धवाला बने प्लैनिंग बोर्ड के वाइस चेयरमैन, दो अन्य को भी मिली कुर्सी

शिमला।। आखिरकार हिमाचल प्रदेश सरकार ने निगमों और बोर्डों में नेताओं कुर्सियां देना शुरू कर दिया है। सबसे पहले रमेश धवाला को स्टेट प्लैनिंग बोर्ड का वाइस-चेयरमैन बनाने की खबर आई है। उन्हें कैबिनेट रैंक मिला है।

धवाला ज्वालामुखी से बीजेपी विधायक हैं

इसके साथ ही सिरमौर से बलदेव भंडारी को स्टेट एग्रीकल्चर मार्केटिंग बोर्ड का चेयरमैन बनाया गया है।वहीं चंबा से जय सिंह को एससी एसटी डिवेलपमेंट कॉर्पोरेशन का उपाध्यक्ष बनाया गया है।

नियुक्ति के बाद तीनों नेताओं ने मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर से मुलाकात की और आभार प्रकट किया।

इस तरह से बोर्डों और निगमों में नियुक्तियों का सिलसिला शुरू हो गया है। संगठन के कई लोग अपने नाम की घोषणा का इंतजार कर रहे हैं।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री के गृह जिले में डेंगू का कहर

बिलासपुर।। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा के गृह जिले में डेंगू बेकाबू होता नजर आ रहा है। बिलासपुर में बीजेपी के एक नेता की डेंगू से मौत होने के बाद 27 और लोगों में डेंगू होने की पुष्टि हुईहै।

अन्य जिलों से तुलना की जाए तो बिलासपुर में सबसे ज्यादा 1678 डेंगू मरीज हैं। बिलासपुर में मंगलवार को मरीजों का आंकड़ा 1651 था।

अब तक प्रदेश में 13,248 लोगों के स्वास्थ्य की डेंगू के लिए जांच की गई है जिनमें से 3,789 लोगों में इस बीमारी की पुष्टि हुई है।

इनमें बिलासपुर में 1678 मरीज हैं और उसके बाद सोलन में 1401 मरीज हैं। फिर मंडी में 493, कांगड़ा में 81, ऊना में 40, शिमला मे 16, सिरमौर में 10, हमीरपुर में 7 और चंबा में 4 मरीजों में डेंगू होने की पुष्टि हुई है। डेंगू के 59 मरीज आईजीएमसी शिमला में हैं।

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री विपिन परमारका कहना है कि अस्पतालों में दवाइयां उपलब्ध कराई गई हैं और मुफ्त में टेस्ट करवाए जा रहे हैं।

नाराज कर्मचारी स्टाफ को कथित तौर पर मूत्र मिलाकर पिलाता रहा पानी!

ऊना।। हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले के अम्ब उपमंडल के एक शिक्षण संस्थान में एक कर्मचारी द्वारा अपने स्टाफ को पेशाब मिलाकर पानी पिलाने का मामला चर्चा में है।

ऐसी खबरें हैं कि एक शिक्षण संस्थान का क्लास फ़ोर कर्मचारी किसी स्टाफ मेंबर द्वारा डांट पिलाने से इतना नाराज हुआ कि उसने पानी के जग में कथित तौर पर पेशाब मिलाना शुरू कर दिया। इस संबंध में ‘पंजाब केसरी’ ने रिपोर्ट छापी है।

रिपोर्ट में लिखा है कि यह कर्मचारी 15 दिन नाइट ड्यूटी पर रहता था और 15 दिन के समय ड्यूटी देता था। आरोप है कि सुबह इसकी ड्यूटी 9 बजे के करीब समाप्त होती तो जाने से पहले वह स्टाफ को पिलाए जाने वाले पानी में पेशाब मिलाकर चला जाता और बाकी दिन खुद ऐसा काम करता।

ऐसे पता चला
रिपोर्ट के मुताबिक पिछले हफ्ते जब एक महिला कर्मचारी को पानी के जग में कुछ पीले रंग का लिक्विड दिखा तो उसे शक हुआ और उसने स्टाफ के अन्य लोगों को जानकारी दी।

प्रतीकात्मक तस्वीर

जब इस संबंध में कर्मचारी से पूछताछ की गई तो वह मुकर गया। बाद में उसने सख्ती बरतने और पुलिस में मामला जाने के डर से गलती मानी और कहा कि वह पेशाब नहीं बल्कि गोमूत्र मिलाता था।

खबर है कि इस कर्मचारी ने लिखित माफी मांगी है और इसे छोड़ दिया गया है मगर स्टाफ के सदस्य परेशान हैं और घर से ही पानी की बोतल ला रहे हैं।

आपको हैरान कर देगा गौरवशाली इतिहास वाला ‘रिहलू का किला’

मयंक जरयाल।। पठानकोट-मण्डी राष्ट्रीय राजमार्ग पर कांगड़ा जिले में एक छोटा सा कस्बा है- शाहपुर। यहां से बाईं ओर नौ किलोमीटर लम्बा शाहपुर-चम्बी सम्पर्क मार्ग आसपास के कई गांवों को राजमार्ग से जोड़ता है। इसी लिंक रोड़ पर 4 किलोमीटर आगे रिहलू नाम का एक गांव पड़ता गै।

आज ये गांव गुमनामी के अंधेरे में गुम है मगर इतिहास में इसका विशेष स्थान रहा है। रिहलू से लगभग 300 फ़ुट की ऊंचाई पर एक ऊंचा सा टीला है, जिसके रिज पर है रिहलू का प्राचीन किला।

आज खण्डहर में तब्दील हो चुके रिहलू के किले का इतिहास बेहद रोचक रहा है। वर्तमान में जिला कांगड़ा में आने वाला रेहलू अतीत में तत्कालीन चम्बा रियासत का हिस्सा हुआ करता था।

कांगड़ा घाटी में सुदूर तक फैला रिहलू तालुका अपनी उपजाऊ भूमि के कारण शुरुआत से ही पड़ोसी रियासतों के बीच विवाद का विषय रहा है।

इतिहास पर गौर करें तो रिहलू का उल्लेख सर्वप्रथम चम्बा के राजा प्रताप सिंह (1559 ई.) के शासनकाल में मिलता है जब मुगल सम्राट अकबर के वित्तमंत्री टोडरमल ने चम्बा रियासत से रिहलू का तालुका हथिया कर शाही जागीर में मिला लिया।

लगभग अगले 200 साल रिहलू मुगलों के अधीन रहा। उसी दौरान कांगड़ा के जागीरदार बनाए गए अकबर के वज़ीर बीरबल का भी रिहलू अल्प अवधि के लिए आवास स्थल रहा।

रेहलू किले का निर्माण कब हुआ?
जब मुगल साम्राज्य पतन की ओर अग्रसर था तब कटोच वंशीय राजा संसार चंद के पास पुनः काँगड़ा रियासत की सत्ता आ गई और उन्होंने त्रिगर्त रियासत की प्राचीन गद्दी जालन्धर के अंतर्गत आने वाली 11 रियासतों पर अपना दावा ठोका।

वहीं मुगल प्रभुत्व समाप्त होने पर सभी स्थानीय राजा अपनी खोई हुई जागीरें आज़ाद करवा रहे थे। उसी कड़ी में चम्बा के तत्कालीन शासक राजा राज सिंह ने भी अकबर के शासनकाल में जबरन हथियाए गए रिहलू तालुके पर दोबारा अधिकार कर लिया।

राज्य का अधिक्तर भू भाग पहाड़ी होने के कारण रिहलू परगना चम्बा रियासत के लिए आर्थिक और युद्धनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण था।

मुगल सूबेदार ने चड़ी-घरोह व कुछ अन्य गांवों को रिहलू तालुके के साथ जोड़ रखा था जिन पर काँगड़ा के शासक राजा संसार चंद ने अपना अधिकार जताना शुरू कर दिया और चम्बा नरेश राज सिंह को रिहलू का इलाका उन्हें सौंपने के लिए कहा।

चम्बा नरेश राज सिंह ने न इस सिर्फ इस फरमान को ठुकरा दिया बल्कि स्वयं रिहलू पहुँच कर एक किले का निर्माण करवाया। 1794 ई. में शाहपुर से 2 किलोमीटर दूर नेरटी नामक स्थान पर इसी रिहलू तालुके के लिए राजा राज सिंह और राजा संसार चंद की सेनाओं के बीच लड़ाई लड़ी गई जिसे ‘नेरटी के युद्ध’ के नाम से जाना जाता है।

इस युद्ध में चम्बा के राजा राज सिंह 45 सिपाहियों की छोटी सी सेना होने के बावजूद पीछे न हटते हुए लड़ते रहे और युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए थे।

जिस जगह राजा ने अपने प्राण त्यागे, उनके बेटे ने उसी जगह उनकी अन्तिम इच्छा के अनुसार एक शिव मंदिर का निर्माण 1796 में करवाया जहाँ हर वर्ष उनकी स्मृति में मेले का आयोजन किया जाता है। अब मेला नेरटी में न हो कर के रैत नामक जगह पर होता है।

चम्बा नरेश के युद्ध में शहीद होने के बावजूद चम्बा की सेनाएँ रिहलू पर अधिकार बरकरार रखने में कामयाब हुईं व राजा संसार चंद के हाथ सिर्फ साथ लगते कुछ ही गांव आ पाए। 1821 ई. तक रिहलू तालुका चम्बा रियासत के ही अधीन रहा।

1809 ई. में सिख शासक महाराजा रणजीत सिंह और काँगड़ा के महाराजा संसार चंद में तय सन्धि के अनुसार काँगड़ा किले पर सिखों का अधिपत्य हो गया जिसका असर रहलू परगने पर भी पड़ा। दरअसल महाराजा रणजीत सिंह द्वारा काँगड़ा किले के क़िलेदार बनाए गए देस्सा सिंह मजीठिया को काँगड़ा, चम्बा, मण्डी, सुकेत समेत सभी पहाड़ी रियासतों का सूबेदार भी नियुक्त किया गया था।

देस्सा सिंह मजीठिया ने चम्बा के रिहलू क्षेत्र पर अधिकार करने के लिए रिहलू किले का घेराव किया जिस पर चम्बा की रानी ने युद्ध न करने का फैसला लेते हुए रिहलू तालुके को सिख सूबेदार को सौंप दिया। इस प्रकार सन 1821 में रिहलू के किले पर सिखों का अधिकार हो गया।

रिहलू के बुजुर्गों से बात करने पर एक आश्चर्यजनक बात पता चलती है। उनके अनुसार रिहलू के किले पर किसी मिर्ज़ा परिवार का अधिकार था। पता चलता है कि मिर्ज़ा परिवार की 5 पीढ़ियों ने रिहलू तालुके पर शासन किया है। उनका कहना है कि हमारे पूर्वजों के मिर्ज़ा परिवार के बुजुर्गों से मैत्रीपूर्ण संबन्ध थे।

अब सवाल ये उठता है कि मिर्ज़ा शासक रिहलू तालुके में कब, कैसे और कहाँ से आए?

सवाल इसलिए भी रोचक है क्योंकि सिखों व अंग्रेजों के बीच की संधि के अनुसार कांगड़ा पर अंग्रेजों का अधिपत्य हो गया था। इतिहास के उस दौर में भी किसी मुसलमान शासक का रिहलू पर हमले का कोई साक्ष्य नहीं मिलता है।

ये वह दौर था जब सिख साम्राज्य अपने स्वर्णिम काल में था। महाराजा रणजीत सिंह के नेतृत्व में पूरे उत्तर-पश्चिम भारत में सिख साम्राज्य का विस्तार हो रहा था। इसी कड़ी में सन 1821 में सिख सेना के गुलाब सिंह ने राजौरी रियासत के शासक अग़र उल्लाह खान को हरा कर सिख साम्राज्य में मिला लिया और मिर्जा परिवार को राजौरी का कुछ हिस्सा जागीर में दे दिया।

1846 में जम्मू और कश्मीर रियासत के शासक बनने के बाद महाराजा गुलाब सिंह ने राजौरी के अंतिम शासक रहीम उल्लाह खान को उनकी हत्या का षड्यंत्र रचने के आरोप में गिरफ्तार कर गोबिंदगढ़ जेल भेज दिया और रहीम उल्लाह खान के बेटे को निर्वासित कर कांगड़ा में रिहलू की जागीर प्रदान कर दी और रिहलू किले में भेज दिया। और इस तरह अगले 100 साल मिर्जा परिवार रिहलू परगने में रहा।

1905 के विनाशकारी भूकंप में काँगड़ा में भीषण तबाही हुई। इस तबाही से रिहलू का किला भी अछूता न रहा। भूकंप में किला पूर्ण रूप से ध्वस्त हो गया जिसमें मिर्ज़ा परिवार के 35 सदस्य मारे गए।

आज़ादी तक मिर्ज़ा परिवार का निवास स्थान रिहलू ही रहा। 1947 में विभाजन के खून खराबे के बीच मिर्ज़ा परिवार के सभी लोग किला छोड़ कर पाकिस्तान चले गए।

वर्तमान में किले की स्थिति बेहद दयनीय है। जिस ऐतिहासिक धरोहर को संरक्षण देना चाहिए था वो सरकार के उदासीन रवैये के कारण आज खण्डर में बदल चुकी है। किले की टूटी हुई दीवारें खुद की दुर्दशा देख कर आँसू बहाने को मजबूर है।

बाकि बचे हुए खहंडर सालों से शराब पीने और जुआ खेलने का अड्डा बने हुए हैं। टनों के हिसाब से मिट्टी और 8 फुट ऊंची घास प्रशासन के निकम्मेपन की गवाही दे रही हैं।

मुझे लगता है कि 1905 के विनाशकारी भूकम्प से किले को इतनी हानि न हुई होगी जितनी प्रशासन के सौतले व्यवहार से हुई है। देवभूमि हिमाचल में ऐसी अनेक धरोहरें आज वेंटिलेटर पर हैं। बिलासपुर में बछरेटू, बहादुरपुर, नौण, कोट कहलूर, त्यून के किलों की भी यही दुर्दशा है।

अभी भी देर नहीं हुई है। सरकार और जनता चाहें तो इन धरोहरों को संरक्षण प्रदान कर इनका कायाकल्प कर के टूरिजम सर्किट विकसित किया जा सकता है। उम्मीद है कभी ऐसा भी दिन आएगा जब टूरिस्ट लोगों के इंस्टाग्राम पर रणथम्भौर और चित्तौरगढ़ किलों के साथ-साथ रिहलू और कोट-कहलूर के फ़ोटो भी देखने को मिलेंगे।

किले में बनाया गया वीडियो देखें-

लेखक चंबा जिले के रहने वाले हैं। इलेक्ट्रिकल इंजिनियरिंग में बीटेक करने के बाद प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी कर रहे हैं। ट्रेकिंग और ट्रैवल राइटिंग में रुचि रखने वाले मयंक के यात्रा वृतांत उनके ब्लॉग ‘हिमालयन फ़ेरीटेल‘ पर पढ़े जा सकते हैं।

धर्मपुर में 423 करोड़ के मशरूम प्रॉजेक्ट पर एक्सपर्ट ने उठाए सवाल

मंडी।। हिमाचल प्रदेश के बागवानी मंत्री महेंद्र सिंह ठाकुर ने पिछले दिनों जानकारी दी थी कि केंद्र से बागबानी के लिए 1688 करोड़ और मशरूम उत्पादन के लिए 423 करोड़ रुपये की परियोजनाएं मंजूर हुई हैं। उन्होंने ‘द ट्रिब्यून’ से बातचीत में पिछले दिनों कहा था कि वह अपने इलाके में में मशरूम उत्पादन को प्रोत्साहन देना चाहते हैं।

यहां तक तो बात ठीक थी मगर 423 करोड़ रुपये के इस प्रॉजेक्ट को लेकर खबर आई कि इसे धर्मपुर में लगाए जाने की तैयारी चल रही है। धर्मपुर बागवानी मंत्री का चुनावक्षेत्र है। इसे लेकर कुछ लोगों ने मंत्री पर पक्षपात करके अपने इलाके में करोड़ों का प्रॉजेक्ट ले जाने के आरोप लगाए। मगर अब इस प्रॉजेक्ट की प्रासंगिकता को लेकर ही गंभीर सवाल उठ रहे हैं और ये सवाल वैज्ञानिक ढंग से उठ रहे हैं।

  • सरकार ने फिजिबिलिटी स्टडी की है या नहीं?
  • रॉ मटीरियल हिमाचल में उपलब्ध नहीं
  • पड़ोसी राज्यों से रॉ मटीरियल जुटाना बेहद महंगा
  • बड़ी-बड़ी कंपनियां बंद हो गईं
  • विदेशी एक्सपर्ट जमीनी हालात नहीं बताते बस प्रॉजेक्ट बेचते हैं
  • मुनाफा बेहद कम होता है, बाजार में कड़ी प्रतिस्पर्धा है

ये सवाल 15 साल से मशरूम इंडस्ट्री में काम का अनुभव रखने वाले विशेषज्ञ सुनील ममगाई ने अपने उस लेख में उठाए हैं जो ‘द ट्रिब्यून’ में प्रकाशित हुआ है। सुनील ने लिखा है कि 423 करोड़ रुपये के निवेश का मतलब है कि इतना बड़ा मशरूम फार्म लगाया जाएगा जिससे कि रोज 50 टन मशरूम का उत्पादन हो सके। सुनील ने लिखा है, “मैं मशरूम फार्म लगाने के अपने अनुभव के आधार पर ऐसा कह सकता हूं।”

वह बताते हैं, “मुझे नहीं मालूम ने इतना ज्यादा पैसा लगाने को लेकर फिलिबिलिटी स्टडी की है या नहीं और अगर की भी है, तो भी उसपर सवाल उठने चाहिए।”

 

रॉ मटीरियल कहां से आएगा
सुनील लिखते हैं कि ग्रोथ के लिए शेड लगाना और वातावरण बनाए रखने के लिए एसी प्लांट लगाना आसान है मगर रॉ मटीरियल जुटाना मुश्किल। उन्होंने लिखा है, “मशरूम उगाने के लिए धान या गेहूं का पुआल, मुर्गों की बीठ या घोड़ों के लीद से बनी खाद और अच्छी किस्म की केसिंग सॉइल चाहिए होती है। मुझे शक है कि हिमाचल में इतना रॉ मटीरियल है।”

वह कहते हैं कि हिमाचल में किसान 500 से 1000 किलो मशरूम रोज उगा रहे हैं और इसके लिए उन्हें ये रॉ मटीरियल पड़ोसी राज्यों पंजाब और हरियाणा से लाने पड़ते हैं। वह कहते हैं, “कल्पना करें कि इस प्रॉजेक्ट के लिए कितना ज्यादा पुआल और मर्गियों की बीठ से बनी खाद बाहरी राज्यों से लानी पड़ेगी। यह व्यावहारिक नहीं होगा।”

सुनील ने पटियाला के महाराजा का उदाहरण देते हुए कहा है कि उन्होंने चैल में मशरूम उगाने की कोशिश की थी मगर रॉ मटीरियल की कीमत इतनी ज्यादा थी कि उनका फार्म बंद हो गया था। वह कहते हैं कि पंजाब के लालड़ू में एग्रो डच इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड दुनिया का सबसे बड़ा मशरूम फार्म था मगर अब वह दीवालिया होकर बंद हो गया है क्योंकि इंटरनैशनल मार्केट में मुकाबला नहीं कर पाया और वित्तीय बोझ को नहीं झेल सका।

वह कहते हैं कि अगर हिमाचल सरकार फिर भी इस प्रॉजेक्ट पर काम करना चाहता है तो कम से कम उन लोगों के साथ मिलकर ढंग से स्टडी करवाए, जिन्हें इस इंडस्ट्री का प्रैक्टिकल अनुभव है, न कि एसी रूम में बैठकर प्रॉजेक्ट बनाने वालों की बात पर भरोसा करे। उन्होंने कहा कि विदेशी जानकारों की मदद लेने में कोई बुराई नहीं मगर वे भारत के जमीनी हालात से वाकिफ नहीं होते।

सुनील ने लिखा है, “विदेशी एक्सपर्ट अपनी मशीनें लगाएंगे मगर सरकार को रॉ मटीरियल की कीमत और अन्य बातों की जानकारी नहीं देंगे। वे प्रोसेसिंग टेक्नॉलजी बेच देंगे मगर प्रोसेस्ड फूड के बाजार के बारे में कुछ नहीं करेंगे। वे अपनी टेक्नॉलजी बेचते हैं और फिर पल्ला झाड़ लेते हैं।”

वह लिखते हैं, “प्रोसेस्ड और फ्रेश मशरूम का मार्केट बहुत प्रतिस्पर्धा भरा है और इसमें मुनाफा बहुत कम होता है। भारत में ही सर्दियों में मशरूम बेचना मुश्किल हो जाता है क्योंकि उस समय सोनीपत के मशरूम से बाजार भर जाते हैं। डिब्बाबंद मशरूम के मामले में चीनी और यूरोपीय लोगों को कोई मात नहीं दे सकता क्योंकि वे सस्ते उत्पाद। बेचते हैं।”

आखिर में उन्होंने सलाह दी है कि अगर सरकार फिर भी प्रॉजेक्ट पर आगे बढ़ना चाहती है तो धीरे-धीरे आगे बढ़े।

संपन्न बागबानों के बेटों ने पीट-पीटकर दलित युवक को मार डाला

शिमला।। हिमाचल प्रदेश के शिमला में तीन युवकों ने एक युवक को पीट-पीटकर मार डाला। इस मामले में अभियुक्त बनाए गए युवक संपन्न परिवारों से है जबकि मारा गया युवक दलित है।

यह पूरा विवाद पास लेने को लेकर हुआ। बाजार में जगह न होने के कारण रजत नाम के युवक ने हॉर्न बजा रही गाड़ी को लगभग 10 मीटर आगे चलकर पास दिया। वहां इन युवकों ने रजत से झगड़ा किया और बाद में बुरी तरह से पीटा। रजत ने बाद में अस्पताल में दम तोड़ दिया।

पुलिस ने इस मामले में कलारा के रहने वाले रितेश, नाव के रहने वाले कार्तिक लोथटा और उनके साथ एक नाबालिग को अभियुक्त बनाया है। तीनों बागवानों के बेटे हैं।

ऐसे हुई घटना
प्रत्यक्षदर्शियों ने पत्रकारों को बताया है कि पहले पास को लेकर विवाद हुआ तो होमगार्ड और लोगों ने बीच बचाव किया। इसके बाद रजत आगे बढ़ गया मगर तीनों लड़कों ने उसका पीछा किया और डुंडी मंदिर के पास रजक की गाड़ी ओवरटेक करके उसके आगे लगा दी।

लोगों का कहना है कि तीनों ने रजत को गाड़ी से बार निकालकर पीटा और भाग गए। इस दौरान रजत की मां वहां पहुंचीं। पिता जो कि डेप्युटी रेंजर हैं, वह भी उसी समय नेरवा पहुंचे। वे घर जाने के लिए रजत को ढूंढ रहे थे। रजत ने उन्हें बताया कि वह घायल कॉलेज रोड पर घायल पड़ा है।

दोनों अपने बेटे को पुलिस स्टेशन ले गए और शिकायत दर्ज करवाई। बाद में उसे अस्पताल ले जाया गया मगर यहां उसकी तबीयत बिगड़ी और उसने दम तोड़ दिया।

पुलिस का कहना है कि अभियुक्तों को गिरफ्तार करके  341, 323, 506 व 302 एवं अनुसूचित जाति एवं जनजाति ऐक्ट की धारा 3 व 4 के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी गई है।

जातिगत भेदभाव के कारण हत्या
नेरवा मारपीट हत्या मामले को लेकर दलित संगठनों के प्रतिनिधियों मृतक के माता, पिता सहित विधायक राकेश सिंघा के नेतृत्व में बीती रात एस पी ऑफिस का घेराव कर दिया। परिजनों का आरोप है कि उनकी जानकारी के बिना ही नेरवा पुलिस शव को नेरवा ले गई। गुस्साए परिजन ने एसपी शिमला से कार्यवाही की मांग उठाई है।

सीपीएम विधायक राकेश सिंघा का का आरोप है कि जिस कानून एवम व्यवस्था के मुददे को लेकर भाजपा सत्ता तक पहुंची, उसी कानून व्यवस्था पर अब सवाल उठ रहे है। उन्होंने कहा कि प्रदेश में अपराध का ग्राफ़ लगातार बढ़ रहा है, पिछले 9 माह की भाजपा सरकार के कार्यकाल में ही हत्याओं के आंकड़ा 50 से ऊपर पहुंच गया है। रेप, छेड़खानी, मारपीट, नशे की तस्करी व अन्य अपराधी भी बेलगाम नज़र आ रहे है।

जस्टिस सूर्यकांत ने ली हिमाचल हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस पद की शपथ

किरण कुमारी, शिमला।। जस्टिस सूर्यकांत आज से हिमाचल प्रदेश के चीफ जस्टिस बन गए हैं। राजभवन में आयोजित सादे समारोह में राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने उन्हें पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई। जस्टिस सूर्यकांत ने हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के 23वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में पद एवम गोपनीयता की शपथ ली।

कौन हैं जस्टिस सूर्यकांत
जस्टिस सूर्यकांत ने वर्ष 1984 में महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय रोहतक से विधि स्नातक की डिग्री हासिल की। हरियाणा के जिला हिसार में मध्यवर्गीय परिवार में 10 फरवरी, 1962 को जन्मे जस्टिस सूर्यकांत ने वर्ष 1977 में गांव के स्कूल से दसवीं की परीक्षा पास की।

साल 1981 में राजकीय स्नातकोत्तर डिग्री कॉलेज से स्नातक की। आज से जस्टिस सूर्यकांत हिमाचल हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के तौर पर अपनी सेवाएं देंगे।

शपथ ग्रहण समारोह में जस्टिस संजय करोल, मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर, विपक्ष के नेता मुकेश अग्निहोत्री सहित कई मंत्री, नेता, जस्टिस व अधिवक्ता मौजूद रहे।

शिमला में क्यों जुटेंगे 10 हिमालयी राज्यों के प्रतिनिधि

किरण कुमारी, शिमला।। पांच अक्टूबर को हिमाचल की राजधानी शिमला में हिमालयी क्षेत्र के दस राज्यों के 60 प्रतिनिधि जुटने जा रहे हैं। इनमे मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, सांसद और अन्य प्रतिनिधि शामिल होंगे।

क्या है कार्यक्रम
इस खास सम्मेलन का आयोजन दो चरणों में होगा। पहले चरण में शूलिनी विश्वविद्याल सोलन में 3-4 अक्टूबर को पेशेवर विशेषज्ञों और प्रतिनिधियों का शिखरसम्मेलन आयोजित किया जाएगा। दूसरे चरण में होटल पीटरहॉफ शिमला में 5 अक्टूबर को सभी हिमालयी राज्यों के मुख्यमंत्री और संसद सदस्य, वरिष्ठ अधिकारी और वैज्ञानिक हिस्सा बनेंगे।

विषय
हिमालयी लोगों की अगली पीढ़ी के कृषि संचालित कल्याण के केंद्रीय विषय के अलावा, कॉन्क्लेव में विचार-विमर्श के दौरान, दो प्रमुख क्षेत्रों यानी जलविद्युत परियोजना और सतत पर्यटन विषयों पर विस्तृत चर्चा होगील.

इस कॉन्क्लेव में मणिपुर, मेघालय, त्रिपुरा, सिक्किम, अरुणाचल, मिज़ोरम नागालैंड, उत्तराखंड, जम्मू कश्मीर और हिमाचल के जनप्रतिनिधि हाइड्रो डिवेलपमेंट, कृषि एवम जलवायु परिवर्तन पर मुख्यतः चर्चा की जाएगी।

विज्ञान प्रोद्योगिकी एवम पर्यावरण के प्रधान सचिव आरडी दीवान ने बताया कि ये अपनी तरह का पहला सम्मेलन है जिसमें हिमालयन राज्य बैठकर महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा करेंगे। केंद्रीय मंत्री राधा मोहन सिंह, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय और केरेन रिजजू, गृह राज्य मंत्री इस कार्यक्रम का हिस्सा रहेंगे।

शिमला में एक सरकारी बंगले पर दो नेम प्लेट्स बनीं चर्चा का विषय

शिमला।। हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में एक सरकारी आवास आजकल खूब चर्चा में है। दरअसल इसके गेट पर दो तख्तियां लगी हुई हैं। एक है पंचायती राज और ग्रामीण विकास मंत्री वीरेंद्र कंवर की तो दूसरी है पूर्व सीएम प्रेम कुमार धूमल की।

दरअसल हिमाचल के पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल को पिछली विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के तौर पर यह सरकारी आवास मिला था। अब नियमानुसार उन्हें यह खाली कर देना चाहिए क्योंकि वह चुनाव हार चुके हैं और किसी ओहदे पर भी नहीं हैं। मगर ऐसा नहीं हुआ तो जीएडी ने मौजूदा मंत्री वीरेंद्र कंवर को यही आवास अलॉट कर दिया।

अब हालात ये हैं कि आवास के गेट पर दो नामों की तख्तियां चिपकी हैं। क्रिस्टन हॉल के मुख्य गेट पर प्रेम कुमार धूमल और छोटे गेट पर ग्रामीण विकास मंत्री वीरेंद्र कंवर के नाम का फट्टा लगा हुआ है। ज़ाहिर है, ऐसे में चर्चा तो होनी ही है।

आज से हिमाचल प्रदेश में बसों पर चढ़ते ही देने होंगे 6 रुपये

शिमला।। हिमाचल प्रदेश सरकार ने बसों का किराया बढ़ाने के लिए अधिसूचना जारी कर दी है। इसके साथ ही अब यात्रियों से नई बढ़ी हुई दरों पर किराया वसूला जा सकेगा। अब बस में चढ़ने के ही छह रुपये हो जाएंगे। दरअसल बसों के न्यूनतम किराये को तीन रुपये से बढ़ाकर छह रुपये कर दिया गया है। छह रुपये में अधिकतम तीन किलोमीटर की यात्रा की जा सकेगी। इसके बाद प्रति किलोमीटर बढ़ी हुई दरों पर किराया चुकाना होगा।

पहले ऐसा होता था कि छोटी दूरियों के लिए लोग सरकारी बसों पर चढ़कर यात्रा कर लिया करते थे और इसके लिए उन्हें न्यूनतम किराया 3 रुपये देना होता था। तीन किलोमीटर तक यही दर थी। मगर अब अगर मजबूरी में किसी को यह यात्रा करनी पड़े तो 6 रुपये देने होंगे।

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दरअसल निजी बस चालकों ने सरकार पर दबाव बनाया था जिसके बाद सरकार ने प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों में सामान्य किराये में 20 और मैदानी क्षेत्रों में सामान्य किराये में 24 फीसदी की बढ़ोतरी करने का एलान किया था। कैबिनेट से मंजूरी मिलने के बाद आज इसकी अधिसूचना जारी कर दी गई है।

कितना बढ़ा किराया
मैदानी इलाकों में 1.12 रुपये प्रति किलोमीटर की दर से किराया लगेगा जबकि पहाड़ी क्षेत्रों में 1.75 रुपये प्रति किलोमीटर की दर से किराया लगेगा। यही नहीं, सरकार ने तथाकथित डीलक्स और लग्ज़री वॉल्वो बसों का भी किराया बढ़ा दिया है। सरकारी टिकटों की मशीनों को बढ़े हुए किराए के हिसाब से अपडेट किया जा रहा है जबकि प्राइवेट बस वालों ने नई दरों पर किराया वसूलना शुरू कर दिया है। वैसे कईयों ने तो उसी दिन से कर दिया था जिस दिन कैबिनेट में इसका मसौदा तैयार हुआ था।

देखें, प्रति किलोमीटर कितना बढ़ा है किराया-

सामान्य बसें
पहाड़ी इलाका- पुराना किराया 145 पैसे- नया किराया 175 पैसे
मैदानी इलाका- पुराना किराया 90 पैसे- नया किराया 112 पैसे

तथाकथित डीलक्स बसें
पहाड़ी इलाका- पुराना किराया 180 पैसे- नया किराया- 217 पैसे
मैदानी इलाका- पुराना किराया 110 पैसे- नया किराया 137 पैसे

तथाकथित लग्ज़री वॉल्वो बसें
पहाड़ी इलाका- पुराना किराया 300 पैसे- नया किराया 362 पैसे
मैदानी इलाका- पुराना किराया 220 पैसे- नया किराया 274 पैसे