जानें, छत पर सोलर प्लांट लगाकर कैसे और कितनी बिजली बेच पाएंगे आप

डॉ. आशीष नड्डा।। एनर्जी सेक्टर में हिमाचल प्रदेश को भारत का पावर हाउस कहा जाता है। प्रदेश में बिजली उत्पादन का मुख्य रिसोर्स नदियां एवं अन्य वाटर बॉडीज़ हैं। वर्तमान में प्रदेश में लगभग 10 GW क्षमता का बिजली किया जा रहा है, हालाँकि सम्भावना 22 GW तक आंकी गई है। बीते कुछ वर्षों की बात की जाए तो बिजली उत्पादन कोयला विंड हाइड्रो रिसोर्सेज़ से हटकर सोलर एनर्जी की तरफ शिफ्ट हुआ है। इसका मुख्य कारण सोलर सेल की कीमतों में वैश्विक स्तर पर कमी और दुनियाभर के देशों का इस दिशा में कार्य करना है।

भारत सरकार ने भी देश में सोलर एनर्जी की संभावनाओं को बढ़ावा देने के लिए 2008 में जवाहर लाल नेहरू मिशन के तहत यह टारगेट रखा था कि देश में 22 GW बिजली उत्पादन 2022 तक सोलर एनर्जी से किया जाएगा। 2015 में इस टारगेट को 100 GW कर दिया गया। अभी तक देश में सोलर से बिजली के उत्पादन की क्षमता लगभग 13 GW तक पहुंच चुकी है।

ऱाज्य सरकारें भी इस दिशा में काम करें इसलिए लिए केंद्रीय बिजली विनायक आयोग ने यह यह मेंडेटरी किया कि प्रत्येक राज्य अपने कुल एनर्जी डिमांड में से कुछ हिस्सा सोलर एनर्जी से पूरा करेगा जिसे SPO (Solar Purchase Obligation) नाम दिया गया। इसी आधार पर हिमाचल प्रदेश को भी 10 MW क्षमता के रूफटॉप सोलर प्लांट चालू वित्तीय वर्ष में राज्य में स्थापित करने होंगे।

Solar Roof Plant in Satara | Solar Rooftop Plant Manufacturers in Satara |

सोलर रूफटॉप की खासियत यह है कि इसमें ग्रिड से बिजली लेने वाला आम उपभोगता भी ग्रिड को बिजली दे सकता है। यानी एक आम नागरिक जो अपने मकान में रहता है वो उसकी छत का प्रयोग करते हुए बिजली उत्पादक भी बन सकता है। केंद्र सरकार ऐसे रूफटॉप प्लांट के लिए सब्सिडी भी दे रही है जो आम राज्यों के लिए टोटल लागत की 30% है वहीँ हिमाचल जैसे विशेष राज्यों के लिए 70% है।

हर प्रदेश की इस दिशा में अलग अलग पॉलिसी है। हिमाचल प्रदेश की सोलर पॉलिसी के आधार पर बात करें तो केन्द्र सरकार 70 फीसदी तथा 10 फीसदी राज्य सरकार अनुदान दे रही है। सरकार ने तय किया है बिजली बोर्ड 2. 50 रूपए पर यूनिट की दर से रूफटॉप प्रोजेक्ट्स से बिजली खरीदेगा।

Ultimate Sun Systems expands into Himachal Pradesh, commissions solar plant at MM Medical College & Hospital, Solan

सबसे बड़ा सवाल है की घरों की छत पर पैदा होने वाली बिजली की खरीद कैसे होगी ?
यह खरीद नेट मीटरिंग पॉलिसी से की जाएगी। यानी घर में एक मीटर जैसे ग्रिड से आने वाली बिजली के यूनिट काउंट करता है उसकी जगह ऐसा मीटर लगेगा जो ग्रिड को दी जाने वाली बिजली के यूनिट भी काउंट करेगा। चूँकि सोलर सिस्टम तो रात को काम नहीं करेगा इसलिए ग्रिड से बिजली तो उपभोगता को लेनी ही पड़ेगी।

उदाहरण के तौर पर माना महीने में कोई उपभोगता 300 यूनिट बिजली ग्रिड से लेता है और 500 यूनिट बिजली ग्रिड को अपने घर में लगे प्लांट से देता है तो 200 यूनिट बिजली के बिल से लैस हो जाएंगे। यानी उपभोगता को 300 की जगह 100 यूनिट का ही बिल आएगा इस तरह एक वर्ष तक बाकी यूनिट अगले बिल में एड होते रहेंगे अंत में जो यूनिट बचेंगे उन्हें 2.50 पर यूनिट के हिसाब से सरकार खरीदकर पैसे देगी।

कितने kW कैपेसिटी का प्लांट लगाया जा सकता है ?
दूसरा सबसे बड़ा सवाल है की रूफटॉप सिस्टम कितने kW का लगाया जा सकता है? तो इसका जबाब है की रूफ टॉप सिस्टम 1000 kW तक का लगाया जा सकता है। पर ध्यान देने वाली बात है kf हर उपभोगता 1000 का नहीं लगा सकता। सोलर प्लांट लगाने की क्षमता को सैंक्शन या कनेक्टेड लोड और वोल्टेज सप्लाई के टाइप से विभिन्न वर्गों में विभाजित किया गया है। मसलन हर घर, संस्था स्कूल, हॉस्पिटल और इंडस्ट्री का एक सैंक्शन लोड होता है जिसका डेटा मीटर के लिए अप्लाई करते समय बिजली बोर्ड को दिया जाता है।

जैसे आम घरो की बात करें तो घर का कनेक्टेड या सैंक्शन लोड 5 kW तक रहता है और घरों में सिंगल फेस सप्लाई वोल्टेज (230 V ) की रहती है। वहीँ अगर किसी ने छोटा उद्योग आटा चक्की आदि लगा रखी तो लोड 15 kW से ऊपर और थ्री फेस सप्लाई ( 440 V ) रहती है वहीँ बड़े बड़े संस्थानों के लिए लोड 1000 kW और हाई टेन्शन वोल्टेज सप्लाई तक भी हो सकता है। इसी आधार पर कौन सी सप्लाई की वोल्टेज लाइन के लिए मैक्सिमम कितने kW तक सिस्टम लगाया सकता है, यह टेबल में दिखाया गया है।

घर में कितने kW कैपेसिटी तक लगा सकते हैं प्लांट?
जैसा की टेबल में साफ़ साफ़ लिखा है 230 V के कनेक्शन के लिए 5 k W तक का सिस्टम लगाया जा सकता है परन्तु इसे भी पॉलिसी में उपभोगता के बिल देने की कैटिगरी में विभाजित कर रखा है। जिसे सिंगल पार्ट टेरिफ और डबल पार्ट टेरिफ में बांटा है।

 

सिंगल पार्ट टैरिफ वाले उपभोगता जिसमे सारे घरेलु उपभोगता शामिल हैं अपने सैंक्शन लोड (जो आमतौर पर 5 से 10 kW के बीच रहता है) का सिर्फ 30 प्रतिशत कपैसिटी का ही सोलर प्लांट लगा सकते है। यानी 5 kW सैंक्शन लोड के लिए 1.5 kW और 10 kW के लिए 3 kW.

solar energy plant installation

वहीँ स्कूल, ट्रस्ट सरकारी हॉस्पिटल अन्य बिल्डिंग और इंडस्ट्री कैटोगरी के उपभोगता अपने कुल सैंक्शन लोड का 80% तक कैपेसिटी का सोलर प्लांट लगा सकते हैं। यानी किसी स्कूल के का कनेक्टेड या सैंक्शन लोड 100 kW है तो वो 80 kW तक का सोलर प्लांट अपनी छत पर लगा सकेंगे।

कितने यूनिट बिजली पैदा करता है 1 kW सोलर प्लांट?
वैसे तो सोलर प्लांट से से बिजली पैदा करने का अनुमान लोकेशन पर डिपेंड है क्योंकि, सौर ऊर्जा हर जगह के हिसाब से अलग है। फिर भी मोटे मोटे तौर पर बात की जाए तो 1 kW कपैसिटी का सोलर रुफटॉप प्लांट सालाना लगभग 1700 से 1800 यूनिट पैदा कर सकता है।

क्या लागत है सोलर प्लांट की?
अगर 1 kW सोलर प्लांट की बात की जाए तो वैसे लागत तो 50000 से 55000 रुपये है पर इसमें से 70% अनुदान केंद्र सरकार की तरफ से है और लगभग 10 % अनुदान राज्य सरकार की तरफ से दिया जाएगा। यानी कुल लागत का 20% ही उपभोगता को देना होगा।

कौन-कौन हैं सब्सिडी के पात्र?
उपरोक्त सब्सिडी या अनुदान के पात्र घेरलू उपभोगता, संस्थान (जो सोसायटी या न्यास के द्वारा रेजिस्ट्रेड हों) सरकार द्वारा संचलित आश्रम या भवन शामिल हैं। इण्डस्ट्री सैक्टर को अनुदान में शामिल नहीं किया गया है। हालाँकि इस सेक्टर के लिए अलग से टैक्स रिबेट जैसे बेनिफिट केंद्र सरकार ने तय किए है।

(लेखक परिचय: डॉ. आशीष नड्डा हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर के रहने वाले हैं, वर्तमान में वर्ल्ड बैंक में सोलर एनर्जी कंसल्टेंट हैं। यह आर्टिकल उन्होंने ‘इन हिमाचल’ के आग्रह पर प्रदेश की जनता को सरल शब्दों में सोलर रूफ टॉप पॉलिसी को समझाने के लिए लिखा है। अधिक जानकारी के लिए ‘हिम ऊर्जा’ की वेबसाइट से पॉलिसी डॉक्युमेंट को पढ़ा जा सकता है या हिमऊर्जा से संपर्क किया जा सकता है।)

नोट- लेख में दिए गए आंकड़े स्टैंडर्ड हैं, ये समय, स्थान और अन्य कारणों से बदल सकते हैं

क्वॉलिटी कंट्रोल स्क्वॉड की कमान संभालेंगे संजय कुंडू

शिमला।। केंद्र में डेप्युटेशन से लौटे वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी संजय कुंडू सीएम कार्यालय के गुणवत्ता नियंत्रण दस्ते (क्वॉलिटी कंट्रोल स्क्वॉड) की कमान संभालेंगे। अभी बतौर मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के अतिरिक्त प्रधान सचिव तैनात संजय कुंडू पीडब्ल्यूडी और आईपीएच समेत तमाम विभागों के कामों की क्वॉलिटी पर नजर रखने का काम करेंगे।

संजय कुंडू के नेतृत्व में यह विशेष दस्ता गड़बड़ी करने वाले अधिकारियों पर यह दस्ता शिकंजा कसेगा। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने गुरुवार को यह बात कथित तौर पर राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों की एक बैठक की अध्यक्षता करते हुए कही।

राज्य में लोक निर्माण विभाग, सिंचाई एवं जन स्वास्थ्य, विद्युत, ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज, पर्यटन विभाग, शहरी विकास जैसे लाइन विभागों में कामकाज की निगरानी के लिए मुख्यमंत्री कार्यालय में एक गुणवत्ता जांच दस्ता स्थापित किया जाएगा।

इंडियन आइडल में धूम मचा रहे शिमला के अंकुश भारद्वाज

इन हिमाचल डेस्क।। इंडियन आइडल सीजन-10 में हिमाचल प्रदेश के शिमला के रहने वाले अंकुश भारद्वाज धूम मचा रहे हैं। अपने शानदार गायन से वह न सिर्फ जजों बल्कि पूरे देश के दर्शकों का मन मोह रहे हैं।

अंकुश शिमला के कोटगढ़ के रहने वाले हैं। पढ़ाई-लिखाई शिमला से ही हुई। खास बात यह है कि अंकुश के पिता भी गायक हैं और आकाशवाणी के शिमला केंद्र से उनके गाए गानों का प्रसारण भी होता रहा है।

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जैसा कि हमारे परिवारों में होता रहा है, हर माता-पिता की उम्मीद होती है कि उनका बेटा कुछ ऐसा करे कि वह अपने पैरों पर खड़ा हो जाए। कार्यक्रम में दिखाए गए वीडियो के मुताबिक अंकुश की मां को लगता था कि अगर उनका बेटा भी गायन में उतर गया तो उसके करियर का क्या होगा।

वह नहीं चाहती थीं कि अंकुश सिंगिंग में करियर बनाए। मगर अंकुश के लिए सिंगिंग ही जुनून है। उन्होंने कुछ गाने गाकर सोशल मीडिया पर डाले थे जो अब उनके इंडियन आइडल में प्रसिद्ध होने के बाद फिर सामने आए हैं।

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उनके इंडियन आइडल में गाए गए गाने फेसबुक और यूट्यूब पर भी खूब देखे जा रहे हैं। एक और बात यह है कि अंकुश ऐसी समस्या से जूझ रहे हैं जिसके कारण समय के साथ-साथ उनकी आंखों की रोशनी खोती जा रही है। अंकुश के मुताबिक इसके इलाज के लिए कुछ लाख रुपयों की जरूरत पड़ सकती है।

ऐसे में अंकुश इंडियन आइडल में न सिर्फ अपने सिंगिंग के जुनून के लिए जी-जान लगा रहे हैं बल्कि विनर बनने पर मिलने वाली रकम से वह अपना इलाज भी करवा पाएंगे।

हिमाचल में भूस्खलन रोकने में वरदान साबित होगी यह तकनीक

ठीक एक साल पहले मंडी के कोटरोपी में हुए भूस्खलन में कई लोगों की जान जाने के बाद भी मंडी प्रशासन और हिमाचल प्रदेश का सरकारी अमला होश में नहीं आया है। एक बार फिर उसी जगह पर भूस्खलन का दौर जारी है। रास्ता खोला जा रहा है मगर बारिश के कारण फिर हालात वैसे ही हो जा रहे हैं। ऐसा नहीं है कि यह कुदरत के कहर के कारण हो रहा है। इसके लिए साफ तौर पर प्रशासन जिम्मेदार है।

पिछले साल आई आपदा भले ही कुदरती हो मगर यह बात भी ध्यान देने लायक है कि वहां कई-कई साल के अंतराल के बाद भूस्खलन होता रहा है। यहां हाल ही में साल 2017 में बड़ा भूस्खलन हुआ था, लेकिन कहा जाता रहा है कि इससे ठीक 20 साल पहले और उससे भी 20 साल पहले इसी जगह पर भूस्खलन हो चुका है। पहले 1977 में और फिर 1997 में और वह भी अगस्त महीने में, जब बारिश चरम पर होती है।

मगर अहम बात ये है कि जब पिछले साल भूस्खलन आया तो बहुत बड़ा इलाका कच्चा हो गया था। यानी उसके ऊपर न तो पेड़ थे न घास। जाहिर है, जिस कच्ची मिट्टी पर न कोई पेड़ होगा न घास, हल्की सी बारिश में भी वह बहने लगेगी। उसमें जगह-जगह पानी जमा होगा और फिर से उसके धंसने की आशंका पैदा होगी। यह बात समझने के लिए बहुत बड़े शोध की जरूरत नहीं है बल्कि यह सामान्य सी बात है।

कोटरोपी में भूस्खलन वाली जगह बारिश के बाद पानी बहने से बनी नालियां। (Image: MBM News Network)

मगर उस समय जब हादसा हुआ था, प्रशासन ने राहत एवं बचाव कार्य चलाया, उसके बाद सड़क बहाल की, कुछ लाइटें लगाईं और आईआईटी का एक प्रोटोटाइप प्रॉजेक्ट लगा दिया कि भूस्खलन से पहले अलार्म बजने लगे। मगर किसी ने भी यह कोशिश नहीं की कि दोबारा भूस्खलन न हो, इसके लिए इंतज़ाम किए जाएं।

जरूरी था कि कच्चे मलबे की ग्रेडिंग की जाती ताकि पानी जमा न हो। नालियां बनाई जातीं ताकि जमीन का क्षरण न हो और पानी एक प्रॉपर चैनल से बाहर निकलता रहे। जरूर थी कि अस्थानी सड़क ही बनानी थी तो उसके नीचे से पाइप डाले जाते, उनसे आसपास प्रॉपर गड्डे बनाए जाते ताकि मलबे से वे ब्लॉक न हों।

इसके बाद जरूरत थी युद्धस्तर पर अभियान चलाकर एकदम वनस्पति विहीन हो चुकी जमीन पर घास या पौधों की ऐसी किस्में लगाई जातीं ताकि वे तेजी से उगतीं और जमीन को जकड़ लेतीं। जहां जरूरी होता, वहां पर नेट के जरिए रीटेनिंग वॉल लगाई जाती और फिर कंक्रीट लेयर लगाई जाती।

पौधों और घास की खास किस्में तुरंत उगती हैं और ज़मीन का क्षरण रोकती हैं।

इस मामले में चीन और जापान से सीखा जा सकता है। साल 2016 में मुझे चीन जाने का मौका मिला था। द ग्रेट वॉल ऑफ चाइना देखने के लिए जब हम बीजिंग से बदलिंग की तरफ जा रहे थे, हाइवे में कई जगह पहाड़ियों पर लोहे के नेट लगे थे और कुछ जगहों पर बड़े हिस्से पर कंक्रीट की परत बिछाई गई थी।

ये कोई नए नहीं, बल्कि पारंपरिक तरीके हैं। मगर हिमाचल में इस्तेमाल या तो नहीं हुए हैं या तो न के बराबर हुए हैं।

गाइड से पूछने पर पता चला कि नेट दरअसल लैंडस्लाइड बैरियर हैं और ये इसलिए लगाए गए हैं ताकि अगर पहाड़ी से कोई पत्थर खिसके तो किसी वाहन को नुकसान न पहुंचे। और वह कंक्रीट प्रॉटेक्शन इसलिए लगाई गई थी ताकि बारिश के कारण कच्ची मिट्टी न बहे और भूस्खलन न हो।

ऐसे जाल लगाकर अचानक लुढ़कने वाले पत्थरों से होने वाले नुकसान को रोका जा सकता है।

बहरहाल स्लोप प्रॉटेक्शन की अन्य भी कई तकनीकें हैं, जिनके बारे में सिविल इंजिनियर बेहतर जानते हैं। मैं इस मामले का विशेषज्ञ नहीं हूं मगर कुछ बातें तो हैं जिन्हें मेरे विचार से आसानी से किया जा सकता है। Guniting या Shortcreting और सॉइल नेलिंग जैसी तकनीक पूरी दुनिया में इस्तेमाल की जा रही है। ये कोई बहुत नई तकनीक नहीं है। भारत में भी कई जगहों पर, खासकर मेट्रो के प्रॉजेक्ट या टनल आदि में यही काम किया जाता है। इसी तरह से भूस्खलन रोकने में भी इसे इस्तेमाल किया जा सकता है। न सिर्फ कोटरोपी बल्कि अन्य जगहों पर भी यही तकनीक इस्तेमाल की जा सकती है। कई सारे स्पॉट ऐसे हैं जहां भूस्खलन होता रहता है। जैसे गुम्मा, हणोगी आदि। कई जगहों पर पत्थर गिरते हैं। वहां पर  इन तकनीकों का इस्तेमाल कारगर होगा।

जरूरी नहीं कि ढलान पर रीटेनिंग वॉल (डंगे) ही लगाई जाए, कोटरोपी जैसी जगह पर इसी तरह से सरिया का नेट बनाकर कंक्रीट की लेयर डाली जा सकती थी।

मगर ऐसा करेगा कौन? हिमाचल में आए दिन हणोगी के पास या मंडी शहर के आसपास कई जगहो पर बोर्ड लिखे होंगे- सावधान, आगे पत्थर गिरते हैं। अरे भई चालक क्या सावधान होगा इसमें? क्या उसे पता चलेगा कि कब पत्थर गिर रहा है कब नहीं? इसी कारण हर साल कई लोग बिना मौत मारे जाते हैं। वैसी ही बात भूस्खलन को लेकर है। जहां पर अक्सर भूस्खलन होता है, क्या वहां पर चीन और जापान से सीखकर कुछ नया नहीं किया जा सकता?

अफसोस, भारत की व्यवस्था ऐसी है कि हादसा हो जाने का इंतजार किया जाता है, फिर तुरंत फर्स्ट एड दी जाती है और फिर समस्या के बारे में सब भूल जाते हैं। ऐसा नहीं कि स्थायी इलाज ढूंढा जाए। अगर समय रहते ऊपर बताए गए काम किए गए होते तो आज दोबारा कोटरोपी में भूस्खलन न होता और न ही सड़क अवरुद्ध होती। और जब तक स्थायी समाधान नहीं किया जाता, तब तक ऐसा होता ही रहेगा और लाखों रुपये खर्च किए जाते रहेंगे। बेहतर होगा इस पैसे से टेक्निकल काम किया जाए और समस्या को हमेशा से सुलझा दिया जाए।

(मंडी जिले से संबंध रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार आदर्श राठौर की फेसबुक टाइमलाइन से साभार। उनसे aadarshrathore @ gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.) 

बीजेपी सरकार का नया नारा, ‘सही विकास का सही नाम- भाजपा और जयराम’

शिमला।। 2019 लोकसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी भारतीय जनता पार्टी ने हिमाचल प्रदेश की चारों लोकसभा सीटों पर फिर जीत हासिल करने के लिए रणनीति तैयार कर ली है। ऐसा लगता है कि इसके लिए केंद्र सरकार की उपलब्धियों के साथ-साथ हिमाचल प्रदेश में जयराम सरकार के अब तक के कार्यकाल की उपलब्धियों को भी जनता तक पहुंचाने की योजना तैयार की गई है।

इसी लक्ष्य के लिए एक नया नारा गढ़ा गया है- ‘सही विकास का सही नाम, भाजपा और जयराम।’ यह स्लोगन 2 मिनट 40 सेकंट के एक वीडियो के आखिर में दिया गया है, जिस वीडियो में हिमाचल की जयराम सरकार की अब तक की प्रमुख उपलब्धियों का उल्लेख किया गया है। (नीचे वीडियो देखें)

सोशल मीडिया पर शेयर किए जा रहे इस वीडियो की शुरुआत और अंत एक ही नारे से साथ होती है- “कम समय में ज्यादा में ज्यादा काम, छह महीनों का सुनहरा परिणाम; सही विकास का सही नाम- भाजपा और जयराम।”

बाकी इस वीडियो में होशियार-गुड़िया हेल्पलाइन, पर्यटन के लिए लाए गए पैकेज, नई नौकरियों, सड़कों, पेंशन-ऋण योजनाओं का जिक्र किया गया है। साथ ही आईटी पार्क और अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट जैसे प्रस्तावित प्रॉजेक्ट्स की भी बात की गई है।

आलोचना का नया मुहावरा- किस्से चलते हैं बिल्ली के पांव पर

सतीश धर।। कविता के पाठकों के लिए हिमाचल के जनजातीय क्षेत्र पांगी घाटी से सम्बद्ध कवि-आलोचक गणेश गनी ने आलोचना का नया मुहावरा देकर हिंदी साहित्य जगत में खलबली मचा दी है।

वास्तव में पिछले तीन दशक से प्राध्यापकीय आलोचना के कारण कविता जिस तरह से पाठकों से दूर होती चली गई, यह चिंता कवि-पाठक दोनों के लिए असमंज की स्थिति पैदा कर रही थी। गनी ने एक सुगम और सहज परामर्श देकर इस दुविधा का निदान अपनी पुस्तक में किया है।

“किस्से चल कर आते हैं बिल्ली के पांव पर’ कवि-आलोचक गनी साहित्यिक संवाद की यात्रा में अपने साथ देश के 50 से अधिक कवियों की कविताओं की स्मृतियां साथ लेकर चलते है । इस यात्रा में शब्दों से बर्फीली धूप है, छाते में बादल है और अंधेरे समय की उजली कविताएं हैं।

गणेश गनी

कवि गनी मानते हैं कविता की दुनिया उतनी सरल नहीं है, जितनी दिखती है। गनी अपनी पुस्तक में लिखते हैं, “शब्दों के निर्रथक जोड़-तोड़ से कवि सोचता है कि कविता बन गई क्योंकि उसे वाहवाही भी मिल जाती है और यही भ्रम में भी डाल देती है।”

“कविता लिखने से पूर्व एक संवेदनशील और बेहतरीन ह्रदय वाला मनुष्य बनना बहुत ज़रूरी है। ऐसा व्यक्ति ही जीवन और समाज में व्याप्त जटिलता को महसूस कर सकता है। कवि के व्यक्तिगत जीवन और उसकी विचारधारा को जानना भी ज़रूरी हो जाता है ताकि उसकी रचना का ठोसपन मालूम हो सके। बहुत से कवि दोहरा जीवन जी रहे।”

कविता की कवि के व्यक्तिगत जीवन से जोड़ कर देखने की यह प्रक्रिया हिंदी कविता को नया आयाम प्रदान करती है। आलोचक गनी का यह कहना कि अपनी मूल्य विहीन तटस्थता, आत्मघाती सहनशीलता और कायर चुप्पी के कारण हिंदी का लेखक अपना मृत्यु लेख स्वयं लिख रहा है सत्य प्रतीत होता है।

गणेश गनी ने हिमाचल के 15 हिंदी कवियों की कविताओं के माध्यम से भी यह आत्म-संवाद यात्रा पूरी की है। कविता की राष्ट्रीय धारा में हिमाचल की हिंदी कविता को शामिल कर जो सम्मान और आदर उन्होंने हिमाचल को बख्शा है वह प्रशंसनीय है। गणेश गनी स्वयं भी हिमाचल के जनजातीय क्षेत्र पांगी से हैं और कुल्लू में एक निजी पाठशाला ग्लोबल विलेज स्कूल का संचालन कर रहे हैं।

(लेखक सतीश धर मूलत: कवि हैं। श्रीनगर (कश्मीर) में जन्मे कवि सतीश धर हिमाचल में पले-बढ़े। वर्ष 1967 कॉलेज के दिनों में कविता लिखना शुरू किया।

उनके तीन कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं- ‘कल की बात’, ‘सलमा खातून नदी बन गयी’, ‘प्रथम पंक्ति के लोग।’ उन्होंने ‘अन्त्योदय पुरुष: शान्ता कुमार’ जीवन-वृतांत का लेखन और ‘भारत और भारतीय संस्कृति’ का सम्पादन किया है।

इसके अलावा दो पुस्तकें कश्मीर की संत कवयित्री माता श्री रूपभवानी पर प्रकाशित हो चुकी हैं। उनसे dharsatish51 @ gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

सरकार और ट्रक आॅपरेटर्स के बीच पिसते किसान-बागवान

प्रशांत प्रताप सेहटा।। आॅल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट यूनियन अपनी मांगों को लेकर कांग्रेस की अपील पर 20 जुलाई से देशव्यापी चक्का जाम व अनिश्चितकालीन हडताल पर है। आंदोलनकारी मांगे पूरी न होने पर उग्र आंदोलन होने की संभावनाओं से भी इंकार नहीं कर रहे। कई जगहों से ट्रकों के साथ आगजनी और ड्राईवरों के साथ मारपीट की घटनाएं भी सामने आ रही है। लेकिन हैरत है कि इस बारे में न तो मीडिया में कोई शोरगुल मचा है और न ही किसी अखबार के पन्ने पर मोटे अक्षरो में लिखी खबर दिखाई दे रही है। क्या यह कोई ऐसी घटना है जिसे टीवी पर 30 सेकेंड चलाकर या अखबार में दो काॅलम में छापकर बात खत्म कर दी जाए? यदि सड़कें किसी देश की लाइफलाइन हैं तो उस पर दौड़ने वाले ट्रक के पहिए उस देश के विकास को गति देते है। ऐसे में अगर किसी विकासशील देश के पहिए ही रुक जाएं तो आप समझ सकते हैं उसकी अर्थव्यवस्था कहां जाकर रुकेगी। मैं इस लेख में सिर्फ हिमाचल की अर्थव्यवस्था और यहां के जनजीवन पर हड़ताल के प्रभावों का उल्लेख करूंगा। केवल हिमाचल में ही इस हड़ताल के कारण करीब 80 हज़ार ट्रकों के पहिए थम गए है। इससे न सिर्फ उद्योगों को नुकसान हो रहा है बल्कि किसान बागवानों में भी त्राहि-त्राहि मची हुई है। उद्योगों में तैयार माल बाजारों तक पहुंचने की बजाए फैक्ट्रयों के गोदामों में जमा हो रहा है। कच्चे माल की सप्लाई न होने के कारण फैक्ट्रियों में क्षमता के अनुरूप उत्पादन नहीं हो पा रहा है। दूसरा सबसे बड़ा खतरा प्रदेश के किसान बागवानों के सिर पर मंडराने लगा है। सोलन सिरमौर के इलाकों में सब्जियां खेतों मे तैयार है और मार्केट में बेचने के लिए भेजी जा रही है। वहीं हिमाचल के सेब बहुल इलाकों में भी सेब व नाशपाती का सीज़न रफ़्तार पकडने लगा है। रोजाना फलों की पेटियों से लदे मिनी ट्रक प्रदेश और बाहरी राज्यों की मंडियों की तरफ रवाना हो रहे है। लेकिन कम फसल होने के बावजूद बागवानों को इसके उचित दाम मिल रहे है। वीरवार को शिमला के भट्ठाकुफ़्फर और पराला स्थित फल मडियां बंद रहीं क्योंकि ट्रक न चलने से खरीददरो द्वारा खरीदा गया सारा सेब फल मंडियों में पड़ा सड़ने लगा है। उन्होने हडताल खत्म होने तक फलों की खरीद फरोख्त करने से इनकार कर दिया है। बागवानों को मजबूर होकर सेब परवाणु, चंडीगढ और दिल्ली की फल मंडियों में बेचना पड रहा है। इन मंडियों तक सेब छोटी गाडियों में दोगुना किराया देकर पहुंचाया जा रहा है। वहां मंडियों में ज्यादा सेब पहुंचने पर बागवानों को कम कीमतें मिल रही है। कुछ बागवानों ने अब फल तोडना कुछ दिनों के लिए बंद कर दिया है लेकिन तैयार फलों को ज्यादा दिनों तक पेड पर भी नहीं रखा जा सकता। ऐसे में अगर यह हडताल जल्द खत्म नहीं होती तो किसान बागवानों को इसकी सबसे ज्यादा मार झेलनी पड़ेगी। ट्रक आॅपरेटर्स की हडताल से अब तक अरबों रुपयों का नुकसान हो गया हे। ऐसा नहीं है कि इस हडताल का असर केवल किसान बागवानों और उद्योंगों पर ही हो रहा है। इससे सरकार को भी प्रतिदिन करोडों रुपये का नुकसान हो रहा है। सरकार को टैक्स के तौर पर रोज़ाना मिलने वाले करोडों रूपयों का घाटा हो रहा है। ट्रक आॅपरेटर्स भी काम न करने से नुकसान झेल रहे हैं और इसका सीधा असर देश की अर्थव्यस्था पर देखने को मिलेगा। यदि यह हड़ताल जल्द खत्म न हुई तो रोज़मर्रा की ज़रूरतों का सामान मिलना मुश्किल हो जाएगा। लेकिन इस तरफ सरकार का उदासीन रवैया देश के भीतर गृहयु़द्ध जैसे हालातों की तरफ ले जा रहा है। किसान हित के मुद्दों के लेकर केंद्र की एनडीए सरकार पहले ही फज़ीहत झेल रही है। इधर लोकसभा चुनाव के लिए भी कम ही समय बचा है ऐसे में इस हड़ताल का ज्यादा दिनों तक चलना एनडीए के मिशन रिपीट के सपने को धूल चटा सकता है। (लेखक शिमला के जुब्बल के रहने वाले हैं। बाग़वानी और लेखन में उनकी रुचि है। उनसे prashantsehta89 @ gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

मनी लॉन्डरिंग मामले में विक्रमादित्य के खिलाफ चार्जशीट दाखिल

नई दिल्ली।। प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने आज हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के बेटे विक्रमादित्य के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग मामले में आज चार्जशीट दायर कर दी। इस मामले में वीरभद्र भी आरोपी हैं।

स्पेशल जज अरविंद कुमार ने केस की सुनवाई की तारीख 24 जुलाई तय की। साथ ही कहा कि उसी वक्त यह तय किया जाएगा कि क्या इस संबंध में अंतिम रिपोर्ट का संज्ञान लिया जाए अथवा नहीं।

विशेष लोक अभियोजक नितेश राणा और एन के मट्टा द्वारा दायर इस आरोपपत्र में तारणी इंफ्रास्ट्रक्चर के एमडी वकमुला चंद्रशेखर और एक अन्य राम प्रकाश भाटिया का नाम भी है। चंद्रशेखर और भाटिया दोनों इस संबंध में सीबीआई द्वारा दर्ज मामले में भी आरोपी हैं। इनके साथ वीरभद्र, उनकी पत्नी प्रतिभा सिंह और अन्य भी आरोपी हैं।

वकील एआर आदित्य द्वारा दायर कराई गई प्रवर्तन निदेशालय की चार्जशीट में 83 वर्षीय वीरभद्र सिंह और उनकी 62 वर्षीय पत्नी प्रतिभा के अलावा यूनिवर्सल एप्पल एसोसिएशन के मालिक चुन्नी लाल चौहान, जीवन बीमा निगम के एजेंट आनंद चौहान और 2 अन्य सहआरोपी प्रेम राज और लावन कुमार रोच का भी नाम है।

आनंद चौहान को ईडी ने 9 जुलाई 2016 को मनी लॉन्ड्रिंग निरोधक अधिनियम, 2002 के प्रावधानों के अंतर्गत गिरफ्तार किया था, लेकिन बाद में 2 जनवरी को उन्हें जमानत दे दी गई। इस संबंध में सीबीआई द्वारा दायर एक अन्य मामले में भी प्रदेश के पूर्व सीएम, उनकी पत्नी, चौहान और अन्य के खिलाफ आरोपपत्र दायर किया है।

उन दोनों ही केसों में सिंह दंपति की अभी तक गिरफ्तारी नहीं हुई है और अन्य आरोपी सीबीआई द्वारा दायर केस में मुकदमे का सामना कर रहे हैं।

कार्यक्रम सीएम का, चर्चा में आ गए प्रधान सचिव श्रीकांत बाल्दी

शिमला।। शनिवार को प्रदेश की राजधानी में हिमाचल हाइड्रो पावर डिवेलपर ऐंड हिमालय पावर प्रड्यूसर्स एसोसिएशन की ओर से एक दिन के सेमिनार का आयोजन हुआ। इस सेमिनार का उद्घाटन मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने किया लेकिन इस इवेंट की एक घटना चर्चा का विषय बन गई है।

पीटर हॉफ में जिस समय कार्यक्रम की शुरुआत में मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर का सम्मान किया जा रहा था, उस समय गेस्ट ऑफ ऑनर ऊर्जा मंत्री अनित शर्मा समेत तमाम अधिकारी और मंच पर बैठे अन्य लोग शिष्टाचार में अपनी सीट पर खड़े हो गए थे मगर अतिरिक्त मुख्य सचिव और प्रधान सचिव मुख्यमंत्री कार्यालय श्रीकांत बाल्दी बैठकर इधर-उधर देखते रहे।

हालांकि उठना या बैठना बड़ी बात नहीं है मगर शिष्टाचार व प्रोटोकॉल के लिहाज से इसे अनुचित माना जा रहा है।

सेमिनार में हिस्सा आए लोगों की नजरों से भी यह घटना बची न रह सकी और कैमरे ने भी इसे कैद कर लिया। कार्यक्रम में आए लोग इस बात की चर्चा करते रहे कि कुछ अन्य मौकों पर भी कथित तौर पर बाल्दी का रवैया इसी तरह का गर्वीला देखने को मिला है। प्रशानिक अधिकारी भी कानाफूसी करते नजर आए।

गौरतलब है कि सात साल से बाल्दी वित्त विभाग संभाल रहे थे और जयराम सरकार ने जब बड़ा प्रशासनिक फेरबदल किया था, तब वह उन्हें मुख्यमंत्री कार्यालय में प्रधान सचिव तैनात किया गया था। इन दिनों प्रशासनिक अमले में भी बाल्दी के बदले हुए तेवर चर्चा में हैं।

रसूखदारों से कब्जे नहीं छुड़ा पाई सरकार, हाई कोर्ट ने सेना को सौंपा जिम्मा

शिमला।। वन भूमि पर किए गए अवैध कब्जों को हटाने को लेकर चल रहे अभियान में रसूखदार लोगों से कब्जे न हटाए जाने से नाराज हाई कोक्ट ने सख्त कदम उठाते हुए अब यह काम भारतीय सेना की ईको टास्क फोर्स को सौंपने का फैसला किया है।

अदालत ने रजिस्ट्रार जनरल को कहा है कि भारतीय सेना की कुफरी स्थित ईको टास्ट फोर्स के अधिकारियों से संपर्क करे ताकि अवैध कब्जे हटाने में मदद मिले।

इसके लिए हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने भारतीय सेना की कुफरी स्थित 133 बटालियन के कमांडिंग ऑफिसर से संपर्क करने को कहा है।

गंदा है वन भूमि पर सेब उगाकर बेचने का धंधा

बता दें कि शिमला जिला के जुब्बल, कोटखाई, चैंथला, पुंगरिश, पांदली और कलेमू में प्रभावशाली कब्जाधारियों से अभी भी अतिक्रमित भूमि नहीं छुड़वाई जा सकी है। अब हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि सेना की ईको टास्क फोर्स के जवान अदालत द्वारा पहले से गठित टीम के सदस्यों के साथ मिलकर आदेश का पालन करें।

दरअसल इस मामले में अदालत द्वारा नियुक्त न्याय मित्र ने हाई कोर्ट को बताया कि स्थानीय लोगों से जानकारी मिली है अभी भी बड़े कब्जाधारियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं हो रही है।उन्होंने कुछ कब्जाधारियों की सूची कोर्ट को सौंपी है।

बहुत से लोगों ने सेब के बागीचे लगाने के लिए देवदार के पेड़ों से भरे जंगल साफ कर दिए हैं।

आरोपों के मुताबिक इनमें से एक परिवार के पास तो 50 बीघा जमीन का अवैध कब्जा है और उस पर उगाए सेबों की कमाई से शिमला में पांच इमारतें खड़ी करने का आरोप है। इस खबर को विस्तार से पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

50 बीघा वनभूमि कब्ज़ाई, सेब बेचकर शिमला में खड़ी की 5 इमारतें