उस दौर में ऐसे थे हिमाचल के नेता और लोग, मगर आज…

डॉ. आशीष नड्डा।।  साल 2009 के आसपास की बात है। लोकसभा के चुनाव का दौर चला था। ज़िला हमीरपुर के किसी गाँव में व्यक्तिगत कार्य हेतु मैं गया था। शाम का झुरमुरा अंधेरा था, घर पहुँचने की जल्दी थी पर मोटरसाइकिल का टायर जबाब दे गया। यह बहुत बुरा अनुभव था, एक तो मैं अकेला था ऊपर से पंक्चर ठीक करने का बंदोबस्त लगभग तीन किलोमीटर था, वो भी खड़ी चढ़ाई को पार करते हुए।

ख़ैर काफी हिम्मत का प्रदर्शन करते हुए मैं वहां पहुँच गया। पंक्चर ठीक करने वाला अपने काम में मशगूल हो गया और मैं उसकी दुकान के साथ चबूतरे पर बैठे 65 -70 साल के बुजुर्गों की चुनावी चर्चा को सुनने लगा। उन लोगों की चर्चा चलते-चलते आजकल के नेताओं और पुराने नेताओं के बीच की तुलना पर पहुँच गई। एक सत्तर साल का बुजुर्ग इसी चर्चा को आगे बढाते हुए एक किस्सा सुनाने लगा।

जिस जगह पर मैं पंक्चर ठीक करवा रहा था, उस इलाके में कोई लम्बरदार (नंबरदार) रहा होगा बूढा। उसी लम्बरदार और उधर के किसी नेता के बीच घटित किस्से को सुनाने लगा। बूढ़ा कहने लगा कि इस इलाके में जो नीचे खड्ड है, वहां पहले पुल नहीं होता था। लोग खड्ड के पानी में बीच बीच में बड़े बड़े पत्थर रखकर उनके ऊपर से निकलकर इसे पर किया करते थे। हर बरसात उन पत्थरों को बहा कर ले जाती और नए पत्थर वहां रखने पड़ते। जिस दिन बारिश हो जाती, उस दिन इस इलाके के बच्चे स्कूल नहीँ जाते थे क्योंकि जो स्कूल था वो खड्ड के पार किसी दूसरे गाँव में था।

यह पूरे इलाके के लिए चिंता का विषय था और बच्चों के भविष्य के लिए और भी ज्यादा भारी बरसातों में कई कई दिन तक बच्चे स्कूल नहीं जा पाते थे। सरकारों को कई बार पत्र लिखे गए कई बार नेता लोगों से मांग की गई पर कुछ बन नहीँ पा रहा था। अब यह तो 1970 -1980 के दशक का हिमाचल था जब मेन रोड ही पूरे नहीं बने थे तो गाँवों की सड़कों की ओर भला कौन देखता।

हमीरपुर से उस समय एक बहुत दिग्गज नेता का राज्य राजनीति में उदय हुआ था। बूढ़ा बता रहा था की हमारे लंबरदार की उन नेता के साथ गहरी दोस्ती थी। वैसे कहाँ कोई विधायक-मंत्री और कहाँ लम्बरदार मगर दोस्ती थी तो थी। हिमाचल में 1977 के चुनाव के बाद यह नेताजी मंत्री बन गए। लम्बरदार ने गाँव में कहा कि इस बार हम यह पुल बनवा देंगे, मंत्री जी हमारे परम मित्र हैं।

सांकेतिक तस्वीर

हालाँकि लम्बरदार की विधानसभा अलग थी और माननीय नेता जी कहीं और से चुनाव लड़ते थे। लंबरदार सुबह के समय गाँव से हमीरपुर (नेता जी के घर) के लिए छड़ी लेकर निकल गया। कोई 30 -35 किलोमीटर का रास्ता था परिवहन के साधन भी इतने नही थे न पुराने लोगों को पैदल चलने में परेशानी होती थी। लिफ्ट मांगते हुए या जैसे भी उन्होंने सफर किया।

तड़के निकलकर दोपहर तक लम्बरदार हमीरपुर में अपने मित्र नेता के घर पहुँच गया। लम्बरदार मंत्री के घर पहुंचा अक्खड़ ग्रामीण स्वभाव। आँगन में कोई स्टाफ मिला तो सीधे नेता का नाम लिया और स्टाफ को हुक्म किया जाके मंत्री को बोल दो फलाना राम लम्बरदार आया है। नेता जी बाहर आये गले लगे। लम्बरदार ने न मंत्री बनने की बधाई दी न कुछ बस हाल चाल पूछा।

नेता: चल खाने का समय हो रहा है खाना खा ले
लम्बरदार: नहीं मैं किसी काम से आया हूं पहले वो कर लेते हैं।

नेता: अरे काम हो जाएगा इतनी दूर से पैदल आया है पहले खाना खा लेते हैं।
लम्बरदार: नहीं, पहले काम फिर भोजन।

हारकर मंत्री जी बोले चल काम ही बता दे। लम्बरदार ने तपाक से सारी समस्या सामने रख दी कि ‘गांव की खड्ड में पुल नहीँ है, लगभग 6 पंचायतों के बच्चे स्कूल जाते हैं, बरसात में बहने का डर बना रहता है। इसलिए पुल बनवा दो।’ मंत्री जी ने कुछ देर सोचा और कहा- हाँ करता हूँ कुछ पर तू खाना खा ले अब। लम्बरदार का खून फिर उबाल मार गया बोला- सोचना नहीं है, खाना बाद में। या हाँ कर अभी या मना कर।

मंत्री साब मनाते रहे पर वो नहीं माना। उन्होंने कहा शिमला जा के मुझे अधिकारियों से पता करना होगा ये करना होगा पर लम्बरदार हाँ या ना के फैसले पर अड़ा रहा। आखिरकर मंत्री जी ने भेद खोल दिया और कहा देख लम्बरदार बात ऐसी है कf इस बार बजट में ज़िला हमीरपुर के ग्रामीण एरिया को एक ही पुल सैंक्शन हो पाया है और वो मैंने अपने पैतृक इलाके के लिए सैंक्शन करवाया है> वहां भी यही समस्या और हजारों की जनता को है।

ये उस दौर की बात है जब हिमाचल सरकार के पास ज्यादा बजट होता नहीं था और कर्ज लेकर काम करने की नेताओं को आदत नहीं थी।  बहरहास, मंत्री जी ने कहा कि अगली बार तेरा ही काम होगा, यह मैं आज ही वचन देता हूँ। लम्बरदार बोला मैं समझ गया, तूने वोट तो अपनी सीट से लेने हैं, हमारा इलाका दूसरी सीट में हैं। फिर तूने हमारे काम क्यों करने? कर तूने अपना वोट बैंक पक्का करना।”

नेता जी समझाते रहे मजबूरियां गिनाते रहे। कभी राजनीति प्रशासनिक भाषा में कभी दोस्ती की भाषा में पर लम्बरदार नहीँ माना। छड़ी उठाकर बिना भोजन किये वापिस गाँव के सफर के लिए निकल गया।

बूढ़ा किस्सा सुनाते हुए आगे कहता है कि दो तीन दिन तक लम्बरदार ने गाँव में किसी से बात ही नहीँ की। न किसी को बताया कि पुल के लिए हाँ हुई या न हुई। तीन दिन बाद किसी ने गांव में बताया कि नीचे खड्ड के पास सरकारी जीप खड़ी है और कुछ नाप नपाई का काम कर रहे हैं। सारा गाँव, बच्चा-बच्चा खड्ड की तरफ दौड़ गया। लम्बरदार भी घर से निकला।

नाप-नपाई कर रहे लोगों को देख पूरा गांव जुट गया था (सांकेतिक चित्र)

गावँ में कोई नई चीज होती है तो ऐसा ही माहौल होता है। मैंने खुद देखा है हैंडपंप लगाने की मशीन बिलासपुर में एक गाँव में आई तो बड़े बुजुर्गों के साथ गाँव का बच्चा बच्चा वहीँ खड़ा रहा। लोग खाना खाने घर जाते और फिर वापिस मशीन के मुहाने खड़े हो जाते। ऐसा नहीं है कि उन्होंने मशीन नहीं देखी थी। वो मशीन को लेकर उत्सुक नहीं थे, वे अपनी गांव की जमीन से निकलने वाली पानी की पहली जलधारा के साक्षी बनना चाहते थे। वो जलधारा जोपेयजल की उनकी बरसों से चली आ रही समस्या का एक समाधान होती।

जब आज के दौर में भी गांवों में ऐसा माहौल है तो 70 के दशक के आखिर में सरकारी जीप के खड्ड किनारे पहुंचने और अधिकारियों के नाप-नपाई करने पर क्या माहौल रहा होगा, आप सोच सकते हैं। बहरहाल, वापस लौटते हैं लंबरदार की ओर। तो सब लोग खड्ड किनारे देखकर खड़े रहे, अधिकारी काम करते रहे। न लोग पूछ रहे कि क्या हो रहा, न अधिकारी बता रहे। लम्बरदार के पहुँचने पर दोनों पक्षों की खामोशी टूटी। अपने रौबदार परिचय के साथ लम्बरदार ने पूछा कि आप लोग यहाँ क्या नाम रहे हैं और कौन हैं। तब पता चला कि वो PWD विभाग के SDO हैं और यहाँ पुल बनाना है, उसकी नाप नपाई के लिए आए हैं मंत्रीं साब के आदेश पर।

लम्बरदार ने कहा- मैं राजनीति जानता हूँ, पुल पता नहीं कब बनेगा। आप आ गए नाप-नपाई करने बिना बजट के। इस पूरे साल जिले के लिए एक ही पुल मिला है ग्रामीण एरिया के लिए तो हमारे गांव में कैसे बन जाएगा? अधिकारी ने जबाब दिया-  आप ठीक बोल रहे हैं। पुल एक ही है। मंत्री जी का आदेश है कि वो उनके इलाके में नहीं, अब यहां बनेगा। मंत्री जी के इलाके का पुल अगले बजट में देखा जाएगा।

इस कहानी का यह हिस्सा सुनकर मैं हैरान रह गया। यह काल्पनिक कहानी नहीं थी, 1977 के आसपास की बात थी। मैं 2009 में इसे सुन रहा था। मैं उस दौर का व्यक्ति हूँ जिस दौर में राजनीति यहाँ तक चली गयी है कि मंत्री चाहते हैं कि सारा विकास उनके इलाके में हो जाए, भले खड्ड के बीच में इमारतें बना दी जाएं और भले वे अगली बरसात में बह जाएं। यहां मंत्री होते तो राज्य के हैं, मगर अपने मंत्रालय की योजनाओं का फायदा प्रदेश को नहीं, अपने चुनाव क्षेत्र को ही देने की सोचते हैं। आज वो दौर है जब सरकारें अपनी पार्टी के विधायक को सगा और विपक्षी विधायक को सौतेला समझती हैं।

वो महान नेता, जिन्होंने एकमात्र सैंक्शन पुल अपनी विधानसभा छोड़कर दूसरी विधानसभा को दे दिया था, उनका नाम था- “ठाकुर जगदेव चन्द।”

ठाकुर जगदेव

यह कहानी यहीं खत्म नहीं है। आगे भी सुनाई गई। बूढ़े ने बताया कि बरसों बाद 1993 में ठाकुर जगदेव चन्द की जब अचानक मृत्यु हुई तो अंतिम संस्कार पर लकड़ी डालने इस इलाके से बहुत लोग गए। बूढ़े ने कहा- मैं भी लम्बरदार के साथ गया था। कफ़न डालने (हिमाचल में मृतकों पर कपड़ा डालने की परंपरा है) की जब बारी आई तो दिसम्बर की कड़कड़ती ठण्ड में लम्बरदार ने कफन की जगह अपनी ओढी हुई शॉल ठाकुर जगदेव के पार्थिव शरीर पर कफ़न की जगह डाली थी। बूढ़े ने बताया कि ठाकुर जगदेव की मृत्यु के ठीक सात दिन 1993 में ही उनके दोस्त लम्बरदार ने भी प्राण त्याग दिए थे ।

प्रतीकात्मक तस्वीर

इस बातचीत ने भावुक कर दिया था। इस बीच तक पंक्चर ठीक हो चुका था। वर्तमान दौर के नेताओं और उस समय के राजनेताओं के बीच की तुलना करते हुए मैं मोटरसाइकिल पर किक मारकर घर की ऒर चल पड़ा। संयोग से मुझे उसी पुल के ऊपर से गुजरना था, जिसकी यह कहानी थी। उस दिन से पहले भी मैं कई बार उस पुल के ऊपर से गुजरा था। मगर इस बात से मैं अनिभज्ञ था कि यह मात्र एक कंक्रीट और पत्थर से बना स्ट्रक्चर नहीँ बल्कि त्याग और दोस्ती की कहानी का एक प्रतीक है।

मैंने मोटरसाइकिल रोककर पट्टिका को देखना चाहा पर सब कुछ मिट चुका था। हमीरपुर बिलासपुर हाइवे पर उखली स्थान हैं वहां से बाबा बालकनाथ मंदिर दियोटसिद्ध को रास्ता कटता है। उसी लिंक रोड पर थोड़ा आगे जाकर जंगल के बीचोबीच खड्ड पर यह पुल है। 2009 के बाद 2011 में जब मैंने इस किस्से को अपनी डायरी में उतारा तब मैं ठाकुर जगदेव चन्द के पैतृक इलाके पटलांदर गया और कहानी को तारीखों से पुख्ता करने लिए उस पुल पट्टिका पढ़ के आया जो पुल ठाकुर जगदेव चन्द को अपने पैतृक इलाके में पुंघ खड्ड के ऊपर बनवाना था जो फिर कहीं बाद में बना।

1977 से 1993 तक ठाकुर जगदेव चन्द ने हमीरपुर सीट से कोई चुनाव नहीँ हारा। 1993 में बाबरी विध्वंस के बाद हुए चुनावों में शांता कुमार सरकार भी गिर गई शांता कुमार सिटिंग सीएम होते हुए भी चुनाव हार गए। उस समय भी ठाकुर जगदेव चंद लगातार पांचवीं बार जीतकर विधानसभा पहुंचे। परंतु चुनाव की जीत के कुछ दिनों बाद ही उनका दिल का दौर पड़ने से अल्पायु लगभग 62 वर्ष की उम्र में स्वर्गवास हो गया।

कहते हैं कि ठाकुर जगदेव चन्द जिन्दा होते तो तो बीजेपी की राजनीति कुछ अलग होती। हालाँकि मैं इसपर नहीं जाता हूँ। ठाकुर जगदेव क्या होते, क्या न होते वो अलग बात है पर वो क्या थे यह बहुत महत्वपूर्ण है। ऐसे भाव वाले नेता (किसी भी पार्टी के) हमारे राज्य को मिले इसीलिए हिमाचल पहाड़ी राज्य होने के बावजूद मुलभुत सुविधायों पेयजल सड़क बिजली के मामले में बड़े राज्यों को टक्कर देता है।

यह किस्सा 2011 में मैंने डायरी पर लिखा था लिखा था परंतु इसे सार्वजानिक प्लैटफॉर्म पर रखने के पीछे उम्मीद यह है कि वर्तमान राजनीति में भी प्रदेश को पार्टीबाजी से ऊपर ऐसे रत्न मिलते रहें।

(लेखक वर्ल्ड बैंक से जुड़े हैं। हिमाचल प्रदेश से जुड़े विषयों पर लिखते रहते हैं। उनसे aashishnadda @ gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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