शिमला में कट गए 400 हरे-भरे पेड़, मंत्री ने थपथपाई वन विभाग की पीठ

शिमला।। पिछली सरकार के दौरान वन माफिया सक्रिय होने का आरोप लगाने वाली भारतीय जनता पार्टी अब सत्ता में आ गई है। मगर सरकार बनने के एक महीने के अंदर ही खबर आई है कि शिमला की कोटी रेंज के शलोट गांव में 400 से ज्यादा हरे-भरे पेड़ काट दिए गए। अब 400 पेड़ पलक झपकते ही कटे तो होंगे नहीं, ऐसे में सवाल उठता है कि वन विभाग के कर्मचारी और अधिकारी क्या करते रहे जो उनकी नाक के नीचे 400 पेड़ साफ हो गए। जाहिर है, लापरवाही तो कहीं न कहीं है ही। मगर इस मामले में वन मंत्री गोबिंद सिंह ठाकुर वन विभाग के अफसरों की तारीफ कर गए और उन्हें सम्मानित करने की बात भी कह गए। वह भी तब, जब पुलिस ने मामले की जांच पूरी नहीं की है।

जिस समय पेड़ कटने की जानकारी मिलने पर मंत्री मौके पर पहुंचे, वन विभाग के कर्मचारी वहां मौजूद थे। उन्होंने मंत्री को बताया कि गार्ड से शिकायत मिलने पर तुरंत कार्रवाई की गई, तभी मामला सामने आया।  लेकिन सवाल उठता है कि महीनों से जारी अवैध कटान पर विभाग ने पहले कार्रवाई क्यों नहीं की। वन विभाग अब इस मामले के सामने आने को कामयाबी बता रहा है और मंत्री ने भी अफसरों की बात पर यकीन किया और उनकी पीठ थपथपाई है। हालांकि उन्होंने मीडिया से बात करते हुए इस घटनाक्रम को ‘साजिश’ भी बताया। उन्होंने विभाग को निर्देश दिए हैं जंगल में गश्त बढ़ाएं और तुरंत इस तरह के मामलों में कार्रवाई करें।

डीएसपी सिटी दिनेश शर्मा ने कहा कि रविवार सुबह से पुलिस टीम मौके पर मौजूद रही देर शाम तक कार्रवाई जारी रही। उन्होंने कहा है कि वारदात स्थल पर मिले स्लीपर और लकड़ियों की नाप नपाई की जा रही है। जिस व्यक्ति पर आरोप लगा है, उसका कहना है कि उसने अपनी जमीन पर पेड़ काटे। हालांकि यह भी जांच के बाद साफ हो जाएगा कि जमीन वन विभाग की है या निजी, मगर नियमों के अनुसार कोई अपनी जमीन से भी इस तरह से पेड़ नहीं काट सकता।

बहरहाल, वन मंत्री ने वन रक्षक और रेंज ऑफिसर को राज्यस्तरीय समारोह में सम्मानित करने के लिए विभाग को सरकार के सामने मामला पेश करने को कहा है। वहीं पिछले साल दिसंबर में रिटायर हो चुके बीट गार्ड पर कार्रवाई की तैयारी की जा रही है। वन विभाग का कहना है कि अगर यह गार्ड पहले जानकारी देता तो ऐसी नौबत नहीं आती।

इस बीच चर्चा है कि ईमानदानरी से काम करने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों को सम्मानित जरूर करना चाहिए मगर तब, जब जांच पूरी हो चुकी हो और पता चल गया हो कि पहले खामोश बैठने में उनकी कोई भूमिका न हो और यह स्पष्ट हो जाए कि उन्होंने वाकई ऐसा काम किया है जो बाकी महकमे के लिए मिसाल है।

1300 कंडक्टरों की भर्ती परीक्षा का रिजल्ट रुका, जांच होगी

शिमला।। एचआरटीसी के 1300 कंडक्टर पदों की भर्ती के लिए हुई परीक्षा की फाइल को प्रदेश सरकार ने परिवहन निगम ने मांग लिया है। यह भर्ती परीक्षा पिछले साल सितंबर में हुई थी जब कांग्रेस की सरकार थी। परिवहन निगन ने सरकारी स्कूलों में परीक्षा केंद्र बनाए थे जिनमें लगभग 40 हजार लोगों ने भाग लिया था।

एचआरटीसी की तरफ से जानकारी आई थी कि लिखित परीक्षा में लगभग 3800 अभ्यर्थी उत्तीर्ण हुए थे और इसके बाद इन युवाओं को दस्तावेजों की जांच के लिए बुलाया गया था। निगन ने रिजल्ट पहले ही तैयार कर लिया था मगर चुनाव आचार संहिता लग गई थी। उस दौरान चुनाव आयोग ने निगम को यह कहकर नतीजे घोषित करने की इजाजत नहीं दी थी कि इसपर नई सरकार फैसला लेगी।

मगर अब खबर है कि नई प्रदेश सरकार ने कंडक्टर भर्ती के परिणाम की फाइल रोक कर जांच करने की बात कही है। बताया जा रहा है कि हिमाचल सरकार इस भर्ती प्रक्रिया में गड़बड़ की आशंका जता रही है। परिवहन मंत्री गोविंद ठाकुर ठाकुर के हवाले से भी जानकारी आई है कि परीक्षा की जांच पड़ताल करने के बाद ही इस मामले पर विचार होगा।

 

नई सरकार ने भी ‘रिटायर्ड ऐंड टायर्ड’ लोगों को दिया सेवा विस्तार

शिमला।। हिमाचल प्रदेश में नई सरकार का गठन होते ही मुख्यमंत्री समेत कई नेताओं ने कहा था कि ‘टायर्ड और रिटायर्ड’ लोगों के लिए कोई जगह नहीं है और जिन लोगों को पिछली सरकार ने सेवा विस्तार दिया गया है, वे बोरिया-बिस्तर बांध लें। मगर अब जानकारी आई है कि नई सरकार ने सिर्फ अपने फैसले पर यूटर्न लेते हुए पांच लोगों को सेवा विस्तार दिया, बल्कि इस फैसले को कैबिनेट में लिया और तुरंत सार्वजनिक भी नहीं किया।

 

तीन अधिकारी ये रहे
खबर है कि हाल में हुई कैबिनेट बैठक में सरकार ने पूर्व मुख्य सचिव के निजी सचिव रहे उमेद राम, ट्रेजरी में कार्यरत गोपाल चंद और 14 वें वित्त आयोग में ओएसडी रहे रिटायर्ड एचएएस अधिकारी अभय पंत को पुनर्नियुक्ति देकर 15वें वित्त आयोग में फिर से ओएसडी लगा दिया।

 

इन दो को भी सेवा विस्तार
इन तीनों अधिकारियों के अलावा हिामचल प्रदेश कैबिनेट ने दो पूर्व मुख्यमंत्रियों प्रेम कुमार धूमल और शांता कुमार के स्टाफ को भी रिटायरमेंट के बाद सेवा विस्तार प्रदान किया है।

 

सार्वजनिक नहीं किया फैसला
कैबिनेट की बैठक के बाद बाकी फैसलों को तो वाह-वाही बटोरने के लिए सार्वजनिक कर दिया मगर इन फैसलों की तुरंत जानकारी नहीं दी गई। शायद डर होगा कि कहीं कुछ दिन पहले किए गए दावों की पोल खुल जाएगी। मगर सच्चाई भला कब तक छिपेगी क्योंकि सरकारी काम हैं। आखिरकार हिंदी अखबार अमर उजाला ने यह जानकारी सार्वजनिक की और लिखा- ‘पिछली सरकार की कैबिनेटों के दौरान होने वाले गोपनीय एजेंडे और निर्णयों की तर्ज पर ही भाजपा सरकार भी चलने लगी है।’

खुद चुनाव जीतने वाले वीरभद्र बोले- EVM से हारी कांग्रेस

शिमला।। हार का ठीकरा ईवीएम पर फोड़ना आदत सी हो गई है। नेताओं की बेशर्मी की हद यह है कि चुनाव लड़ने से पहले बोलेंगे कि ईवीएम गड़बड़ है। बावजूद इसके चुनाव लड़ेंगे और फिर नतीजे आने पर दोबारा कहेंगे कि हमने तो पहले ही कहा था कि ईवीएम गड़बड़ है। अरे पता था तो लड़े ही क्यों? मगर कमाल की बात तो वो नेता करते हैं जो इसी सिस्टम से चुनकर आते हैं फिर भी बयानबाजी से बाज नहीं आते। इस लिस्ट में एक और नाम जुड़ा है हिमाचल के वयोवृद्ध नेता और पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह का, जिन्होंने पिछले कार्यकाल में कई अजीब बयान दिए।

 

पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने चुनावों में कांग्रेस पार्टी की हार के लिए सुक्खू के दावे को नकारते हुए ईवीएम को जिम्मेदार ठहराया है। बुधवार को तपोवन में पार्टी की हार के संबंध में पूछे गए सवालों का जवाब देते हुए वीरभद्र सिंह ने कहा कि जिन क्षेत्रों में कांग्रेस पार्टी मजबूत थी, उन क्षेत्रों में हुई पराजय का बड़ा कारण ईवीएम रही हैं। पूर्व सीएम से जब पूछा गया कि चुनावों में धूमल भी हारे हैं तो उन्होंने कहा कि कुछ ही जगहों पर छेड़छाड़ हुई है।

 

पूर्व मुख्यमंत्री ने सत्ता में खींचतान को हार की वजह बताए जाने पर टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसी वजह से नहीं हारे बल्कि चुनावों में हार के लिए मशीनें ही जिम्मेदार रही हैं।

 

चर्चा है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि वीरभद्र सच बोल रहे हों और खुद भी ईवीएम से छेड़छाड़ करवाकर जीते हों और बेटे को भी जितवाया हो। इसलिए जानते हैं कि छेड़छाड़ संभव है, मगर अपनी पोल न खुल जाए इसलिए  खुलकर सबूत नहीं दे रहे। बहरहाल, इसे बेशर्मी ही कहा जाएगा कि हार को स्वीकार न करके ईवीएम को दोष देकर जनादेश का मजाक उड़ाया जा रहा है।

हिमाचल की बेटी ने स्कीइंग में देश को दिलाया पहला अंतरराष्ट्रीय मेडल

शिमला।। मनाली की रहने वाली 21 साल की आंचल ठाकुर ने भारत को स्कीइंग में पहला अंतरराष्ट्रीय मेडल दिलाया है। स्कीइंग की अंतरराष्ट्रीय संस्था फेडरेशन डि स्की द्वारा आयोजित एल्पाइन एजेर 3200 कप में आंचल ने कांस्य पदक जीता है।

आंचल अभी तुर्की में हैं। वहां से उन्होंने अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया कि कई महीनों की मेहनत सफल हुई है। उन्होंने कहा कि मेरी शुरुआत अच्छी रही और इसी कारण मुझे मेडल जीतने में सफलता मिली।

आंचल के पिता रोशन ठाकुर विंटर गेम्स फेडरेशन ऑफ इंडिया के सेक्रेटरी जनरल हैं। उन्होंने खुशी जताते हुए कहा कि यह बड़ी उपलब्धि है और स्कीइंग से जुड़े भारतीयों को इसपर गर्व है।

आंचल अभी तुर्की में हैं

हालांकि उनका कहना है कि केंद्र की तरफ से स्कीइंग के प्रमोशन को लेकर कोई खास मदद नहीं मिलती और इस तरफ ध्यान नहीं दिया जाता।

आंचल को शुभकामनाएं। बता दें कि हिमाचल प्रदेश में भी स्कीइंग की अपार संभावनाए हैं मगर इस तरफ ध्यान नहीं दिया जाता।

कुछ खास इलाकों पर सीएम रिलीफ फंड को ज्यादा खर्च कर गई वीरभद्र सरकार

शिमला।। नई सरकार के सामने जब एक शख्स ने इलाज के लिए मुख्यमंत्री राहत कोष से आर्थिक मदद की मांग की तो पता चला कि यह कोष तो खाली ही हो गया है। अमूमन इस कोष में चार-पांच करोड़ रुपये हुआ करते थे, मगर पता चला कि दो लाख रुपये ही बचे हैं। यही नहीं, यह रकम पूरे प्रदेश के लोगों पर बराबर खर्च हुई होती तो बात अलग थी, मगर जानकारी सामने आई है कि वीरभद्र सिंह सरकार शिमला ग्रामीण, रोहड़ू, रामपुर और हरोली पर ज्यादा रकम खर्च की है।

बता दें कि मुख्यमंत्री वीरभद्र पर पहले ही रोहड़ू, रामपुर और शिमला का पक्ष लेने का आरोप लगा रहा है और ऐसा आज से नहीं, बल्कि हमेशा से है। मगर इन आरोपों को सीएम राहत कोष को लेकर हुए खर्च पर सामने आ रही जानकारी से और बल मिला है। बता दें कि रोहड़ू वीरभद्र की पुरानी सीट रही है, रामपुर रियासत के वह राजा रहे हैं, शिमला ग्रामीण से पिछली बार विधायक थे और अभी उनका बेटा यहां से एमएलए है। और हरोली सीट से वीरभद्र सिंह के करीबी मुकेश अग्निहोत्री विधायक हैं जिन्हें इस बार वीरभद्र सिंह ने कांग्रेस विधायक दल का नेता बनवाने में कामयाबी पाई है।

चलिए, यह रकम जो खर्च हुई होगी जरूरमंद लोगों पर ही हुई होगी। मगर प्रश्न है कि बाकी इलाकों में भी तो लोग परेशान होंगे, उन्होंने भी तो दरख्वास्तें भेजी होंगी, उन्हें भी तो जरूरत रही होगी, फिर वहां समान धनराशि का आवंटन क्यों नहीं हुआ और इन चार इलाकों में ही क्यों पिछली सरकार मेहरबान रही? ऐसे सवाल सोशल मीडिया पर भी उठाए जा रहे हैं। बहरहाल, नई सरकार के मंत्रियों ने 1-1 लाख रुपये का अनुदान अपनी तरफ से सीएम राहत कोष में दिया है और कहा जा रहा है कि बीजेपी अपने विधायकों से भी इस कोष में अनुदान देने के लिए कहेगी।

हिमाचल सरकार ने बैन की ‘पद्मावत’ फ़िल्म: मीडिया रिपोर्टस

शिमला।। संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावती, जिसका नाम अब पद्मावत हो गया है, चर्चा है कि 25 जनवरी को रिलीज होने जा रही है। मगर जानकारी सामने आई है कि हिमाचल प्रदेश की बीजेपी सरकार ने इस फिल्म पर रोक लगाने का फैसला किया है। ‘टाइम्स नाउ‘ ने यह खबर दी है कि हिमाचल की नई सरकार लगातार इस फिल्म को बैन करने को लेकर दबाव में थी।

आपको बता दें कि मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने इस संबंध में कहा है, “मैं ज्यादा नहीं बोलना चाहता. इस पर चर्चा होगी। फिल्म विवादित है। मैं कला का सम्मान करता हूं लेकिन लोगों की भावनाओं के आहत होने की बात आती है तो इसपर विचार किया जाना चाहिए और चर्चा होनी चाहिए।”

बता दें कि हिमाचल प्रदेश सरकार की तरफ से फिल्म को लेकर अभी तक कोई लिखित आदेश सामने नहीं आया है। इस फिल्म राजस्थान ने पहले ही बैन लगाया हुआ है और वहां पर भी बीजेपी की ही सरकार है। इस तरह के फैसले बता रहे हैं कि सरकारें किस तरह से कुछ संगठनों के दबाव में आ रही हैं। इससे पहले मंडी से बीजेपी के सांसद रामस्वरूप शर्मा ने भी फिल्म का विरोध किया था।

नेता प्रतिपक्ष पद को लेकर बिना वजह बवाल कर रही बीजेपी

शिमला।। मीडिया के एक हिस्से में खबर आई कि इस बार हिमाचल में नेता प्रतिपक्ष का पद दिया जाएगा या नहीं, इस पर पेंच अटका हुआ है। इस खबर के आते ही सत्ताधारी बीजेपी के स्वर भी बदल गए और खुद मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने कह दिया कि इस पर विचार किया जाएगा। गोलमोल बातें की जा रही है, साफ कुछ नहीं कहा जा रहा।

हकीकत यह है कि यह किसी के चाहने या न चाहने की बात नहीं है, कांग्रेस को नेता प्रतिपक्ष का पद मिलना तय है और उसे कोई नियम नहीं रोक सकता। यह बात अलग है कि लोकतंत्र की भावना को ताक पर रखते हुए जिस तरह से केंद्र में मोदी सरकार ने कांग्रेस को यह पद देने से इनकार कर दिया, जयराम उसी तर्ज पर चलते हुए हिमाचल में भी ऐसा ही कर दें। मगर ऐसा करना हास्यास्पद ही होगा।

अखबारों ने फैलाया भ्रम
सबसे पहले एक हिंदी अखबार ने खबर छापी कि ‘नई सरकार के विधानसभा के पहले शीत सत्र के दौरान इस बार कांग्रेस पार्टी को नेता प्रतिपक्ष के दर्जे लिए सरकार की इच्छा पर रहना पड़ेगा। कांग्रेस ने मुकेश अग्निहोत्री को नेता प्रतिपक्ष चुन लिया है लेकिन सदन में नेता प्रतिपक्ष के दर्जे के लिए अभी इंतजार करना पड़ेगा।’

इसके पीछे अखबार ने तर्क दिया था- ‘हिमाचल की दूसरी राजधानी धर्मशाला के तपोवन में विधानसभा के शीत सत्र इस बार नेता प्रतिपक्ष के बिना चलेगा। भले ही विपक्षी दल कांग्रेस ने नेता प्रतिपक्ष चुन लिया है लेकिन इस दर्जे के लिए पार्टी के पास एक तिहाई सदस्य होना जरूरी है। कांग्रेस के इस बार 21 विधायक ही हैं जबकि 68 सीटों वाली विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के लिए 23 विधायक होना जरूरी हैं। भाजपा ने 44 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया है। एक माकपा का और दो निर्दलीय विधायक हैं।’ हालांकि इस अखबार ने अग्निहोत्री को नेता प्रतिपक्ष लिखा है मगर वह कांग्रेस विधायक दल के नेता चुने गए हैं।

क्या हैं नियम
मीडिया में बताए जा रहे नियम सतही हैं क्योंकि इस तरह का कोई नियम नहीं है। यहां तक कि भारतीय संसद तक को लेकर इस तरह का कोई लिखित नियम नहीं है। फिर भी यह मान्यता है कि विपक्ष में बैठने वाले दलों में जिस दल के पास सर्वाधिक सीटें होती हैं उससे किसी सांसद को विपक्ष का नेता चुना जाता है। अगर किसी भी विपक्षी दल के पास कुल सीटों का 10% नहीं है तो सदन में कोई विपक्ष का नेता नहीं भी हो सकता है। 10% अंश की गणना दल के आधार पर होती है, गठबंधन के नहीं। हालांकि यह सपीकर के विवेक पर भी निर्भर करता है कि ऐसी दशा में नेता प्रतिपक्ष का पद देना है या नहीं क्योंकि भारतीय लोकतंत्र में विपक्ष का नेता अथवा नेता प्रतिपक्ष आधिकारिक विपक्ष का नेता होता है।

68 सीटो का 10 पर्सेंट निकाला जाए तो यह 6.8 बनता है यानी कांग्रेस के पास कम से कम 7 सीटें होनी चाहिए। और उसके पास 21 विधायक हैं। ऐसे में उसे कोई दिक्कत नहीं है।

मुख्यमंत्री का बयान हैरान करने वाला
जब यह खबर फैली की नेता प्रतिपक्ष के पद को लेकर संशय है तो मुख्यमंत्री से जब पत्रकारों ने सवाल किया तो उन्होंने कहा- विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के दर्जे के मामले में प्रदेश सरकार नियम अनुसार गंभीरता से विचार करेगी। मगर सवाल उठता है कि इसमें गंभीरता से विचार करने जैसी बात ही क्या है? स्पष्ट क्यों नहीं कुछ कहा जा रहा

जब 2003 में बीजेपी को सिर्फ 16 सीटें आई थीं, तब नेता प्रतिपक्ष प्रेम कुमार धूमल बने थे। ध्यान दें 16 सीटें ही आई थीं बीजेपी की तब, जबकि अभी कांग्रेस की 21 आई हैं। अब जिस कांग्रेस ने मुकेश अग्निहोत्री को अपनी तरफ से विधायक दल का नेता बनना तय किया है, वह सदन की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी भी है। ऐसे में नेता प्रतिपक्ष भी उसी से होगा।

खैर, अब नेता प्रतिपक्ष को लेकर ऊहापोह को बढ़ाना कहीं यह तो नहीं दिखाता कि जीत मिलने के जोश में लोकतांत्रिक मूल्य और परंपराएं बीजेपी की प्राथमिकताओं में अब नहीं हैं?

क्या वाकई हिमाचल के इस मंदिर में सोने से गर्भवती हो जाती हैं महिलाएं?

मंडी।। हो सकता है पिछले दिनों फेसबुक, यूट्यूब या किसी टीवी चैनल पर आपने देखा हो कि हिमाचल में एक ऐसा मंदिर है जहां, जहां फर्श पर सोने से महिलाएं गर्भवती हो जाती हैं। सुनने में यह बात अजीब लगती है और हममें से बहुत से लोग यकीन भी कर लेते होंगे कि शायद ऐसा ही होता होगा। मगर हकीकत अलग है। बात कुछ और है और कुछ लोगों ने इसे बदलकर कुछ और बना दिया। सिर्फ इसलिए ताकि लोग हैरान होकर उनका वीडियो देखें और उसे आगे शेयर कर दें।

ऐसी-ऐसी भ्रामक बातें मंदिर के बारे में फैलाई गई हैं

मंडी जिले के जोगिंदर नगर में लड-भड़ोल के पास है सिमसा माता का मंदिर। इस पुराने मंदिर में बहुत से लोगों की आस्था है। दूर-दूर से लोग यहां आते हैं। मां को संतान दात्री भी कहा जाता है। दरअसल जिन लोगों को संतान की प्राप्ति नहीं होती, ऐसा माना जाता है कि मां सिमसा के आशीर्वाद से उन्हें संतान मिल सकती है। मगर इसकी भी एक प्रक्रिया है।

नवरात्रों के दौरान यहां एक विशेष उत्सव होता है, जिसे ‘सलिंदरा’ कहते हैं। सलिंदरा शायद अर्धनिद्रा या निद्रा का अपभ्रंश है, जिसका अर्थ है स्वप्न देखना। तो नवरात्रों के दौरान दूर-दूर से आई महिलाएं रात को मंदिर परिसर में फर्श पर सोती हैं। इस दौरान अगर किसी को सपने में मां ने दर्शन दिए, तो समझिए उसपर मां की कृपा है। मगर इसके बाद सपने में ही अगर ये महिलाएं देखें कि उन्हें कोई फल या सब्जी आदि मिली है, तो माना जाता है कि उनकी मनोकामना पूरी होगी और उन्हें संतान जरूर होगी। वहीं यदि किसी को फल के अलावा कोई निर्जीव चीज़ यानी धातु, लकड़ी, बर्तन आदि मिले तो इसका अर्थ है कि आप जिस इच्छा से आई हैं, वह पूरी नहीं हो पाएगी।

अगर किसी को सपने में ऐसा नहीं दिखता है तो वह फिर सोकर प्रयास कर सकता है। मगर सपना आ जाने के बाद भी कोई वहीं रुका रहे तो माना जाता है कि वह अस्वस्थ हो जाता है। कई सालों से लोगों की अटूट आस्था है और उनका कहना है कि वाकई ऐसा होता है। आप कभी मंदिर जाएं तो बहुत से लोग अपनी संतान लेकर वहां आए होते हैं, जिसे वे मानते हैं कि मा के आशीर्वाद से ही हुई है।

क्या कहते हैं लोगों के अपने अनुभव
विज्ञान के दौरान में भले ही देवताओं की मौजूदगी और चमत्कार पर यकीन करना मुश्किल है मगर जानकारों का कहना है कि सांकेतिक रूप से ही सही, मां सिमसा के मंदिर में सपने वाली बात में संयोग से ही सही, कुछ सच्चाई तो है। उदाहरण के लिए यहां पर जिन निस्संतान महिलाओं को सपना आता है कि उन्हें संतान प्राप्ति होगी, दरअसल उनमें पति-पत्नी दोनों में मेडिकल रूप से कोई गंभीर कमी नहीं होती, मगर फिर भी गर्भधारण नहीं हो पा रहा होता। ऐसा हार्मोन्स की गड़बड़ी के कारण या पति में शुक्राणुओं की कमी के कारण हो सकता है। ऐसे कई लोग खुद बताते हैं कि उनके साथ ऐसा ही हुआ। उनका कहना है कि सभी जगह चेकअप करवाने के बाद पता चला था कि पति-पत्नी मेडिकल रूप से स्वस्थ हैं मगर गर्भधारण में समस्या आ रही थी। बाद में मंदिर आने के बाद पत्नी को फल मिलने का सपना आया और कुछ महीनों बाद गर्भधारण हो गया।

वहीं कुछ उदाहरण ऐसे भी मिले हैं जिनमें महिलाओं को सपने में निर्जीव चीज़ यानी पत्थर या बर्तन आदि मिला, उसका मतलब हुआ कि उनकी संतान नहीं होगी। इसके बाद जब उन्होंने मेडिकल जांच करवाई तो कई बार महिलाओं में मेडिकल रूप से कुछ समस्या मिली तो कई बार उनके पतियों में मेडिकल कारणों से कमी पाई गई। जब इन्होंने अस्पताल में उन समस्याओं का इलाज करवाया तो जरूर इन्हें संतान प्राप्ति हुई। कृत्रिम गर्भधारण के ज़रिये भी बहुत से लोगों ने संतान प्राप्ति की है। ऐसे लोग मानते हैं कि इसमें भी मां की कृपा रही क्योंकि अगर सपने का अर्थ यही था कि आप उस स्थिति में संतान प्राप्ति न कहीं कर सकते। इसके बाद ही वे दंपती अस्पताल गए थे। ये कहते हैं कि अगर विज्ञान उनके लिए वरदान साबित हुआ है तो भी उन्हें मां की वजह से ही संतान प्राप्ति हुई है क्योंकि अगर संतान न होने वाला सपना नहीं आता तो वे शायद कभी अस्पताल में चेकअप करवाने जाते ही नहीं।

आस्था और विज्ञान
कई बार हम वही सपने देखते हैं जिसके बारे में हमने बात की होती है। तो यह एक बेशक संयोग हो सकता है कि आप मंदिर में जिस सपने को देखने की इच्छा से जा रहे हों, वहां वही सपना आए। मगर यह बात जरूर हैरान करती है कि जिस महिला को जैसा सपना आता है, उसे वैसा ही परिणाम देखने को क्यों मिलता है। बहरहाल, आस्था और विज्ञान की अपनी-अपनी दुनिया है। यह बहस तो कभी खत्म नहीं होगी।

सीएम के लिए ऑडी, मंत्रियों के लिए इनोवा खरीदने की खबर पक्की नहीं

शिमला।। पिछले कई दिनों से सोशल मीडिया से लेकर मेन स्ट्रीम मीडिया तक हिमाचल प्रदेश के नए मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर की सादगी की खबरों से छाया हुआ है। कुछ लोगों ने यह तक छाप दिया कि मुख्यमंत्री इतने साधारण हैं कि जमीन पर बैठकर धाम खा रहे थे। बहरहाल, सादगी की खबरें एक तरफ, अब एक और खबर मीडिया में आई जिसे लेकर मुख्यमंत्री की सादगी पसंद छवि पर सवाल उठाए जा रहे हैं। दरअसल पहले इस तरह की खबर आई थी कि इन गाड़ियों के लिए जीएडी ने ऑर्डर देने की तैयारी की है मगर बाद में सरकार की तरफ से स्पष्ट कर दिया गया कि न तो ऐसी गाड़ियां खरीदने की तैयारी है और न ही भविष्य में ऐसा करने की योजना है।

‘सरकार ने कहा- ऐसा कोई ऑर्डर नहीं किया गया’
इससे पहले गुरुवार दिन भर यह खबर छाई रही कि हिमाचल प्रदेश सरकार ने चार नए वाहनों का ऑर्डर किया है, जिसमें तीन इनोवा हैं और एक ऑडी है। तीन इनोवा मंत्रियों के लिए हैं और ऑडी मुख्यमंत्री के लिए। समाचार फर्स्ट पोर्टल के मुताबिक ऑडी कार 47 लाख रुपये में आएगी। 20 लाख रुपये की तीन इनोवा गाड़ियों और 47 लाख की ऑडी का खर्च मिला दिया जाए तो रकम एक करोड़ रुपये से हो जाती है। हालांकि बाद में इस पोर्टल ने अपडेटेड खबर डाली कि मुख्यमंत्री ने खंडन किया है। खबर के मुताबिक मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर और मंत्री सुरेश भारद्वाज ने कहा है कि इस संबंध में न तो कोई चर्चा हुई है और न ही ऐसे प्रस्ताव की योजना है (पढ़ें)।

पहले से आ रही थीं ऐसी खबरें
मीडिया में पहले से ही इस तरह की खबरें आ रही हैं कि नई सरकार मंत्री पहले कमरों के लिए झगड़े, फिर बंगलों के लिए विवाद हुआ और फिर गाड़ियों की फरमाइश होने लगी थी। अमर उजाला में गुरुवार सुबह छपी खबर के मुताबिक नई सरकार के पदाधिकारियों का कहना है कि कोरोला गाड़ियों में झटके लगते हैं।

बहरहाल, अगर ये गाड़ियां सरकार चलाने के लिए जरूरी हैं तो जरूर ली जाएं। इनकी सवारी करने से मंत्री और मुख्यमंत्री अगर ऐसी नीतियां लाएं कि हिमाचल सरकार की आय बढ़े और उसके सिर पर से पैंतालीस हजार करोड़ रुपये का खर्च कम हो जाए, तो वे जो मर्जी करें। मगर ऐसा करके दिखाने के लिए अभी वक्त है। सरकार बने अभी महीना भी पूरा नहीं हुआ, खर्च ज्यादा नजर आ रहे हैं और सोशल मीडिया पर लोग नाराजगी भी जता रहे हैं।

(गाड़ी की तस्वीर प्रतीकात्मक है)