लेख: यह 2017 है, 1947 नहीं, राजशाही से मोह छोड़ें वीरभद्र

आई.एस. ठाकुर।। वीरभद्र सिंह जी का बयान पढ़ा कि मैं 122वां राजा हूं, कोई खानाबदोश नहीं और टूट सकता हूं मगर झुक नहीं सकता। इस बयान के दूसरे हिस्से से तो बड़ी प्रेरणा मिलती है। कितनी अच्छी बात है कि कोई कहे कि मैं टूट सकता हूं, मगर किसी तरह के दबाव के आगे झुक नहीं सकता। वीरभद्र सिंह ने यह बात उनके खिलाफ चल रहे मामलों के संदर्भ में कही। यह जताने के लिए कि वह संपन्न हैं और उन्हें भला करप्शन करने की क्या जरूरत।

 

उन्हें हक है अपना बचाव करने का क्योंकि अभी तक एक भी मामला अदालत में उनके खिलाफ साबित नहीं हुआ है। वह आरोपी हैं, दोषी नहीं। मगर उनके इस बयान का पहला हिस्सा निराश करने वाला है- मैं 122वां राजा हूं, कोई खानाबदोश नहीं। निराश इसलिए करता है, क्योंकि जो शख्स लोकतंत्र में जनता के वोटों सो चुना जाता रहा हो और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत 6 बार मुख्यमंत्री रहा हो, वह अब भी अपने बीते हुए शाही इतिहास से क्यों चिपका हुआ है?

 

मुख्यमंत्री कई बार बयान दे चुके हैं कि वह राजा हैं, शाही हैं, ऐसा है, वैसा है। आज उनका पंजाब केसरी पर जो बयान पढ़ा, उसपर जवाब दिया जाना चाहिए। और यह जवाब लोकतांत्रिक देश के एक नागरिक होने के नाते संवैधानिक अधिकार के तहत दिया जा रहा है। पहले तो उनका बयान पढ़िए-

भाजपा सरकार ने मेरी संपत्ति को लेकर एक ही मामले में 3-3 जांचें बिठाई हैं ताकि वह मुझे परेशान करके सत्ता साहिल कर सके लेकिन ऐसा नहीं होगा, क्योंकि मैं टूट सकता हूं लेकिन झुक नहीं सकता। मैं कोई खानाबदोश नहीं हूं, 122 वां राजा हूं। सीलिंग एक्ट के समय मेरे परिवार द्वारा कई करोड़ों रुपयों की जमीनें सरकार को दी गई।

खानाबदोशों का कोई सम्मान नहीं होता क्या?
उनके इस बयान को देखें तो यही है कि वह कह सकते हैं कि वह कठोर हैं और झुक नहीं सकते। मगर उनके इस बयान से सामंतवाद की बू आती है। वह कहते हैं कि मैं खानाबदोश नहीं हूं। तो क्या खानाबदोश लोगों का आत्मसम्मान नहीं होता? खानाबदोश लोग मामूली लोग होते हैं? क्या वे जल्दी से झुक जाया करते हैं? देश-दुनिया में करोड़ों खानाबदोश हैं। वे एक जगह से दूसरी जगह घूमते रहे हैं। आज बहुत से लोग जो खानाबदोश नहीं भी हैं, वे भी एक समय खानाबदोश थे। हिमाचल के बहुत से राजे-रजवाड़े खुद इधर-उधर से आए हैं। बल्कि हिमाचल ही नहीं, पूरी मानव सभ्यता का इतिहास खानाबदोशी का रहा है। मुख्यमंत्री को न जाने क्यों अपमानजनक तुलनाएं करने की आदत है। जैसे पिछले दिनों गद्दी समुदाय को लेकर की थी। कभी सफाई कर्मचारियों को की थी तो कभी अन्य नेताओं को की थी।

122वें राजा हैं तो क्या हुआ?
बुशहर रियासत के 121वें शासक पद्म सिंह और उनकी नौवीं पत्नी शांति देवी की संतान हैं वीरभद्र सिंह। पद्म सिंह का निधन अप्रैल 1947 में हो गया था। उस वक्त वीरभद्र सिंह नौ साल के थे। इसी साल अगस्त में देश आजाद हो गया और लोकतांत्रिक व्यवस्था लागू हो गई। सिंबॉलिक रूप से भले ही वीरभद्र सिंह राजा मानते रहें खुद को, मगर वह राजा नहीं हैं और न ही राजा के तौर पर खुद को पेश कर सकते हैं। वीरभद्र क्यों भूल जाते हैं कि आज वह जो कुछ हैं, वह जनता के कारण हैं न कि राजशाही के कारण? अगर वह कहते हैं कि मैं सातवीं बार मुख्यमत्री बनूंगा तो यह मुख्यमंत्री पद उन्हें इसलिए नहीं मिलेगा कि वह अपने वंश के 122वें राजा हैं। यह पद तभी मिल पाएगा जब इन चुनावों में प्रदेश की जनता कांग्रेस के पक्ष में मतदान करके उसे बहुमत देती है और फिर चुने हुए प्रतिनिधि और पार्टी उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपती है। यह बात अलग है कि वह ‘मैं राजा हूं’ के दम पर कुछ मासूम लोगों को प्रभावित करके उनका फायदा चुनावों में उठाते हों।

 

‘करोड़ों की जमीनें मेरे परिवार ने सरकार को दी है’
क्या वीरभद्र का राजवंश आसमान से इन जमीनों को अपने नाम लिखवाकर लाया था? जमीन तो जमीन है। जमीन पर किसी का नाम नहीं लिखा होता, जमीन जरूर किसी के नाम लिख जाती है। अगर वीरभद्र सिंह के राजवंश ने करोड़ों की जमीनें सरकार को दी हैं तो महान कार्य नहीं किया। देश-प्रदेश के लाखों लोगों की तय सीमा से अधिक जमीन सरकार के पास गई है। फर्क इतना है कि जिन सामंतों और रजवाड़ों ने ज्यादा जमीन कब्जाई थी, उनकी ज्यादा गई। तो यह जमीन कहां से आई थी उनकी पास और किसकी थी? लोकतंत्र सबको समानता देता है। पूरे देश के रजवाड़ों को दर्द ही इसलिए हुआ था कि उन्होंने कई पीढ़ियों से जो जनता की जमीन कब्जाई थी, वह सरकार ने उनसे छुड़ाई और भूमिहीनों को दी। पहले के दौर में तो जितनी रियासत थी, वो सारी की सारी ही राजा की होती थी। तो क्या उस पूरी जमीन का ही मालिक रजवाड़ों को बनाकर रख दिया जाता? और जमीन देकर महानता ही साबित करनी है तो वीरभद्र सिंह अपने सेब के बागीचों को क्यों नहीं सरकार को दान कर देते, जिनपर यह ऐक्ट लागू नहीं होता।

 

राजा होना कोई महान काम नहीं था
मुख्यमंत्री से गुजारिश है कि वह इस सोच को अब तो छोड़ दें। प्रदेश के सबसे अनुभवी नेता हो और लोकतांत्रिक व्यवस्था से चुने जाते रहे नेता हो। फिर दूसरों को नीचा दिखाने और खुद को शाही दिखाने की आदत भी छोड़ दो। और वह वक्त गया कि जनता यह सोचकर आंखें मूंद ले कि भला एक संपन्न राज परिवार के वशंज को करप्शन करने की क्या आदत। राजा-रजवाड़ों की छवि जनता के मन में बहुत अच्छी नहीं है। राजा-रजवाड़े बहुत अच्छे नहीं थे। भारत समेत पूरी दुनिया के राजवंश तो जाने ही जाते हैं अपनी भोग-विलासिता के लिए, कई-कई विवाह करने के लिए, अनोखे कानून बनाने के लिए, जमीनों पर कब्जों के लिए लड़ाई करने के लिए, लोगों पर अत्याचार करने के लिए। भारत के रजवाड़े तो अपनी संपत्ति और सत्ता को बचाए रखने के लिए अंग्रेजों के पिछलग्गू भी बने थे। तो यह तर्क काम नहीं करता कि मैं तो राजा हूं, मुझे क्या जरूरत। सबसे ज्यादा जरूरत तो राजा को ही होती है। वरना आम जनता अपने आप में अपने हाल में मस्त है, जितना उसके पास है, उसी में गुजारा कर रही है।

आपको रजवाड़ाशाही से ऊपर होकर जिम्मेदार लोकतांत्रिक नेता की तरह बातें करनी चाहिए। जहां तक बात है आप पर लगे आरोपों की, उनका जवाब भी लोकतांत्रिक ढंग से दीजिए। अब वह दौर गया कि रजवाड़ा होने का नाम लेकर सहानुभूति बटोरी जाए। यह 2017 है, 1947 नहीं।

लेखक मूलत: हिमाचल प्रदेश के हैं और पिछले कुछ वर्षों से आयरलैंड में रह रहे हैं। उनसे kalamkasipahi @ gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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