यशपाल: भगत सिंह का वो ‘हिमाचली’ साथी, जिसे हमने भुला दिया

बदलती तारीख के साथ शायद ही कोई ऐसा दिन गुजरता हो, जिस दिन इस महान राष्ट्र हिन्द की धरती पर किसी महान आत्मा ने जन्म न लिया हो। आज तीन दिसम्बर की ही बात करें तो स्वतंत्रता सेनानी एवं भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की जयंती हैं। डॉ. प्रसाद को तो बच्चा बच्चा जानता है और शायद औपचारिकता के लिए ही सही, गाहे बगाहे उन्हें याद भी किया जाता है। परन्तु आज ऐसी ही एक और महान विभूति का जन्मदिन है जिसे राष्ट्र ने तो भुला ही दिया, उसके प्रदेश में भी याद करना तो दूर उसके बारे में जानने वाले भी चंद ही लोग होंगे। नई पीढ़ी ने तो कमोबेश नाम भी न सुना हो शायद। भगत सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद का हिमाचली साथी जो बम बंनाने में एक्सपर्ट था।

3 दिसम्बर 1903 को तात्कालिक कांगड़ा के भूम्पल गाँव (वर्तमान हमीरपुर तहसील नादौन) में जन्मे उस क्रांतिकारी का नाम था-यशपाल। “

वो “यशपाल” जिन्होंने भगत सिंह चन्द्रशेखर आज़ाद, राजगुरु और सुखदेव जैसे महान क्रांतिकारियों के साथ जंग-ए-आजादी में अपना योगदान दिया। भूम्पल गाँव में अत्यंत गरीब घर में पैदा हए यशपाल के सर से पिता का साया बहुत जल्दी उठ गया था। पढ़ने के लिए उनकी गरीब माँ ने उन्हें बचपन में ही आर्य समाज द्वारा मुफ्त चलाए जाने वाले गुरुकुल हरिद्वार में भेज दिया।

बचपन से ही बच्चा यशपाल सोचता था कि भारत को गुलामी की बेड़ियों से कैसे आजाद करवाया जाए। इसी बात की जब वो सहपाठियों से चर्चा करता तो उसकी गरीबी का मजाक उड़ाया जाता। आखिर यशपाल ने एक बार बुरी तरह बीमार हो जाने के बाद गुरुकुल छोड़ दिया और उनकी माँ उन्हें लेकर लाहौर चली आईं।

लाहौर शहर उस समय पंजाब की राजधानी और शिक्षा का बहुत बड़ा हब था। मिडल स्कूल की पढ़ाई लाहौर से करने के बाद यशपाल ने हाई स्कूल की पढ़ाई फिरोजपुर से की। 17 साल का किशोर यशपाल अब महात्मा गांधी का फॉलोवर बनकर स्वतन्त्र संग्राम में अपने योगदान के लिए व्याकुल हो चला था।

गांधी जी के असहयोग आंदोलन के सन्देश को गाँव गाँव में पहुँचाने का काम यशपाल ने शुरू कर दिया था। यहाँ तक की मेट्रिक फर्स्ट क्लास करने के बाद सरकार की तरफ से सरकारी कालेज में पढ़ने हेतु स्कॉलरशिप मिल सकती थी, वो भी यशपाल ने ठुकरा दी और खुद फीस देकर नेशनल कालेज लाहौर में दाखिला ले लिया। नेशनल कालेज लाहौर आर्य समाज से सबंधित था और स्वतंत्रता सेनानी लाला लाजपत राय ने इसकी स्थापना की थी।

यह वो कालेज था जहाँ यशपाल की मुलाकात भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव थापर सरीखे नौजवानों से हुई। यही कालेज पंजाब में क्रंतिकारियों का अड्डा बना। आजादी के लिए मतवाले ये नौजावन यहाँ क्रांति और क्रांतिकारियों के इतिहास से भरी किताबें पढ़ते और आपस में भारत को आजाद करवाने के एजेंडे पर चर्चा करते। यहीं भगत सिंह ने 1928 में स्थापना कर दी Hindustan Socialist Republican Association (HSRA) की। यशपाल भी इसी का हिस्सा हो गए।

भगत सिंह राजगुरु और सुखदेव आजाद सरीखे लोग सामने काम करते वहीँ यशपाल परदे के पीछे HSRA को सपोर्ट करते। यशपाल बम एक्सपर्ट के रूप में HSRA के बीच प्रसिद्ध हो गए। 1अप्रैल 1929 को गुप्त रूप से लाहौर में चल रही बम बनाने की फैक्ट्री पर जब ब्रिटिश पुलिस की रेड पड़ी तो यशपाल लाहौर से भूमिगत होकर हिमाचल में अपने पैतृक इलाके कांगड़ा में आ गए।

ऐसे छुपकर काम नही चलेगा, संगठन को फिर इकट्ठा करना पड़ेगा, यह सोच मन में लेकर यशपाल जून 1929 को फिर लाहौर पहुँच गए। यशपाल लाहौर तो पहुंचे पर क्रांतिकारियों का कारवाँ बिछड़ चुका था। भगत और सुखदेव अरेस्ट हो चुके थे अन्य साथियों (जो फ्री थे) के पते यशपाल के पास नहीं थे। ये पते दे सकता था जेल में बंद सुखदेव। यशपाल वकील बनकर जेल में सुखदेव से मिले और कुछ लोगों के पते मालूम किए।

परन्तु जब तक वो उन पतों से साथियों को इक्कठा कर पाते, पुलिस ने सहारनपुर में स्थित HSRA की दूसरी बम बनाने के कारखाने पर भी रेड कर दी और HSRA से जुड़े लोग पकड़े गए। उनमें से कुछ ब्रिटिश पुलिस के मुखबिर बन गए।

यशपाल ने तब अपने ही दम पर आगे बढ़ने का विचार किया। 23 दिसम्बर 1929 को लॉर्ड इरविन को ले जा रही ट्रेन में विस्फोट हुआ। यह बम धमाका यशपाल ने किया था। इस विस्फोट से नुकसान तो हुआ पर लॉर्ड इरविन की जान बच गई। इसके बाद HSRA पर ब्रिटिश पुलिस का शिकंजा कस गया, बहुत से सदस्य गिरफ्तार कर लिए गए वेकिन यशपाल और आजाद अभी भी बाहर थे। 1930 में चंद्रशेखर आजाद ने HSRA को फिर संगटित करने के बीड़ा उठाया। यशपाल को सेंट्रल कमिटी का मेंबर बनाया गया और उन्हें पंजाब का प्रभार सौंपा गया।

यह वो समय था जब यशपाल की मुलाकात 17 साल की लड़की प्रकाशवती कपूर से हुई, जो भविष्य में उनकी पत्नी भी बनीं। परन्तु प्रकाशवती से सबंधों के चलते उन्हें अपने ही साथियों की आलोचना भी सहनी पड़ी क्योंकि HSRA वैचारिक रूप से शादी ब्याह में यकीन नहीं रखती थी। ऊपर से 17 वर्ष की कपूर को संगठन उम्र के हिसाब से भी कम मान रहा था। HSRA में यहाँ तक चर्चा चलने लगी कि यशपाल कहीं रास्ता बदलकर पुलिस के मुखबिर न हो जाएं।

सितम्बर 1930 में आजाद ने फैसला किया की HSRA के सदस्यों को अब क्रान्ति मिलकर एक जगह से नहीं बल्कि अपने अपने दम पर हर कोने से शुरू कर देनी चाहिये। इस आधार पर आजाद ने बचे संगठन के सब लोगों में हथियार बाँट दिए। 23 मार्च 1931 लाहौर असेंबली में बम फेंकने और सार्जेंट की हत्या के आरोप में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दे दी गईं। HSRA के लिए यह बहुत बड़ा झटका था। इसी बीच यशपाल ने रूस जाकर क्रांति को जिन्दा रखने की कोशिश की पर कामयाब नहीं हुए। चंद्रशेखर आजाद से बेशक उनके मतभेद रहे पर मनभेद कभी नहीं था। यह इस बात से भी प्रमाणित होता है कि आजाद की शहादत तक यशपाल उनके साथ काम करते रहे।

गिरफ्तारी
1932 वह दौर था जब न भगत सिंह थे, न चंद्रशेखर आजाद। HSRA लगभग ख़त्म हो रहा था। यशपाल ने उसे ज़िंदा करने की ठानी और सफल भी हुए जनवरी 1932 में यशपाल एक बार पुनर्जीवित HSRA में कमांडर इन चीफ चुने गए। HSRA ख़त्म नहीं हुआ है, ऐसे पर्चे छपवाकर देशभर में बांटे गए, जिनपर कमांडर इन चीफ यशपाल का नाम लिखा था। परन्तु जनवरी जाते-जाते यशपाल आखिरकार पहले बार पुलिस की पकड़ में आ गए और 22 जनवरी को गिरफ्तार कर लिए गए।

यशपाल का हर काम परदे के पीछे का रहा था और वो कभी गांधी से प्रभावित होकर सत्याग्रही भी रहे थे। इसलिए नेहरू परिवार से संबंधित श्याम कुमारी नेहरू ने उन्हे राजनीतिक कैदी बनवा दिया। उनपर कानपुर में हत्या और इलाहबाद में पुलिस वाले की हत्या के दो मुकदमे चले थे और दोनों में अलग-अलग सजा सुनाई गई।

कुलमिलाकर उन्हें 14 वर्ष की सजा हुई। बाद में यशपाल की क्रिमिनल हिस्ट्री और गिरते स्वास्थ्य के बावजूद प्रकाशवती कपूर ने उन्हीं से शादी का संकल्प लिया और पूरा भी किया। भारत के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि 7 अगस्त 1936 को यशपाल और प्रकाशवती की शादी जेल में ही हुई। बाद में कांग्रेस और ब्रिटिश राज के बीच हुई संधि के तहत राजनीतिक कैदियों को छोड़ने का फैसला लिया गया, जिसमें 6 वर्ष जेल में बिताने के बाद यशपाल 1938 में रिहा हो गए यशपाल भी रिहा हो गए।

क्रांतकारी यशपाल के बाद लेखक यशपाल का जन्म
यशपाल जेल से रिहा तो हुए परन्तु उनपर बैन लगा दिया गया की अब वो पंजाब नहीं जा सकते। यशपाल कांगड़ा भी नहीं आ पाए क्योंकि वह उस समय पंजाब का हिस्सा था। रिहा होते ही वह पत्नी के साथ लखनऊ चले गए। खराब स्वास्थ्य के कारण उन्होंने अब कलम के जरिये क्रांति की मशाल जलाए रखने का फैसला किया।

यशपाल मार्क्सवादी विचारों पर लिखने लगे। उन्होंने 1939 में पहली रचना लिखी “पिंजरे की उड़ान।” उसके बाद 1941 में अपनी पत्रिका “विप्लव” का प्रकाशन शुरू किया जिसे ब्रटिश राज ने अपने विरुद्ध मानते हुए 1941 में बंद करवा दिया। हालाँकि भारत के आजाद होने पर 1947 में यह मैगजीन फिर शुरू हुई।

यशपाल वो क्रांतिकारी थे जो जिन्हे आजाद भारत में भी जेल में जाना पड़ा। “विप्लव” अपने आक्रामक विचारों और कम्युनिस्ट विचारदारा से मिश्रित रचनाओं को लिखने के कारण आज़ाद भारत की उत्तर प्रदेश सरकार ने यशपाल को 1949 में जेल में डाल दिया। ऐसा कहा गया कि रेलवे की हड़ताल जो कम्युनिस्टों द्वारा प्रायोजित थी, उसे भड़काने में यशपाल की रचनाओं का योगदान है। हालांकि 6 महीने बाद यशपाल रिहा हुए मगर “विप्लव” का प्रकाशन हमेशा के लिए बंद हो गया।

यशपाल फिर भी लिखते रहे। उन्‍होंने कथा-कहानियों, उपन्‍यास, व्‍यंग्‍य, संस्‍मरण आदि के जरिए समाज की हकीकत और मानव मन की परतों को सामने लाने की भरपूर कोशिश की। इनका उपन्‍यास ‘झूठा-सच’ बेहद चर्चित रहा है, जिसमें देश के विभाजन की त्रासदी की जीवंत तस्‍वीर खींची गई है। 1970 में भारत सरकार ने यशपाल को पद्म भूषण से भी सम्मानित किया।

1976 में “मेरी तेरी उसकी बात” के लिए यशपाल को साहित्य अकादमी प्रुस्कार से भी नवाजा गया। “सिंहावलोकन” नाम की कृति से यशपाल ने अपनी जीवन को अभी तीन अध्यायों में ही पिरोया था और चौथा अध्याय पूरा नहीं कर पाए थे कि उनका निधन हो गया। यशपाल के लेखन पर कहा गया है वो प्रेमचंद का रूप थे परन्तु प्रेमचंद जहाँ गाँव पर लिखते थे, वहीँ यशपाल शहरी जीवन पर कहानियां गढ़ते थे।

मरणोपरांत यशपाल 2003 में भारत सरकार द्वारा उनके नाम से जारी एक डाक टिकट पर नजर आए थे। यशपाल तो आज नहीं हैं परन्तु हिमाचल प्रदेश ने उन्हें कभी उस सत्कार से याद नहीं किया जिसके वो असल में हकदार थे। महान क्रांतिकारियों के साथी रहे यशपाल की जयंती पर क्या आज कहीं सरकारी स्तर पर आयोजन हुआ या होता है? इसकी तो मुझे ख़बर नहीं। हिमाचली उन्हें कितना जानते हैं, इसकी भी खबर नहीं। पर हां, उनके गांव के स्कूल भूम्पल में उनकी जयंती हर साल मनाई जाती है और आज भी मनाई गई।

बारूद से शुरू करके कलम की स्याही से क्रान्ति की गाथा लिखने वाले “यशपाल” को इस लेख के माध्यम से मैं नमन करता हूँ।

संकलन : आशीष नड्डा

लेखक हिमाचल प्रदेश के जिला बिलासपुर से हैं और वर्तमान में वर्ल्ड बैंक ग्रुप में कंसल्टेंट हैं। अक्सर हिमाचल से सबंधित मुद्दों पर लिखते रहते हैं।

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