इस बात का कोई सबूत नहीं कि शिमला को ‘श्यामला’ कहा जाता था

इन हिमाचल डेस्क।। हिमाचल प्रदेश में राजधानी शिमला का नाम ‘श्यामला’ करने की मांग हो रही है। हैरानी की बात यह है कि सोलन का नाम ‘शूलिनी’, मनाली का नाम ‘मनु’ और कुल्लू का नाम ‘कुलांत पीठ’ करने मांग क्यों नहीं हो रही। अब आप सोच रहे होंगे कि यह कैसी बात की जा रही है। दरअसल जिस तरह से ये कहा जाता है कि शिमला का नाम श्यामला देवी के मंदिर के काऱण पहले श्यामला था,  उसी तरह से माना जाता है कि सोलन का नाम वहां के शूलिनी देवी के नाम पर, मनाली का नाम मनु के नाम पर और कुल्लू का ‘कुलांत पीठ’ के कारण पड़ा था।

लेकिन मांग सिर्फ शिमला का नाम बदलने की ही हो रही है। इसलिए, क्योंकि कुछ लोगों के जहन में यह बात बैठ गई है कि शिमला का नाम अंग्रेजों ने बदला वह भी इसिलए कि वे ‘श्यामला’ नहीं बोल पाते थे। मगर वे अपनी बात को मजबूत तरीके से रखने के लिए कोई ऐतिसाहिक तथ्य या दस्तावेज सामने नहीं रख पा रहे। अंग्रेज द्वापर या त्रेता युग में तो आए नहीं थे कि उन्होंने क्या किया था, क्या नहीं, यह कहा नहीं जा सके। शिमला में पहले अंग्रेज के आने से लेकर उनके जाने तक की घटनाओं का विस्तृत ब्योरा उपलब्ध है। मगर कहीं पर भी यह सबूत नहीं है कि उन्होंने श्यामला को शिमला कर दिया था। कम से कम बुजुर्गों को तो पीढ़ी दर पीढ़ी याद रहता कि ऐसा नाम था जो ऐसा कर दिया गया था। शिमला हमेशा से शिमला था और पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने भी इसकी पुष्टि की है।

कालांतर में बदल जाते हैं कई नाम
अगर किसी जगह पर किसी देवी का मंदिर हो तो क्या जगह का नाम उसी नाम से हो जाता है? मान लिया जाए कि शिमला में श्यामला देवी के मंदिर के कारण उसका नाम श्यामला था, तो क्या अंग्रेजों को ही इस नाम को बोलने में दिक्कत होती है? क्या स्थानीय लोगों की बोलचाल में अपभ्रंश नहीं बना करते?

हो सकता है कि इसका नाम बहुत पहले श्यामला रहा हो, लेकिन क्या स्थानीय लोगों की बोलचाल इसे शिमला नहीं बना सकती?  जैसे कि कहा जाता है कि सोलन का नाम शूलिनी देवी के मंदिर के नाम पर पड़ा। क्या इसका नाम भी अंग्रेजों ने शूलिनी से सोलन कर दिया? कहा जाता है कि मनु के नाम पर मनाली का नाम था। तो क्या यह कालांतर में मनाली अपने आप बना या नहीं? या अंग्रेज इसे मनाली बना गए? तथाकथित मांडव नगर को क्या अंग्रेजों ने मंडी बना दिया था? माना जाता है कि कुल्लू का नाम कुलांत पीठ के कारण ऐसा पड़ा है। फिर ये कुल्लू क्या अंग्रेजों ने किया?

जाहिर सी बात है, जगहों के नाम किसी मंदिर या अन्य स्थानों के नाम पर आधारित हो सकते हैं, लेकिन उनका स्वरूप कालांतर में खुद भी बदलता है। मान लिया जाए कि अगर श्यामला देवी के नाम पर इस जगह का नाम था तो वह अंग्रेजों के आने से पहले अपने आप भी शिमला हो सकती है। बोलचाल में ऐसी ही तो रूप बदलते हैं। इसे ही तो अपभ्रंश कहा जाता है। जो शब्द कठिन होते हैं, वे समय के साथ बोलचाल में रूप बदलकर कुछ और हो जाया करते हैं।

मगर जरूरी नहीं कि हर जगह का नाम किसी मंदिर या किसी अन्य स्थान के ऊपर ही आधारित हो। कई जगहें ऐसी हैं जिनके नाम का ओर-छोर नहीं मिलेगा। ऊना किस नाम पर आधारित है? यह संभव है कि शिमला को लेकर लोगों ने लॉजिक लगाना शुरू किया कि आखिर शिमला का नाम ऐसा कैसे पड़ा होगा। तो उन्हें लगा कि बगल में काली बाड़ी है, काली माता का मंदिर यानी श्याम रंग की माता का मंदिर यानी श्यामला माता का मंदिर है ये और इस कारण शिमला पड़ गया होगा। फिर अगला लॉजिक आया कि अंग्रेज बोल नहीं पाते श्यामला तो नाम शिमला कर दिया।

इन लोगों को अति प्राचीन जाखू मंदिर और शिमला के नाम में  कोई सामीप्य नहीं मिला। अगर शिमला का नाम संयोग से जाखवपुर होता तो यही लोग जाखू मंदिर से इसका इतिहास जोड़ रहे होते। अगर शिमला का नाम पहले कलबैड़ी होता और अंग्रेज इसे शिमला नाम देते तब विरोध समझ आता कि काली बाड़ी नाम का पहले यहां मंदिर था, जिसके कारण जगह का नाम कलबैड़ी था मगर अंग्रेजों ने इसे बदलकर शिमला दिया था।

श्यामला देवी का मंदिर कहां है?
हिमाचल में कहीं और तो श्यामला देवी का मंदिर है नहीं, न ही शिमला में प्रचलित नाम से ऐसा मंदिर है, फिर वह मंदिर कहां है जिसके नाम पर शिमला का नाम श्यामला बताया जा रहा है? यह जानकारी कहां से आई, इस बारे में कोई ठीक से नहीं बता रहा और न ही इसका उल्लेख है। कुछ लोग कह रहे हैं कि शिमला में काली माता का मंदिर है, और श्यामला काली माता का नाम है, इसलिए इसका नाम श्यामला था और अंग्रेज श्यामला बोल नहीं पाए तो उन्होंने इसे सिमला बना दिया।

लेकिन जिस काली बाड़ी को देवी श्यामला का मंदिर कहा जा रहा है, उसे कोई श्यामला माता का मंदिर नहीं कहता। किसी आधिकारिक पत्र में उसे श्यामला मंदिर कभी कहा नहीं गया और न ही स्थानीय लोग उसे श्यामला माता का मंदिर करते हैं। सभी काली बाड़ी ही कहते हैं। इस मंदिर के बारे में रोचक बात यह है कि इसका निर्माण अंग्रेजों ने ही करवाया था। इतिहासकारों का स्पष्ट मत है कि काली बाड़ी मंदिर को 19वीं सदी की शुरुआत में स्थापित किया गया था। इस संबंध में शिमला काली बाड़ी की आधिकारिक वेबसाइट में जानकारी दी गई है। इसमें कहा गया है कि मौजूद मंदिर को 1845 में अंग्रेजों ने बनाया था। लेकिन मूल मंदिर बंगाली भक्तों ने बनाया था।

अब ये न कहना कि इसे भी अंग्रेजों ने श्यामला से काली बाड़ी बना दिया था। दरअसल बंगाल में मां दुर्गा पर बहुत लोग आस्था रखते हैं। लेकिन वहां पर कोई भी मंदिर मां श्यामला के नाम से नहीं है। हां, पश्चिम बंगाल के बर्धमान जिले में श्यामला नाम का गांव जरूर है। लेकिन काली के मंदिर को काली बाड़ी ही वहां कहा जाता है। शिमला के इस काली मंदिर का निर्माण चूंकि शुरू में बंगाली कम्युनिटी ने करवाया था, इसलिए यह तभी से काली बाड़ी ही था। श्यामला मंदिर नहीं। अब इस भ्रम के कारण ही काली बाड़ी वेबसाइट और अन्य वेबसाइटों में काली बाड़ी को श्यामला मंदिर कहा जाने लगा है। विकीपीडिया में हिमाचल सरकार के ही एक पुराने वेबपेज पर लिखी जानकारी के आधार पर इसका नाम श्यामला होने की बात कही गई है मगर हिमाचल सरकार के पास यह जानकारी कहां से आई, इसका जिक्र नहीं।

कौन हैं देवी श्यामला
काली मां के 1008 नामों की सूची में भी आपको ‘श्यामला’ नाम नहीं मिलेगा। यह बात अलग है कि अभी ‘श्यामल’ यानी सांवले रंग वाले के स्त्रीलिंग के तौर पर श्यामला को ‘सांवले रंग वाली’ देवी काली के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया गया है, मगर श्यामला देवी का ग्रंथों में अलग से जिक्र है और वह काली मां नहीं हैं।

ब्राह्मण पुराण में उन्हें अलग देवी (मंत्रिणी) बताया गया है जो अन्य देवी-देवताओं की प्रमुख हैं, भक्तिवेदांताश्रम उन्हें दुर्गा देवी का वह रूप बताता है जो कृष्ण के श्याम रूप में अवतार लेने पर भौतिक संसार से संवाद करने में मदद करती थीं तो कहीं उन्हें राजा मतांगी बताया गया है। इंडोनेशिया में रहने वाले तमिल भी अलग श्यामला देवी की पूजा करते हैं।

बेमतलब की बहस
वैसे ये बहस इलाहाबाद को प्रयागराज करने के बाद उठी है। अकबर ने इस शहर को इलाहाबाद के नाम से बसाया था तो प्रयाग कर दिया उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने। लेकिन इतिहास कहता है कि प्रयाग सिर्फ नदी के संगम वाले हिस्से को कहा जाता था, यहां शहर के रूप में बसावट की अकबर के दौर में हुई थी और वह भी एक तटबंध बनाने के बाद।

कुछ जानकारों का तो यह भी कहना है कि यह इलाहाबाद दरअसल इलावास का अपभ्रंश यानी बिगड़ा हुआ रूप है। इला उन्हीं मनु की कन्या थीं, जिनके बारे में कहा जाता है कि प्रलय के बाद जिनकी नाव कुलांत पीठ (आज के कुल्लू) में टिकी थी और जिन मनु के नाम पर आज की मनाली का नामकरण बताया जाता है।

या तो सरकार कोई ऐतिहासिक दस्तावेज लाए जो बताता हो कि शिमला का नाम पहले श्यामला था और अंग्रेजों ने इस कारण इसका नाम इस साल बदला था तो बात बने। वरना नाम के बजाय हर किसी को काम पर ध्यान देना चाहिए। खासकर शिमला नगर निगम की मेयर को जो शिमला का नाम बदलने का प्रस्ताव लाने की बात कर रही हैं। उनका कहना है कि नई पीढ़ी को इतिहास पढ़ना चाहिए।

बेहतर होगा कि शिमला की मेयर पहले अपना इतिहास दुरुस्त करें या फिर कोई दस्तावेज सामने आएं जो बताता हो कि शिमला पहले श्यामला था। वरना सर्दियों से पहले ही इस बात की तैयारियां शुरू करें कि लोगों को बर्फबारी के दौरान असुविधा न हो। वरना शिमला के लोग भूले नहीं है कि जब वे गर्मियों में पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस रहे थे, तब मेयर साहिबा चीन में एक कार्यक्रम में शिरकत करने चली गई थीं।

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कभी सोचा है दिल्ली जाने वाले HRTC ड्राइवर-कंडक्टर कहां सोते हैं?

इन हिमाचल डेस्क।। हिमाचल प्रदेश से दिल्ली के लिए दिन और रात के रूटों पर कई बसें चलती हैं। डीलक्स, सेमी डीलक्स और ऑर्डिनरी बसों के ड्राइवर और कंडक्टर बड़ी संख्या में दिल्ली पहुंचते हैं। जो बसें सुबह दिल्ली पहुंचती हैं वे शाम को दिल्ली से हिमाचल के लिए चलती हैं और जो शाम को पहुंचती हैं वे सुबह हिमाचल के लिए रवाना होती हैं। फिर बस का यह स्टाफ कहां आराम करता है, कहां नींद पूरी करता है? साथ ही एक सवाल यह भी उठता है कि इतनी सारी बसों को पार्क कहां किया जाता है।

जो लोग दिल्ली में मंडी हाउस से होकर गुजरते हैं, वे देखते होंगे कि कुछ बसें तो वहां खड़ी होती हैं। बाकी बसें दरअसल जगतपुर गांव में खड़ी होती हैं, जहां पार्किंग स्पेस भी है और ड्राइवर-कंडक्टर आराम भी कर सकते हैं। सवारियों को आईएसबीटी उतारने के बाद अधिकतर बसें जगतपुर ही जाती हैं।

जगतपुर में पार्किंग स्पेस की अगस्त 2017 की तस्वीर (Image: FB/Shesh Ram Thakur)

जगतपुर गांव यमुना नदी के तट पर ही है और बरसात के दिनों में कई इस गांव में बाढ़ का पानी भर जाता है। यहीं पर एचआरटीसी बसों के लिए एक पार्किंग स्पेस है और पास में ही ड्राइवरों-कंडक्टरों के ठहरने का इंतजाम। नीचे देखें जगतपुर में खड़ी बसों का एक वीडियो।

अब हिमाचल प्रदेश के परिवहन मंत्री गोविंद सिंह ठाकुर ने फेसबुक पर एक पोस्ट डालकर कहा है कि कुछ समय पहले उन्होंने इस जगह का दौरा किया था तो पाया था कि ड्राइवर और कंडक्टर खराब हालत में रह रहे थे। उन्होंने लिखा है कि अब तक यहां करीब 20 लाख रुपये खर्च करके सुविधाओं को बढ़ाया गया है।

हिमाचल बस ड्राइवरों के रुकने की जगह दिल्ली में
Image: FB/ Govind Singh Thakur

परिवहन मंत्री ने कहा है कि जब उन्होंने दौर किया था अधिकारियों को इनके विश्राम स्थल में एयरकंडीशनर, दीवारों की मुरम्मत और शौचालय के निर्माण के निर्देश दिए थे।

दिल्ली से हिमाचल के कुछ रूट बहुत लंबे हैं और 12 से 14 घंटों का लंबा सफर तय करना पड़ता है। इस दौरान हम यात्री तो आराम से नींद पूरी कर सकते हैं मगर ड्राइवर और कंडक्टर को जागते हुए और पूरा ध्यान सड़क पर रखकर गाड़ी चलाते हुए काटना पड़ता है। ऐसे में जरूरी है कि उनके आराम के लिए सही इंतज़ाम किए जाएं ताकि वे आराम से नींद पूरी कर सकें। इसलिए जरूरी है कि अधिक से अधिक सुविधाएं उनके विश्राम स्थल में दी जाएं।

सरकार ने बंद की मंत्री किशन कपूर के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच

शिमला।। कांगड़ा जिले में एक बीडीओ को खुलेआम डांटने फिर उस बीडीओ के सस्पेंड होने के बाद चर्चा में आए खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री किशन कपूर के खिलाफ लगे भ्रष्टाचार के आरोप के मामले की जांच हिमाचल सरकार ने बंद कर दी है। राज्य का विजिलेंस ब्यूरो इसकी जांच कर रहा था। खबर है कि पर्याप्त सबूत न मिलने के कारण मामले में क्लोजर रिपोर्ट लगाई गई है।

क्या था मामला
यह मामला तब का है जब प्रेम कुमार धूमल मुख्यमंत्री थे औऱ उस समय किशन कपूर हिमुडा के चेयरमैन थे। उनके ऊपर प्लॉटों का आवंटन करने में गड़बड़ करने का आरोप लगा था। आरोप यह भी था कि उन्होंने पत्नी के नाम ही प्लॉट आवंटित कर दिया जो पद के दुरुपयोग का मामला बन रहा था।

2013 में शुरू हुई थी जांच
इस मामले में साल 2013 में विजिलेंस ब्यूरो ने भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत मामला दर्ज किया था। आरोप था कि उन्होंने विवेकाधिकार कोटे का दुरुपयोग किया और इससे पत्नी और चहेतों को ही प्लॉट बांट दिए।

इस संबंध में अमर उजाला ने विभागीय सूत्रों के हवाले से लिखा है, “जांच में यह बात तो सामने आई थी कि कपूर ने पत्नी के नाम पर एक बड़ा प्लाट आवंटित कर दिया। लेकिन विवाद होने के बाद कपूर ने इसे सरकार को सरेंडर कर दिया था। ऐसे में उनके खिलाफ मामला नहीं बनता। इस बात को आधार बनाते हुए ब्यूरो ने जांच बंद कर दी है।”

लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि विवाद होने पर प्लॉट को अगर सरकार को वापस दे दिया जाए तो इसका मतलब यह तो नहीं कि पहले गलत काम नहीं हुआ। उदाहरण के लिए कोई किसी से रिश्वत ले और बाद में पकड़े जाने पर यह कहे कि रिश्वत के पैसे वापस ले लो और मुझे छोड़ दे तो क्या ऐसा संभव है।

हालांकि इस मामले में चूंकि जांच 2013 में शुरू हुई थी और पांच साल में विजिलेंस कुछ नहीं कर पाई। और अब प्रदेश में जो नई सरकार बनी है उसमें किशन कपूर मंत्री हैं तो यह जांच पूरी हो गई और विजिलेंस ने क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी।

मंत्री को व्यवहार सुधारने की नसीहत देने वाला बीडीओ सस्पेंड

मंत्री को व्यवहार सुधारने की नसीहत देने वाला बीडीओ सस्पेंड

शिमला।। पिछले दिनों फतेहपुर में हुए कार्यक्रम के दौरान कथित तौर पर दवाई खाए गए बीडीओ को खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री किशन कपूर ने सार्वजनिक तौर पर डांटा था और कहा था कि सरकार से बुरा कोई नहीं होगा। इसके बाद बीडीओ अरविंद गुलेरिया ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके मंत्री के व्यवहार पर आपत्ति जताई थी। अब खबर आई है कि अरविंद गुलेरिया को सस्पेंड कर दिया गया है और उन्हें डीआरडीए में तैनात किया गया है।

क्या हुआ था
किशन कपूर गृहिणी सुविधा योजना कार्यक्रम में भाग ले रहे थे। इस कार्यक्रम के दौरान बीडीओ कुछ देर के लिए कहीं चले गए और जह वह वापस लौटे तो किशन कपूर ने उन्हें सबके सामने डांट पिला दी। वीडियो में स्पष्ट होता है कि बीडीओ ने मंत्री से कहा कि वह दवाई खाने के लिए गए थे मगर मंत्री ने उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया और धमकी दे दी कि सरकार के लिए आप कुछ नहीं हैं। इस दौरान कैमरा देखकर वह बीडीओ को जनता की सेवा करने की हिदायत दे दी। यही नहीं, खबर तो यह है कि उन्होंने इस घटना की वीडियो बना रहे पत्रकार का मोबाइल छीन लिया और क्लिप डिलीट करवाई।

क्या कहना था बीडीओ का
इसके बाद एचएएस अधिकारी अरविंद गुरेलिया ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। उन्होंने कहा था कि वह मंत्री से अपील करेंगे कि वह अपने व्यवहार में सुधार करें। उन्हें कर्मचारी और अधिकारी के प्रति ऐसा करने से जनता के बीच अच्छा संदेश नहीं जा रहा और हमारी संस्थाओं के लिए भी गलत मेसेज जा रहा है। इससे लोगों का व्यवहार भी अधिकारियों के प्रति बदल जाएगा।

अब क्या हुआ
अब खबर यह आई है कि अरविंद को सस्पेंड कर डीआरडीए धर्मशाला में तैनात किया गया है। इस संबंध में सचिव आरडी डॉ आरएन बत्ता ने आदेश जारी कर दिए हैं।

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बीडीओ ने कहा- अपने अशोभनीय व्यवहार को सुधारें मंत्री किशन कपूर

कांगड़ा, एमबीएम न्यूज नेटवर्क।। शनिवार को कांगड़ा जिले के फतेहपुर में गृहिणी सुविधा योजना के एक कार्यक्रम के दौरान खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री किशन कपूर ने फतेहपुर के युवा एचएएस अधिकारी (बीडीओ) को खुलेआम डांटा था। इससे दुखी बीडीओ फतेहपुर अरविंद गुलेरिया ने रेस्ट हाउस में प्रेस कॉन्फ्रेंस की और कहा कि वह ईश्वर से कामना करते हैं कि मंत्री को सद्बुद्धि दे।

उन्होंने कहा कि वह मंत्री से अपील करेंगे कि वह अपने व्यवहार में सुधार करें। उन्हें कर्मचारी और अधिकारी के प्रति ऐसा करने से जनता के बीच अच्छा संदेश नहीं जा रहा और हमारी संस्थाओं के लिए भी गलत मेसेज जा रहा है। इससे लोगों का व्यवहार भी अधिकारियों के प्रति बदल जाएगा।

पत्रकारों के सामने एसडीओ ने कहा कि निजी तौर पर उन्हें इस घटना से आघात नहीं लगा है मगर जो युवा दिन-रात अधिकारी बनने के लिए संघर्ष करते हैं, तैयारी करते हैं, उनका मनोबल इस तरह की घटनाओं से गिर जाता है।

अऱविंद गुलेरिया ने कहा, “मंत्री मेरे लिए सम्माननीय हैं और अगर मेरे खिलाफ उनके पास शिकायत थी तो कमरे में बैठकर शिकायत की जा सकती थी। लेकिन सैकड़ों लोगों और अधिकारियों व मीडिया की मौजूदगी में उन्होंने जो भला-बुरा कहा, वह शोभनीय नहीं था।”

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बीडीओ ने कहा कि आजकल की युवा पीढ़ी नेताओं को आदर्श मानती है मगर सम्माननीय पद पर बैठे एक वरिष्ठ मंत्री द्वारा ऐसा व्यवहार करने से राजनेताओं की छवि को और उन्हें आदर्श मानने के सपने को भी धक्का लगा है। नीचे देखें, क्या हुआ था फतेहपुर में:

खाद्य आपूर्ति मंत्री किशन कपूर ने बीडीओ को धमकाया

खाद्य आपूर्ति मंत्री किशन कपूर ने बीडीओ को धमकाया

कांगड़ा।। कुछ दिन पहले अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के सदस्यों को डांटते हुए वीडियो में कैद हुए खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री और धर्मशाला से बीजेपी विधायक किशन कपूर एक बार फिर सार्वजनिक सभा में तल्ख तेवरों में नजर आए। एक वीडियो में वह एक बीडियो को डांटते हुए नजर आ रहे हैं।

यह वीडियो कांगड़ा जिले के फतेहपुर का है जहां किशन कपूर गृहिणी सुविधा योजना कार्यक्रम में भाग ले रहे थे। इस कार्यक्रम के दौरान बीडीओ कुछ देर के लिए कहीं चले गए और जह वह वापस लौटे तो किशन कपूर ने उन्हें सबके सामने डांट पिला दी।

वीडियो में स्पष्ट होता है कि बीडीओ ने मंत्री से कहा कि वह दवाई खाने के लिए गए थे मगर मंत्री ने उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया और धमकी दे दी कि सरकार के लिए आप कुछ नहीं हैं। इस दौरान कैमरा देखकर वह बीडीओ को जनता की सेवा करने की हिदायत दे दी। यही नहीं, खबर तो यह है कि उन्होंने इस घटना की वीडियो बना रहे पत्रकार का मोबाइल छीन लिया और क्लिप डिलीट करवाई।

लेकिन इस घटना का एक वीडियो सार्वजनिक हो गया है, देखें:

सवाल ये उठता है कि अगर कोई अधिकारी बीमार हो तो क्या दवाई खाने नहीं जा सकता? या शौच आदि ही आ जाए तो क्या उसे टॉइलेट जाने का भी अधिकार नहीं? गौरतलब है कि इससे पहले किशन कपूर ने पिछले दिनों मांगें रख रहे छात्रों से कहा था- आप सौभाग्यशाली हैं कि मंत्री आपसे बात कर रहा है।

यह पहला मौका नहीं है जब इस तरह की टिप्पणियों या तेवरों के लिए किशन कपूर विवादों में घिरे हैं। लेकिन सत्ता में आने के बाद जहां नेताओं को विनम्र होना चाहिए, वहां इस तरह के व्यवहार पर जनता सवाल उठा रही है। क्योंकि अधिकारी भी जनता की सेवा के लिए हैं और नेता भी। किसी को भी किसी का अपमान करने का अधिकार नहीं है।

छात्रों ने मंत्री को दिखाया आईना, बोले- मिनिस्टर बने भी तो हमारी वजह से हैं

मुख्यमंत्री जी, बदलना ही है तो ‘शिमला’ का नाम ‘जुमला’ कर दो

आई.एस. ठाकुर।। सुनने में आया कि उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज हो जाने के बाद हिमाचल में भी कुछ शेर नाम बदलने की मुहिम चला रहे हैं। ये अलग बात है कि ये शेर भेड़चाल चल रहे हैं। वैसे भेड़चाल की तो अपने देश में आदत है ही। जब यूपी में कोई काम हो सकता है तो हिमाचल में क्यों नहीं?

ये देखकर फिर अखबार में अपने नाम पढ़ने का शौक रखने वाले कुछ लोगों ने अपने संगठनो के नाम से शिमला का नाम श्यामला करने का ज्ञापन सौंपा दिया। हर दूसरे सवाल पर ‘हम विचार कर रहे हैं’ का जवाब देने वाले हिमाचल के मृदुभाषी मुख्यमंत्री जी से जब पत्रकारों हिमाचल में जगहों के नाम बदले जाने को लेकर सवाल किया तो उन्होंने जवाब दिया, “हम विचार कर रहे हैं।”

लेकिन विचार क्यो कर रहे हैं?
सीएम साहब की क्लिप सुनने में गलती न हुई हो तो वह कह रहे थे कि बहुत सी बातें जो अंग्रेज़ों की गलत बातों का स्मरण करवाती हैं, उनके नाम बदलने पर विचार हो सकता है। मुख्यमंत्री ने स्कैंडल पॉइंट, रिज, पीटरहॉफ जैसी जगहों का जिक्र किया। आखिर में उन्होंने यह तो कहा कि जनता से सुझाव मांगेंगे, मगर सवाल ये उठता है कि आखिर नाम बदलने की जरूरत क्यों महसूस हो गई?

वैसे हिमाचल में जो नाम मौजूद हैं, उनमें बुराई क्या है? जो इमारतें अंग्रेजों ने बनाई, जिन शहरों और कस्बों को अंग्रेजों ने बसाया, अगर उनके नाम अंग्रेज़ी हैं तो इसमें दर्द की कौन सी बात है? और अगर इन नामों से इतनी ही दिक्कत है तो India नाम भी चेंज करवा दीजिए।

तो क्या भारत को भी तोड़ दोगे?
और फिर नाम ही क्यों, देश को भी अलग-थलग कर दीजिए क्योंकि आज भारत जिस सूरत में है, वह सूरत अग्रेजों की ही बनाई हुई है। आज का भारत छोटे-छोटे राजे-रजवाड़े अपनी-अपनी रियासतों में बंटा हुआ था। तो क्या आज से इंडिया, आज के भारत को आप इसलिए छिन्न-भिन्न करना चाहेंगे कि इसे अंग्रेजों ने ये शक्ल दी है?

वैसे मुझे पता है कि कुछ लोग ये तर्क देंगे कि अंग्रेजों ने तो भारत तोड़ा है, पाकिस्तान बनाया है वरना पुराना भारत को ऊपर अफगानिस्तान से लेकर म्यांमार तक था, अखंड भारत था। और यही वो लोग हैं जो नाम बदलने की संस्कृति का समर्थन करते हैं। यही लोग हैं जो वर्तमान में तो कुछ नहीं करते मगर गौरवशाली इतिहास के भ्रम में पड़े रहते हैं।

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हीनभावना और नाम बदलने की मांग
हीनभावना के शिकार ये लोग इतिहास को बदल देना चाहते हैं, उसे स्वीकार नहीं करना चाहते। वे उससे सीखना नहीं चाहते, वर्तमान में अच्छे काम करके नया इतिहास रचने की क्षमता नहीं रखते। बस, जो बीता हुआ कल है, उससे छेड़छाड़ करते रहेंगे। मौजूदा शहरों की दुर्दशा ठीक नहीं करेंगे, बस नाम बदल देंगे और खुश हो लेंगे।

शिमला अंग्रेजों की ग्रीष्मकालीन राजधानी थी। इस शहर को बसाया है अंग्रेजों ने। अपना बनाया हिमाचल सरकार के पास है ही क्या? कई बड़ी इमारतें और सरकारी दफ्तर अंग्रेजों की बनाई सड़कों पर चल रहे हैं। नई ट्रेन हिमाचल में आप कहीं ढंग से चला नहीं सके, अंग्रेज यहां शिमला तक ट्रेन ले आए थे। उससे आगे आपने एक फुट पटरी नहीं बिछाई।

पूरी दुनिया में हिमाचल की पहचान शिमला से रही है।

और जिस रिज का नाम बदलने की आप बात कर रहे हैं, रिज का मतलब होता है पहाड़ी का ऊपरी समतल हिस्सा। उसका टॉप। तो रिज अंग्रेजों का दिया नाम इसलिए है क्योंकि वह जाखू वाली पहाड़ी के तल पर थोड़ा समतल हिस्सा था। खैर, ये बेकार की बहस है। अगर किसी जगह का नाम अपमानजक हो और उससे वहां रहने वालों को शर्म आए तो उसे स्थानीय लोगों के नाम पर बदलना चाहिए। जैसे एक जगह किसी नाले का नाम *तड़ नाल था जिसे लोग चतुर नाला कहने लगे हैं। त्रपड़ नाल को तारापुर कहने लगे हैं।

समझदारों की भी सुने सरकार
ऐसे नाम बदलने हों तो बदलिए। मगर जो नाम आपके इतिहास के प्रतीक हैं। उन्हें क्यों बदलना? जो लंबे समय से आपकी संस्कृति का हिस्सा हैं, उन्हें क्यों बदलना? यह मूर्खतापूर्ण कदम है। अगर कहीं और कोई नासमझी भरा काम कर रहा है तो इसका मतलब यह नहीं कि आप भी वैसा ही करने लगें। और कुछ मुट्ठी भर लोग कुछ भी मांग करने लगें तो सरकार को उस पर विचार करने से पहले यह विचार करना चाहिए कि वह बात विचार करने लायक है भी या नहीं।

सरकार को चंद नासमझों को खुश करने के बजाय यह भी सोचना चाहिए कि वह पढ़े-लिखे, शिक्षित और समझदार लोगों का भी प्रतिनिधित्व करती है। उसके बीच अपनी छवि की भी चिंता सरकार को करनी चाहिए। क्योंकि किसी जगह का नाम बदलने से आप न सिर्फ उस जगह से जुड़े इतिहास पर पर्दा डाल देते हैं बल्कि पहचान को खत्म कर देते हैं। जगहों के नाम बदलने पर होने वाले खर्च को क्या कर्ज में डूबा प्रदेश सह सकता है, इस पर भी विचार होना चाहिए।

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नए शासकों को ही दिक्कत क्यों?
हिमाचल निर्माता डॉक्टर वाई.एस. परमार ने नाम नहीं बदले, मगर अब के शासकों को नाम बदलने की जरूरत महसूस हो रही है। वह भी चंद निठल्ले लोगों की मांग पर। शांता कुमार की सरकार थी तो शिमला में कई ऐतिहासिक इमारतों के नाम बदल दिए थे। शायद ये काम कांग्रेस से प्रेरित था जिसने स्नोडन का नाम इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज कर दिया था। लेडी रीडिंग को कमला नेहरू अस्पताल कर दिया था। बीजेपी ने रिपन को दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल कर दिया। ओक ओवर को शांता कुमार ने शैल कुंज बना दिया था तो पीटरहॉफ को मेघदूत। कुछ नाम वैसे के वैसे रह गए तो कुछ नाम फिर अपने पुराने रूप में लौट आए हैं।

फिर भी अगर मौजूदा सरकार को लगता है कि नाम बदलना ही है तो मेरा सुझाव भी ले ले। शिमला स्मार्ट सिटी तो बन नहीं पाया बड़े-बड़े दावों के बीच, इसलिए इसका नाम बदलना ही है तो ‘शिमला’ की जगह ‘जुमला’ रख दीजिए। क्योंकि हिमाचल को लेकर प्रधानमंत्री जी ने चुनाव से पहले जितनी भी बातें की थीं, उनमें से अधिकतम ‘जुमला’ ही साबित हुई हैं। बाकी प्रदेश में जिस जगह का नाम जो भी रख दीजिए, आपकी मर्जी। हिमाचल की राजधानी जुमला होगी तो सीधे वर्तमान शासकों की अकर्मण्यता की याद दिलाएगी। आपको भी अंग्रेजों की तथाकथित बुरी बातों की याद नही आएगी।

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

लेखक हिमाचल और देश से जुड़े विषयो पर लिखते रहते हैं, उनसे kalamkasipahi@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

मदारी के करतब को बलि का जुलूस बताकर फैला दी अफवाह

इन हिमाचल डेस्क।। मेलों के दौरान अक्सर मदारी गर्दन काटकर दोबारा जोड़ने के करतब दिखाते हैं। मगर वे कहते हैं कि हम खून नहीं दिखाएंगे क्योंकि हमें ऐसी इजाजत नहीं। दरअसल वे इस तरह से भ्रम पैदा करते हैं कि तमाशवीनों को लगता है कि वाकई गर्दन काटी गई है। यही तो कला है जादू के खेल की। मगर इस तरह के जादू की ट्रिक को अगर लोग यकीन करने लग जाएं तो क्या होगा?

ऐसा ही वाकया सामने आया है राजस्थान के भीलवाड़ा जिले से। गंगापुर में नवरात्र मेलों के दौरान मदारी ने करतब दिखाया, चारपाई के निचले हिस्से पर बच्चे के लेटने की जगह बनाई, सफेद चादर बिछाई और ऊपर वाले हिस्से में गर्दन निकाली। ऐसा लग रहा था कि गर्दन काटकर रखी गई है। लेकिन असली रंग देने के लिए उसने रंगों का इस्तेमाल किया और थाली पर लाल रंग लगा दिया और खुद आगे तलवार पर लाल रंग लगाकर चलने लगा। मानो खून लगा हो।

मगर देखते ही देखते शरारती तत्वों ने ये वीडियो बलि का वीडियो का बताकर शेयर कर दिया और लोगों को कोसना शुरू कर दिया। कहा जाने लगा कि अंधविश्वास की हद देखो। मगर अंधविश्वास की हद यह है कि इस वीडियो को शेयर वाले खुद सोशल मीडिया के झूठ पर अंधविश्वास कर बैठे हैं। नीचे देखें यूट्यूब पर शेयर किया गया एक फर्जी वीडियो जिसमें गुमराह करने वाले कैप्शन लगे हैं

क्या कहा राजस्थान पुलिस ने
राजस्थान पुलिस के साइबर सेल ने कल ही इस वीडियो को झूठा करार दिया था और कहा था कि ये करतब था। फिर भी इन हिमाचल ने भीलवाड़ा के गंगापुर पुलिस स्टेशन में इंस्पेक्टर रामवीर जाखड़ से बात की। उन्होंने In Himachal को बताया, “हमने जांच की है और साफ किया है कि ये झूठी और बिना मतलब की बात है। इस तरह के करतब मोहर्रम से लेकर कई तरह के मेलों में दिखाए जाते रहे हैं और ये नरवात्र के दौरान का वीडियो है और जादू का करतब मात्र है।”

उन्होंने ये भी कहा कि इस मामले में अफवाह फैलाने वालों के खिलाफ विधिसम्मत कानूनी कार्रवाई अमल में लाई जाएगी। भीलवाड़ा के एसपी डॉक्टर रामेश्वर सिंह ने भी बलि की बात को गलत बताया। लेकिन सोशल मीडिया के झूठ को फैलाने में हिमाचल के पेज भी पीछे नहीं रहे। राइट फाउंडेशन नाम के एक पेज ने भी इसी तरह का एक वीडियो शेयर किया था, जिसे इस ‘इन हिमाचल’ पर इस खबर के छपने के बाद हटा दिया गया। उस वीडियो पोस्ट का स्क्रीनशॉट नीचे है। इसके नीचे कॉमेंट करते हुए इस पेज ने दावा किया था कि उसकी राजस्थान टीम ने जांच करके इस वीडियो की पुष्टि की है।

झूठा मेसेज फैलाता खुद को समाज सेवी बताने वाले संगठन का पेज

मगर जैसा कि साफ है, अफवाह फैलाना जुर्म है और ऐसा करने पर कार्रवाई भी हो सकती है। इस वीडियो को बलि का वीडियो बताकर शेयर करने वालों की कॉमनसेंस ने काम नहीं किया। यह सच है कि बलि कोई बेवकूफ दे सकता है और कुछ मानसिक रूप से बीमार लोग अंधविश्वास में आकर देते भी हैं। लेकिन कौन सा समाज होगा जो ऐसा करके जुलूस निकालेगा और चुप रहेगा और मीडिया में खबर भी नहीं आएगी? यानी अंधविश्वासी तो हैं, मगर वे लोग जो सोशल मीडिया पर भी सच-झूठ को जांचे बिना अंधविश्वास कर लेते हैं।

अवैध वॉल्वो को रोक नहीं रही, HRTC वॉल्वो को बंद करने जा रही सरकार

शिमला।। हिमाचल प्रदेश सरकार कुछ वॉल्वो बसों को बंद करने जा रही है। यह फैसला इन बसों के घाटे में होने के कारण लिया जा रहा है। ऐसी खबर है कि हिमाचल से दिल्ली और चंडीगढ़ के रूट पर चलने वाली कई बसें घाटे में है और परिवहन मंत्री ने एचआरटीसी को कहा है कि इन्हें बंद किया जाए। सरकार द्वारा ठेके पर चलाई जा रही इन बसों को लेकर निगम को अब एक प्रस्ताव सरकार को सौंपना होगा।

बता दें कि पिछले महीने ही सरकार ने मनाली-दिल्ली, धर्मशाला-दिल्ली और शिमला-दिल्ली रूट पर एक-एक बस बंद की थी। लेकिन अगर ये रूट इतने ही घाटे के हैं तो इनपर अवैध प्राइवेट बसें क्यों ठसाठस भरी चल रही हैं? जी हां, देश की राजधानी से हिमाचल के तीन महत्वपूर्ण स्थानों- मनाली, धर्मशाला और शिमला के लिए कई सारी प्राइवेट वॉल्वो फिक्स्ड रूटों पर चल रही हैं जो अवैध हैं।

अभी तो कुछ ही सरकारी वॉल्वो बसों को बंद करने की तैयारी है मगर जिस तरह बिना रोक टोक अवैध लगजरी बसें चल रही हैं, उस तरह से तो एक दिन सभी सरकारी बसों को बंद करने की नौबत आ जाए तो हैरानी नहीं होगी। जब सरकारी वॉल्वो का किराया प्राइवेट बसों से दोगुना महंगा होगा तो ठेके वाली क्या, वे बसें भी बंद करनी पड़ेंगी जिन्हें एचआरटीसी खुद चला रही है।

इन अवैध बसों से घाटे में एचआरटीसी बसें
ये अवैध बसें सीधे-सीधे एचआरटीसी की बसों को नुकसान पहुंचा रही हैं। मगर हिमाचल सरकार इन बसों को तो बंद नहीं करवा रही, इनके कारण घाटे में आई एचआरटीसी की बसों को बंद करने की तैयारी में है। अगर इन अवैध बसों पर नकेल कसी जाए तो स्वाभाविक तौर पर एचआरटीसी घाटे में नहीं जाएगी। लेकिन सरकार की ओर से इन बसों को लेकर अब तक कोई कदम नही उठाया गया है। नतीजा यह कि सरकारी बसें कॉम्पिटिशन से बाहर हो रही हैं।

दिल्ली-मनाली रूट पर एक दिन में 42 प्राइवेट वॉल्वो
अब अगर एक आध प्राइवेट बस चल रही हो तो समझा जा सकता है कि पता नहीं चल रहा। मगर रेडबस वेबसाइट पर आप दिल्ली से मनाली जाना चाहें तो 42 प्राइवेट बसों के ऑप्शन आते हैं। और इनका किराया शुरू होता है 750 रुपये से और औसत किराया है 1100 रुपये। अब अगर आप एचआरटीसी की वेबसाइट देखें तो उसमें इसी रूट पर 8 बसें है और उनका किराया है 1688 रुपये। यानी एक जैसी बस में किराये का सीधा 550 रुपये का फर्क। नीचे देखें-

दिल्ली-मनाली रूट पर रेडबस पर प्राइवेट लग्जरी बसों का किराया

इसी रूट पर एचआरटीसी वॉल्वो बसों का किराया

धर्मशाला के लिए भी यही हालत
इस रूट पर भी कई प्राइवेट बसें चलती हैं और उनका किराया शुरू होता है 800 रुपये से। औसत किराया प्राइवेट बसों का है 1000 रुपये के आसपास। लेकिन आपको एचआरटीसी की बस से जाना है तो किराया है- 1318 और औसत किराया 1350 रुपये। यानी 350 रुपये का फर्क। हालांकि शिमला में ये तरह दिल्ली शिमला पर प्राइवेट बसों का किराया 887 से शुरू होता है और 1280 तक है। जबकि एचआरटीसी की लग्जरी बसों में ये किराया है 965 रुपये। यानी लगभग एक जैसा। शिमला रूट पर ज्यादा प्राइवेट बसें नहीं हैं मगर मनाली और धर्मशाला रूट पर बहुत सी हैं। और इन रूटों पर किराए का ये फर्क यात्रियों को प्राइवेट बसों की ओर खींचता है।

प्राइवेट वॉल्वो सस्ती क्यों है
दरअसल ये अवैध बसें टूरिस्ट परमिट वाली हैं और ये ग्रुप बुकिंग ही करवा सकती हैं। यानी अगर आपके कॉलेज, स्कूल, कंपनी या परिवार के सदस्यों को एकसाथ कहीं घूमने जाना है तो इन बसों को बुक करवाया जा सकता है। मगर ये बसें किन्हीं दो स्थानों के बीच में तय समय ऐसे पर चल रही हैं, मानों इन्हें इसका रूट परमिट मिला हो। जबकि ये ऐसा नहीं कर सकतीं और ऐसा करना अवैध है। यानी ये बसें दिल्ली से धर्मशाला या मनाली के लिए किसी ग्रुप को तभी ला सकती हैं, जब वह ग्रुप इन्हें बुक करे। ऐसा नहीं कि ये रोज शाम आठ या नौ बजे चलें और सवारियों से टिकट लें।

टैक्स चोरी कर रही हैं ये बसें
अब इस तरह से ये बसें न सिर्फ कानून तोड़ रही हैं बल्कि एचआरटीसी और अन्य राज्यों के परिवहन निगमों को भी चूना लगा रही हैं, क्योंकि ये सरकारी लग्जरी बसों की तुलना में कम किराया वसूलती हैं। और लोगों को तो वैसे भी कम किराया सुविधाजनक होता है। मगर ये कम किराया इसलिए वसूलती हैं क्योंकि ये टैक्स की चोरी करती हैं। ये जिन-जिन राज्यों से होकर परमानेंट रूट चला रही हैं, उन्हें टैक्स नहीं देतीं। इसीलिए इनका किराया सस्ता होता है।

इसे आप इस तरह समझ सकते हैं कि हिमाचल रोड ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन की कोई बस दिल्ली तक जाती है तो उसमें प्रति सवारी टिकट के हिसाब से राज्यों को टैक्स देना होता है। आपने टिकट देखा भी होगा, उसमें लिखा होता है- पंजाब टैक्स, हरियाणा टैक्स, दिल्ली टैक्स। ये आपके टिकट पर लगने वाला वह टैक्स होता है, जो एचआरटीसी को इन राज्यों को देना होता है।

अब इस कारण वैध सरकारी वॉल्वो बसों और अवैध प्राइवेट वॉल्वो बसों के किराए में भारी अंतर आ जाता है। अब अगर आप ग्राहक हैं तो आप तो चाहेंगे कि एक जैसी सुविधा वाली यात्रा कम किराए पर हो। तो आप स्वाभाविक तौर पर अवैध प्राइवेट बसों से जाएंगे और अपने आप सरकारी बस घाटे में चली जाएगी।

अब क्या कर रही सरकार
जो सरकार खुलेआम सड़कों पर दौड़ रही इतनी बड़ी बसों को देख नहीं पा रही, इन्हें रोक नहीं पा रही, वह सरकार कैसे बेहद छोटी मात्रा में स्मगलिंग करके लाए जा रहे चिट्टे को पकड़ सकती है? यानी सरकार की इच्छाशक्ति ही नहीं है। पहले तो आरटीओ की भूमिका ही इस मामले में संदिग्ध थी, मगर अब सरकार पर भी लोग प्रश्न उठाने लगे हैं। खासकर हाल ही में जब लग्जरी बसों के किराए भी सरकार ने बढ़ाए तो प्राइवेट बसों की तुलना में उनका किराया बहुत बढ़ गया। इस तरह से ये बसें कॉम्पिटिशन से बाहर हो गई हैं। पांच सौ रुपये का फर्क जनता के लिए मायने रखता है।

लेकिन अवैध बसों को बंद करवाने के बजाय एचआरटीसी की बसों को ही बंद किया जा रहा है। आज ही एक दैनिक समाचार पत्र में परिवहन मंत्री गोविंद सिंह ठाकुर का बयान छपा है, “प्रदेश सरकार उन वॉल्वो बसों को बंद करने जा रही है जो घाटे में चल रही हैं। एसी डीलक्स बसों को भी बंद किया जा रहा है। प्रस्ताव तैयार करने को कहा गया है।”

क्या किया जाना चाहिए
बंद करने के बजाय अवैध बसों पर नकेल कसने के लिए क्यों प्रस्ताव तैयार नहीं किया जा रहा? या एचआरटीसी की बसों को कॉम्पिटिशन में लाने के लिए क्यों प्रस्ताव नहीं लाया जा रहा? और अगर सरकार इस काम में अक्षम है तो बसें चला ही क्यों रही है? और अगर वह अवैध बसों पर नकेल नहीं कस सकती तो कोई ऐसा कानूनी रास्ता क्यों नही निकालती इस सेक्टर में वैध रूप से प्राइवेट बसें चलें और बदले में सरकार को कमाई हो?

जनता को मतलब नहीं कि कौन सी बस वैध, कौन सी अवैध है। वह सुविधाएं देखती है और बचत देखती है। अगर आपको कम पैसे में बड़ी पानी की बोतल, कंबल आदि मिले और दूसरी तरफ ज्यादा पैसे देकर सिर्फ पानी की छोटी बोतल मिले तो आप कौन सी बस में जाएंगे? सरकार को सोचना चाहिए कि कैसे इन बसों को कॉम्पिटिशन में लाना है।

आम जनता के बीच हमेशा से यह चर्चा है कि इस तरह की अवैध बसों को चलने देने के बीछे बहुत बड़ा खेल चलता है और कमाई ऊपर तक जाती है। ऐसे में अगर सरकार प्राइवेट अवैध बसों की ओर आंख मूंदकर बैठी रहेगी और उनके कारण घाटे में जा रही एचआरटीसी की बसों को ही बंद करती रहेगी तो उसकी छवि के लिए यह अच्छी बात तो नहीं है।

चेयरमैन-उपाध्यक्षों की नियुक्तियों में दिखे जयराम के तेवर

इन हिमाचल डेस्क।। लंबे इंतजार के बाद आखिरकार हिमाचल प्रदेश में जयराम सरकार ने बोर्डों और निगमों के उपाध्यक्षों और चेयरमैनों के पदों पर नियुक्तियां करना शुरू कर दिया है। अब तक इस तरह से पार्टी और संगठन से जुड़े 13 लोगों को जिम्मेदारियां दी जा चुकी हैं। इन नियुक्तियों में खास बात यह नजर आ रही है कि सभी जिलों को प्रतिनिधित्व मिला है और साथ ही जिन्हें ये पद मिले हैं, वे सीेम जयराम ठाकुर की ही चॉइस हैं।

जब इन नियुक्तियों में देरी हो रही थी तो चर्चा थी कि जयराम ठाकुर के ऊपर पार्टी के अंदर से कथित रूप से विभिन्न खेमों से दबाव बनाने की कोशिश हो रही है कि फ्लां व्यक्ति को उपाध्यक्ष या चेयरमैन बनाया जाए। मुख्यमंत्री को कार्यभार संभाले एक साल पूरा होने को था, मगर कयास ही लगाए जा रहे थे कि किसे कुर्सी मिलेगी।

मुख्य सचेतक और उप मुख्य सचेतक बनाए जाने के बाद 12 अक्तूबर को सरकार ने रमेश धवाला को स्टेट प्लैनिंग बोर्ड का वाइस-चेयरमैन (कैबिनेट रैंक) बनाया और साथ ही सिरमौर से बलदेव भंडारी को स्टेट एग्रीकल्चर मार्केटिंग बोर्ड का चेयरमैन व चंबा से जय सिंह को एससी एसटी डिवेलपमेंट कॉर्पोरेशन का उपाध्यक्ष बनाया। धवाला को बड़ा पद मिलना तय था मगर बलदेव भंडारी और जय सिंह को पहले पद दिए जाने से एक बात साफ हो गई थी कि जयराम इस बार अलग करने जा रहे हैं।

संगठन में कई बड़े नेता, जो पहले मंत्री थे और इस बार चुनाव हार चुके हैं या जिन्हें टिकट नहीं मिला, वे आस लगाए बैठे थे कि उन्हें प्राथमिकता दी जाएगी और वे कुर्सी के लिए अपने-अपने स्तर से लॉबीइंग और सिफारिश में भी जुटे थे। लेकिन बदलेव भंडारी और जय सिंह को पद देकर जयराम ने साफ संकेत दे दिया था कि वह अपने मन से नियुक्तियां करेंगे और दूर की सोच रखते हुए ऐसे लोगों को मौका देंगे जिन्होंने संगठन में न सिर्फ कड़ी मेहनत की हो बल्कि जो पार्टी की भविष्य की योजना में महत्वपूर्ण कड़ी साबित हों।

इसीलिए बुधवार को जब 10 नए नामों का एलान हुआ, उनमें न तो वे बड़े दिग्गज थे जिनके आगे चुनाव लड़ने की संभावनाएं कम हैं और न ही वे लोग शामिल थे जिनके चुनाव जीतने की संभावनाएं कम हैं। जयराम ठाकुर के कुछ करीबी भी इस लिस्ट में नहीं थे, जिनके नाम मीडिया के कुछ हिस्सों में संभावितों के तौर पर पहले ही प्रकाशित किए जा चुके थे। पहले अक्सर इस तरह की नियुक्तियाँ पसंद और नज़दीकी के हिसाब से की जाती रही हैं मगर जयराम ठाकुर ने उस बार संगठन और क्षेत्रीय संतुलन बनाने पर फोकस रखा है।

किन्हें मिली नियुक्ति?
आबादी के हिसाब से हिमाचल के सबसे बड़े जिले से कांगड़ा से इंदौरा के मनोहर धीमान को जीआईसी का उपाध्यक्ष बनाया गया है। बता दें कि पिछली बार मनोहर धीमान निर्दलीय विधायक थे और मई 2017 में वह भारतीय जनता पार्टी में भी शामिल हो गए थे। वह भारतीय जनता पार्टी से टिकट चाहते थे मगर यहां से बीजेपी ने रीता धीमान को टिकट दिया था।

उस समय मनोहर की लोकप्रियता काफी थी और चुनाव लड़ते तो जीत सकते थे और न भी जीतते तो सीधे बीजेपी उम्मीदवार के टिकट कटते। मगर मनोहर चुनाव से हट गए और बीजेपी की रीता धीमान विधायक चुनी गईं। अब उनके इस त्याग को जयराम ने पहचाना है और उपाध्यक्ष पद से नवाजा है।

विधायक मनोहर धीमान थाम सकते है भाजपा का दामन

इसी तरह से अन्य पदों पर जिन्हें भी नियुक्ति मिली है, वे किसी एक खेमे से संबंध नहीं रखते और अधिकतर गुटबाजी से दूर रहने के लिए पहचाने जाते हैं। दरअसल ये नियुक्तियां इसलिए अहम होती हैं ताकि इनके माध्यम से पद पर बैठे लोग कुछ काम कर सकें और अगले चुनाव के लिए उनके जीतने की संभावनाएं बनें। यानी यह भविष्य के लिए किया जाने वाला निवेश है। इसीलिए जयराम ने इसमें ऐसे लोगों को नहीं चुना, जो भले दिग्गज रहे हों मगर बुरी तरह चुनाव हारे हैं या फिर उनकी छवि ही ऐसी है कि जनता के बीच उनकी स्वीकार्यता बन नहीं पाएगी।

सूत्रों के अनुसार जयराम ठाकुर ने आलाकमान से फ्रीहैंड लेने के बाद ही ये नाम फाइनल किए हैं और इसमें वह किसी अन्य दिग्गज नेता या पदाधिकारी से प्रभावित नहीं हुए हैं। जाहिर है, लोकसभा चुनाव सिर पर हैं और जिन लोगों को अभी तक ओहदे नहीं मिले हैं, उनके नाराज होने का खतरा बना हुआ है। लेकिन इसके बावजूद जयराम ने जिस तरह से ये नियुक्तियां की हैं, इससे संकेत तो मिल रहे हैं कि वह सख्त फैसले लेने लगे हैं। लेकिन वह अपनी ही पार्टी के लोगों के असंतोष और नाराजगी से कैसे निपटेंगे, यह देखना होगा।

हालांकि एक और बात जो देखने को मिली है, वो यह कि उपाध्यक्ष और चेयरमैन चुनने में लगभग सभी जिलों का ध्यान रखा गया है। हमीरपुर से विजय अग्निहोत्री, ऊना से रामकुमार और प्रवीण शर्मा, किन्नौर से सूरत नेगी, शिमला से रूपा शर्मा और गणेश दत्त, काँगड़ा से मनोहर धीमान और रमेश धवाला, सोलन के दर्शन सैनी, चंबा से जय सिंह, सिरमौर से बलदेव तोमर और बलदेव भंडारी, कुल्लू से राम सिंह। हालांकि मुख्यमंत्री के गृहजिले मंडी, बिलासपुर और लाहौल स्पीति से अभी किसी को ओहदा नहीं मिला है।

बोर्डों-निगमों के उपाध्यक्षों की नियुक्ति का दूसरा दौर, 10 को मिली कुर्सी