बेघर हुए लोगों का आरोप- छोटी जाति का बताकर नहीं दी मंदिर में शरण

कांगड़ा।। पालमपुर में एक ऐसा मामला सामने आया है, जो हिमाचल प्रदेश जैसे पढ़े-लिखे राज्य के लिए शर्म का विषय है। दरअसल ठाकुरद्वारा के पास वन विभाग की जमीन में अवैध रूप से रह रहे कुछ लोगों की झुग्गियों को वन विभाग ने हटा दिया। ऐसे में ठंड के मौसम में बेघर हुए लोगों ने एक मंदिर से शरण मांगी। मगर इन लोगों का कहना है कि उनके ‘छोटी जाति’ से होने के कारण उन्हें शरण नहीं मिली और उनका सामान भी फेंक दिया गया।

 

इस खबर को ‘हिमाचल अभी-अभी’ पोर्टल ने प्रकाशित किया है। हालांकि इसमें यह नहीं बताया गया है कि मंदिर कौन सा था और मंदिर कमेटी का इन आरोपों पर क्या कहना है। मगर यह लिखा गया है कि ‘रामनगर कॉलोनी के पास बसे ये लोग मुलथान (कांगड़ा जिला) के हैं। वन विभाग ने 6 में से चार झोपड़ियों को गिरा दिया और दो को आज गिराया जाना है। लोगों ने मंदिर से शरण मांगी मगर उनहें नहीं दी गई। लोगों का कहना है कि एक रात गुजारने के लिए पूछा गया था मगर मंदिर कमेटी ने यह कहकर मना कर दिया कि आप छोटी जाति के हो और मंदिर में रखा सामान भी फेंक दिया।’

 

पोर्टल ने इसका एक वीडियो भी शेयर किया है। सुनिए, क्या कहना था लोगों का-

हालांकि अच्छी बात यह है कि एक व्यक्ति ने आगे आकर अपने घर में इन्हें अपने यहां शरण दी। अवैध कब्जे करना गलत है और उससे भी ज्यादा गलत विभाग का पहले खामोश बैठे रहकर सर्दियों के मौसम में लोगों को बेघर कर देना। हालांकि यह कार्रवाई हाई कोर्ट के आदेश पर हुई है मगर सवालों के घेरे में आ गई है, क्योंकि कब्जे हटाने आई टीम के पास जमीन की निशानदेही से संबंधित दस्तावेज नहीं थे और इस बाबत शिकायत लोगों ने लिखित रूप से डीसी कांगड़ा से की है।

 

जैसे ही टीम कब्जे हटाने के लिए मौके पर पहुंची तो लोगों ने विरोध शुरू कर दिया। उनका कहना था कि वह पिछले 40 साल से यहां रह रहे हैं और बच्चों की परीक्षाएं सिर पर हैं। इस दौरान काफी देर तक हंगामा चलता रहा और बिजली बोर्ड के कर्मचारियों की ओर से कनेक्शन काटने के बाद वन विभाग ने कब्जों को तोड़ दिया।

 

डीएफओ का कहना है कि बेघर हुए लोग कहां रहेंगे, यह देखना प्रशासन का काम है। लेकिन अहम सवाल यह है कि हमारे समाज को क्या हुआ है कि इंसान-इंसान में भेदभाव अब भी बरकरार है। बेघर हुए लोगों को मंदिर में रात गुजारने की इजाजत न देना अमानवीय है।

 

इस मामले की जांच की जानी चाहिए और अगर घटना सच है तो प्रशासन को कार्रवाई करनी चाहिए। मगर समाज के तौर पर यह सभी के लिए शर्म की बात है कि हमारे बीच ऐसे लोग मौजूद हैं जो आज भी अपनी झूठी शान के लिए दूसरों को अपमानित करते हैं।

कथित रूप से छेड़छाड़ पर बेल्ट से पीटा अध्यापक, वीडियो वायरल

एमबीएम न्यूज नेटवर्क, हमीरपुर।। हिमाचल प्रदेश में एक वीडियो सामने आया है जिसमें छात्र एक शख्स की बेल्ट से पिटाई कर रहे हैं। जमीन पर बैठा शख्स चिल्ला रहा है और कमरे में मौजूद छात्राएं रोकने की कोशिश कर रही हैं। बताया जा रहा है कि वीडियो हमीरपुर के एक निजी कॉलेज का है और जिसकी पिटाई हो रही है वह अध्यापक है।

अब यह ख़बर अपडेट हो गई है, आरोपी अध्यापक को रेप के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया है। यहां क्लिक करके पढ़ें

कथित तौर पर अध्यापक पर किसी छात्रा से छेड़छाड़ का आरोप लगा है। बता दें कि इन आरोपों की और इस मामले की पुष्टि नहीं हो पाई है।

 

घटना कल की बताई जा रही है। इस मामले में क्या हुआ है, स्पष्ट नहीं हो पाया है। किसी ने इस शख्स की पिटाई का वीडियो बनाया हुआ है। इसमें एक लड़की भी बेल्ट से पिटाई करती नजर आ रही है।

 

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जानकारी के मुताबिक मामला देर रात पुलिस के पास पहुंच गया था और आज लड़की का मेडिकल करवाया जा सकता है। नीचे देखें वीडियो:

 

 

(यह एमबीएम न्यूज नेटवर्क की खबर है और सिंडिकेशन के तहत प्रकाशित की गई है)

SDM लेने के चक्कर में बहुत कुछ खोने की तरफ बढ़ते लोग

राजेश वर्मा।।  दुर्भाग्यपूर्ण क्या बेहद निंदनीय है की सराज के एक हिस्से में वहां कुछेक लोगों द्वारा मात्र एसडीएम कार्यालय के लिए गैर जिम्मेदाराना तरीके से उस इतिहास को बदनाम करने की कोशिश की है जिसे रचे अभी चंद दिन भी नहीं हुए। जिस काम के लिए प्रदेश का मुखिया प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से दोषी नहीं उसे उसके लिए गुनहगार माना जा रहा है। सच कहूं तो लगता है हम लोग एसडीएम कार्यालय चाहते ही नहीं। हम तो चंद असमाजिक तत्वों के बहकावे में आकर यह सब धरना प्रदर्शन व शव यात्रा नहीं बल्कि अपनी ही सोच की “बेशर्म यात्रा” निकाल रहे हैं।

 

इस घटना के पीछे मैं माननीय मुख्यमंत्री जी को भी दोषी मानता हूं उनके दोष यह हैं…

1.पहला दोष यह है कि वह एक साधारण परिवार से संबंध रखने वाले साधारण से प्रदेश वासी हैं क्या साधारण होना गुनाह है?

2.दूसरा दोष वह एक इमानदार स्वच्छ छवि वाली शख्सियत हैं। क्या राजनीति में इमानदार स्वच्छ होना गुनाह है?

3.तीसरा दोष यह की उनमें अपने लोगों का दुख दर्द समझने का दिल है? क्या किसी मुख्यमंत्री के ह्रदय में अपने लोगों के प्रति प्रेम भाव होना गुनाह है?

4.चौथा दोष यह की वह मंडी से हैं तभी तो हर कोई बिना बुद्धि का प्रयोग किए बस हर छोटी बड़ी बात पर मंडी को कोसने लग जाता है।

5.पांचवा और सबसे बड़ा दोष है की वह खुद सराज से हैं तभी वहां के लोगों में ऐसा भद्दा प्रदर्शन करने की हिम्मत हुई क्योंकि यदि मुख्यमंत्री कहीं और से होता तो आपको शायद यह सब करने की छूट नहीं मिलती। उनके अपनेपन को ही इन लोगों ने कमजोरी समझ लिया।

6.छठा यह की वह राजनीति करने की बजाए, राजनीति का शिकार ज्यादा हो रहे हैं। इसमें भी लगता है बेगानों की बजाए अपनों के ज्यादा शिकार बन रहे हैं अपनों में भी वह “अपने” जो अंग-संग दिखते हैं या ज्यादा हितैषी लगते हैं क्योंकि इन अपनों की अब तक की चुप्पी यही साबित करती है।

अरे यदि इस मुख्यमंत्री में एक आम पहाड़ी का दिल नहीं होता तो आप किसी की हिम्मत नहीं हो सकती थी कुछ भी धरना प्रदर्शन करने की, शायद उनकी शरीफियत व इंसानियत को इन लोगों ने कमजोरी समझ लिया लेकिन कमजोर तो यह खुद थे जिस बात को मिल बैठकर समझाया जा सकता था उसे पूरे देश प्रदेश में पहुंचा कर अपनी बुद्धिमत्ता का ऐसा परिचय दिया की हर कोई सोचने पर मजबूर हो गया की क्या यह वही शांत वादियां है जिसके चर्चे विदेशों में भी होते हैं।

राजनीति यहां भी कहां रूकी घटना एक क्षेत्र में घटित हुई और कुछेक ज्ञानी विज्ञानी पूरी मंडी को कोसने लग गए। उदाहरण देते हैं सुजानपुर की जनता ने गलत किया अब मंडी वाले गलत कर रहे हैं। आप पूरे हमीरपुर को कटघरे में क्यों नहीं खड़ा करते? मतलब जैसा दिल करे वैसे क्षेत्रवाद को हवा दो। आखिर किस लिए? सिर्फ राजनीति के लिए ही मंडी को बदनाम कर रहे हो? खैर कसूर आपका नहीं जब अपने ही लोग समझ न पाएं।

बात करें एसडीएम कार्यालय की तो यह ठीक है हम आप सब चाहते हैं एसडीएम कार्यालय ही क्या? हमारे अपने-अपने क्षेत्र में और भी संस्थान खुलें परंतु क्या इस तरह से विरोध करके खुलें? कदापि नहीं इसे पाने के और भी तरीके हैं शांतिमय तरीके से बातचीत करके फिर भी बात न बनें तो शांतिमय तरीके से मौन जलूस या प्रदर्शन करके क्या कुछ नहीं हासिल हो सकता? या फिर कानूनी प्रक्रिया का सहारा लेकर आदि आदि।

अरे मुख्यमंत्री आपके अपने घर गांव से है एक एसडीएम कार्यालय क्या आप तो जो चाहो ले सकते हो लेकिन शायद आप लेने की तरफ नहीं खोने की तरफ बढ़ रहे हैं।
वह लोग भी सोच बदले जो यह कहते हैं की मुख्यमंत्री मंडी से है। मुख्यमंत्री प्रदेश के हैं हम सबके हैं सीमाओं में बांध कर खुद को न बांधिए।

(स्वतंत्र लेखक और शिक्षक राजेश वर्मा बलद्वाड़ा, मंडी के रहने वाले हैं और उनसे 7018329898 पर संपर्क किया जा सकता है।)

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ठंडे पकौड़े खरीदने से इनकार करने पर दुकानदार ने महिला को पीटा

एमबीएम न्यूज नेटवर्क, मंडी।। हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले में एक अजीबो-गरीब मामला सामने आया है। जिले के सरकाघाट में एक महिला ने आरोप लगाया है कि जब उसने एक दुकान से ठंडे पकौड़े खरीदने से इनकार किया तो दुकानदार ने उसके साथ मारपीट कर दी।

फतेहपुर के लुणाधा गांव में रहने वाली कमला देवी ने पुलिस को जानकारी दी है कि जब वह सुरेश कुमार नाम के शख्स की दुकान से पकौड़े खरीद रही थीं, तब पता चला कि पकौड़े ठंडे हैं। इसपर उन्होंने खरीदने से इनकार कर दिया। मामला बढ़ गया और आरोप है कि सुरेश कुमार ने मारपीट शुरू कर दी।

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सरकाघाट पुलिस ने आईपीसी की धारा 341 और 323 के तहत मामला दर्ज किया है और आगे की कार्रवाई कर रही है।

(यह एमबीएम न्यूज नेटवर्क की खबर है और सिंडिकेश के तहत प्रकाशित की गई है)

अमीर मुख्यमंत्रियों की सूची में जयराम ठाकुर 18वें नंबर पर

इन हिमाचल डेस्क।। एसोसिएशन ऑफ़ डिमोक्रेटिक रिफॉर्म (एडीआर) ने एक रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट में भारत के 29 राज्यों और दो केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों की संपत्ति का ब्योरा दिया गया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर की चल-अचल संपत्ति 3.27 करोड़ रुपये है।

 

इस लिस्ट में देश के 31 मुख्यमंत्रियों में सबसे ज्यादा संपत्ति के मामले में जयराम ठाकुर 18वें नंबर पर है। वहीं आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू इस लिस्ट में पहले नंबर पर हैं, जिनके पास 177 करोड़ की चल-अचल संपत्ति है।

भारतीय जनता पार्टी शासित राज्यों की बात करें तो संपत्ति के मामले में जयराम सातवें नंबर पर हैं। इस मामले में गुजरात के सीएम विजय रुपाणी नंबर वन हैं।

 

त्रिपुरा के मानिक सरकार सबसे कम संपत्ति वाले सीएम हैं, जिनके पास लगभग 26 लाख की संपत्ति है।

 

कैसे बनी यह रिपोर्ट?
एडीआर ने निर्वाचन आयोग में विधानसभा चुनाव लड़ने के समय दिए संपत्ति से संबंधित दस्तावेजों को आधार बनाकर रिपोर्ट जारी की है।

लेख: CM का पुतला फूंकने वाली ‘भेड़ों’ को कौन हांक रहा है?

आई.एस. ठाकुर।। नई सरकार बनने के बाद मैंने तय किया था कि इस सरकार को कम से कम छह महीने दूंगा, फिर उसके काम के आधार पर इसकी समीक्षा वाला लेख लिखूंगा। पिछले कई दिनों से जुंजैहली वाला घटनाक्रम देख रहा था, मगर खुद को रोकता रहा। कल जैसे ही खबर पढ़ी कि एसडीएम कार्यालय की मांग को लेकर सड़कों पर उतरे लोगों ने मुख्यमंत्री की शवयात्रा निकाली और श्मशानघाट जाकर उसे आग भी लगाई तो हैरान रह गया।

 

मैंने तस्वीरों को गौर से देखा। समझने की कोशिश की कि भीड़ में कौन लोग शामिल थे। इस भीड़ को मैंने भेड़ों की सांकेतिक उपमा इसलिए दी है कि जैसे भेड़-बकरियां कहीं भी हांक दिए जाने पर वहीं जाने लगती हैं, जुंजैहली का मामला भी वैसे ही लग रहा है। यहां लोग खुद कम, किसी के उकसावे पर ज्यादा हुड़दंग मचा रहे हैं। पहले आप जरा इस वीडियो को देखें:

गांव के एकदम भोले-भाले लोग नजर आ रहे हैं आगे। महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं। कोई विसल बजा रहा है, कोई मुस्कुराते हुए विक्ट्री साइन बना रहा है। यह आक्रोश या गुस्से भरा प्रदर्शन था या किसी धार्मिक उत्सव का जुलूस? हर आंदोलन की एक प्रकृति होती है। विषय क्या है, इस पर बाद में आते हैं। पिछले कई दिनों के प्रदर्शनों की तस्वीरों और वीडियो से निष्कर्ष में पहुंचा हूं कि ये प्रदर्शन स्वत: स्फूर्त नहीं बल्कि सुलगाया गया है। वरना आप गुस्से में होते तो ठहाके लगाते हुए शवयात्रा नहीं निकालते।

 

एसडीएम कार्यालय में होता क्या है?
इस भीड़ में चल रहे आधे से ज्यादा लोगों को यह तक पता नहीं होगा कि एसडीएम कार्यालय में होता क्या है। फिर भी वे इस आंदोलन में शरीक हो गए हैं। एसडीएम कार्यालय कोई स्कूल या कॉलेज भी नहीं होता कि किसी को वहां हर रोज़ जाना पड़े। इस बात में कोई शक नहीं कि एसडीएम कार्यालय काफी अहम दफ्तर होता है और कई तरह के प्रशासनिक कार्य करवाने होते हैं। लेकिन ऐसा भी नहीं कि वह आपके यहां से 11 से 15 किलोमीटर दूर खुले तो आपको दिक्कत हो जाए। और वैसे भी जब कहा है कि एसडीएम ज्यादातर समय जुंजैहली में भी बैठेगा, फिर आपको क्या दिक्कत है?

 

विरोध का मतलब समझ से परे
जुंजैहली में एसडीएम कार्यालय पिछली कांग्रेस सरकार ने खोला था। वह भी एक तरह से कांग्रेस ने कोर्ट को गुमराह किया था। इसी कारण इस साल की शुरुआत में कोर्ट ने अधिसूचना को रद्द कर दिया और फिर नई सरकार ने थुनाग में एसडीएम ऑफिस खोलने का ऐलान किया। ध्यान रहे कि जुंजैहली और थुनाग में दूरी 14 किलोमीटर है। फिर भी जुंजैहली में प्रदर्शन हो रहे हैं। सुविधा तो आप ही लोगों को मिल रही है न, फिर दिक्कत क्या है?

तुष्टीकरण खतरनाक
पिछली सरकार के दौरान मैं वीरभद्र सरकार की तुष्टीकरण की नीतियों की आलोचना कर रहा था। वीरभद्र ऐसा कर रहे थे कि स्थानीय नेता जो मांग रहे थे, आंख मूंदकर हां कर दे रहे थे। स्कूल, कॉलेज, अन्य सरकारी दफ्तर खोलने में प्रासंगिकता नहीं देखी गई, व्यावहारिकता नहीं देखी गई, किसी ने मांगा दे दिया। यह तुष्टीकरण प्रदेश को महंगा पड़ा है। जुंजैहली कांड इसी की एक देन है। ऐसी परंपरा स्थापित हो गई है कि हर कोई चाहेगा कि उसके यहां दफ्तर खुल जाएंगे। मगर क्या ऐसा किया जा सकता है?

 

कांग्रेस शर्म करे
वीरभद्र के पुतले कहीं जल जाते थे तो पुलिस अधिकारियों के तबादले हो जाया करते थे। पिछली सरकार के दौरान पुलिसकर्मियों को ऊपर से कार्रवाई का इतना खौफ होता था कि वीरभद्र के पुतलों से चिपक जाया करते थे, मगर उन्हें आग नहीं लगने देते थे। मगर मुख्यमंत्री के गृहक्षेत्र में शवयात्रा निकाली गई फिर खड्ड किनारे पुतला फूंका गया, कुछ नहीं हुआ। यह प्रदर्शन कांग्रेस के जिन नेता के नेतृत्व में हो रहा है, उसने कोर्ट को गुमराह किया था और क्षेत्रवाद के लिए अपनी राजनीति चमकाने के लिए ही जुंजैहली में एसडीएम ऑफिस खुलवाया था। वही आज इस प्रदर्शन को हवा दे रहा है, लोगों को उकसा रहा है, महिलाओं को आगे कर रहा है। जबकि इस समस्या के लिए वह खुद जिम्मेदार है। कांग्रेस के नेताओं की चुप्पी दिखाती है कि राजनीति का स्तर कितना गिर गया है।

 

मुख्यमंत्री जी, नरमी से काम नहीं चलेगा
मुख्यमंत्री को लगता होगा कि मेरा इलाका है, अपने लोग हैं, इन्हें क्या कहें। मगर यह ढीला रवैया अगर वोट खोने के डर से है तो समझ लीजिए कि आप अगर बिना वजह इस प्रदर्शन के आगे झुक गए तो आपको वोट तो वैसे भी नहीं मिलेंगे इनके, अपने वोट भी जाएंगे। इसलिए बिना दबाव में आए फैसला लें और जिसमें जनहित हो, वही फैसला लें।

 

प्रदर्शनकारी अपने नेता से पूछें
प्रदर्शनकारी अपने नेता से पूछें कि इस समस्या को पैदा किसने किया। जुंजैहली से एसडीएम ऑफिस कोर्ट के आदेश पर हटा है। तो जरा अपने नेता से पूछें कि कोर्ट ने ऐसा फैसला क्यों किया? दरअसल वह नेता अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए अपनी गलती का ठीकरा मुख्यमंत्री पर फोड़ने की कोशिश कर रहा है। मुख्यमंत्री की इस मामले में भूमिका बाद में आती है, पहले उस शख्स की, जो खुद कोर्ट जाकर गोलमोल बातें कर आया था। भीड़ को देखकर लग रहा था यह वही भीड़ है जो आंख मूंदकर कहीं भी चली जाती है। ठीक भेड़ों की तरह, कहां भी हांक दिया जाए, चल पड़ती हैं।

गांव के भोले लोग हैं, उन्हें फुसलाना आसान है। ध्यान रहे सराज क्षेत्र की गिनती हिमाचल के सबसे पिछड़े क्षेत्रों में होती है। अब लोगों को गुमराह करना कितना आसान है, यह अंदाज़ा लगाना आसान है। मगर मुख्यमंत्री को चाहिए कि इन लोगों से सीधा संवाद करें। भले कांग्रेस के हों या किसी और के, उन्हें समझाएं कि मामला क्या है। भोले लोग समझते भी जल्दी हैं।

(लेखक विभिन्न विषयों पर लिखते रहते हैं, उनसे kalamkasipahi@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है)

ये लेखक के निजी विचार हैं

हिमाचल BJYM अध्यक्ष ने वैलंटाइन्स डे को मनाया भगत सिंह का शहादत दिवस

शिमला।। पिछले कई सालों से यह परंपरा चल रही है कि वैलंटाइन्स डे का विरोध करने के नाम पर कभी मातृ-पितृ दिवस मना लिया जाए तो कभी उसे देख की आजादी के लिए कुर्बान हो जाने वाले क्रांतिकारियों के शहादत दिवस से जोड़ दिया जाए। कभी कोई यह अफवाह फैलाता है कि 14 फरवरी को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दी गई थी तो कभी कोई कहता है कि इस दिन इन्हें सजा सुनाई गई थी। फिर ये लोग ऐसी पोस्टें डालकर खुद को देशभक्त दिखाकर बाकियों को देशभक्ति की याद दिलाते हुए कहते हैं- वैलंटाइन्स डे मनाना जरूरी है या इन शहीदों का याद करना?

मगर सोचिए, इन फर्जी देशभक्तों को खुद पता नहीं होता कि भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को 7 अक्तूबर 1930 को सजा सुनाई गई थी और 23 मार्च 1931 को फांसी दी गई थी। 14 फरवरी से किसी को रिश्ता जोड़ना ही है उनका तो वह यह कि मदन मोहन मालवीय ने 14 फरवरी 1931 को इरविन के सामने इनके लिए दया याचिका डाली थी। मगर फिर भी नकली देशभक्त वैलंटाइन्स का विरोध करने के नाम पर शहीदों के नाम पर झूठ फैलाते हैं।

हिमाचल प्रदेश भारतीय जनता युवा मोर्चा के अध्यक्ष विशाल चौहान ने भी ऐसी ही एक पोस्ट डाली है। जरा नजर डालें-

ऐसे कई लोग हैं जिन्होंने ऐसी पोस्टें डाली हैं। इससे पता चलता है कि उनकी देशभक्ति कितनी खोखली है और वे हीनभावना के शिकार हैं। जिसे न मनाना हो, वह वैलंटाइन्स डे न मनाए। मगर दूसरों को ज्ञान देने से पहले उन्हें खुद ज्ञान जुटा लेना चाहिए।

जानें, क्यों उबल रहा है मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर का गृहक्षेत्र

एमबीएम न्यूज नेटवर्क, मंडी।। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के चुनावक्षेत्र सेराज के जंजैहली में हो रहे विरोध प्रदर्शन ने शनिवार को उग्र रूप धारण कर लिया। एक बार फिर सड़क पर उतरे लोगों ने मुख्यमंत्री का पुतला जला दिया। पुलिस ने लोगों को ऐसा करने से रोकने की कोशिश की, मगर वह नाकाम रही। लोगों ने जयराम और उनकी सरकार के खिलाफ नारेबाजी की। इस दौरान कुछ लोगों ने पुलिसकर्मियों पर पथराव कर दिया जिसमें पुलिसवालों को चोट आई है।

 

एसपी मंडी गुरदेव चंद शर्मा ने कहा है कि भीड़ के पीछे से किसी ने पत्थर बरसाए हैं और पुलिस इन लोगों का पता लगाने का प्रयास कर रही है। वहीं प्रदर्शनकारियों ने सरकार, पुलिस और प्रशासन को चुनौती दी है कि कल से सराज विधानसभा क्षेत्र की प्रत्येक ग्राम पंचायत में पुतले जलाए जाएंगे और जिसमें रोकने का दम है वह अपनी पूरी ताकत लगा दे। पुलिस ने भीड़ के खिलाफ हत्या की कोशिश का मामला दर्ज कर लिया है।

क्या है मामला
यह सारा विवाद एसडीएम कार्यालय जंजैहली और उपतहसील छतरी की अधिसूचना रद्द होने के कारण पैदा हुआ है। वैसे यह फैसला हाईकोर्ट ने रद्द किया है। लोगों का कहना है कि सरकार इस पर फैसला ले सकती है मगर ले नहीं रही, ऐसे में उन्हें प्रदर्शन का रास्ता अपनाना पड़ रहा है।

 

शुक्रवार को दो घंटों तक चक्का जाम भी किया गया था। इसे लेक पुलिस ने कुछ लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया है जिनमें कुछ कांग्रेसी नेता भी हैं।

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कांग्रेस सरकार के समय हुआ था फैसला
जंजैहली में कांग्रेस सरकार के समय खुले एसडीएम कार्यालय जंजैहली व उपतहसील छतरी की अधिसूचना रद कर दी है। हाईकोर्ट के फैसले से अब एसडीएम कार्यालय थुनाग शिफ्ट करने का रास्ता साफ हो गया है। एसडीएम कार्यालय कहां खुले हाईकोर्ट ने इस बात पर कोई स्पष्ट फैसला नहीं दिया है। अब यह सरकार के रूख पर निर्भर है कि वह एसडीएम कार्यालय कहां खोलती है।

 

एसडीएम कार्यालय के लिए सरकार को अब नए सिरे से अधिसूचना जारी करनी होगी। कमोवेश उपतहसील छतरी के मामले में भी ऐसा ही होगा। वीरभद्र सरकार ने जंजैहली में एसडीएम कार्यालय खोलने की अधिसूचना 27 जून 2006 व छतरी में उपतहसील की 21 अप्रैल 2016 को जारी की थी।

 

याचिका में दिए गए थे ये तर्क
क्षेत्र की जनता ने उस समय एसडीएम कार्यालय थुनाग में खोलने की वकालत की थी, लेकिन वीरभद्र सरकार ने लोगों की मांग को अनदेखा कर दिया था। लोगों का तर्क था कि थुनाग में पहले से तहसील मुख्यालय है। एसडीएम कार्यालय तहसील मुख्यालय से करीब 14 किलोमीटर दूर खोला गया है। ऐसे में लोगों को राजस्व से संबंधित कार्यालयों के लिए थुनाग व जंजैहली के चक्कर काटने पड़े। इससे समय व धन दोनों की बर्बादी होगी।

 

याचिका में थुनाग पंचायत की तरफ से दलील दी गई थी कि थुनाग तहसील में 19 पटवार सर्कल आते हैं। थुनाग कस्बा सराज हलके के मध्यम में स्थित है। क्षेत्र के पंचायत प्रतिनिधियों व जिला परिषद सदस्यों ने प्रस्ताव पारित कर सरकार से थुनाग में एसडीएम कार्यालय स्थापित करने की मांग की थी। उसे भी दरकिनार किया गया। भौगोलिक दृष्टि से एसडीएम कार्यालय के लिए जंजैहली उपयुक्त नहीं था। सर्दी में यहां बर्फवारी होती है। इससे एसडीएम मुख्यालय पहुंचना लोगों के लिए संभव नहीं होगा।

याचिका की सुनवाई कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश संजय करोल व न्यायाधीश संदीप शर्मा की खंडपीठ ने की। ग्राम पंचायत थुनाग की याचिका को मंजूर करते हुए खंडपीठ ने पूर्व सरकार के समय जंजैहली में एसडीएम व छतरी में उपतहसील खोलने की अधिसूचना को रद कर दिया। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर भी थुनाग कस्बे में एसडीएम कार्यालय खोलने की हिमायती थे।

बेरोजगारी भत्ते की जगह निःशुल्क आयोजित हों प्रतियोगी परीक्षाएं

राजेश वर्मा।। “बेरोजगारी” एक ऐसा नाम जो माथे पर चिंता की लकीरें उकेर देता है। प्रत्येक व्यक्ति खुद से या फिर अपने परिवार से इस शब्द को दूर करने के लिए हमेशा प्रयासरत रहता है। बेरोजगारी का अभिप्राय है– काम करने योग्य इच्छुक व्यक्ति को कोई काम न मिलना।

 

भारत में बेरोजगारी के अनेक रूप है, बेरोजगारी में एक वर्ग तो उन लोगों का है, जो अशिक्षित या अर्द्धशिक्षित हैं और रोजी-रोटी की तलाश में भटक रहे हैं, दूसरा वर्ग उन बेरोजगारों का है जो शिक्षित हैं, जिसके पास काम तो है, पर उस काम से उसे जो कुछ प्राप्त होता है, वह उसकी आजीविका के लिए पर्याप्त नहीं है। बेरोजगारी की इस समस्या से शहर और गाँव दोनों आक्रांत है।

 

खैर समय-2 पर सरकारें चाहे केंद्रीय हो या राज्य बेरोजगारी को कम करने के लिए सदैव प्रयासरत रहती है, कम करना इसलिए कहूंगा क्योंकि बेरोजगारी को पूरी तरह से खत्म करना किसी भी देश प्रदेश के लिए संभव नहीं। यह किसी न किसी रूप में किसी न किसी क्षेत्र में सदैव विद्यमान रहती है। इसी समस्या को कुछ हद तक कम करने के लिए अल्पकालिक उपाय में से एक है “बेरोजगारी भत्ता।”

देश के कई राज्यों में बेरोजगारों की फौज को राहत के तौर पर “बेरोजगारी भत्ता” नामक एक ऐसी वित्तीय सहायता प्रदान की जा रही है जिससे कुछ हद तक बेरोजगारों का दर्द कम हो सके। इसी बेरोजगारी भत्ते की चर्चा हमारे प्रदेश में भी समय-2 पर किसी न किसी वजह से होती रही है।

 

मैं व्यक्तिगत तौर पर इस बात की तरफ नहीं जाना चाहता कि प्रदेश में बेरोजगारों को राहत के तौर पर बेरोजगारी भत्ते का प्रावधान किया जाए या न किया जाए लेकिन कुछेक पहलुओं पर जरूर प्रकाश डालना चाहूंगा जो शायद बेरोजगारी भत्ते को पहला और अंतिम विकल्प नहीं मानते। यह बात सर्वविदित है कि प्रदेश एक पहाड़ी राज्य है। यहां अन्य राज्यों की तुलना निजी क्षेत्र में व स्वरोजगार के संसाधन उस अनुपात में उपलब्ध नहीं जैसे होने चाहिए वजह साफ है प्रदेश की भौगोलिक परिस्थितियां।

यदि बेरोजगारी दर या आंकड़ों पर गौर किया जाए तो प्रदेश के श्रम एवं रोजगार कार्यकाल द्वारा जारी नवीनतम आँकड़ों के अनुसार अभी तक 8 लाख के लगभग बेरोजगार प्रदेश के विभिन्न रोजगार कार्यालयों मे पंजीकृत हैं। इनमें से लगभग 67 हजार के लगभग स्नातकोत्तर, 1 लाख के करीब स्नातक, 6 लाख के आस पास मैट्रिक से लेकर अंडरग्रेजुएट तक, 60 हजार के करीब अंडर मैट्रिक , बेरोजगार प्रदेश के विभिन्न रोजगार कार्यालयों में दर्ज हैं।

 

उपरोक्त आंकड़ों से एक बात साफ है कि सबसे ज्यादा आंकड़ा सेकेंडरी शिक्षा के बाद वाले बेरोजगारों का है। बेशक यह आंकड़ा 8 लाख से उपर है परंतु हकीकत में मेरा मानना यह है कि वास्तव बेरोजगारी इसका 50% है। आज प्रत्येक युवा जब तक सरकारी नौकरी हासिल नहीं कर लेता तब तक वह अपना नाम अपने क्षेत्र के रोजगार कार्यालय में दर्ज करवा कर रखता है। 8 लाख में से 50% इसलिए कहूंगा क्योंकि यह 50% निजी क्षेत्र में रोजगार प्राप्त किए हुए है। लेकिन हम बेरोजगारी के इन आंकड़ों को केवल सरकारी क्षेत्र से ही जोड़ कर देखते हैं। वहीं इस 50% का 50% वह वर्ग है जो निजी क्षेत्र में एक सम्मानजनक वेतन पर जीवनयापन कर रहा है जबकि उसका नाम अभी भी प्रदेश के विभिन्न रोजगार कार्यालयों में दर्ज है। सरकारी नौकरी की चाहत में वह युवा वर्ग भी अपना नाम नहीं कटवा पाता जिसे सरकारी क्षेत्र से कहीं अधिक वेतन निजी क्षेत्र में मिल रहा है। कुल मिलाकर प्रदेश में बेरोजगारी भत्ते की पात्रता के लिए 3-4 लाख बेरोजगारों का आंकड़ा ही बनता है।

बात चली है बेरोजगारी भत्ते की। एक युवा अपने रोजगार को ध्यान में रखते हुए भविष्य की पढ़ाई का चुनाव करता है ताकि उसे अपनी उच्च शिक्षा या व्यवसायिक शिक्षा पूरी करने के बाद रोजगार प्राप्त हो। लेकिन यह इतना भी आसान नजर नहीं आता।

 

सवाल यह है कि आखिर जब तक रोजगार उपलब्ध न हो तब तक किया क्या जाए? क्या बेरोजगारी भत्ते का प्रावधान ही अंतिम विकल्प हो सकता है। शायद देश प्रदेश का कोई भी बेरोजगार युवा बेरोजगारी भत्ता नहीं चाहेगा वह रोजगार चाहेगा। बात यदि अपने प्रदेश की करें तो किसी भी सरकार के लिए यह सचमें कदापि संभव नहीं कि 3-4 लाख लोगों को बेरोजगारी भत्ता दिया जाए। वजह है हमारे पास इतने संसाधन नहीं जिनसे हम इस मांग को पूरा कर सकें। न ही हमारे प्रदेश का युवा बेरोजगारी भत्ते की मांग करता है वह रोजगार की मांग करता है।

 

मेरी नजर में हमारे युवाओं को बेरोजगारी भत्ते की लत डालने की बजाए स्वरोजगार की तरफ ले जाना चाहिए ताकि कोई युवा व्यवसायिक शिक्षा ग्रहण कर सरकार की तरफ टकटकी लगाए न देखे वह अपना कार्य शुरू करे। इस तरह की नीतियों को बढ़ावा देना चाहिए। उन्हें बिना ब्याज दर के स्वरोजगार के लिए आसान ऋण उपलब्ध करवाया जाए। वहीं दूसरी और जो युवा उच्च शिक्षा प्राप्त हैं उन्हें केंद्रीय व राज्य के अधीन होने वाली विभिन्न पदों की भर्ती हेतु लिया जाने वाला आवेदन शुल्क खत्म किया जाए।

आज किसी भी भर्ती हेतु आवेदन करने के लिए एक बेरोजगार युवा का कम से कम 5 सौ रुपए के लगभग खर्च बैठता है। कुछेक पढ़े-लिखे युवा तो कई बार आवेदन शुल्क न होने के कारण आवेदन तक नहीं कर पाते। जब तक वह बेरोजगार है तब तक उससे बिना शुल्क लिए रोजगार संबधी अवसरों में निशुल्क बैठने का मौका तो दिया ही जा सकता है। जोकि उस बेरोजगारी भत्ते से कहीं बढकर है। एक वर्ष में कहीं 10 बार विभिन्न पदों के लिए आवेदन करना पड़े तो यही खर्च करीब 5 हजार के आसपास बैठता है। यह तो बेरोजगार वर्ग के लिए “एक तो कंगाली ऊपर से आटा गीला” वाली कहावत चरितार्थ करती है।

 

यदि युवावस्था में बेरोजगारी भत्ते की आदत डाल दी जाएगी तो हमारा युवा उसे ही अपना कर्म मानकर अपनी अंदर की योग्यता को धीरे-धीरे खत्म कर देगा। वह उसे ही अंतिम विकल्प मान लेगा और शायद यह किसी धीमे जहर से कम नहीं होगा। हमें बीमारी का जड़ से खत्म करने का उपचार चाहिए न कि बीमारी को पालने का। यह जड़ से उपचार बेरोजगारी भत्ता देकर नहीं बल्कि रोजगार उपलब्ध करवा कर, स्वरोजगार के लिए प्रेरित कर ही संभव है।

(स्वतंत्र लेखक और शिक्षक राजेश वर्मा बलद्वाड़ा, मंडी के रहने वाले हैं और उनसे 7018329898 पर संपर्क किया जा सकता है।)

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गांवों के रास्ते हासिल होगा स्वच्छ और स्वस्थ भारत का लक्ष्य

के.एस. ठाकुर।। भारत को आजाद हुए सात दशक हो चुके हैं, पर भारत आज भी स्वच्छता के लिए संघर्षरत है। पिछली जनगणना वर्ष 2011 के आंकड़ों के मुताबिक ग्रामीण परिवारों में मात्र 30.7 प्रतिशत और शहरी परिवारों में 81.4 प्रतिशत परिवारों के पास शौचालय सुविधा उपलब्ध थी।

भारत में पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों की करीब 15 लाख मौतें प्रति वर्ष शौचालय की उपलब्धता न होने के कारण होती हैं। गंदगी से आंतों की पाचन और भोजन को पचाने वाले तंत्र पर भी नकारात्मक असर पड़ता है। यह बीमारी स्वच्छता व सफाई के अभाव के कारण पनपती है।

स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए स्वच्छता की आदत का होना बेहद जरूरी है। स्वच्छ समाज, स्वस्थ भारत के निर्माण के उद्देश्य की पूर्ति के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो अक्तूबर, 2014 को स्वच्छ भारत मिशन कार्यक्रम की शुरुआत करके वर्ष 2019 तक महात्मा गांधी की 150वीं जयंती पर भारत को खुले में शौच की कुप्रवृत्ति से मुक्त करके स्वच्छ भारत का लक्ष्य देश के सामने रखा। इसी कड़ी में ग्रामीण भारत में 2019 तक 12 करोड़ शौचालय बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। यह लक्ष्य तभी हासिल हो पाएगा, जब शासन-प्रशासन के साथ-साथ देश की जनता भी इसमें अपना सक्रिय सहयोग दे।

खुले में शौच जाने के दुष्प्रभावों के प्रति ग्रामीण लोगों को पूरी तरह जागरूक बनाने के लिए ग्राम स्तर पर विशेष अभियान आरंभ किए गए हैं, जो कि धीरे-धीरे अपना रंग दिखाना शुरू भी कर रहे हैं। गुजरात और आंध्र प्रदेश अपने-अपने शहरों और नगरों को खुले में शौच से मुक्त घोषित करने वाले पहले राज्य बन गए हैं। महाराष्ट्र, मिजोरम, हिमाचल प्रदेश, केरल तथा अन्य पूर्वोत्तर राज्य शहरी क्षेत्रों को शीघ्र खुले में शौच से मुक्त घोषित करने की दिशा में अग्रसर हैं।

इस स्वच्छता मिशन की सफलता के लिए धन की आवश्यकता का बहुत महत्त्व होगा। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, भारत स्वच्छता सुविधाओं पर सकल घरेलू उत्पाद का महज 0.2 प्रतिशत हिस्सा ही खर्च करता है, जबकि पाकिस्तान और नेपाल क्रमशः 0.4 तथा 0.8 प्रतिशत करते हैं। जब तक सरकारी संस्थाओं व गरीब ग्रामीण निवासियों को शौचालय निर्माण के लिए पर्याप्त धन मुहैया नहीं होगा, तब तक इस मिशन की रफ्तार धीमी ही रहेगी।

ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत बड़ी आबादी गरीबी, भुखमरी तथा कुपोषण से ग्रस्त है। ऐसे में स्वच्छ भारत अभियान के अंतर्गत सरकार द्वारा वित्तीय सहायता का उचित प्रावधान करना होगा। जब इनसान पारिवारिक भरण-पोषण में ही व्यस्त रहेंगे, तो शौचालय के निर्माण में सफलता मिलना कठिन होगा। हालांकि स्वच्छ भारत मिशन की गूंज भारत के हर घर, गांव, कस्बे तथा शहर में पहुंच चुकी है। सरकारी तथा गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा भी सक्रिय भूमिका निभाई जा रही है।

स्वच्छता मानव जीवन की एक ऐसी आवश्यकता है, जो एक दिन या साल में 12 दिन अपनाने पर जीवन को स्वच्छ नहीं बना सकती। हमारे समाज में यह परंपरा बहुत पुरानी है कि हम लोग किसी भी कार्य को नियमित और अनुशासित होकर नहीं करते। यही कारण है कि आज आजादी के सात दशक बीत जाने पर भी हम स्वच्छता की आदत को अपनाने के लिए संघर्षरत हैं।

भारत में स्वच्छता संवैधानिक दृष्टि से ‘राज्य सूची’ का विषय है, जिसे 73वें संविधान संशोधन के तहत स्थानीय निकायों को सौंपा गया है। ग्रामीण भारत में इसे लागू करने की जिम्मेदारी प्रशासन के निचले स्तर यानी ग्राम पंचायतों, ब्लॉक स्तर, जिला व राज्य की है। इसके अतिरिक्त भारत सरकार द्वारा शुरू किए गए स्वच्छ भारत मिशन के संदर्भ में अनेक कार्यक्रम शुरू किए गए, जैसे केंद्रीय ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम (1986), संपूर्ण स्वच्छता मिशन (1999), निर्मल भारत अभियान (2012) तथा स्वच्छ भारत अभियान (2014) प्रमुख हैं।

ऐतिहासिक दृष्टि से समीक्षा की जाए तो नरेंद्र मोदी द्वारा प्रारंभ की गई स्वच्छ भारत अभियान अब तक की योजनाओं में सबसे लोकप्रिय योजना रही। इस अभियान में सरकारी व गैर सरकारी तंत्र के साथ-साथ मीडिया और आम जनता में जो जागरूकता व सजगता देखने को मिली, वह काबिले तारीफ है। किसी ने भेड़-बकरियों को बेच कर शौचालय बनाए, तो किसी ने अपने गहने, जेवरात गिरवी रखकर इस अभियान में अपना योगदान दिया। अभी भी बहुत से ऐसे परिवार मौजूद हैं, जो कि धन के अभाव में शौचालय का निर्माण नहीं करवा पा रहे हैं।

इस समस्या के समाधान की जिम्मेदारी स्थानीय प्रशासनिक अधिकारी के कंधों पर है और इसके लिए ये अधिकारी ग्राम पंचायतों, निकायों, समुदायों, स्कूलों तथा आंगनबाड़ी केंद्रों की मदद ले सकते हैं। प्रशासन की सामंजस्य की प्रवृत्ति से समाज में स्वच्छता की आदत को प्रोत्साहित करना होगा। विद्यार्थियों में स्वच्छता संबंधी आदतों तथा स्वास्थ्य शिक्षा को प्रोत्साहित करने के सक्रिय उपाय करने होंगे। इसके अलावा प्रदेश में ठोस और तरल कचरा प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित करते हुए इस अभियान को सफलता की ओर मोड़ना होगा।

ग्रामीण क्षेत्र में जब समग्र स्वच्छता सुविधाओं की व्यवस्था होगी, तभी भारत दो अक्तूबर, 2019 तक खुले में शौच मुक्त व स्वच्छ राष्ट्र बन सकेगा।

(लेखक कर्म सिंह ठाकुर मंडी ज़िले के सुंदरनगर से हैं। उनसे ksthakur25@ gmail. com या 98053 71534 पर संपर्क किया जा सकता है।)

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