जब मैदान के लिए सेना से ‘युद्ध’ लड़ रहे थे धूमल-अनुराग

हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव नज़दीक हैं, ऐसे में In Himachal राज्य की राजनीति पर एक खास सीरीज़ चलाने जा रहा है। इस सीरीज़ में प्रदेश की राजनीति, यहां के राजनेताओं, पार्टियों, मुद्दों और इतिहास को लेकर बात की जाएगी। सीरीज़ के हर पार्ट में उन मुद्दों पर बात करेंगे, जो हिमाचल प्रदेश की राजनीति में छाए रहे। इस सीरीज़ की शुरुआत करने जा रहे हैं पिछले विधानसभा चुनाव यानी 2012 में हुए इलेक्शन से ठीक पहले के हालात की। उन दिनों जो मुद्दा प्रदेश की राजनीति में छाया हुआ था, वह था शिमला का ऐतिहासिक अनाडेल मैदान, जो सेना के पास है।

 

भले ही सेना शिमला के अनाडेल मैदान को अभी सक्रिय रूप से ट्रेनिंग, खेल व अन्य गतिविधियों के लिए ही करती है, मगर जानकार बताते हैं कि किसी आपात स्थिति में (युद्ध या फिर भयंकर प्राकृतिक आपदा) में सेना को यहां बेस कैंप बनाकर गतिविधियां संचालित करने में सुविधा होगी। मगर 2012 में तो तत्कालीन सरकार के मुखिया प्रेम कुमार धूमल कहते थे कि सेना को दी गई लीज़ खत्म हो चुकी है, ऐसे में सेना इसपर अवैध कब्जा करके बैठी हुई है। वह मांग कर रहे थे कि सेना तुरंत इस कब्जे को छोड़े और मैदान को प्रदेश सरकार के हवाले करे। उसी समय मुख्यमंत्री के बेटे अनुराग ठाकुर चाहते थे कि यहां पर क्रिकेट का मैदान बनाया जाए। अनुराग और उनके पिता मिलकर बयानबाजी कर रहे थे और यह मामला अखबारों की सुर्खियों में बना रहा था।

 

स्टेडियम बनाने की चाहत
जब प्रेम कुमार धूमल 1998 से 2003 तक मुख्यमंत्री रहे थे, उसी दौरान अनुराग ठाकुर हिमाचल प्रदेश क्रिकेट असोसिएशन के प्रेजिडेंट चुने गए थे और उसी दौरान उनके पहले प्रॉजेक्ट ‘धर्मशाला क्रिकेट स्टेडियम’ का निर्माण शुरू हुआ था। विजिलेंस ने अपनी चार्जशीट में धूमल पर अपने बेटे की खेल संस्था को फायदा पहुंचाने के लिए मुख्यमंत्री रहते हुए कई तरह की अनियमितताओं का आरोप लगाया था। इसके बारे में आप विस्तार से यहां क्लिक करके पढ़  सकते हैं

 

2003 के बाद फिर से कांग्रेस की सरकार आई और फिर उसके पांच साल बाद फिर से बीजेपी को मौका मिला और प्रेम कुमार धूमल फिर मुख्यमंत्री बने। मिशन धर्मशाला सक्सेसफुल हो चुका था। अनुराग ठाकुर धर्मशाला में स्टेडियम बना चुके थे और उसकी चारों तरफ चर्चा हो रही थी। उन दिनों युवा वर्ग भी काफी अभिभूत नजर आ रहा था और अनुराग उनकी नजरों में स्टार थे। संभवत: अनुराग शिमला में भी स्टेडियम बनाकर इसे अपनी उपलब्धियों में शुमार करना चाहते थे। क्योंकि अनाडेल मैदान बहुत खूसबूरत है और दूर से नजर आता है।

बर्फबारी के बाद अनाडेल

तो जब धूमल मुख्यमंत्री बने ही थे, उन्होंने इस मैदान को सेना से प्रदेश सरकार के लिए कोशिश शुरू कर दी थी। उनका मई 2008 का एक बयान अभी तक मीडिया में है, जिसमें उन्होंने अनाडेल ग्राउंड का जिक्र करते हुए कहा था कि सरकार अनाडेल ग्राउंड को वापस लेने के लिए रक्षा मंत्रालय से मुद्दा उठाएगी, क्योंकि रक्षा मंत्रालय को पट्टे पर यह जमीन दी थी जिसकी अवधि 28 साल पहले खत्म हो चुकी है।

 

जब सेना के खिलाफ किया गया था प्रदर्शन
2008 से कोशिशें जारी रही, सेना अपना पक्ष रखती रही कि हमारे लिए यह मैदान महत्वपूर्ण है, सामरिक दृष्टि से भी। मगर प्रदेश सरकार, इसके मुखिया प्रेम कुमार धूमल और उनके बेटे तत्कालीन सांसद और एचपीसीए के प्रमुख अनुराग ठाकुर ने कोशिशें जारी रखीं। जब केंद्र सरकार के रक्षा मंत्रालय से कोई सहयोग नहीं मिला तो सेना के खिलाफ बयानबाजी से बढ़कर सेना के खिलाफ प्रदर्शन किए गए और सेना पर हथकंडे अपनाने का आरोप लगाया गया। कई खेल संगठनों के बैनर तले शिमला में रैलियां निकाली गईं और अनाडेल में प्रदर्शन तक किया गया- जिनके आगे लिखा गया था- फ्री अनाडेल। यह नारा कश्मीर में होने वाले उन प्रदर्शनों जैसा था, जिनमें भारत को कब्जाधारी बताते हुए सेना के ठिकानों के बाहर प्रदर्शन करते वक्त बैनरों में लिखा होता है- फ्री कश्मीर।

सेना के खिलाफ प्रदर्शन

‘अनुराग का नारा, अनाडेल हमारा’
यह नारा ऐसा लगता है मानो किसी और देश की ताकत ने हमारे संसाधन पर कब्जा कर लिया हो। घटना 7 अप्रैल, 2012 की है। ‘अनाडेल वापस करो’ रैली का आयोजन किया गया था। यह रैली डेढ़ बजे रिज मैदान से लेकर मुख्यमंत्री आवास ओकओवर तक निकाली गई। अनुराग ठाकुर की अध्यक्षता में एक लाख से अधिक हस्ताक्षरित बैनरों को मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल को सौंपा गया। बच्चों ने अनाडेल वापस दो और फ्री अनाडेल जैसे बैनर भी पकड़ हुए थे। वे नारे लगा रहे थे कि उन्हें अनाडेल मैदान वापस चाहिए। एचपीसीए ने बच्चों को इस दौरान टी शर्ट भी दी थी, जिस पर लिखा था कि अनाडेल हमारा है।

 

अनुराग ने इस मौके पर कहा था– ‘अनाडेल मैदान पर पिछले 50 वर्षों में सेना की कोई भी महत्वपूर्ण गतिविधि नहीं हुई है। इसका प्रयोग केवल अधिकारी गोल्फ खेलने के लिए करते हैं, जिस पर शिमला की जनता और खेल प्रेमियों को आपत्ति है। इशसे बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ हो रहा है। अनाडेल मैदान पर स्पोर्टिंग हब बनने से यहां पर पर्यटन को बढ़ावा देने में भी मदद मिलेगी, जैसे धर्मशाला मे मिली। किसी भी आपातकालीन स्थिति के दौरान हम सेना के साथ होंगे और जरूरत पड़ने पर बॉर्डर की तरफ कूच करने के लिए भी तैयार हैं।’

अनुराग ठाकुर

यह था सेना का पक्ष
बेटे अनुराग द्वारा स्टेडियम के निर्माण के मकसद को लेकर निकाली गई इस रैली के कुछ दिन बाद सेना और धूमल के बीच आरोप-प्रत्यारोप शुरू हुए। सेना के प्रवक्ता ने चंडीगढ़ में जारी बयान में मुख्यमंत्री पर वन माफिया को संरक्षण देने का आरोप लगाया और कहा कि मैदान सुरक्षा की दृष्टि से सेना के पास रहना चाहिए क्योंकि क्रिकेट के बजाय देश की सुरक्षा ज्यादा महत्वपूर्ण है। हालांकि सेना ने बाद में इस विवादास्पद बयान से किनारा कर लिया था कि  पर्यावरण के बिगड़ने और भू-माफिया के साथ हिमाचल सरकार की साठगांठ होने के आधार पर अनाडेल को क्रिकेट स्टेडियम के लिए नहीं दिया जा रहा। सेना की तरफ से कहा गया कि हिमाचल सरकार के साथ उसके अच्छे संबंध हैं और इस तरह का कोई बयान सेना की ओर से अधिकारिक तौर पर नहीं दिया गया। सेना की तरफ से जारी प्रेस रिलीज पर खूब विवाद हुआ था।

प्रेम कुमार धूमल

धूमल का सेना पलटवार
इस बयान पर तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल ने पलटवार किया और इस बयान के लिए बिना शर्त माफ़ी मांगने को कहा और ऐसा न होने पर मानहानि का दावा करने की बात कही। उन्होने कहा, ‘अनाडेल हिमाचल सरकार की पूंजी है और यह मैदान सेना के अवैध कब्जे में है। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी व रक्षा मंत्री जार्ज फर्नाडीस के साथ सेना के पदाधिकारियों की मौजूदगी में विस्तृत चर्चा हुई थी। निर्णय हुआ था कि सेना को वैकल्पिक भूमि उपलब्ध करवाई जाएगी।’

धूमल ने यह भी कहा था, ‘प्रदेश न्यायालय ने प्रदेश सरकार को यह निर्देश दिए हैं कि शहर के युवाओं में खेल गतिविधियों को प्रोत्साहित करने के लिए उचित स्थान की तलाश की जाए। इसके लिए शिमला के नागरिकों ने फोरम गठित किया है, जिसमें 14 खेल संघ भी शामिल हैं। फोरम ने विस्तृत हस्ताक्षर अभियान चलाया, जिसमें 1.08 लाख लोगों ने हस्ताक्षर किए। इस हस्ताक्षरित ज्ञापन मुख्यमंत्री को प्रस्तुत किया गया। मुख्यमंत्री के व्यक्तिगत पत्र सहित ज्ञापन की प्रतियां प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री को प्रेषित की जा रही हैं, ताकि समुचित कार्रवाई कर मैदान को सेना के कब्जे से मुक्त करवाया जाए।’

 

वरिष्ठ नेता थे खामोश
ध्यान देने वाली बात यह है कि जिस वक्त अनाडेल मैदान को लेकर यह सब खींचतान चल रही थी, शिमला के विधाय सुरेश भारद्वाज सक्रिय रूप से धूमल और उनके पुत्र अनुराग के साथ थे। उन्होंने इसे शिमला नगर-निगम चुनाव का मुख्य मुद्दा बनाने का भी ऐलान किया था। वीरेंद्र कश्यप ने भी प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी और सेना को नसीहत दी थी। मगर उनके अलावा पार्टी के वरिष्ठ नेता सक्रिय रूप से अपनी ही सरकार के स्टैंड पर साथ नहीं थे। शांता कुमार ने अपनी पार्टी के नेताओं को संयमित होकर बयान देने के लिए कहा था।

उनका कहना था कि राष्ट्रीय सुरक्षा क्रिकेट स्टेडियम से बड़ा विषय है। वहीं नड्डा का कहना था, “राज्य सरकार ने इस मैदान पर किसी खेल गतिविधि अथवा क्रिकेट स्टेडियम के लिए किसी अभियान का कभी भी समर्थन नहीं किया है।” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि मैदान को सेना से हासिल करने के लिए राज्य सरकार कोई समझौता नहीं करेगी। उन्होंने हस्ताक्षर अभियान का पार्टी से कोई संबंध न होने की भी बात कही थी।

 

सरकार बदली, रुख बदला
जब 2012 में हुए चुनाव में बीजेपी सत्ता से बाहर हुई और कांग्रेस की सरकार बनी, उसने कहा कि अनाडेल मैदान सेना के पास ही रहेगा। मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने कई मौकों पर दोहराया कि रणनीतिक दृष्टि, आपदा राहत और प्रबंधन के अभ्यास के लिए अनाडेल मैदान उचित है, ऐसे में इसे सेना के अधीन ही रखा जाना चाहिए। जिस दौरान धूमल सरकार इसे सेना से लेने की कोशिश कर रही थी, उस दौरान भी वह विपक्ष में रहते हुए सरकार के रुख की आलोचना कर रहे थे।

आज जब केंद्र में बीजेपी की सरकार है, अगर इस मैदान को लेने में हिमाचल का हित है तो धूमल और अनुराग अपनी ही सरकार के सामने कम से कम इस मैदान को वापस लेने के लिए बात कर सकते हैं। मगर आज यह मुद्दा कहीं नहीं है। एक वक्त सेना को कब्जाधारी बताकर उसके खिलाफ नारेबाजी करने वाले अनुराग ठाकुर आज खुद सेना में लेफ्टिनेंट हो चुके हैं। शायद उन्हें यह भी समझ आ गया है कि स्टेडियम बनाने का इंप्रेशन ज्यादा दिनों तक नहीं चलता।

 

क्या है अनाडेल मैदान का मसला?
अनाडेल ग्राउंड की 121 बीघा ज़मीन मूल रूप से हिमाचल प्रदेश सरकार की है और उसके आसपास करीब 12 बीघा जमीन पर नगर निगम का मालिकाना हक है। 121 बीघा ज़मीन ब्रिटिश शासन के दौरान सेना को दरअसल ट्रेनिंग आदि के लिए दूसरे विश्व युद्ध के दौरान  (1941 में)मिली थी, जिसकी लीज़ करीब 35 साल पहले (1982 में) खत्म हो चुकी है। वहीं निगम की ज़मीन सेना ने 1955 में 20 साल के लिए लीज़ पर ली थी। 1975 में लीज़ खत्म हुई, मगर इसे रिन्यू नहीं करवाया गया। निगम को अभी भी सेना से करीब 819 रुपये लीज मनी मिलते हैं। निगम का कहना है कि 1988 में सेना ने 1975 के बाद से बनी लीज मनी दे दी थी मगर नियमों के मुताबिक आज तक लीज़ रिन्यू नहीं करवाई।

मैदान को लेकर क्या-क्या है विवाद
दरअसल कई सरकारों ने बहुत पहले से सेना से इस मैदान को लेने की कोशिश की थी। मसला तब भी उठा था जब नब्बे के दशक की शुरुआत में सेना ने प्रदेश सरकार के हेलिकॉप्टर के यहां उतरने पर आपत्ति जताई थी। धूमल ने पहली बार मुख्यमंत्री बनने पर भी जॉर्ज फर्नांडिज़ (तत्कालीन रक्षा मंत्री) से यह मसला उठाया था मगर नतीजा कुछ नहीं निकला था। मगर 2008 मे जब वह मुख्यमंत्री थे, तब उन्होंने पुत्र के साथ मिलकर जो अभियान चलाया, वह कुछ अलग ही था। केंद्र में यूपीए सरकार थी और उनके बेटे अनुराग यहां क्रिकेट स्टेडियम बनाना चाहते थे। प्रदेश के मुख्यमंत्री का बेटे के लिए इस तरह से व्यक्तिगत रूप से देश की सेना के खिलाफ उतर जाना उस वक्त के प्रबुद्ध लोगों को रास नहीं आया था।

 

स्टेडियम बन जाता तो क्या होता?
सेना की अपनी जरूरत हो सकती है और इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि शिमला और हिमाचल प्रदेश को भी उस मैदान की जरूरत है। शिमला शहर में इतनी खुली जगह कहीं नहीं है, जहां पर बड़े खेलों का आयोजन हो सके। ऐसे में बातचीत से बीच का रास्ता निकालना कठिन नहीं है। जब सेना को जरूरत हो, इसे सेना इस्तेमाल करे और जब प्रदेश सरकार या यहां की खेल संस्थाओं को जरूरत हो, तब खेल संस्थाएं इस्तेमाल करें। मगर इस तरह का समाधान केंद्र और राज्य सरकार के बीच संवाद से ही हो सकता है। संविधान के प्रति निष्ठा लेने की शपथ लेने वाली सरकारें और उनके प्रतिनिधि इस तरह से सेना आदि के खिलाफ नारेबाजी करें, यह ठीक नहीं लगता।

 

सेना पर आरोप लगाए जा रहे थे कि इस मैदान को सेना कभी-कभार ही इस्तेमाल करती है। मगर शिमला के इस मैदान में क्रिकेट स्टेडियम बन जाता तो क्या हो गया होता? धर्मशाला में स्टेडियम बन गया तो यहां आज तक कितने मैच हो गए? 2003 में यह स्टेडियम खुला था और आज 14 साल हो चुके हैं। इतने समय में यहां पर सिर्फ 3 वनडे मैच और 1 टेस्ट मैच खेला गया है। टी-20 मैच 7 खेले गए हैं। अगर सेना शिमला के इस मैदान में कुछ नहीं करती तो क्रिकेट स्टेडियम बनाने पर कौन सा रोज मैच हो रहे थे। जब धर्मशाला में 14 साल में सिर्फ 11 अंतर्राष्ट्रीय मैच हुए हैं, यहां भी इतने ही हो जाते। या चलो 30 हो जाते। बाकी के दिन क्या होता यहां?

सीरीज के अगले हिस्से में फिर एक ऐसे मुद्दे के साथ, जो हिमाचल की राजनीति में छाया रहा

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