डेढ़ मिनट में जानें CM के पौने तीन घंटे के बजट भाषण का सार

शिमला।। हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने आज वित्त वर्ष 2018-19 के लिए 41,440 करोड़ रुपये का बजट पेश किया। मुख्यमंत्री का भाषण 2 घंटे 40 मिनट तक चला। आंकड़ों के कारण भाषण बोझिल न हो जाए, इसके लिए बीच-बीच में मुख्यमंत्री कविताएं और शायरी भी सुनाते रहे। बहरहाल, संक्षेप में जानें इस बार बजट में क्या-क्या प्रावधान किए गए हैं।

  • मुख्यमंत्री लोक भवन योजना के तहत 20 लाख की लागत से हर विधानसभा क्षेत्र में सामुदायिक भवन बनाए जाएंगे, जिनके विस्तार के लिए विधायक अपनी निधि से पैसा दे सकते हैं।
  • विधायक निधि 1.10 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 1.35 करोड़ रुपये की गई।
  • मंत्री प्रदेश के दूर-दराज के इलाकों में भी जनमंच लगाकर लोगों की समस्याएं सुनेंगे।
  • एपीएल परिवार छोड़ सकते हैं राशन पर सब्सिडी, सीएम और सभी मंत्रियों ने भी छोड़ी सब्सिडी।
  • मनरेजा में रोजगार 100 से बढ़ाकर 120 दिन किया गया।
  • शराब की हर बोतल पर एक रुपया सेस लगेगा ताकि गोवंश के संरक्षण में रकम खर्च की जाए। मंदिरों के चढ़ावे का 15 प्रतिशत गोवंश संरक्षण में खर्च होगा।

कृषि

  • ऐंटी हेलगन खरीदने पर सब्सिडी देगी सरकार। बागवानी के लिए पावर टिलर योजना लाई जाएगी।
  • जैविक खेती को बढ़ाने के लिए ‘प्राकृतिक खेती, खुशहाल किसान’ योजना के लिए 25 करोड़ रुपये का प्रावधान।
  • सिंचाई के लिए बिजली के दाम प्रति यूनिट 1 रुपये से घटाकर 73 पैसे किए गए।
  • पालमपुर और शिलारू में दो नए बागवानी केंद्र बनेंगे। जल से कृषि पर बल योजना के लिए 250 करोड़ रुपये का प्रावधान।

  • सोलर फेंसिंग के लिए 35 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, 50 पर्सेंट सब्सिडी मिलेगी।
  • कोल्ड स्टोरेज और स्टेट मिशन फॉर फूड प्रोसेसिंग के लिए 10 करोड़ रुपये का प्रावधान।


पशु एवं मत्स्य पालन

  • मत्स्य पालन के लिए 11 नई जगहों पर ट्राउट फिश फार्म बनाने के लिए जगह ढूंढी जाएगी। सरकारी जमीन भी दी जाएगी और निवेश पर अनुदान भी मिलेगा।
  • मधुमक्खी पालन के लिए 10 करोड़ रुपये का प्रावधान।
  • देसी नस्ल की गाय पर 20 फीसदी सब्सिडी, डेयली लगाने पर 10 पर्सेंट अनुदान। दूध की खरीद पर 1 रुपया बढ़ा। गोमूत्र उद्योग पर 4 प्रतिशत अनुदान मिलेगा।
  • मुर्गीपालन पर 60 प्रतिशत का अनुदान। भेड़-बकरी पालन के लिए प्रोत्साहन, बकरी पालने के लिए 11 बकरियां देगी सरकार।

मानदेय

  • प्रधान को चार हजार रुपये मिलते थे अब पांच हजार मिलेंगे, उप प्रधान को 2200 की जगह 2500 मिलेंगे।
  • जिला प्रतिनिधि 12 हजार और सदस्य अब 4000 रुपये पाएंगे।
  • नगर परिषद अध्यक्ष 6 हजार, उपाध्यक्ष चार हजार और सदस्य 2200 रुपये मानदेय पाएंगे।
  • नगर निगमों में मेयर 8 की जगह 11 हजार, डेप्युटी मेयर 7500 और सदस्य पांच हजार रुपये पाएंगे।

शिक्षा

  • 12वीं के साइंस स्ट्रीम के टॉप 10 छात्रों विज्ञान पुरस्कार दिया जाएगा। 3 लाख से कम आये वाले परिवार के बच्चों को एंट्रेस एग्जाम की फ्री कोचिंग।
  • 31 भाषा प्रयोगशालाएं बनेंगी। साथ ही योग पाठ्यक्रम- जॉय ऑफ लर्निंग शुरू किया जाएगा।
  • अध्यापकों के लिए ट्रांसफर पॉलिसी लाई जाएगी।
  • एकलव्य स्कूल की तर्ज पर 68 मुख्यमंत्री आदर्श स्कूल खोले जाएंगे। शुरू में 10 स्कूल होंगे, जहां सभी सुविधाएं और छात्रावास भी होंगे।
  • 3, 6 और 9वीं क्लास के बच्चों को मुफ्त स्कूल बैग मिलेगा। साथ ही महीने के एक दिन बैग फ्री डे होगा। बच्चे बिना बैग के स्कूल जाएंगे। एग्जाम खत्म होने के बाद किताबें दान करने के लिए खास दिन रका जाएगा।
  • हिमाचल प्रदेश विवि के लिए 110 करोड़ का बजट प्रावधान। शिक्षा के लिए कुल 7044 करोड़ रुपये का प्रावधान।

रोज़गार

  • रोजगार केंद्र का नाम बदल कर परामर्श केंद्र, रोजगार मेले लगेंगे।
  • 18 से 35 वर्ष की आयु के युवाओं के लिए मुख्यमंत्री स्वाबलंबी योजना लांच की गई।
  • 40 लाख के निवेश पर 25 प्रतिशत कैपिटल सब्सिडी मिलेगी। युवाओं को 1 प्रतिशत पर सरकारी भूमि लीज पर मिलगी। निजी जमीन खरीदने पर स्टाम्प ड्यूटी 6 से घटाकर 3 प्रतिशत करने की घोषणा।
  • कौशल विकास योजना में 59 हज़ार 500 बेराजेगारों को ट्रेनिंग दी जाएगी, कौशल विकास भत्ता जारी रहेगा, जिसके लिए 100 करोड़ का प्रावधान किया गया।


उद्योग

  • 40 लाख के निवेश पर 25 प्रतिशत कैपिटल सब्सिडी मिलेगी।
  • स्मॉल स्केल इंडस्ट्री पर विद्युत शुल्क 4 से 2 प्रतिशत किया। मीडियम स्केल इंडस्ट्री के लिए विद्युत शुल्क 10 से 7 प्रतिशत किया गया।
  • स्मॉल और मीडियम स्केल इंडस्ट्री पर पांच वर्ष के लिए नए उद्योग को विद्युत शुल्क पर छूट मिलेगी।
  • पन बिजली नीति में संशोधन होगा, तीन महीने के अंदर नई नीति लाएगी सरकार। ऑनलाइन मॉनीटरिंग प्रणाली हिम प्रगति शुरू की जाएगी।
  • चंबा के बढोह और सिरमौर के नौहराधार में सीमेंट प्लांट लगाए जाएंगे।
  • उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए पट्टा अधिनियम होगा सरल। उद्योग के लिए एनओसी लेने की प्रक्रिया सरल की जाएगी।

कर्मचारी

  • नियमित सरकारी कर्मचारियों-पेंशनरों को उनके मूल वेतन/मूल पेंशन पर 1 जुलाई 2017 से 4 प्रतिशत अतिरिक्त अंतरिम सहायता प्रदान की जाएगी। इससे कर्मचारियों को 260 करोड़ का वित्तीय लाभ होगा। ये अंतरिम राहत भविष्य में होने वाले वेतन/पेंशन संशोधन में समायोजित की जाएगी।
  • 2018-19 में अनुबंध कर्मचारियों को मूल वेतन व ग्रेड पे का दोगुना वेतन स्वरूप प्रदान किया जाएगा। अनुबंध कर्मचारियों को वेतन में मूल प्लस ग्रेड पे तथा ग्रेड पे का 75 प्रतिशत दिया जाता है।
  • दिहाड़ीदारों की दिहाड़ी 210 से बढ़ाकर 220 रुपये की गई।

(आर्टिकल अपडेट किया जा रहा है, अन्य जानकारियों के लिए कुछ समय बाद लौटें)

बंदरों की समस्या पर बीजेपी विधायक का शर्मनाक और विवादास्पद सुझाव

शिमला।। हिमाचल प्रदेश विधानसभा में गुरुवार को जिस समय आवारा पशुओं के आतंक पर चर्चा चल रही थी, उस दौरान हमीरपुर से बीजेपी के विधायक ने ऐसा सुझाव दिया, जो न सिर्फ कुछ समूहों के लिए अपमानजनक है, बल्कि नस्लभेदी भी है। यही नहीं, उन्होंने कुत्ते बंदरों को कम करने के लिए उन्हें खाने के लिए पैरामिलिट्री फोर्स ‘असम राइफल्स’ को बुलाने का भी सुझाव दिया। हैरानी की बात यह है कि ये अपमानजक टिप्पणियां विधानसभा की कार्यवाही से हटाई भी नहीं गईं हैं और वेबसाइट पर अपलोड की गई Unedited फाइल में मौजूद हैं।

पहले तो विधायक ने गोली मारने या फिर जंगलों में सोलर फेंसिंग सिस्टम लगाकर घेरेबंदी करने की सलाह दी। इसके बाद उन्होंने जो कुछ कहा, हम उसे यथावत विधानसभा की कार्यवाही के आधार पर प्रकाशित कर रहे हैं। उन्होंने कहा-

“मेरा एक और सुझाव है। अध्यक्ष महोदय, यह ऊना की बात है जहां पीछे चाइनीज कंपनी वालों ने एनएच का ठेका लिया हुआ था। जिसने दिन वह रहे, उतने दिन ऊना में कोई स्ट्रे डॉग नजर नहीं आया। वे सब खा गए। इसलिए सुझाव है कि जैसे आसाम राइफल्स है या नीग्रो लोगों की कोई कंपनी हो, उन्हें प्रदेश में लाया जाए और उन्हें एक-दो साल का ठेका दिया जाए, तो भी इनको कम करने या खत्म करने में उनकी मदद ली जा सकती है।”

“अध्यक्ष महोदय, जैसा कि हमारे कर्नल साहब ने कहा कि इनको ढूंढने और इधर-उधर से पकड़ने में ही 500 करोड़ रुपये का खर्च हुआ है, अगर ऐसी किसी कंपनी को हम खाने के ऊपर भी बुला लें तो इतना सारा खर्च बच जाएगा।”

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चीन के बारे में पूर्वग्रह
पहली बात तो यह है कि विधायक ने चीनी लोगों के बारे में पूर्वग्रह भरी टिप्पणी की है, जिसके समर्थन में उन्होंने कहां से आंकड़े जुटाए, उन्होंने जिक्र नहीं किया। वह कि आधार पर कह सकते हैं कि चीन के लोग ऊना के सभी आवारा कुत्तों को खा गए और क्या उनके जाते ही कुत्ते अचानक फिर से वापस आ गए? और क्या चीन के सभी लोग कुत्ते खाते हैं? यह चीन के लोगों के प्रति बनाए गए पूर्वग्रहों पर आधारित टिप्पणी है।

असम राइफल्स को लेकर अज्ञान
इसके बाद उन्होंने आसाम राइफल्स को भी नहीं बख्शा। उन्होंने इस तरह से आसाम राइफल्स, जो कि देश की सबसे पुरानी पैरामिलिट्री फोर्स है, उसे इस मामले में घसीटा और उसमें शामिल जवानों के प्रति भी पूर्वग्रह भरी टिप्पणी की। गौरतलब है कि असम राइफल में देश के किसी भी हिस्से का जवान शामिल हो सकता है। इससे विधायक के सामान्य ज्ञान का भी पता चलता है। वैसे भी यह हमारे देश के पूर्वोत्तर राज्यों के बारे में पूर्वग्रहों को और मजबूत करने वाला बयान है।

ब्लैक लोगों पर टिप्पणी
तीसरी बात उन्होंने ‘नीग्रो कंपनियों’ का जिक्र किया। नीग्रो दरअसल ब्लैक लोगों के लिए इस्तेमाल की जाने वाली टर्म है जिसे इस्तेमाल अब कम ही किया जाता है। उन्हें भी कुत्ते और बंदर खाने वाला बताकर विधायक ने उनका अपमान किया है और एक तरह से यह नस्लीय टिप्पणी है। वह किस आधार पर कह सकते हैं कि सभी ब्लैक बंदरों या कुत्तों को खाते हैं?

कुल मिलाकर यह उनका यह सुझाव न सिर्फ अव्यावहारिक औऱ हास्यास्पद है, बल्कि अपमानजनक भी है। यह तो बाद की बात है कि अगर कोई ऐसा खान-पान करता भी है, तो विशेष तौर पर उसे हिमाचल इसी काम के लिए बुलाया जाए, क्या यह संभव है?

हैरानी की बात है कि जब वह यह टिप्पणी कर रहे थे, तब किसी ने भी उन्हें नहीं टोका। पहले समाज का कम शिक्षित वर्ग इस तरह की बातें किया करता था, मगर अब प्रदेश की दशा-दिशा तय करने वाले विधायक भी पूर्वग्रह भरी बातें करने लग गए हैं। जंगली और आवारा जानवरों की समस्या से पूरा प्रदेश परेशान है, मगर चर्चा के नाम पर इस तरह के सुझाव आएंगे तो समस्या का निदान होने से रहा।

दो मंत्रियों की सदस्यता को चुनौती देने वाली याचिका पर हाई कोर्ट का नोटिस

शिमला।। हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश सरकार के दो मंत्रियों की सदस्यता को चुनौती देने वाली याचिका पर सरकार और चुनाव के साथ-साथ इन दोनों मंत्रियों को भी नोटिस भेजा है। इन मंत्रियों में एक हैं धर्मपुर के विधायक और आईपीएच मंत्री महेंद्र सिंह ठाकुर और दूसरे हैं लाहौल-स्पीति के विधायक और कृषि मंत्री रामलाल मार्कंडा।

याचिका में आरोप लगाया है कि दोनों मंत्रियों ने हाल ही में संपन्न विधानसभा चुनाव के समय जो हलफनामा दिया था, उसमें कुछ जानकारियां छिपाई गई हैं या गलत बताई गई हैं। हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए चार सप्ताह में जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई 18 अप्रैल को होगी।

महेंद्र सिंह ठाकुर पर आरोप
धर्मपुर निवासी रमेश चंद ने चुनाव से पहले दिए जाने वाले हलफनामों के आधर पर याचिका डाली है कि यहां के विधायक और जयराम सरकार में बागवानी एवं आईपीएच मंत्री महेंद्र सिंह ठाकुर की पत्नी गृहिणी हैं और 2012 में उनके पास पैन कार्ड तक नहीं था। लेकिन इस बार उनकी संपत्ति 7.68 करोड़ दिखाई गई है। सवाल पूछा गया है कि पांच साल में उनके गृहिणी होते हुए यह संपत्ति एकाएक कैसे आ गई।

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गौरतलब है कि महेंद्र सिंह ठाकुर की पत्नी के नाम पर मनाली के रांगड़ी में एक होटल भी है। एनजीटी के आदेश के बाद जांच में यहां पाया गया था कि टीसीपी और अन्य निर्माण नियमों का उल्लंघन किया गया है। इस कारण होटल का बिजली और पानी का कनेक्शन काट दिया गया था। बाद में खबर आई थी कि अवैध हिस्से पर खुद ही हथौड़ा चला दिया गया था।

प्रदेश में इस तरह से 1700 होटलों में अनियमितताएं पाई गई थीं और फिर जयराम सरकार ने इन होटलों को राहत देने की बात कही थी। उस समय विपक्ष ने आरोप लगाया था और ऐसी खबरें भी आई थीं कि सरकार में बैठे बड़े नेता के रिश्तेदार के होटल फंसने के कारण ही सरकार नियमों में बदलाव कर रही है ताकि उन्हें राहत दे सके।

रामलाल मार्कंडा पर आरोप
दूसरी तरफ कृषि मंत्री रामलाल मार्कंडा पर याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि उनके और उनकी पत्नी के नाम पर जो संपत्ति है, उसमें एकरूपता नहीं है।

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कहा गया है कि 2007 में भी वह विधायक थे, लेकिन उनकी तब की संपत्ति और इस बार की संपत्ति में कोई मेल नहीं है। साथ ही कहा गया है कि शपथपत्र में भी संपत्ति की जानकारी गलत है।

ऐसे में हाई कोर्ट ने इन दोनों मंत्रियों के साथ-साथ  सरकार और चुनाव आयोग को भी नोटिस भेजा है।

धारा 118: अगर आप कृषक नहीं हैं तो क्या आप हिमाचली नहीं हैं?

इन हिमाचल डेस्क।। हिमाचल प्रदेश टेनंसी ऐंड लैंड रिफॉर्म्स ऐक्ट 1972 की धारा 118 के तहत ‘गैर-कृषकों को जमीन हस्तांतरित करने पर रोक’ है। यानी किसी भी तरीके से हिमाचल की जमीन ऐसे आदमी को नहीं दी जा सकती, जो  हिमाचल प्रदेश का किसान न हो। इस कारण हिमाचल में बहुत से ऐसे हिमाचली जमीन नहीं खरीद पा रहे, जो कृषक नहीं हैं। लगभग 45 से भी ज्यादा सालों से हिमाचल के गैर-कृषक हिमाचली अपने हिमाचल में अपने लिए आसानी से जमीन नहीं खरीद सकते, क्योंकि पेचीदगियां बहुत ज्यादा है। वहीं आपने देखा होगा कि सरकार 118 में छूट देकर किसी बाहरी को भी हिमाचल में जमीन खरीदने की इजाजत दे सकती है। इसी कारण बाहरी राज्यों की कई फिल्मी हस्तियों से लेकर राजनीतिक हस्तियां हिमाचल में बंगले बना चुकी हैं या बना रही है।

पढ़ें- आसान भाषा में समझें, क्या है धारा 118

क्या गैर-कृषक हिमाचली हिमाचली नहीं हैं?
अगर आपका व्यवसाय कृषि नहीं हैं और फिर भी आप बरसों से हिमाचल में रह रहे हैं, तब भी आप उतनी आसानी से हिमाचल में जमीन नहीं खरीद सकते, जितनी आसानी से कृषक हिमाचली खरीद सकता है। पिछले दिनों आपने देखा होगा कि कांग्रेस सरकार के समय जब हाई कोर्ट ने अवैध कब्जे हटाने का आदेश दिया था, वीरभद्र सिंह सरकार ने तुरंत एक कमेटी का गठन किया और अवैध कब्जों को नियमित करने के लिए प्रयास किए जाने लगे। नई सरकार का रुख भी अलग नहीं है। यानी हिमाचल में कृषक अगर अवैध कब्जा करें तो उन अवैध कब्जों को वैध करने के लिए नियम बनाने के लिए सरकारें जी-जान से जुट जाती हैं, लेकिन गैर-कृषक हिमाचलियों को जमीन खरीदने के नियम सरल बनाने की बात आए तो धारा 118 का हवाला देकर पल्ला झाड़ लेती हैं।

हाई कोर्ट के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गई थी वीरभद्र सरकार
हिमाचल हाईकोर्ट ने सितंबर 2016 में आदेश दिया था कि कई परिवार हिमाचल में 1972 से भी काफी समय से पहले रहते आ रहे हैं और उनकी आगे की पीढिय़ां यहीं पली-बढ़ी हैं, लेकिन वे कृषक न होने के कारण यहां जमीन नहीं खरीद सकते। साथ ही हिमाचल प्रदेश टेनंसी ऐंड लैंड रिफॉर्म्स ऐक्ट की धारा 118 से संबंधित लंबे समय से मुकदमा चला आ रहा है। जिससे बड़ी संख्या में लोगों को गैर कृषक होने के कारण प्रदेश में जमीन खरीदने की इजाजत नहीं है, जबकि वे दशकों से प्रदेश में रह रहे हैं और इस नाते अब हिमाचली भी हैं। कोर्ट ने आदेश दिया था कि कानून में संशोधन किया जाए। इसपर वीरभद्र सरकार तुरंत सुप्रीम कोर्ट गई जहां पर हाई कोर्ट के आदेश को निरस्त कर दिया गया।

कई दोष हैं धारा 118 में
कृषकों के अवैध को भी वैध बनाने के लालायित सरकारें गैर-कृषकों से सौतेला व्यवहार करती है, उसका अंदाजा आप इससे लगा सकते हैं कि शहरी इलाकों में गैर कृषकों की जमीन का पंजीकरण इसलिए नहीं किया जाता, क्योंकि नियम कहता है कि अगर आपको पुश्तैनी घर में हिस्सा बनता है और कहीं और जमीन नहीं खरीद सकते। यानी गैर-कृषक हिमाचली का पुश्तैनी घर अगर चार कमरों का है और इसके चार हिस्सेदार हो गए तो क्या वह एक कमरे में अपने बच्चों आदि के साथ गुजारा चला पाएगा?

गैर कृषकों के हिमाचल में जमीन खरीदने के नियम बहुत पेचीदा हैं। जो लोग जमीन खरीदना चाहते हैं, उन्हें डीसी ऑफिस से लेकर सचिवालय तक धक्के खाने पड़ते है। गैर-कृषक हिमाचली हिमाचल में कई तरह के व्यवसाय करते हैं, टैक्स देते हैं, वोट देते हैं, मगर धारा 118 के अजीब नियमों के कारण वे अपने ही प्रदेश में दूसरे दर्जे के नागरिक बने हुए हैं।

लेकिन कोई भी सरकार इन हिमाचलियों की सुध नहीं ले रही और अगर कोई सुधार की कोशिश करता है तो विरोध कर दिया जाता है। धारा 118 में नियमों का सरलीकरण समय की मांग है। इसमें इस तरह से बदलाव किए जा सकते हैं कि कम से कम हिमाचलियो गैर-कृषकों को ही लाभ पहुंचा दिया जाए। मगर राजनीति क्या न करवाए। गंभीरता से इस पर विचार करने के बजाय राजनीति की जाती है और अगर कोई दूसरी पार्टी की सरकार बदलाव की कोशिश करे तो विरोध करके ऐसे दिखाने की कोशिश की जाती है कि वह खुद हिमाचल के पैरोकार हैं। यहां सभी पार्टियां ऐसी ही हैं।

धारा 118 के अगले हिस्से में पढ़ें, हिमाचल हितैषी बनने का दिखावा करने वाली पार्टियों ने किस तरह से धारा 118 का दुरुपयोग किया है।

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जब वीरभद्र सरकार ने दी थी चाय के बागीचे बेचने की छूट

इन हिमाचल डेस्क।। विधामसभा में कांग्रेस आरोप लगा रही है कि मौजूदा सरकार धारा 118 से छेडछाड़ कर हिमाचल की जमीन बाहरी लोगों को बेचना चाहती है और हम ऐसा नहीं होने देंगे। मगर चुनाव से ठीक पहले हिमाचल प्रदेश की वीरभद्र सरकार की कैबिनेट ने कांगड़ा ज़िले के चुनिंदा चाय बागानों के मालिकों के लिए लैंड यूज़ को बदलने के लिए सैद्धांतिक मंजूरी दे दी थी। इससे चाय के इन बागानों की जमीन को बेचे जाने का रास्ता खुल गया था, जिस पर हिमाचल प्रदेश सीलिंग ऑन लैंड होल्डिंग्स ऐक्ट के तहत रोक लगी हुई थी। मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की कैबिनेट ने इस बदलाव के लिए एक नई टर्म गढ़ी थी- ‘टी टूरिज़म।’

दरअसल सरकार ने कहा था कि लैंड यूज़ बदला गया है मगर सिर्फ टूरिज़म से जुड़े प्रॉजेक्टों के लिए। यानी ‘टी टूरिज़म’ के प्रचार के लिए ऐसा किया जा सकता है। मगर टी-टूरिज़म के नाम पर सरकार ने इतना बड़ा फैसला क्यों लिया और क्यों इतने दिनों से ऐसा करने में तुली हुई थी। कहीं ऐसा तो नहीं कि सरकार में शामिल कुछ लोगों को इस डील से ‘लाभ’ होना है या उनके करीबियों को लाभ पहुंचना था?

‘पंजाब से आए थे कॉल’ये सवाल उठते हैं अंग्रेजी अख़बार ‘द ट्रिब्यून’ की उस रिपोर्ट के आधार पर, जिसमें दावा किया गया था- ‘चाय बागान बेचने के लिए लॉबीइंग चल रही है।’ (रिपोर्ट पढ़ें) इसके मुताबिक टी गार्डन बेचे जाने से स्मार्ट सिटी धर्मशाला का हरियाली भरा हिस्सा गायब हो सकता है।‘

दो कैबिनेट मीटिंगों में इससे पहले धर्मशाला के एक बड़े टी-गार्डन को बेचे जाने के लिए नियम बदलने की कोशिश की गई थी, मगर कुछ मंत्रियों ने विरोध किया था। मगर अख़बार ने दावा किया था कि इसका विरोध करने वाले मंत्रियों को पड़ोसी राज्य (इशारा पंजाब की ओर) में सर्वोच्च पदों पर बैठे लोगों से कॉल आया कि जरा अपने रुख में नरमी लाइए।

धर्मशाला में चाय के दो बड़े बागान हैं और दोनों का मालिकाना हक एक ही परिवार के पास है। पिछले पांच सालों ने कुमाल पथरी मंदिर के पास टी गार्डन की जमीन पर सरकार ने एक होटल बनाने की इजाजत दी थी। होटल प्रभावशाली लोगों का है और पूरा होने को तैयार है। कुछ समय पहले इसी सरकार ने कांगड़ा के चाय बागान की बिक्री पर रोक लगा दी थी। यह फैसला तब लिया गया था जब सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण की एजुकेशन सोसाइटीको टी गार्डन की जमीन मिलने को लेकर विवाद हो गया था। मगर वीरभद्र सरकार बड़े बागान मालिकों को खुश करने के लिए नियमों में ढील दे रही थी।

हिमाचल प्रदेश सीलिंग ऑफ लैंड होल्डिंग्स (अमेंडमेंट) ऐक्ट 1999 के तहत चाय के उत्पादन के लिए इस्तेमाल होने वाली जमीन की बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया था और इसे किसी दूसरे काम में इस्तेमाल करने पर सरकार को इसका अधिग्रहण कर लेने का अधिकार मिल गया था। मगर कैबिनेट के फैसले से चाय बागान के मालिकों को लैंड सीलिंग ऐक्ट से इस शर्त पर छूट मिली है कि उन्हें कांगड़ा की चाय बागान की विरासत बरकरार रखनी है। मगर प्रश्न यह उठता है कि इस तरह की छूट सिर्फ चुनिंदा और बड़े रसूखदार चाय बागान के मालिकों को ही क्यों दी गई? छोटे बागान के मालिक भी तो जरूरत के समय, किसी बीमारी या आर्थिक संकट के चलते पैसों के लिए जमीन का हिस्सा बेचकर कुछ पैसे ला सकते हैं? उन्हें यह अधिकार क्यों नहीं? और रोक हटानी ही है तो पूरी रोक हटा दी जाए और सभी को चाय के बागीचे उखाड़कर वहां इमारतें बनाने का अधिकार दे दो और अपनी विरासत को नष्ट कर दो।

बता दें कि कानून कहता है कि किसी के पास भी 300 कनाल से ज्यादा का मालिकाना हक नहीं हो सकता, मगर कांगड़ा के चाय बागानों के मालिकों को यह छूट दी गई है कि वे सैकड़ों एकड़ अपने पास रख सकें। मगर यह छूट इस शर्त पर मिली है कि वे इसे बेचेंगे नहीं और इनकी देखभाल करेंगे। धर्मशाला और पालमपुर के सिर्फ दो राजनीतिक रूप से प्रभावशाली टी एस्टेट मालिकों के पास 1000 बीघा से ज्यादा ज़मीन है।

वैसे सरकारों की हालत का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि कांगड़ा जिलों मे कई धार्मिक संगठनों और बाबाओं सैकड़ो कनाल जमीन चाय बागानों की ली हुई है और उसके ऊपर पक्के ढांचे खड़े कर दिए हैं। यह सब खुलेआम हुआ मगर सरकार और प्रशासन मूकदर्शक बने रहे। आज तक किसी भी पार्टी के नेता की जुबान इसके खिलाफ नहीं खुली। इसी तरह से अब वीरभद्र कैबिनेट ने जो तथाकथित शर्तों के तहत ‘टी टूरिज़म’ के नाम पर छूट दी थी, उसकी भी धज्जियां यदि उड़ेंगी तो कोई कुछ नहीं बोलेगा। मगर जितनी बेचैन वीरभद्र सरकार नियमों में परिवर्तन देने के लिए दिख रही थी, वह भी चुनाव से ठीक पहले, इसके लिए उसकी नीयत पर सवाल उठना लाजिमी है। साथ ही विपक्ष की खामोशी पर भी, जो समय चुप था और आज सत्ता में है।

लेख: हर विभाग के हर दफ्तर में लगे CCTV कैमरा, सुधर जाएंगी सेवाएं

राजेश वर्मा।। शिक्षा की बेहतरी व गुणवत्ता के दृष्टिकोण से सरकार व विभाग द्वारा बोर्ड परिक्षाओं में नकल रोकने के लिए प्रदेश के स्कूलों में सीसीटीवी कैमरे लगवाना स्वागत योग्य निर्णय है। कोई कुछ भी कहे लेकिन शिक्षा की बेहतरी के लिए शिक्षक समाज व ज्यादातर लोग इस निर्णय का स्वागत कर रहे हैं। मैं इससे आगे जाकर कहूंगा की भविष्य में विद्यालय के प्रत्येक क्लासरूम में भी सीसीटीवी स्थापित किए जाएं। इससे जहां शिक्षा की गुणवत्ता उपर उठेगी, वहीं विद्यालयों में यदा कदा छात्राओं से दुर्व्यवहार की जो घटनाएं घटित होती हैं, उन पर भी काफी हद तक अंकुश लगेगा।

इसी तरह मन में एक सवाल उठता है की बहुत से विभाग ऐसे हैं जहां इन सीसीटीवी कैमरों की आज से नहीं बल्कि पिछले काफी वर्षों से जरूरत महसूस की जा रही है। तहसील कार्यालयों की ही बात करें तो इनमें भी सीसीटीवी कैमरे लगने चाहिए, जहां या तो “आज बाबू जी आए नहीं” कह कर टरका दिया जाता है या आए दिन” रिश्वत कांड में फंसे “जैसी खबरें देखने सुनने को मिल जाती हैं। यही सीसीटीवी हर एसडीएम आफिस में भी लगने चाहिए।

राजस्व विभाग
कई बार यह भी सामने आया की लाईसेंस बनाने के लिए भी कैसे कैसे हथकंडे अपनाए जाते हैं। प्रदेश में सबसे चर्चित खबरें राजस्व विभाग की रहती हैं। आए दिन प्रदेश के किसी न किसी कोने में पटवारी या कानूनगो को रंगे हाथों रिश्वत लेते पकड़े जाने की खबर छपती ही रहती है। हर पटवार खाने में सीसीटीवी लगने चाहिए एक नकल तक की कॉपी लेने के लिए रिश्वत की मांग जब सुर्खी बनती है तो अपने ही विभाग का इमानदार कर्मचारी भी खुद को लज्जित महसूस करने लग जाता है।

बिजली विभाग हो, लोकनिर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) हो या आईपीएच विभाग हो, कर्मचारियों व अधिकारियों द्वारा बहुत बार ठेकेदार या आम लोगों से काम के बदले रिश्वत लेने की मांग या दबाव जैसी खबरें भी इन विभागों की कार्यप्रणाली पर प्रश्न चिन्ह खड़ा करती है। इन विभागों में तो हर हाल में सीसीटीवी लगने चाहिए।

अस्पतालों में भी
अब बात करें उस विभाग की जिसके बिना मानों जिंदगी ठहर सी जाती है वह है स्वास्थ्य विभाग। बहुत बार शिकायतें मिलती हैं की डॉक्टर जी अपने कैबिन में नहीं। यह जरूरी नहीं कि कोई भी डॉक्टर जानबूझकर अस्पताल में आकर भी ड्यूटी से नदारद रहे लेकिन यदि अच्छाई है तो बुराई भी वहाँ जरूर होगी भले ही कम हो। मरीज बाहर इंतजार करते रहते हैं, लेकिन मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव व कुछेक चिकित्सक अंदर बैठे घंटों तक बतियाते रहते हैं। हालांकि सरकार व विभाग ने इसके लिए दिशा-निर्देश भी जारी किए हैं लेकिन फिर भी कुछेक नहीं मानते। हर अस्पताल में सीसीटीवी लगे।

थानों में तो और भी जरूरी
जब हम बेहतरी की बात करते हैं तो बेहतरी हर क्षेत्र में होनी चाहिए हर तरफ़ होनी चाहिए। समाज से जुड़े हर विभाग की जबावदेही तय करनी होगी तभी हम बेहतर सेवाएं दे व ले पाएंगे। पुलिस एक ऐसा विभाग है जो बना तो लोगों की सेवा व सुरक्षा के लिए है लेकिन कई बार विभाग के कुछेक कर्मचारियों की करनी से अन्य सभी की साख को बट्टा लगता है। लोग पूरा पूरा दिन बैठे रहते हैं परंतु एफआईआर तक नहीं लिखी जाती या आमजन से दुर्व्यवहार आदि जैसे आरोप भी लगते हैं। लेकिन प्रमाण न होने से आम इंसान खुद को लाचार महसूस करता है। उसे लगता है वह आया तो न्याय पाने के लिए है लेकिन यहां तो और अन्याय हो रहा है प्रत्येक थाने व पुलिस चौकी आदि में भी सीसीटीवी लगने ही चाहिए।

समर्थन करें कर्मचारी
हर विभाग में सीसीटीवी लगे हर कार्यालय में सीसीटीवी लगने चाहिए। इनका समर्थन केवल आम प्रदेश वासी को ही नहीं बल्कि हर विभाग के कर्मचारी को करना चाहिए ताकि किसी को यह न लगे की कर्मचारी तो इस बात का विरोध खुद की कमियों को छुपाने के लिए करते हैं। इससे न केवल जनसेवाओं में सुधार आएगा बल्कि कर्मचारी हित के लिए भी यह जरूरी हैं, क्योंकि कई बार आम नागरिकों द्वारा कर्मचारियों से दुर्व्यवहार, हाथापाई व हमलों जैसी घटनाएं भी सामने आती है। इसलिए तकनीक के इस युग में समाजिक बेहतरी के लिए तकनीक का लाभ उठाया जाना चाहिए।

कर्मचारियों को तो आगे बढ़कर इसकी मांग व स्वागत करना चाहिए ताकि ऐसा संदेश न जाए की सब कर्मचारी केवल कुर्सी तोड़ते है डक्का नहीं तोड़ते। डिजिटल इंडिया के सपने को साकार करने व भ्रष्टाचार पर रोक थाम के लिए यह कदम जरूरी है।

(स्वतंत्र लेखक राजेश वर्मा बलद्वाड़ा, मंडी के रहने वाले हैं और उनसे 7018329898 पर संपर्क किया जा सकता है।)

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निजी वॉल्वो से HRTC को करोड़ों का चूना; अब प्राइवेट ट्रांसपोर्ट पर बादलों का एकाधिकार

इन हिमाचल डेस्क।। दिल्ली का मजनू का टीला इलाका। आईएसबीटी से सिंघू बॉर्डर की तरफ जाते समय आने वाले इस इलाके में कुछ निर्माणधीन फ्लाइओवर हैं, जिन्हें अभी इस्तेमाल नहीं किया जाता। इन फ्लाइओवर्स के नीचे और ऊपर कुछ लग्ज़री बसें खड़ी रहती हैं। शाम के वक्त यहां हलचल बढ़ जाती है।

पहली नजर में यह सामान्य बात लग सकती है। मगर दरअसल इन बसों के जरिये सरकारों को हर साल करोड़ों का चूना लग रहा है। हिमाचल प्रदेश सरकार को भी। दरअसल ये बसें हिमाचल प्रदेश की पॉप्युलर टूरिस्ट डेस्टिनेशंस के लिए भी चलती हैं। अगर आप समझ रहे हैं कि यह टूरिस्ट के लिए और आपके लिए सुविधाजनक है तो इसके पीछे का पूरा खेल समझिए।

इनमें से ज्यादातर बसों ने ऑल इंडिया टूरिस्ट परमिट ली हुई है। इसका मतलब है कि ये बसें भाड़े पर काम करती हैं यानी किसी ग्रुप या कंपनी को अपने लोगों को कहीं पर ले जाना है तो वे इन बसों को बुक कर सकते हैं। उदाहरण के लिए किसी कंपनी को अपने कर्मचारियों को घुमाने ले जाना है या किसी कॉलेज की ट्रिप या धार्मिक यात्रा है।

मगर ये बसें किन्हीं दो स्थानों के बीच में तय समय ऐसे पर चल रही हैं, मानों इन्हें इसका रूट परमिट मिला हो। जबकि ये ऐसा नहीं कर सकतीं और ऐसा करना अवैध है। यानी ये बसें दिल्ली से धर्मशाला या मनाली के लिए किसी ग्रुप को तभी ला सकती हैं, जब वह ग्रुप इन्हें बुक करे। ऐसा नहीं कि ये रोज शाम आठ या नौ बजे चलें और सवारियों से टिकट लें।

टैक्स चोरी कर रही हैं ये बसें
अब इस तरह से ये बसें न सिर्फ कानून तोड़ रही हैं बल्कि एचआरटीसी और अन्य राज्यों के परिवहन निगमों को भी चूना लगा रही हैं, क्योंकि ये सरकारी लग्जरी बसों की तुलना में कम किराया वसूलती हैं। और लोगों को तो वैसे भी कम किराया सुविधाजनक होता है। मगर ये कम किराया इसलिए वसूलती हैं क्योंकि ये टैक्स की चोरी करती हैं। ये जिन-जिन राज्यों से होकर परमानेंट रूट चला रही हैं, उन्हें टैक्स नहीं देतीं। इसीलिए इनका किराया सस्ता होता है।

इसे आप इस तरह समझ सकते हैं कि हिमाचल रोड ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन की कोई बस दिल्ली तक जाती है तो उसमें प्रति सवारी टिकट के हिसाब से राज्यों को टैक्स देना होता है। आपने टिकट देखा भी होगा, उसमें लिखा होता है- पंजाब टैक्स, हरियाणा टैक्स, दिल्ली टैक्स। ये आपके टिकट पर लगने वाला वह टैक्स होता है, जो एचआरटीसी को इन राज्यों को देना होता है।

बादल ट्रांसपोर्ट की मनॉपली
अब ऐसी जानकारी सामने आई है कि इस निजी ट्रांसपोर्ट के कारोबार में पंजाब के बादलों का एकाधिकार होने जा रहा है। वही बादल परिवार, जिनकी पंजाब में पिछले साल तक सत्ता थी और पूरे पंजाब के प्राइवेट ट्रांसपोर्ट पर जिनका एकाधिकार है। ‘द ट्रिब्यून’ ने दावा किया है कि हिमाचल में प्राइवेट लग्ज़री ट्रांसपोर्ट कंपनियों का बादल अधिग्रहण कर रहे हैं। इस तरह से प्राइवेट बिजनस पर बादलों का एकाधिकार हो जाने पर एचआरटीसी और झटका लगेगा।

एचआरटीसी के हवाले से अखबार ने लिखा है कि इस समय हिमाचल से 200 निजी बसें दिल्ली तक जा रही हैं लेकिन 70 ही हरियाणा में टैक्स दे रही हैं। ऐसा भी सामने आया है कि छोटे-छोटे ऑपरेटर होने के कारण पहले आपसी प्रतियोगिता के कारण ये अवैध ऑपरेटर किराया कम रखते थे, मगर बादलों का एकाधिकार हो जाने पर किराया बढ़ सकता है क्योंकि उनके मुकाबले और कोई होगा ही नहीं। वे जैसा मर्जी किराया रख सकते हैं।

ये कंपनियां खरीद रहे बादल
अखबार ने लिखा है कि बादलों ने जो कंपनियां खरीद ली हैं या खरीदने जा रहे हैं, वे इस तरह से हैं- लक्षमी होलीडेज़, लीओ ट्रैवल्स, नॉदर्न ट्रैवल्स, अप्सरा ट्रैवल्स और तनिष्क ट्रैवल्स। इन कंपनियों को बादल की कंपनी मेट्रो ईको ग्रीन रिजॉर्ट्स खरीद रही है जिसमें सुखबीर सिंह बादल और उनकी पत्नी और केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर शेयरहोल्डर हैं। इसका जिक्र इन्होंने अपने चुनावी हलफनामे में भी किया था।

बीजेपी सरकार की चुप्पी पर सवाल
अखबार ने लिखा है कि बीजेपी सरकार की बादलों के मनॉपली के इस कथित कदम पर चुप्पी पर सवाल उठ रहे हैं। गौरतलब है कि बादलों की पार्टी शिरोमणि अकाली दल केंद्र में एनडीए में बीजेपी का सहयोगी दल है। हरसिमरत कौर केंद्रीय मंत्री भी हैं। अखबार लिखता है कि इस संबंध में हिमाचल प्रदेश के परिवहन मंत्री गोविंद सिंह ठाकुर से संपर्क नहीं हो पाया।

प्राइवेट बसों कोई खरीदे, कोई चलाए, ये उनकी मर्जी। लेकिन अगर ये निजी बसें गैरकानूनी ढंग से टैक्स चोरी करके हिमाचल में चल रही हैं और इससे निगम को घाटा हो रहा है और सरकार चुप रहती है तो सवाल उठना लाजिमी है। खासकर नए परिवहन मंत्री गोविंद ठाकुर पर जिम्मेदारी ज्यादा हो जाती है, जो आए दिन मीडिया में एचआरटीसी के कायाकल्प के दावे कर रहे हैं। ऐसे में एक मुहिम चलाकर चेक करना चाहिए कि कौन सी बसें सही हैं और कौन सी गलत ढंग से चल रही हैं।

सही समय पर होगी पिछली सरकार के खिलाफ चार्जशीट की जांच: मुख्यमंत्री

शिमला।। हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने कहा है कि पिछली सरकार पर उनकी पार्टी ने विपक्ष में रहते हुए जो आरोप लगाए थे, उनकी जांच के लिए सही समय का इंतज़ार किया जा रहा है।

त्रिपुरा और नगालैंड में जीत के बाद भारतीय जनता पार्टी के कार्यालय में आए मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि राज्यपाल को जो चार्जशीट सौंपी गई थी, वह हमारे पास है और सही समय पर उसकी जांच करवाई जाएगी।

गौरतलब है कि इस चार्जशीट में अनिल शर्मा पर भी बीजेपी ने गंभीर आरोप लगाए थे, जो मौजूदा सरकार में मंत्री हैं। चुनाव से ठीक पहले वह कांग्रेस छोड़ बीजेपी में शामिल हो गए थे। पिछली सरकार में उनके ऊपर मंडी राजमहल सौदे से लेकर पशुओं की दवाइयों की खरीद में गड़बड़ी जैसे आरोप बीजेपी ने लगाए थे।

ऐसे में अब देखना है कि यह ‘सही समय’ कब आएगा और इस ‘सही समय’ से मुख्यमंत्री का आशय क्या है। आशंका ऐसी भी है कि महत्वपूर्ण पद पर बैठा व्यक्ति अपने खिलाफ सबूतों को मिटा भी सकता है। कहीं सही समय सबूतों के मिट जाने के बाद तो नहीं आएगा?

कांग्रेस के अधिवेशन में ‘धमाका’ कर निकल गए बाली

शिमला।। शनिवार को कांग्रेस के राज्य स्तरीय अधिवेशन में वरिष्ठ नेता और पूर्व परिवहन मंत्री जीएस बाली फिर उन्हीं तेवरों में नजर आए, जैसे वह पहले दिखा करते थे। वह सबसे बाद में आए, फिर उन्होंने वीरभद्र, सुक्खू से लेकर रंजीता तक पर करारे वार किए और फिर पहले ही अधिवेशन से चले गए। नगरोटा बगवां सीट से बहुत कम अंतर से चुनाव हारने के बाद यह पहला अवसर था जब वह मंच पर ऐसे नजर आए।

वीरभद्र, अग्निहोत्री पर निशाना

जैसे ही बाली बोलने के लिए उठे उन्होंने पूर्व सीएम वीरभद्र सिंह और अभी कांग्रेस विधायक दल के नेता मुकेश अग्निहोत्री को निशाने पर ले लिया। उन्होंने कहा, “पार्टी की हार में सबसे अधिक बड़ी भूमिका ऐसे नेताओं की है, जो कहते कुछ हैं और करते कुछ और ही हैं। राजीव थाली योजना मेरे दिमाग की उपज थी। लेकिन जब इस योजना का शुभारंभ किया गया तो योजना का पूरा श्रेय पूर्व सीएम वीरभद्र सिंह और मुकेश अग्रिहोत्री ले गए।”

पूर्व परिवहन मंत्री ने कहा, “योजना मेरी और तस्वीरें पूर्व सीएम वीरभद्र सिंह और पूर्व मंत्री मुकेश अग्निहोत्री के साथ छपवाते रहे।”

सुक्खू भी लपेटे में

बाली ने मंच से प्रदेश अध्यक्ष सुखविंदर सिंह सुक्खू को नसीहत दे डाली। उन्होंने कहा कि सुक्खू जी अपने काम पर ध्यान दो, वीरभद्र की बातों का बुरा मत मानो। उन्होंने प्रदेशाध्यक्ष सुक्खू से कहा कि वह वीरभद्र सिंह की छोटी-छोटी बातों का बुरा मानते रह गए और इसी चक्कर में दूसरे लोग फायदा उठा गए।

बाली ने कहा, “मेरी बातों का बुरा न मानते हुए संगठन की मजबूती पर पूरा ध्यान दें। सुक्खू जी, आपकी तरह मेरा फोन कभी बंद नहीं होता है। जब चाहे कोई भी फोन करे।”

प्रदेश प्रभारी को नसीहत

बाली ने यहां मौजूद प्रभारी रंजीता रंजन को नसीहत देते हुए कहा कि बगावत करने वालों पर कड़ी कार्रवाई करें। उन्होंने कहा, “सच को सच और झूठ को झूठ बोलेंगे तो ही इस पार्टी का कल्याण हो सकता है।”

भत्ते पर लताड़ा

कौशल भत्ता योजना को लेकर अपनी सरकार के ढीले रवैये पर भी बाली ने चोट की। वह बोले, “ये योजना इतनी असफल रही कि कि सालों तो युवाओं को इस योजना के फार्म भरने में ही लग गया। जनता की नजर हमेशा घोषणा पत्र पर होती है इसलिए मेनिफेस्टो का भी कुछ रोल होता है।”

‘118 पर विरोध से पहले जानकारी जुटाएं’

मौजूदा सरकार धारा 118 को सरल बनाने की कोशिश कर रही ताकि निवेश आ सके। कांग्रेस इसका विरोध कर रही है। मगर बाली मे अपनी पार्टी से कहा कि प्रदेश हित में धारा 118 के मुद्दे पर एक कमेटी गठित करे कि इसमें बदलाव होना चाहिए या नहीं। बाली ने कहा कि सरकार का इस मुद्दे पर विरोध करने से पहले पार्टी को इस बारे में पूरी जानकारी होनी चाहिए ताकि पछताना न पड़े।

भाषण के बाद बाली कुछ देर मंच पर बैठे और फिर अचानक पारिवारिक कारणों का जिक्र करके चले गए। मगर इस अधिवेशन के दौरान और बाद में भी उनके ही भाषण की चर्चा होती रही।

Are we ready to abolish the caste system?

Sumit Gautam>> There is no scientific, intellectual, social and logical basis for caste system. The caste system is profoundly illogical and is also against the basic tenets of the Constitution.

“This is not permissible. Right to dignity is a fundamental right and a basic human right. Human dignity is one of the basic features of the Constitution. The Constitution of India also guarantees a casteless and classless society”.

But in our society we the people, who are from upper castes, have never seen, experienced and never got discriminated on the basis of their caste. Some people support this evil of our society in the name of culture, heritage, God’s, pride, honor, and whatever they can name it, but this is only to justify their mental thrust only.

Caste is a delicate issue. It’s ubiquitous, and we are full of it. We should start to change things from individual level. But when you go to people and deny caste, they may not react favorably. I think if a decisive percentage of people, especially elites, start marrying out of their caste, we may see a casteless Himachal in a generation’s time. At least we (every individual) must play his/her part to abolish cast system.

Now what I want to tell you is that, why we need to abolish caste system. The caste system was created to make social groups. People are grouped because of their occupation. But with advancement in literacy and reservation most castes have now become strong. Many elite classes now earn less than the business men. Basically time has changed and people can now understand their backgrounds better.

Reservation system is also being misused
Most backward and scheduled classes are now taking advantage of this reservation. Also communal tensions are increasing because of the caste system. And the system is not driven by the nature of the occupation rather by the family in which a person takes birth. Moreover God created us all equals as humans, what matters is our thinking and character and not our parent’s occupation.

And also reservation system is also being misused by peoples; peoples who actually need it are still not getting enough exposure and opportunities, whereas there is some other who doesn’t need reservation are still getting perks, so reservation should be on the basis of financial condition of the family and also to people who belong to the tribal area of Himachal Pradesh.

Caste system grew in Himachal, as a means of socially binding individuals together. People who took birth in a particular class of occupation were grouped together and named in that manner. Soon with development of a legal system there was a need to make a rigid caste system which could be followed by all the Indian citizens.

This gave birth to general class schedules classes and backward classes. Reservation system was started to encourage the oppressed classes and give them liberated living. But with passage of time this caste system has become hollow and fragile. Something which was made for social grouping has turned to social divide with all groups developing hatred for each other.

So, the end there is only one solution to this problem, we all need to take a step further to abolish this evil system of our society.

RISE ABOVE CASTE, CREED, COLOR, AND RELEGION. WE ARE THE PEOPLE OF MODERN AGE. AND I BELIEVE WE WILL DO IT SOMEDAY.

(Author Sumit Gautam is a regular reader of In Himachal. He can be reached at ovemelong.sharma888 @gmail.com)

Disclaimer: The views expressed here are solely those of the author in his private capacity