अनुराग ठाकुर के सामने लगे नारे- जनता को बेवकूफ बनाना बंद करो

हमीरपुर।। बीजेपी नेता और हमीरपुर सीट से सांसद अनुराग ठाकुर को उस समय असहज स्थिति का सामना करना पड़ा जब कुछ लोगों ने उनके खिलाफ नारेबाजी कर दी। भोरंज में यह घटना हुई जहां अनुराग ठाकुर की गाड़ी आते ही लोगों ने प्रदर्शन शुरू कर दिया।

वीडियो में नजर आता है कि कुछ लोग हाथ में बैनर लिए खड़े हैं और गाड़ी आते ही ‘अनुराग ठाकुर गो बैक’ और ‘जनता के मूर्ख बनाना बंद करो’ के नारे लगाने लगे। पुलिसकर्मी भी वहां मौजूद थे।

देखें, ‘न्यूज 18 हिमाचल’ द्वारा शेयर किया गया इस घटना का वीडियो:

लोगों ने हाथ में जो तख्तियां पकड़ी थीं, उनपर लिखा था- स्टार नहीं, सेवक चाहिए। यह घटना भरेड़ी की है।

धमाल मचा रहा है नाटी का ये सवा मिनट का वीडियो, देखें

इन हिमाचल डेस्क।। सोशल मीडिया पर हिमाचली नाटी के कई वीडियो वक्त-वक्त पर वायरल होते रहते हैं, इसी तरह से अब एक और वीडियो तेजी से शेयर किया जा रहा है। इस वीडियो में एक लड़की पहाड़ी गाने पर नाटी कर रही है।

यह तो स्पष्ट नहीं है कि वीडियो कहां है, कब शूट किया गया है और कलाकार का नाम क्या है, मगर वीडियो में दिख रहे बैनर से पता चलता कि एनएसएस के किसी कैंप का है।

कुछ घंटे पहले बीइंग हिमाचली पेज पर शेयर किए गए इस वीडियो को हजारों लोग अब तक देख चुके हैं। नीचे देखें:

अवैध निर्माण करने वाले होटलों को राहत देने की तैयारी

शिमला।। पिछली सरकार जहां अवैध कब्जाधारियों के कब्जे नियमित करने के लिए जुटी रही, मई सरकार अवैध निर्माण करने वाले होटलों को राहत देने की तैयारी कर रही है।

बता दें कि एनजीटी के कड़े रुख के चलते अवैध निर्माण करने वाले होटलों में हड़कंप मचा हुआ है। ऐसे में हिमाचल प्रदेश सरकार इन्हें राहत देने के लिए योजना बना रही है। शहरी विकास मंत्री सरवीन चौधरी ने चंबा में पत्रकारों से बात करते हुए कहा, “सरकार अपने दायित्व को समझते हुए लोगों के हितों को समझेगी और उन्हें सुरक्षित बनाने के लिए संभव कदम हो उसे उठाया जाएगा।”

लेकिन सवाल उठता है कि क्या अवैध कब्जा करने वाले या अवैध निर्माण करने वाले मासूम लोग हैं जो उन्हें राहत दी जाए? इस तरह से साबित होता है कि सरकार किसी की भी रहे, कानून तोड़ने वालों की मौज है और सरकारों का इन्हें संरक्षण देना और लोगों को भी कानून तोड़ने के लिए प्रोत्साहित करता है।

मंत्री सरवीन चौधरी ने कहा,”पिछली सरकार ने डेढ़ वर्ष तक कुछ नहीं किया। अगर किसी ने होटल संचालक ने कुछ कमरों का अवैध निर्माण किया है तो उसका असर उस होटल के मुख्य परिसर पर नहीं पढ़ना चाहिए, क्योंकि इससे होटल व्यवसाय को भारी नुकसान पहुंचता है।”

उन्होंने कहा कि सरकार ऐसा मार्ग खोजने में जुटी हुई है जिससे कि अदालत की गरिमा बनी रहे और प्रभावित होने वाले लोगों को भी राहत पहुंचे। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री की स्वीकृति मिलने के बाद इसपर अमली जामा

बता दें कि इसी सरकार में मंत्री महेंद्र सिंह ठाकुर की पत्नी के होटल को भी एनजीटी ने नोटिस भेजा था। दिसंबर 2017 में एनजीटी के सामने खुद महेंद्र सिंह ठाकुर ने माना था कि होटल निर्माण के लिए नियमों को तोड़ा गया है और होटल का जितना अवैध हिस्सा है, उसे वह खुद हटा देंगे। एनजीटी ने इस मामले में एसडीएम मनाली को निगरानी रखने रखते हुए फाईनल रिपोर्ट सौंपने को कहा था। इसके बाद इस होटल के अवैध हिस्से को खुद तोड़ दिया गया था।

पत्रकार रवीश कुमार ने कहा- थर्ड क्लास लोग बन गए हैं मुख्यमंत्री

इन हिमाचल डेस्क।। गणतंत्र दिवस के अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने शुभकामनाएं देते हुए कहा है कि गणतंत्र को कमजोर करने की कोशिश हो रही है। उन्होंने अपने फेसबुक पेज पर लिखा है, “अफसोस इस वक्त भारत में थर्ड क्लास नेता मुख्यमंत्री बन गए हैं। यकीनन थर्ड क्लास हैं। अगर इनके चेहरे पर जाति और धर्म का पाखंड न लिपा गया होता तो यह अपना दस्तख़त करने के काबिल नहीं हैं। आप इनके भाषणों में मौजूद मूर्खता को पहचान लेते और इनकी सभाओं से उठ कर चले जाते।”

वह आगे लिखते हैं, “ये मुख्यमंत्री थर्ड क्लास न होते तो ये संविधान की रक्षा में 25 जनवरी को खड़े नज़र आते। एक फिल्म के बहाने जो लोग उत्पात मचाते रहे और जो लोग उस उत्पात के बहाने सांप्रदायिक गौरव में चुपचाप ढलते रहे उन सबने संविधान की आत्मा को धोखा दिया है। उम्मीद है आने वाले वक्त में भारत इन थर्ड क्लास नेताओं को मुख्यमंत्री पद से हटा देगा। हम इन मूर्खों को महान समझ कर अपने सपनों को इनके हवाले करना बंद करेंगे।”

रवीश कुमार ने आगे लिखा है कि ये भारत के संविधान के प्रतिनिधि नहीं हैं। संविधान की बनाई व्यवस्था का लाभ उठा कर पदों पर पहुंचे हुए ये लोग हैं। उन्होंने उम्मीद जताई है कि कोई नौजवान आएगा जो संवैधानिक आदर्शों से लैस होगा और संवैधानिक व्यवस्था की सर्वोच्चता को कायम करेगा।

वरिष्ठ पत्रकार लिखते हैं कि आपका नागरिक बनना ही संविधान का सम्मान है। उनके पूरे लेख को नीचे पढ़ा जा सकता है-

26 जनवरी की झांकी में दिखे ‘की गोम्पा’ के बारे में जानें

शिमला।। हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति के ‘की गोम्पा’ की झलक इस बार गणतंत्र दिवस की झांकी में देखने को मिली। झांकी में इस खूबसूरत मठ की प्रतिकृति बनाई गई थी और आगे ध्यानरत बुद्ध की प्रतिमा थी। साथ ही पारंपरिक वस्त्रों और वाद्य यंत्रों से सजे लामा चल रहे थे। इस झांकी ने खूब ध्यान बटोरा।

कहां है ‘की गोम्पा?’
‘की गोम्पा’ स्पीति नदी के किनारे स्पीति घाटी में है की गोम्पा। यह एक बौद्ध मठ है जो एक पहाड़ी पर बना हुआ है। यह स्पीती घाटी का सबसे बड़ा मठ है और लामाओं का शिक्षण केंद्र भी। इसे 11वीं सदी में बनाया गया था।

Key Monastery

(तस्वीर- ध्रुव चोपड़ा, स्रोत: Budgetwayfarers.com)

कई बार इस मठ पर हमले भी हुए हैं। पहले माना जाता है कि 14वीं सदी में इसके ऊपर हमला हुआ और फिर 17वीं सदी में मंगोलों ने फिर हमला किया था।1841 में लद्दाख और कुल्लू के युद्ध में इसे नुकसान पहुंचा और फिर सिख सेना के आक्रमण के दौरान।

1975 में आए भूकंप से भी इसे नुकसान पहुंचा मगर आज भी यह भव्य रूप में मौजूद है। झांकी देखें-

स्कूल में पढ़ाई जा रही है हिमाचल की इस बहादुर बेटी की कहानी

एमबीएम न्यूज, घुमारवीं।। अपनों के प्रति प्यार हमें वह ताकत देता है जिसका मुकाबला कोई नहीं कर सकता। रक्षाबंधन पर हम लाए हैं एक ऐसी ही प्रेरक कहानी, जिसमें भाई-बहन के स्नेह के आगे मौत ने भी घुटने टेक दिए थे।

रक्षाबंधन पर आमतौर पर यह मान्यता है कि भाई वचन देता है अपनी बहन की रक्षा का। मगर बिलासपुर के घुमारवीं की एक बहन की बहादुरी की चर्चा आज भी होती है। यह बच्ची अपने भाई को बचाने के लिए तेंदुए से भिड़ गई थी।

शिल्पा और अंशुल
शिल्पा और अंशुल (Image: MBM News Network)

घुमारवीं उपमंडल की भराड़ी उप-तहसील के बडोन में शिल्पा शर्मा 29 अक्तूबर 2012 को भाई अंशुल के साथ स्कूल जा रही थी। इसी दौरान तेंदुए ने अंशुल पर हमला कर दिया। उस समय खुद शिल्पा की उम्र 11 साल की थी और भाई की उम्र  13 साल थी।

बहन के अंदर न जाने कहां से ताकत आई और वह तेंदुए से दो-दो हाथ करने को तैयार हो गई। उसने बिना घबराए पत्थरों व लकड़ियों के टुकड़े से तेंदुए पर हमला कर दिया। उसने भाई को उसके स्कूल बैग से अपनी तरफ खींच लिया।

कुछ ही पलों के अंदर का यह घटनाक्रम बहुत महत्वपूर्ण था क्योंकि शिल्पा हिम्मत हार जाती तो तेंदुआ आराम से अंशुल को लेकर चला जाता। मगर तेंदुआ शिल्पा के जवाबी हमले से सकपका गया। तब तक शोर सुनकर लोग वहां आ गए।

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नन्हे अंशुल को घायल करने के बाद भी आदमखोर तेंदुआ झाडिय़ों में ही घात लगाए बैठा रहा, जिसे बाद में लोगों ने भगाया। बहन ने अपनी जान दांव पर लगा कर भाई की जान बचा ली। पांच दिन तक अंशुल अस्पताल में दाखिल रहा। लेकिन बहादुर बेटी अपने भाई को आदमखोर तेंदुए के पंजों से छुड़वाने में कामयाबी हो चुकी थी।

राज्य सरकार के अनुमोदन पर बहादुर बेटी को तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने भी सम्मानित किया था। शिल्पा आज भी उस दिन को याद करके सिहर उठती हैं। वह कहती हैं कि भाई को उस हालत में देख न जाने कहां से मेरे अंदर ताकत आ गई थी। इन दिनों वह बी फार्मा कर रही हैं। बोर्ड ने उनकी कहानी को तीसरी क्लास के सिलेबस में शामिल किया है।

(यह एमबीएम न्यूज नेटवर्क की खबर है और सिंडिकेशन के तहत प्रकाशित की गई है)

राजपूत महासभा बोली- हिमाचल में रिलीज नहीं होने देंगे पद्मावत

मंडी।। मंगवार को हिमाचल प्रदेश के मंडी में चंद लोग राजपूत महासभा के बैनर तले इकट्ठा हुए और ऐलान किया कि प्रदेश में संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावत को रिलीज़ नहीं होने दिया जाएगा। मंडी के ऐतिहासिक सेरी चाणनी परिसर में इकट्ठा हुए इन लोगों ने फिल्म देखे बिना ही अपना विरोध जताया।

हिमाचल प्रदेश राजपूत महासभा के महासचिव के.एस. जम्वाल ने कहा कि राजपूत महासभा करणी सेना की पक्ष में है और हिमाचल प्रदेश में पद्मावत फिल्म को रिलीज नहीं होने दिया जाएगा। उन्होंने कहा, “फिल्म में इतिहास के साथ छेड़छाड़ की गई है और रानी पद्मावती को गलत ढंग से दिखाया गया है। ऐसे में इसे सहन नहीं किया जा सकता।”

जम्वाल ने कहा कि राजपूत महासभा इस सीएम जय राम ठाकुर से भी मिल चुकी है और इस फिल्म पर रोक लगाने की मांग उठाई है। उन्होंने कहा कि सरकार को सुप्रीम कोर्ट में फिल्म को रोक लगाने के लिए याचिका दायर करनी चाहिए।

यह बात अलग है कि इस विरोध प्रदर्शन में कुछ ही लोग आए थे और मंच भर भी नहीं सका था।

कब दूर होगी हिमाचल के सरकारी कर्मचारियों की पेंशन की टेंशन?

राजेश वर्मा।। आज पूरे देश के साथ-साथ प्रदेश में भी 2003 के बाद नियुक्त होने वाले कर्मचारियों में नई पेंशन योजना (एनपीएस) को लेकर दिन ब दिन रोष बढ़ता जा रहा है। विरोध होना भी लाजिमी है बडी़ विचित्र बात है कि कर्मचारी लोकतंत्र में जिन सरकारों को मां का दर्जा देते हैं वही मां अपने बच्चों को बुढ़ापे में भूखे मरने के लिए छोड़ रही है। यह सच है कि सरकारी सेवा क्षेत्र में नौकरियों के अवसर समय के साथ-साथ कम हुए हैं फिर भी आज जिन लोगों को सरकारी क्षेत्र में नौकरी मिल रही है संतोष उन्हें भी नहीं है। इसकी मुख्य वजह है पहले तो नौकरी का अनुबंध पर मिलना दूसरा सबसे बड़ी चिंता जो इस समय इन कर्मियों के लिए बनी हुई है वो है सेवाकाल के बाद बिना पेंशन के बुढापा। आखिर पेंशन की चिंता क्यों जायज है?

मैं कुछेक पहलुओं पर सबका ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा कि पुरानी पेंशन क्यों जरूरी है। भारतीय संविधान ने सबको समानता का अधिकार दिया लेकिन व्यवस्था ने समय के साथ अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए इसको समानता की जगह असमानता में बदल दिया। बात हो रही है पुरानी पेंशन की तो 2003 के बाद सरकारी क्षेत्र में नियुक्त होने वाले कर्मियों के लिए केंद्रीय व राज्य सरकारों ने पुरानी पेंशन बंद कर दी उसकी जगह नई पेंशन स्कीम शुरू कर दी गई। शुरू में इसका जितना विरोध होना चाहिए था वह नहीं हो पाया किसी भी चीज़ या योजना के परिणाम उसके लागू होने के 10-15 वर्षों बाद सामने आते हैं।

यहां भी यही हुआ आज 10-12 वर्षों बाद नई पेंशन स्कीम के परिणाम या दुष्परिणाम कहें, सामने आ रहे हैं।अब जो कर्मी 2003 के बाद नियुक्त हुआ है उसे 10-15 वर्ष के सेवाकाल बाद मात्र 1हजार के लगभग पेंशन मिल रही है। इसके जीवंत उदाहरण अभी हाल ही में प्रदेश के कांगडा जिले में कुछेक जेबीटी शिक्षकों की सेवानिवृति पर देखने को मिला। इस बात से कोई भी मुंह नहीं मोड सकता कि मात्र 1 हजार रुपए की पेंशन पर एक एक सेवानिवृत्त व्यक्ति कैसे अपना व अपने परिवार का पेट पाल सकता है।

यह कैसी समानता?
ये कैसा समानता का अधिकार है कि एक ही पद पर नियुक्त कर्मी जब सेवानिवृत्त होते हैं तो एक कर्मी को 25 हजार की पेंशन और दूसरे को उतने ही सेवाकाल बाद 1 हजार की पेंशन आखिर ये कैसी समानता है। हमारी सरकारें इतना भी नहीं समझ पाई कि कर्मियों के लिए तो न्यू पेंशन स्कीम (एनपीएस) लागू कर दी लेकिन खुद के लिए वही पुरानी पेंशन मतलब माननीय चाहे एक वर्ष तक निर्वाचित रहे उन्हें पुरानी पेंशन और कर्मचारी चाहे 20 वर्ष का कार्याकाल पूरा कर ले उसे 1 हजार की नाममात्र न्यू पेंशन।

इस देश का दुर्भाग्य कहें या नेताओं का सौभाग्य एक बार जनप्रतिनिधि चुनें जाने के बाद वे ता-उम्र पेंशन के हकदार बन जाते हैं भले ही वह अपना 5 वर्ष का कार्यकाल पूरा भी ना कर पाएं।

मैं नई व पुरानी पेंशन के तकनीकी पहलुओं पर नहीं जाना चाहता मैं तो उन सामाजिक पहलुओं पर सबका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं जिसकी तस्वीर बहुत दर्दनाक है। सबसे मुख्य बात पुराने कर्मियों का जीपीएफ कटता है जो सरकारी खजाने में जाता है और ब्याज भी वर्तमान दर का देय होता है वहीं नई पेंशन स्कीम में कर्मचारी का सीपीएफ कटता है जिसमें कर्मचारी के मूल वेतन की 10% राशि कटती है जबकि इतनी ही राशि सरकार या नियोक्ता द्वारा डाली जाती है। यह सब राशि शेयर बाजार में लगती है इसे सरकारी खजाने में नहीं रखा जाता यहां भी सरकार ने एक कर्मी की जमा पूंजी को बाजार के हवाले कर दिया गारंटी भी कोई नहीं।

एक कर्मचारी पहले जीपीएफ अपनी मर्जी से जमा करवा सकता था लेकिन अब नई पेंशन स्कीम के अधीन कर्मी चाह कर भी बचत नहीं कर सकता। इससे बड़ा मजाक क्या हो सकता कि जहाँ कर्मचारी जितनी राशि जमा कर रहे हैं उनकी वह राशि शेयर बाजार में जाकर कम हो रही है। अंत में भी तरह-2 की औपचारिकताएं पूरी करने पर अपने जमा की पूरी पूंजी नहीं मिल पाती। सामाजिक सुरक्षा सभी के लिए जरूरी है। आज चाहे गांव हो या शहर वर्तमान में एकल परिवारों का चलन है। संयुक्त परिवार अब नहीं रहे। एक कर्मी जिसने 15-20 साल सरकारी नौकरी करने के बाद अपने बच्चों व परिवार पर अपनी सारी जमा पूंजी खर्च की लेकिन जब बुढापा आया तो वही बच्चे मां बाप को छोड़कर चले जाते हैं। इससे दुखदायी और क्या हो सकता है कि अपनी जमा पूंजी को खत्म कर एक इंसान को सरकार ने भी बेसहारा छोड़ दिया वहीं उसके अपने भी छोड गए।

व्यवस्था से भी कुछेक प्रश्नों का समाधान आपेक्षित है कि यदि पुरानी पेंशन से देश का वित्तीय घाटा बढ़ा तो क्या माननीयों की पेंशन से यह घाटा नहीं बढ़ा होगा?

किसी लोकतांत्रिक देश में कल्याणकारी राज्य ही वहां की परिभाषा है। वर्तमान में पूरे देश में पुरानी पेंशन की मांग उठ रही है क्योंकि न्यू पेंशन स्कीम के दुष्परिणाम अब जाकर सामने आ रहे हैं। वैसे भी यह तो कदापि न्यायोचित नहीं की केवल समय के आधार पर आप अपने कर्मचारियों को अलग-2 पेंशन दें वह भी तब, जब वह एक ही पद पर एक-समान सेवाकाल पूरा करके सेवानिवृत्त हुए हो। बस केवल इस अंतर के आधार पर एक को पेंशन से वंचित रखा जा रहा है कि वह 2003 के लिए बाद नियुक्त हुआ है। सबसे बड़ी बात तो यह हे कि जो चीज कर्मियों पर लागू हो वह उन जनप्रतिनिधियों पर भी होनी चाहिए जो 2003 के बाद चुनें गए हों । क्योंकि अपने फायदे के लिए नियमों में ढील देना संविधान के मौलिक अधिकारों का हनन हैं। जबकि यह अधिकार सबको व सब पर एक समान लागू होते हैं।

आज जरूरत है सरकारी क्षेत्र को ऊपर उठाने की और इसको उपर मात्र वहां के कर्मी ही उठा सकते हैं। लेकिन वह भी तभी ऊपर उठा पाएंगे जब बिना डर भय के कार्य कर पाएंगे। कोई भी इंसान वर्तमान स्थिति से खुश नहीं होता वह खुश होता है अपने भविष्य को देखकर, भविष्य की तस्वीर ही उसकी वर्तमान क्षमता को बढ़ाती है। उम्मीद है देश प्रदेश की सरकारें अपनी कर्मचारियों के लिए उसी पेंशन को बहाल करेंगी जिस पेंशन की हमारे माननीय व 2003 से पहले के कर्मी उपभोग कर रहे हैं।

(स्वतंत्र लेखक और शिक्षक राजेश वर्मा बलद्वाड़ा, मंडी के रहने वाले हैं और उनसे 7018329898 पर संपर्क किया जा सकता है।)

अगर आपके पास भी तबादला नीति को लेकर सुझाव हैं तो हमारे फेसबुक पेज पर मेसेज करें या फिर ईमेल करें हमारी आईडी inhimachal.in @gmail. com पर।

हेलिकॉप्टर से अपने इलाके में आए सीएम गरीबी याद करके हुए भावुक

एमबीएम न्यूज नेटवर्क, मंडी।। सिराज विधानसभा क्षेत्र के दौरे पर आए मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने अपने बचपन के उस दौर की यादें साझा कीं, जिसमें उन्होंने कहा कि गरीबी को उन्होंने करीब से महसूस किया है। बालीचौकी में आयोजित जनसभा में जयराम ठाकुर ने कहा कि वह किताबें मांगकर पढ़ाई करते थे और नंगे पैर स्कूल जाया करते थे।

मुख्यमंत्री ने कहा कि जब वो स्कूल में पढ़ते थे तो उनके पापा अगली कक्षा के विद्यार्थियों से किताबें ले लिया करते थे, क्योंकि किताबें खरीदने के लिए पैसे नहीं होते थे। उन्होंने प्राइमरी स्कूल के दौर को याद करते हुए कहा कि स्कूल से घर तक नंगे पैर आना-जाना पड़ता था क्योंकि परिवार की हालत ऐसी नहीं थी कि जूते खरीद सके।

मुख्यमंत्री ने कहा कि आज ये बातें भले ही सुनने में अजीब लग रही हैं लेकिन इस दौर को उन्होंने अनुभव किया है। उन्होने कहा कि मुझे मिस्त्री का बेटा होने पर नाज़ है। उन्होंने कहा, “भले ही आज पिताजी जीवित नहीं हैं लेकिन उनका आशीवार्द हमेशा मेरे साथ है।”

मुख्यमंत्री ने कहा कि उनके माता-पिता ने उन्हें खून-पसीने की कमाई से पाल-पोस कर बढ़ा किया है जिस कारण आज वह इस मुकाम तक पहुंच पाए हैं। वह बोले, “न तो मेरा परिवार किसी राजनीतिक पृष्ठभूमि से है और न ही वह मैं परिवार को राजनीति में लाना चाहता हैूं।”

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अपने बचपन के दिनों का जिक्र करते हुए मुख्यमंत्री कई बार भावुक हो गए और उनकी आंखें भी नम हो गईं।

(ऊपर एमबीएम न्यूज नेटवर्क की खबर है जो सिंडिकेशन के तहत प्रकाशित की गई है।)

यह बात अलग है कि उनके इस दौरे के लिए सरकार ने छोटा हेलिकॉप्टर किराए पर लिया था क्योंकि बड़ा हेलिकॉप्टर यहां उतर नहीं पा रहा था। इसे कांग्रेस विधायक दल के नेता मुकेश अग्निहोत्री ने भी सवाल उठाए हैं और कहा है कि इससे पता चलता है कि नई सरकार जो पैसा बचाने की बातें कर रही थी, उनमें कितनी सच्चाई है।

मंडी में यहां पर हिमाचल का चौथा एयरपोर्ट बनाने की तैयारी

शिमला।। हिमाचल प्रदेश की नई सरकार ने प्रदेश में चौथा एयरपोर्ट बनाने के लिए कोशिश शुरू कर दी है। अभी हिमाचल में तीन जगह हवाई पट्टियां हैं- कांगड़ा के गग्गल में, कुल्लू के भुंतर में और शिमला के जुबड़हट्टी में। मगर अब  प्रदेश सरकार चाहती है कि चौथा एयरपोर्ट मंडी ज़िले में खुले। गौरतलब है कि इसके लिए बहुत पहले से मांग उठती रही है।

अब सरकार इस एयरपोर्ट को बनाने का प्रस्ताव जल्द ही एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया को भेजेगी। दिल्ली से लौटे मुख्यमंत्री ने कहा है कि तीन हवाई अड्डों पर उड़ानों की संख्या बढ़ाने के साथ ही मंडी जिले में नया एयरपोर्ट बनाने की तैयारी की जा रही है।

कहां बन सकता है एयरपोर्ट?
मंडी में प्रस्तावित एयरपोर्ट के लिए दो जगहें चिह्नित की गई हैं। पहली जमीन नेरचौक के पास है, जहां बहुत ज्यादा समतल जमीन है। कहा जा रहा है कि यहां कोहरा भी पड़ता है, जिससे भविष्य में उड़ानों के संचालन में दिक्कत आ सकती है। (नेरचौक में जहां फोरलेन बना है)

वहीं दूसरी जगह घोघरधार बताई जा रही है जो पहाड़ी पर है। यहां बहुत बड़ा मैदानी हिस्सा है जिससे कई दंतकथाएं भी जुड़ी हुई हैं। बहरहाल, ये बाद की बात है, अभी प्रस्ताव मंजूर होगा तब जाकर जगह आदि फाइनल होगी।