हिमाचल को मालामाल कर सकती हैं इंडस्ट्रियल भांग की खेती

शिमला।। हिमाचल के पड़ोसी राज्य उत्तराखंड में भांग की खेती को इजाजत मिली तो सवाल उठा कि हिमाचल में ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता। मगर चूंकि हिमाचल प्रदेश पहले से ही भांग के नशीले उत्पादों के कारण देशभर में चर्चा में है, ऐसे में यहां के बाशिंदों का सावधान होना स्वाभाविक है। लेकिन रोचक बात यह है कि उत्तराखंड ने जिस भांग की खेती की इजाजत दी है, वह अलग तरह की भांग है और उसे नशे के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

नशे के लिए इस्तेमाल होने वाली भांग को अंग्रेजी में मैरवाना कहा जाता है। इसमें तथाकथित नशीले रसायनों की मात्रा ज्यादा होती है जबकि उत्तराखंड में जो भांग उगाई जा रही है और जिसे हिमाचल में भी उगाने जाने की मांग की जा रही है, वह अलग तरह की भांग है। इसे अंग्रेजी में हेम्प कहते हैं। अगर इसके पत्तों की बनावट को नजरअंदाज कर दिया जाए तो यह ठीक जूट (पटसन) जैसा पौधा है और जूट की ही तरह कई सारे इंडस्ट्रियल कामों में इस्तेमाल होता है।

हेम्प वह भांग नहीं है जो कहीं भी उग आती है। यह खास तरह की किस्म है जिसमें रेशों की भरपूर मात्रा होती है और पौधे भी ऊंचे होते हैं।

क्या है इंडस्ट्रियल हेम्प (Hemp)
यह सबसे तेजी से उगने वाले पौधों में से एक है। इंसान आज से 10 हजार साल पहले इसके रेशों को इस्तेमाल करना शुरू किया गया था। कागज बनाने, कपड़े बनाने, बायोडीग्रेडेबल प्लास्टिक, पेंट, पशुओं के लिए चारा, बायोफ्यूल और इंसुलेशन बनाने जैसे कई काम इससे किए जा सकते हैं।

हालांकि नशे या दवा के तौर पर इस्तेमाल की जाने वाली भांग और इंडस्ट्रियल हेम्प दोनों ही Cannabis sativa स्पीशीज से संबंध रखते हैं और दोनों में ही साइकोएक्टिव (मस्तिष्क के व्यवहार को प्रभावित करने वाला) पदार्थ टेट्राहाइड्रोकैनाबिनॉल (THC) पाया जाता है। मगर खास बात यह है कि दोनों में कई बातें अलग हैं।

हेम्प में THC यानी दिमाग़ के व्यवहार को बदलने वाले या यूं कहें की नशीले पदार्थ की मात्रा बहुत कम होती है और कैनाबिडिऑल (CBD) की मात्रा ज्यादा होती है। कैनाबिडिऑल या CBD के कारण नशे वाला प्रभाव कम हो जाता है। हेम्प की इस तरह की प्रजातियां भी उपलब्ध हैं, जिनमें THC की मात्रा और भी कम होती है।

हेम्प की जो किस्में इंडस्ट्रियल यूज के लिए उगाई जाती है, उनमें THC (नशीले पदार्थ) की मात्रा 0.3 प्रतिशत से भी कम होती है। यही कारण है कि इन्हें चरस और गांजा बनाने में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। जबकि चरस, गांजा आदि बनाने के लिए जो किस्में उगाई जाती हैं, उनमें दो प्रतिशत से लेकर 20 प्रतिशत तक TCH होता है।

फायदे क्या हैं

चूंकि हेम्प को नशे के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, तो सवाल उठ रहा होगा कि इसके फायदे क्या हैं? जानें, दुनिया में किन-किन कामों में इस्तेमाल हो रहा है हेम्प का-

खाने के तौर पर
खाने में यह कई तरह से इस्तेमाल किया जाता है। हेम्प के बीजों को कच्चा खाया जा सकता है, अंकुरित करके खाया जा सकता है या फिर पाउडर के रूप में खाया जा सकता है। इनमें नशा नहीं होता। हेम्प ऑइल, हेम्प मिल्क और हेम्प जूस भी बनाया जा सकता है। इसमें पोषक तत्वों की भी भरमार रहती है।

हेम्प के बीजों को खाया जा सकता है, इसके बीजों के तेल को भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

रेशों का इस्तेमाल
हेम्प के रेशों को कई तरह से इस्तेमाल किया जाता रहा है। कपड़े, पर्दे, मैट, शॉल, बोरे और जूते तक इससे बनते हैं। हेम्प के रेशों से प्लाई बोर्ड भी बनाया जा सकता है। इंसुलेशन के लिए गत्तों को इस्तेमाल किया जाता है। सीलिंग तक बनती है इसके रेशों से।

हेम्प के रेशों से बना कपड़ा

कारों में फाइबर ग्लास के साथ
हेम्प फाइबर को वाहनों में भी इस्तेमाल किया जाता है। फाइबर ग्लास के साथ इसे मिक्स करके इंटीरियर बनाए जाते हैं। ऑडी, फोर्ड, जीएम, होंडा, मर्सेडीज़, बीएमडब्ल्यू और फोक्सवागन जैसी कंपनियां इसे इस्तेमाल कर रही हैं। ये सोचिए कि एक मर्सेडीज़ कार में (सी क्लास) लगभग 20 किलो मटीरियल हेम्प का बना हुआ होता है।

हल्का और मजबूत होने के कारण इस्तेमाल किया जा रहा हेम्प

बैंकनोट का कागज
इससे कागज भी बनाया जा सकता है। फिल्टर पेपर, सिगरेट में इस्तेमाल होने वाला पेपर और कुछ देशों के बैंक नोट में भी इसे इस्तेमाल किया जाता है। मजबूती के कारण इसका चुनाव किया जाता है।

1914 में हेम्प से नोट बनाने की शुरुआत हुई थी.

गहने और जूते
हेम्प के रेशों से नेकलेस, ब्रेसलेट, चूड़ियां आदि भी बनाई जाती है। कई बार ग्लास और स्टोन की मदद भी ली जाती है।

हेम्प से बना ब्रेसलेट

इसके मजबूत रेशों से न सिर्फ सैंडल्स और फैंसी जूते बन सकते हैं बल्कि ऐथलेटिक शूज में भी इन्हें इस्तेमाल किया जा रहा है। इसे कॉटन, पॉलिएस्टर आदि के साथ मिक्स किया जाता है। खास बात यह है कि इसके बने जूतों में बदबू नहीं आती। वैसे हिमाचल में भी पारंपरिक रूप से भांग के पौधों की छाल से पैरों में पहनने वाली पूलें और बिन्ने आदि बनाए जाते थे।

रस्सियां और चारा
जाहिर है, ऊपर हमने इसके रेशों की मजबूती का जिक्र किया है। इससे रस्सियां बनाई जाती हैं जो काफी मजबूत होती हैं। गायों और घोड़ों आदि को हेम्प की भूसी खिलाई जा सकती है। ठीक उसी तरह, जैसे पशुओं को गेहूं की भूसी और धान का पुआल खिलाया जाता है।

बायोफ्यूल
बायोफ्यूल या जैव ईंधन भी हेम्प के बीजों से बनाया जा सकता है। इसे कई बार हेम्पोलीन भी कह दिया जाता है। पौधे की फर्मेंटेसन करके एल्कॉहल बना दिया जाता है जिसे ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसे सीधे ही डीज़ल इंजन में डाला जा सकता है।

इसके अलावा हेम्प को उगाने से अन्य खरपतवार भी नहीं उगती।

पिछड़ न जाए हिमाचल
चूंकि हिमाचल के पड़ोसी राज्य उत्तराखंड ने हेम्प की खेती की शुरुआत कर दी है, यह संभव है कि वह बड़े पैमाने पर इसे उगाना शुरू करके मार्केट में कब्जा जमा ले। चूंकि भांग के पौधों की पैदावार के लिए हिमाचल प्राकृतिक रूप से आदर्श रहा है, इसलिए जाहिर है अगर हिमाचल में हेम्प की खेती की जाने लगे तो उसकी पैदावार उत्तराखंड से भी बेहतर होगी।

हिमाचल का वातावरण भांग प्रजाति के पौधों के लिए इतना अनुकूल है कि हर कहीं इसके पौधे उग जाते हैं। ऐसे में जब बिना नशे वाली हेम्प प्रजाति की वैज्ञानिक विधि से खेती की जाएगी तो उसके अच्छे परिणाम देखने को मिलेंगे। चूंकि बंदरों और सुअरों से भी भांग को खतरा नहीं है, इसलिए वे किसान भी अपने यहां हेम्प उगाकर अच्छी कमाई कर सकेंगे जिन्होंने खेती बंद कर दी है।

साथ ही इससे भविष्य में और भी ज्यादा संभावनाओं के द्वार खुलेंगे क्योंकि भांग के मेडिकल इस्तेमाल के लिए कई तरह के शोध हुए हैं और कई बीमारियों और डिसऑर्डर्स से लड़ने में इसके औषधीय गुण प्रभावी साबित हुए हैं। ऐसे में संभव है कि भविष्य में सरकार दवा आदि बनाने के लिए लाइसेंस्ड फार्मिंग की इजाजत देगी। ऐसा हुआ तो पहले से भांग उगाने का अनुभव रख रहे हिमाचलियों को लाभ मिलेगा।

भांग पर In Himachal की इस खास सीरीज की अगली कड़ी में बात होगी मेडिकल कैनबिस या मेडिकल मैरवाना पर।

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