अपने कहे मुताबिक शिमला रूरल से दावेदारी क्यों नहीं छोड़ी विक्रमादित्य ने?

आई.एस. ठाकुर।। खबर पढ़ी कि मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह जी ने कहा है कि सुखराम की ‘याद्दाश्त गुम हो गई है’ और उन्हें पता नहीं चल रहा कि वे क्या बोल रहे हैं (पढ़ें)। यह पढ़कर हैरानी सी हुई क्योंकि पिछले दिनों कई मंचों पर मुख्यमंत्री वीरभद्र बोलते-बोलते अटके हैं और भूल चुके हैं कि आगे क्या बोलना है। कई बार तो वह यही भूल गए कि धूमल से पहले बीजेपी का मुख्यमंत्री कौन था और कई बार यही भूल गए कि वे कितनी बार मुख्यमंत्री रह चुके हैं। इसके वीडियो भी उपलब्ध हैं, जिनमें वे पीछे मौजूद लोगों से मदद लेते दिखे हैं।

 

रही बात बोलने का पता न चलने की, मुख्यमंत्री खुद ऐसे बयान दे चुके हैं जो उन्हें नहीं देने चाहिए थे। फिर वह गुड़िया केस में कोटखाई के लोगों पर की गई टिप्पणी हो, गद्दियों पर कथित टिप्पणी हो, होशियार सिंह मामले में टिप्पणी हो…. ऐसे कई मामलों में वह अंट-शंट बोल चुके हैं और मीडिया में इसके भी सबूत हैं। मगर कमजोर याद्दाश्त की बात आई तो बुजुर्ग मुख्यमंत्री पर ज्यादा कटाक्ष नहीं करना चाहिए। 83 साल की उम्र में और होगा भी क्या। चिंता तो उनके युवा बेटे विक्रमादित्य को लेकर है, जो कुछ ही दिन पुरानी बात भूल गए।

 

यह तो किसी से छिपा नहीं है कि भारत की राजनीति में परिवारवाद का आदर्श उदाहरण देखना हो तो आजकल शिमला का रुख करना चाहिए, जहां पिता (वीरभद्र सिंह) ने अपनी सीट अपने बेटे (विक्रमादित्य) को टिकट देने के लिए छोड़ दी। मगर अफसोस, टिकट है कि फाइनल होने में कई दिन का वक्त लग गया। अब खबर आ रही है कि हाईकमान से हरी झंडी मिल गई है। होना ही था, आखिरकार मुख्यमंत्री के बेटे जो ठहरे। मगर मैं विक्रमादित्य को याद दिलाना चाहता हूं उनका वह बयान, जिसमें उन्होंने कहा था- एक परिवार से एक ही व्यक्ति को टिकट मिलना चाहिए(पढ़ें)।

 

जब मीडिया में ये खबर छाई कि विक्रमादित्य एक परिवार से एक टिकट की हिमायत कर रहे हैं, तब कांग्रेस के ही मंत्री कौल सिंह ठाकुर ने व्यंग्य किया था- क्या विक्रमादित्य ने अपने पापा से पूछकर यह बयान दिया है(पढ़ें)। इसके बाद मुख्यमंत्री वीरभद्र ने कहा था कि कांग्रेस में एक परिवार एक टिकट जैसी कोई पॉलिसी नहीं है। मगर दोबारा विक्रमादित्य, जिन्हें कुछ लोग ‘टीका’ कहते हैं, तो ‘टीका’ ने टिप्पणी की कि मैं अभी भी अपनी बात पर कायम हूं।

 

उस वक्त लगा होगा कि कोई तो आया जो राजनीति में बदलाव की बात करता है। मगर ‘टीका’ की टिप्पणी की पोल तब खुल गई, जब वीरभद्र अर्की से चुनाव लड़ने जा रहे हैं। राजनीति में जुबान का बड़ा महत्व होता है। उम्मीद थी कि विक्रमादित्य अपनी जुबान का मान रखेंगे और कहेंगे, मैं अपनी बात पर कायम हूूं और चूंकि मेरे पापा को टिकट मिल गया, मैं शिमला रूरल से अपना दावा छोड़ता हूं।

 

मगर ऐसा हुआ क्या? वैसे चुनाव से पहले युवाओं को ज्यादा से ज्यादा टिकट देने का ऐलान भी इन्हीं जनाब ने किया था। उस वक्त ऐसा लग रहा था जैसे टिकट आवंटन खुद ही करेंगे। मगर कहीं पर 90 साल के बुजुर्ग चुनाव में उतर रहे हैं, कहीं 83 तो कहीं पर 80 साल के। अब कांग्रेस के लिए युवाओं की परिभाषा 75 साल पार हो तो अलग बात है। क्योंकि अधिकरत सीटों पर बुजुर्ग नेताओं को टिकट दिए गए हैं।

 

शायद विक्रमादित्य अपनी दोनों बातें भूल गए हैं। वन फैमिली, वन टिकट भी गायब हो गया और युवाओं को टिकट भी नहीं मिल रहे। प्लीज़, यह घिटा-पिटा डायलॉग न मारना कि पार्टी का फैसला है। हम जैसे लोगों तो विक्रमादित्य ने बहुत निराश किया है, जिन्हें लगता था कि वह शायद बाकी नेताओं से अलग हैं। ऐसे में लगता है कि मुख्यमंत्री जी को सुखराम के बजाय विक्रमादित्य की याद्दाश्त की और ‘क्या बोलना है क्या नहीं’ की चिंता करनी चाहिए। क्योंकि अभी वह युवा हैं और उनके सामने लंबा भविष्य पड़ा है।

(लेखक मूलत: हिमाचल प्रदेश के हैं और पिछले कुछ वर्षों से आयरलैंड में रह रहे हैं। उनसे kalamkasipahi @ gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

DISCLAIMER: ये लेखक के निजी विचार हैं।

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