तो क्या विक्रमादित्य को कांग्रेस कार्यालय हॉली लॉज में खोलने का किराया चाहिए?

ठाकुर वी प्रताप ।। विक्रमादित्य सिंह ने सोशल मीडिया पर एक ट्वीट किया, जिसमें लिखा कि

“हमारे परिवार ने किसी भी टिकट के लिए आवेदन नहीं किया है, ना ही ऐसी कोई महत्वाकांक्षा और लालसा  है, हम हमेशा पार्टी की विचारधारा के साथ खड़े हैं। सन 1977 में जब प्रदेश कार्यालय में ताला लग गया था, उस समय 4 साल पार्टी कार्यालय हमारे निजी निवास हॉली लॉज से चला है। पार्टी आलाकमान जो भी निर्णय लेगी हम उसका सम्मान करेंगे पर धरातल की वास्तविक स्थिति भी हम उन्हें अवगत करवाते रहेंगे। सब चंगा सी वाली बोली हमारी नहीं”

लाल रंगों में रंगी चार लाइनों से कांग्रेस में भीतर के भीतर घमासान मचा है, जो एक-दो दिन में सतह पर आ ही गया। विक्रमादित्य के इस दांव से कांग्रेस चौतरफा घिर रही है। कांग्रेस के एक बड़े नेता ने इस पोस्ट के बाबत कहा कि विक्रमादित्य सिंह उस जमाने की बात कह रहे हैं जब वह पैदा भी नहीं हुए थे।

आखिर वह किस बात का एहसान जता रहे हैं। अगर कांग्रेस पार्टी चार साल वीरभद्र सिंह के आवास से चली है तो वीरभद्र सिंह भी इसी कांग्रेस से छह मर्तबा मुख्यमंत्री रहे हैं और वह देश की राजनीति में छह दशक तक छाए रहे, उसी कांग्रेस की वजह से जिस पर वह एहसान जता रहे हैं।

पूर्व मुख्यमंत्री स्व. वीरभद्र सिंहं का घर हॉली लॉज

वरिष्ठ कांग्रेसी नेता ने तल्ख़ शब्दों में कहा आखिर यह बता कर वह जताना क्या चाहते हैं। वह साफ़-साफ़ कहें. “उस चार साल का” वह और उनका परिवार कितना किराया वसूलना चाहती है। राजा साहब इसी पार्टी से सांसद बने, फिर सीधा मुख्यमंत्री बने, केंद्र में मंत्रीं बने, रानी प्रतिभा सिंह सांसद बनी, विक्रमादित्य स्वयं एमएलए बने और अब खुद को सीएम की गद्दी पर देखना चाहते हैं ।

यह सब हो क्यों रहा है इस पर जरा तफसील से नज़र डालते हैं

प्रदेश में उपचुनाव का बिगुल बज चुका है। सभी दावेदार टाल ठोक रहे हैं। अपने इष्ट आराध्यों की परिक्रमा राजनीति में टिकट हासिल करने का प्रथम मापदंड बन चुका है। बीजेपी में मंथन चल ही रहा है, वहीं पूर्व सीएम राजा वीरभद्र सिंह की पत्नी रानी प्रतिभा सिंह और शिमला ग्रामीण से विधायक विक्रमादित्य सिंह दिल्ली पहुंच गए और आलाकमान से मिले। बाकायदा यह फोटो भी सोशल मीडिया पर साझा की गई।

संदेश साफ़ था कि रामस्वरूप शर्मा के निधन से खाली हुई लोक सभा सीट पर अपनी दावेदारी ठोंक दी गई है । प्रतिभा सिंह मंडी से के एक बार उपचुनाव जीत चुकी हैं, दूसरी उनकी अपनी रियासत भी मंडी लोक सभा के अंतर्गत आती है । दूसरी तरफ उनके समर्थक उन्हें अभी से मंडी में कांग्रेस का अधिकृत प्रत्याशी मान चुके हैं।

बात निकलती है तो दूर तलक जाती है। पिछली मर्तबा 2019 के आम लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे पंडित सुखराम ने अपने पोते को सेट करने के लिए ने अपने बेटे अनिल शर्मा का मंत्री पद तक दांव पर लगा दिया। यह बात अलग है वह सीट मंडी से रिकॉर्ड वोटों से हार गए ।

ये खींचतान में सिर्फ सुखराम और स्वर्गीय वीरभद्र सिंह के बीच रहती तो ठीक था । लेकिन मौके पर चौका मारते हुए बाकी कांग्रेसी नेता भी इस कलह में शामिल हो गए। टिकट को किसी का पुश्तैनी हक मानने के बजाय आलाकमान, नियम और लोकतान्त्रिक प्रक्रिया का हवाला देने लगे।

कांग्रेस पार्टी के जिम्मेदारों का कहना है कि टिकट किसे दिया जाएगा यह आलाकमान तय करेगा। पंजाब की कलह में उलझी पार्टी के लिए सुखराम, विक्रमादित्य और बाकी नेताओं की नूराकश्ती आलाकमान के लिए भी परेशानी सबब बनेगी।

दिल्ली दौरे की नूराकश्ती अभी चल ही रही थी विक्रमादित्य सिंह ने एक बयान दिया है जिसके उतने गंभीर मायने हैं जितना गंभीरता से सोचा  जाए। बकौल विक्रमादित्य…

“हमारे परिवार ने किसी भी टिकट के लिए आवेदन नहीं किया है, ना ही ऐसी कोई महत्वाकांक्षा और लालसा  है, हम हमेशा पार्टी की विचारधारा के साथ खड़े हैं ।

सन 1977 में जब प्रदेश कार्यालय में ताला लग गया था, उस समय 4 साल पार्टी कार्यालय हमारे निजी निवास हॉली लॉज से चला है ।

पार्टी आलाकमान जो भी निर्णय लेगी हम उसका सम्मान करेंगे पर धरातल की वास्तविक स्थिति भी हम उन्हें अवगत करवाते रहेंगे ।

सब चंगा सी वाली बोली हमारी नहीं”

कम शब्दों में भी समझे तो इसका यही मतलब है कि कांग्रेस में सब सही नहीं है, जो आलाकमान को यहां से बताया जा रहा है सच्चाई उसके इतर है। शुरुआत की लाइनों का जो सीधा मतलब यही है कि हमने टिकट नहीं मांगा है और ना मांग रहे। लेकिन किसी को भी टिकट देने से पहले इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि कांग्रेस पर हमारे बहुत एहसान हैं।

जब कांग्रेस ऑफिस में ताला लग गया था तो कोई भी रहनुमा आगे नहीं आया था। आए थे तो राजा वीरभद्र सिंह जिनके घर में कांग्रेस का ऑफिस चला था। लिहाज़ा कोई भी निर्णय लेते समय इस एहसान का ध्यान रखा जाना चाहिए. विक्रमादित्य की यही बात पुराने और कद्दावर कांग्रेसी नेताओं को अखर रही है।

कई नेता इसे विक्रमादित्य द्वारा प्रदेश कांग्रेस और आलाकमान को आईना दिखाने की हरकत बता रहे हैं तो कई लोग उनकी अपरिपक्वता और बचकाना। कुछ सीनियर नेताओं का मानना है कि विक्रमादित्य सिंह का यह बयान उन लाखों कांग्रेसियों और पार्टी के नेताओं की आस्था और समर्पण पर हमला है जो स्वर्गीय राजा वीरभद्र सिंह के पीछे 60 साल तक झंडा लेकर चलते रहे और जयकारे लगाते रहे।

चार साल तक हॉली लॉज में कांग्रेस पार्टी के चलने की बात अब देखो कहां तक जाती हैं यह तो वक़्त ही तय करेगा । लेकिन आलाकमान के मान पर उठ रहे प्रश्नों के बीच कांग्रेस का यह अंतर्कलह न तो कांग्रेस के हित में है न हिमाचल के हित में।

साठ साल से बुशैहर राज परिवार के लिए झंडा उठाने वाले समर्थकों की राजनीतिक अभिलाषाओं पर वसीम बरेलवी का यह शे’र’ और बात ख़त्म…

तुम्हारे राह में मिट्टी के घर नहीं आते

इसलिए तो तुम्हें हम नज़र नहीं आते

मोहब्बत के दिनों की यही खराबी है

ये रूठ जाए तो फिर लौटकर नहीं आते

 ये लेखक के निजी विचार हैं। लेखक से [email protected]gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।