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सीएम सुक्खू के वादे को पूरा करने के लिए अच्छा है हिमाचल के लिए RDG बंद होना

सुखविंदर सिंह सुक्खू (पीटीआई)

इन हिमाचल डेस्क।। हिमाचल प्रदेश को मिलने वाली रेवेन्यु डेफिसिट ग्रांट यानी आरडीजी (राजस्व अनुदान घाटा) को बंद किए जाने को एक नकारात्मक क़दम के तौर पर दिखाया जा रहा है। कुछ लोग, सोशल मीडिया इन्फ़्लुएंसर और यहां तक कि मुख्यमंत्री भी ये कह रहे हैं कि हिमाचल जंगलों और नदियों की रक्षा करता है, इसलिए उसे उसका जायज़ मुआवज़ा नहीं दिया जा रहा।

ये तर्क भ्रामक है। इन हिमाचल पहले भी कहता रहा है कि ग्रीन बोनस एक अलग और जायज़ मांग है। जंगलों, ज़मीन और नदियों की हिफ़ाज़त के लिए मुआवज़ा मिलना चाहिए और इस मुद्दे पर अलग से चर्चा होनी चाहिए। मगर इसे आरडीजी से तो बिल्कुल नहीं जोड़ा जाना चाहिए। ग्रीन बोनस को आरडीजी से जोड़ना, आरडीजी के असली मक़सद को नज़रअंदाज़ करने जैसा है।

यह स्पष्ट बात है कि आरडीजी कोई स्थायी अधिकार नहीं है। ये फ़ाइनैंस कमीशन की सिफ़ारिश पर दी जाने वाली एक ऐसी टेंपपरी एड या अस्थायी वित्तीय मदद है, जिसका मकसद ये है कि वक्त के साथ राज्य अपने रेवेन्यु डेफ़िसिट या वित्तीय घाटे को कम करें और फिर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनें। यानी वो अपने खर्चे अपनी कमाई से पूरा कर सके।

हिमाचल प्रदेश के मामले में समस्या आरडीजी के बंद होने की नहीं है, बल्कि इस बात की है कि सरकारी पैसा कैसे खर्च किया जा रहा है। राज्य की अपनी कमाई के हर एक रुपये में से 60 पैसे से ज़्यादा पहले ही सरकारी सैलरी और पेंशन में चला जाता है। इस असंतुलन को ठीक करने के बजाय वर्तमान सरकार ने ओल्ड पेंशन स्कीम दोबारा लागू कर दी, जिससे लंबे समय का वित्तीय बोझ काफ़ी बढ़ गया। यानी आगे चलकर और ज्यादा रकम पेंशन पर खर्च होन वाली है।

अभी ही हिमाचल प्रदेश का रेवेन्यु डेफडिसिट और कर्ज चिंताजनक हालत में है। ऊफर से दिक्कत ये है कि हिमाचल प्रदेश की आर्थिक दशा क्या है, उसे सुधारने के लिए सरकार के पास क्या योजनाए हैं, इसकी साफ़ और पारदर्शी जानकारी अब भी सामने नहीं है। ऐसे में आरडीजी खत्म करने के लिए केंद्र पर भेदभाव का आरोप लागना प्रदेश की वित्तीय समस्याओं से ध्यान भटकाने जैसा है।

ये बात भी समझनी ज़रूरी है कि भारत सरकार ने हिमाचल प्रदेश को मदद देना पूरी तरह बंद नहीं किया है। वेल्फ़ेयर स्कीम, इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट और डिज़ास्टर रिलीफ़ वगैरह के ज़रिये मदद जारी रहेगी। इन चीज़ों से राज्य की आर्थिक क्षमता बढ़ती है। जबकि आरडीजी देने का मकसद होता है- रोज़मर्रा के खर्च चलाने में मदद करना।

मगर जब राज्य सरकार मेडिकल डिवाइस पार्क जैसे पैकेज, जिनके बनने से आगे चलकर हिमाचल में रोजगार और राजस्व दोनों बढ़ना है, उसकी रकम केंद्र को यह कहकर लौटा दे कि हम उद्योगों को सस्ती जमीन न देकर खुद यहां ये पार्क बनाएंगे और फिर प्रॉजेक्ट को खटाई में डाल देंगे तो मतलब है कि राज्य केंद्र की मदद नहीं चाहता।

इसके अलावा, वही राज्य अगर बार-बार होने अपना खर्च बढ़ाता जाए और साथ ही डेफ़िसिट ग्रांट्स पर निर्भर रहने की बात करे, तो उससे एक सवाल किया जाना चाहिए-  मसला पैसों की कमी का है या वित्तीय अनुशासन का?

जब किसी राज्य से ये उम्मीद हो कि वो अपने रोज़मर्रा के खर्च खुद संभाल सकता है, तब आरडीजी को जारी रखना इसके मक़सद के ख़िलाफ़ है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू बार-बार कह चुके हैं कि 2027 तक हिमाचल प्रदेश आत्मनिर्भर बन जाएगा। कुछ दिन पहले भी उन्होंने यही दावा मंच से किया था। फिर जब ये समय-सीमा क़रीब आ रही है, तो उम्मीद सीधी है कि रोज़मर्रा के खर्च धीरे-धीरे हिमाचल की अपनी कमाई से पूरे किए जाएंगे।

इस नज़र से देखें, तो आरडीजी का खत्म होना कोई सज़ा नहीं है। ये तो राज्य और उसके मुखिया के प्रदेश को आत्मनिर्भर बनाने के दावे की एक परीक्षा है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू की उनके शब्दों में नीति रही है कि वो fiscal prudence या राजकोषीय विवेक अपनाएंगे।

इस मामले में उनका केंद्र को कोसना जनता से सहानुभूति नहीं ला पाएगा क्योंकि लोग देख रहे हैं कि पहले कैसे उन्होंने सीपीएस बनाए और अब असंख्य विधायकों और गैर विधायकों को कैबिनेट रैंक दिए हुए हैं। जनता यह भी देख रही है कि कैसे रिटायर्ड अधिकारी पुनर्नियुक्त किए जा रहे हैं। भविष्य के लिए ओपीएस का बोझ डाल गए हैं अलग।

अगर पहले वह इन सब गैर जरूरी नियुक्तियों और खर्चों को खत्म कर fiscal prudence दिखाएंगे, तब जरूर वह कह पाएंगे कि आरडीसी बंद होना हिमाचल के साथ अन्याय है। वरना उनका जंगलों और नदियों को बचाने के दावे करना भी बेमतलब है क्योंकि पूरे प्रदेश ने देखा है कि कैसे हरे पेड़ काटे गए। इसी तरह, कचरे के निपटारे की व्यवस्था न होने से सारी गंदगी नदियों में पहुंच रही है।

बहरहाल, जल्द ही वह प्रदेश का बजट पेश करेंगे। उसमें पता चलेगा कि 2027 तक प्रदेश को आत्मनिर्भर बनाने (अपनी कमाई से खर्च चलाने) का जो लक्ष्य उन्होंने रखा था, उसे पूरा कर पाएंगे या बीते सालों की तरह ही अपनी विफलताओं के लिए पिछली सरकार को कोसते रहेंगे। ठीक उसी तरह, जैसे केंद्र में बीजेपी सरकार पिछली कांग्रेस सरकारों को कोसती रहती है।

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