदत भी छोड़ दो। और वह वक्त गया कि जनता यह सोचकर आंखें मूंद ले कि भला एक संपन्न राज परिवार के वशंज को करप्शन करने की क्या आदत। राजा-रजवाड़ों की छवि जनता के मन में बहुत अच्छी नहीं है। राजा-रजवाड़े बहुत अच्छे नहीं थे। भारत समेत पूरी दुनिया के राजवंश तो जाने ही जाते हैं अपनी भोग-विलासिता के लिए, कई-कई विवाह करने के लिए, अनोखे कानून बनाने के लिए, जमीनों पर कब्जों के लिए लड़ाई करने के लिए, लोगों पर अत्याचार करने के लिए। भारत के रजवाड़े तो अपनी संपत्ति और सत्ता को बचाए रखने के लिए अंग्रेजों के पिछलग्गू भी बने थे। तो यह तर्क काम नहीं करता कि मैं तो राजा हूं, मुझे क्या जरूरत। सबसे ज्यादा जरूरत तो राजा को ही होती है। वरना आम जनता अपने आप में अपने हाल में मस्त है, जितना उसके पास है, उसी में गुजारा कर रही है।

आपको रजवाड़ाशाही से ऊपर होकर जिम्मेदार लोकतांत्रिक नेता की तरह बातें करनी चाहिए। जहां तक बात है आप पर लगे आरोपों की, उनका जवाब भी लोकतांत्रिक ढंग से दीजिए। अब वह दौर गया कि रजवाड़ा होने का नाम लेकर सहानुभूति बटोरी जाए। यह 2017 है, 1947 नहीं।

लेखक मूलत: हिमाचल प्रदेश के हैं और पिछले कुछ वर्षों से आयरलैंड में रह रहे हैं। उनसे kalamkasipahi @ gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

मैं राजा हूं, टूट सकता हूं मगर झुक नहीं सकता: वीरभद्र सिंह

सोलन।। शिमला रूरल सीट बेटे के लिए छोड़ने के बाद अर्की से चुनाव लड़ रहे मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह बीजेपी की तरफ से लगाए जा रहे आरोपों पर हमलावर हो गए हैं। उन्होंने कहा कि बीजेपी सरकार ने मेरी संपत्ति को लेकर एक ही मामले में तीन-तीन जांचें बिठाई हैं ताकि परेशान करके सत्ता हासिल कर सके, मगर ऐसा नहीं होगा।

 

वीरभद्र सिंह ने कहा,  “मैं टूट सकता हूं लेकिन झुक नहीं सकता। मैं कोई खानाबदोश नहीं हूं। अपने वंश का 122वां राजा हूं। सीलिंग ऐक्ट के समय मेरे परिवार की करोड़ों रुपये की जमीनें सरकार को दी गई हैं।”

 

मुख्यमंत्री ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी हमेशा से ही लोगों को तोड़ने का काम करती है। कभी वह क्षेत्रवाद के नाम पर लोगों को तोड़ती है, कभी धर्म के नाम पर तो कभी गोरक्षा के नाम पर।