‘स्टेटहुड, मारो ठुड’ नारे लगते रहे, परमार हिमाचल को पूर्ण राज्य बनवा लाए

डॉक्टर वाई. एस. परमार की जयंती पर पढ़िए वरिष्ठ बीजेपी नेता मोहिंदर नाथ सोफत का आलेख उनके फेसबुक पेज से साभार।

हिमाचल निर्माता और प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री स्वर्गीय डाँक्टर वाई एस परमार जी का जन्म दिन है। डा साहिब उन दिनों राजनीति मे थे जब राजनीति एक समाज सेवा का माध्यम था न की कोई पेशा। वह एक दूरदर्शी नेता थे। आज जो हिमाचल का स्वरूप है वास्तव मे उन्ही की देन है। इसी लिए उन्हे हिमाचल निर्माता के तौर पर जाना जाता है।

मुझे स्मरण है कि जब वह पूर्ण राज्य की लड़ाई लड़ रहे थे उस समय कर्मचारी अन्दोलन चल रहा था। कर्मचारियों को लगता था कि यदि हिमाचल को पूर्ण राज्य का दर्जा मिल गया तो हिमाचल का अपना वेतन आयोग होगा इसलिए सारे हिमाचल मे यह नारा गूंज रहा था “स्टेट हूड मारो ठूड”। कर्मचारी अपने से आगे नहीं सोच पा रहे थे।

डॉक्टर परमार की नजर प्रदेश के भविष्य की ओर थी। डा साहिब अति स्वाभिमानी व्यक्ति थे। जब कांग्रेस मे संजय गांधी जी का दौर था और बडे बडे प्रदेशों के मुख्यमंत्री उनके आगे नतमस्तक हो रहे थे। यहां तक खबरें छपी कि एक बडे प्रदेश के मुख्यमंत्री ने तत्कालीन प्रधानमंत्री के सपुत्र और उस समय के यूथ कांग्रेस के बेताज बादशाह की चप्पल उठाने मे भी गुरेज नहीं किया था। परन्तु इस देव भूमि के मुख्यमंत्री और नेता ने अपने पद की गरिमा से कभी समझौता नहीं किया।

उन दिनों यह चर्चा आम थी कि संजय गांधी जी जिनके सत्ता का नशा सिर चढ़ कर बोल रहा था वह अपने कसौली दौरे के दौरान किसी बात को लेकर डा परमार से नाराज हो गए थे। उनकी नाराजगी की परिणीति हिमाचल मे नेतृत्व परिवर्तन के साथ हुई । परमार जी को दिल्ली बुला का त्याग पत्र मांग लिया गया और श्री रामलाल ठाकुर जी को हिमाचल का मुख्यमंत्री बना दिया गया।

उस समय डा साहिब के पास शिमला मे अपना घर नही था और वह त्यागपत्र दे कर अपने पुशतैनी घर बागथन चले गए। संजय दौर मे मुख्यमंत्री के पद की गरिमा बचाते हुए भले ही उन्होंने अपना मुख्यमंत्री का पद खो दिया हो परन्तु मुख्यमंत्री के पद की गरिमा और हिमाचल का सम्मान बचाने मे सफलता हासिल की थी। वह ऐसे नेता थे कि न उनके पास शिमला मे अपना घर था और न ही अपनी गाड़ी थी हालांकि वह18 वर्ष तक हिमाचल के मुख्यमंत्री रहे थे।

मुझे याद है कि डा साहिब बागथन– सोलन बस मे पहली सीट पर बैठ कर आया जाया करते थे।उन दिनों फ्रंट सीट विधायक के लिए सुरक्षित होती थी। आज इस बात पर कोई नौजवान विश्वास करने को तैयार नहीं होगा। आज जब राजनीति सेवा का माध्यम न हो कर व्यपार का माध्यम बन चुका है।

ऐसे मे डा परमार की जीवनी पर आने वाले समय मे विश्वास करना कठिन होगा। उनका स्वभाव, व्यवहार, कार्यशैली और निर्णय सब हिमाचल की संस्कृति से पुरी तरह मेल खाते थे। मेरा ऐसी पुन्य आत्मा को शत-शत नमन।

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