जानें, ये चिट्टा आखिर है क्या और कैसे इंसान को तबाह कर देता है

इन हिमाचल डेस्क।। उड़ता पंजाब मूवी जब रिलीज होने वाली थी तब देश में अचानक चर्चा छिड़ी कि पंजाब तो नशे के चंगुल में आकर बर्बाद होने की कगार पर है। मगर जिस समय पूरा फोकस पंजाब पर बना हुआ था, उस समय ड्रग्स के कारोबारी हिमाचल में जड़ें जमाने में जुटे हुए थे। ड्रग्स में आजकल जिसकी सबसे ज्यादा चर्चा होती है, वह है चिट्टा। आए दिन पढ़ने को मिलता है कि चिट्टे के साथ इतने लोग गिरफ्तार या इतना चिट्टा बरामद। जानिए, ये चिट्टा आखिर है क्या और इंसान को कैसे मजबूर बना देता है।

पंजाबी और उसकी उपभाषाओं या बोलियों में चिट्टा का मतलब होता है- सफेद। तो इस ड्रग को यह नाम इसके चिट्टे या यानी सफेद रंग के कारण मिला है। पहले पंजाब में हेरोइन को चिट्टा कहा जाता था मगर अब चिट्टे की परिभाषा, व्यापक हो गई है। हेरोइन तो अफीम से बनने वाला ड्रग है लेकिन अब और भी कई सिंथेटिक ड्रग्स इस्तेमाल होने लगे हैं जो देखने में सफेद ही होते हैं। इस कारण उन्हें भी चिट्टा ही कहा जाने लगा है। ये सिंथेटिक ड्रग्स हैं- MDMA , जिसे ecstasy भी कहा जाता है, LSD (lysergic acid diethylamide ) और मेथाम्फेटामीन (methamphetamine).

यानी चिट्टा कोई एक ड्रग नहीं है। वह हेरोइन भी हो सकता है, मेथाम्फेटामीन भी, MDMA भी और LSD भी। इसलिए किसी को ड्रग्स के साथ पकड़ा जाए और वह सफेद रंग का हो तो यह लैब टेस्टिंग के बाद ही पता चल पाया है कि कौन सा सिंथेटिक ड्रग है। मगर कॉमन भाषा में उसे चिट्टा कह दिया जाता है और अखबार भी वैसे ही छाप देते हैं। मगर फिर भी अधिकतर मीडिया रिपोर्टों में आजकल जिस चिट्टे की बात की जाती है, उसमें मेथाम्फेटामीन प्रमुख है। तो इस लेख में इसी ड्रग के बारे में जानिए, कितना खतरनाक है ये।

क्या है मेथाम्फेटामीन
Methamphetamine (मेथाम्फेटामीन) को मेथ (Meth) भी कहा जाता है और इसके क्रिस्टल स्वरूप को Crystal Meth कहते है। दरअसल यह हमारे सेंट्रल नर्वस सिस्टम के लिए उत्तेजक की तरह काम करता है। यानी हमारे दिमाग और रीढ़ की हड्डी के बीच के उस महत्वपूर्ण हिस्से की गतिविधियों को बढ़ा देता है, जिसका काम शरीर के विभिन्न हिस्सों से सिग्नल लेना है और कोई हरकत करने के लिए संदेश भेजना है।

क्रिस्टल से लेकर पाउडर तक मिलता है मेथ का

इस ड्रग को कई तरह से लिया जाता है। सीधे मुंह से निगलकर, नाक से सूंघकर, धुएं के जरिए, नस में इंजेक्शन लगाकर, मांसपेशियों में इंजेक्शन लगाकर या फिर त्वचा के बाहरी हिस्से में इंजेक्शन लगाकर। इसके अलावा गूदा या योनि में रखकर भी इसे इस्तेमाल किया जाता है।

1893 में खोजे गए इस ड्रग का असर यह होता है कि कम मात्रा में लिया जाए तो आनंद का अनुभव होता है, आदमी ज्यादा अलर्ट हो जाता है, उसकी कॉन्सेन्ट्रेशन बढ़ जाती है और अगर कोई थक गया तो उसकी एनर्जी बढ़ती है। इससे भूख कम हो जाती है और वजन कम करने में मदद मिलती है। लेकिन यह पढ़कर खुश होने की जरूरत नहीं है कि ये तो फायदेमंद है।

इसकी जरा सी भी ज्यादा डोज मतिभ्रम, मिर्गी जैसे दौरे पड़ने और दिमाग में खून का रिसाव होने जैसी हालत पैदा कर देती है। आदमी अपने मूड पर कंट्रोल नहीं कर पाता और अजीब व्यवहार करने लगता है। यही नहीं, ऐसे शोध भी हैं कि इस कारण इंसान की यौन इच्छाएं बेहद बढ़ जाती हैं और वे कई दिनों तक सेक्स के जुनून के आगे मजबूर हो जाते हैं, वे संतुष्ट नहीं हो पाते।

इंसान को बदलकर रख देता है मेथ

मेथ को दवा के तौर पर कम ही इस्तेमाल किया जाता है मगर नशे के लिए इसे बहुत ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है। बाकी देशों में तो इसके मेडिकल यूज के उदाहरण नहीं मिलते, मगर अमरीका में मेथ को ADHD नाम के डिसऑर्डर के इलाज के लिए अप्रूव किया गया है। यह एक तरह का मेंटल डिसऑर्डर है जिसमें व्यक्ति को अपने आसपास की चीजें समझने में दिक्कत होती है, वह कॉन्सेन्ट्रेट नहीं कर पाता और कई बार उसका व्यवहार उसकी उम्र के अनुरूप नहीं होता।

इसके अलावा अमरीका में बच्चों और व्यस्कों में मोटापे का इलाज करने के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है। मगर बावजूद इसके बहुत ही दुर्लभ मामलों में इसे इस्तेमाल किया जाता है और वह भी पूरी निगरानी के साथ। ऐसा इसलिए क्योंकि इस ड्रग के दुरुपयोग की आशंकाएं ज्यादा रहती हैं। अमरीका में हालात ये हैं कि ‘पार्टी ऐंड प्ले’ में यह खूब यूज होता है। पार्टी ऐंड प्ले में लोग इंटरनेट डेटिंग साइट के माध्यम से आपस में जुड़ते हैं, इस ड्रग को लेते हैं और फिर सेक्स करते हैं। मेथ कुछ इस तरह से असर डालता है कि लोग कई दिनों तक सेक्स में डूबे रहते हैं।

नुकसान
मौज-मौज में आनंद के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला मेथ आदमी को बर्बाद कर देता है। आइए पहले शारीरिक नुकसान की बात करते हैं। चिट्टे की लत के शिकार लोगों के दांत समय से पहले टूटना शुरू हो जाते हैं। इस हालत को मेथ माउथ कहा जाता है। ये उन लोगों में ज्यादा होता है, जो ड्रग को इंजेक्शन के माध्यम से लेते है। भूख कम लगना, ज्यादा ही ऐक्टिव हो जाना, ज्यादा पसीना निकलना, मुंह सूखना, दिल की धड़कन कभी तेज होना तो कभी कम हो जाना, बीपी बढ़ना या घटना, सांस तेजी से लेना, स्किन ड्राई हो जाना, धुंधला दिखाई देना, दस्त या कब्ज होना और देखने में पीले से नजर आना। ये सब मेथ के साइड इफेक्ट हैं।

मेथ माउथ

चूंकि मेथ के नशे में आदमी सेक्स के आगे मजबूर होता है तो वह यह भी नहीं सोचता कि कहां किससे और किस हालत में सेक्स कर रहा है। इस कारण यौन रोगों के फैलने की आशंका बनी रहती है। अक्सर देखा गया है कि ड्रग्स लेने वाले अपने ग्रुपों में रहते हैं, उनके बीच इस तरह का अनप्रॉटेक्टेड सेक्स होने के कारण इन रोगों के फैलने की आशंका ज्यादा होती है। ऊपर से वे एक ही सीरिंज इस्तेमाल करते हैं तो हैपेटाइटस से लेकर एचआईवी तक से संक्रमित हो सकते हैं।

दूसरी बात आती है कि मानसिक नुकसान की। बेचैनी, अवसाद, आत्महत्या का विचार और मन में अजीब कल्पनाएं करने की स्थिति इस ड्रग से पैदा हो जाती है। इससे न्यूरोटॉक्सिसिटी हो जाती है और पूरे शरीर का सिस्टम गड़बड़ा जाता है। अब नशे के आदी लोगों को पता तो है नहीं कि किस मात्रा में ड्रग उनके लिए तुरंत जानलेवा हो सकता है। उन्हें क्वॉलिटी और क्वॉन्टिटी का होश नहीं रहता। इसलिए जरा सी ओवरडोज़ उनका खेल खत्म कर सकती है। जैसे कि दिल की धड़कन असामान्य हो जाती है, पेशाब करने में दर्द होने लगता है तो कई बार पेशाब आता ही नहीं, भ्रम की स्थिति पैदा हो जाती है, शरीर का तापमान बढ़ जाता है, घबराहट होने लगती है।

इनमें सबसे खराब स्थिति है साइकोसिस। इस स्थिति में आदमी यह फर्क नहीं कर पाता कि वह असल जिंदगी में है या ख्वाब देख रहा है। वह कल्पनाएं करने लगता है। दिमाग उसे अजीब चीजें दिखाता है। और कई बार इलाज न मिले समय पर तो 5–15% लोग पूरी तरह रिकवर नहीं हो पाते। यानी यूं समझ लें कि उनका दिमाग हमेशा के लिए हिल जाता है। वे अपना स्थायी नुकसान कर बैठते है।

खतरनाक है लत
एक बारे जिसे लत लग जाए, उसके लिए इसे छोड़ना मुश्किल है। एक शोध के मुताबिक, मेथ के आदी 61 लोगों को इलाज के एक साल बाद फिर से इलाज के लिए लाना पड़ा। और उनमें से आधे लोग आगे के 10 सालों में फिर से मेथ इस्तेमाल करने लगे। समस्या ये है कि इसकी लत से बाहर निकालने के लिए इलाज का कोई एकदम प्रभावी तरीका अभी तक नहीं मिल पाया है। इसके लिए अभी कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरपी को ही इस्तेमाल किया जाता है। यानी काउंसलिंग आदि से आदमी से व्यवहार को बदलने की कोशिश की जाती है।

जो लोग मेथ इस्तेमाल करते हैं, धीरे-धीरे उन्हें डोज़ बढ़ानी बड़ती है क्योंकि शरीर में ड्रग के लिए धीरे-धीरे टॉलरेंस पैदा हो जाती है। अन्य ड्रग्स की तुलना में यह टॉलरेंस बहुत तेजी से पैदा होती है। इस कारण अगर किसी को चिट्टे से दूर करना हो, बड़ी मुश्किल हो जाती है। ऐसे समझिए कि किसी से मेथ छुड़ाने से ज्यादा आसान है कोकीन छुड़ाना।

अगर किसी से मेथ छुड़ाया जाए तो वो बेचैन हो जाता है। उसे तलब लगती है ड्रग की। मूड बदलता रहता है, थकान होती है। भूख बहुत बढ़ जाती है। कई बार वह सुस्त हो जाता है। हताश हो जाता है। या तो नींद उड़ जाती है या फिर उसे बहुत नींद आती है। वह अजीब-अजीब सपने देखता है।

दूर रहने में ही है भलाई

दूरी में ही भलाई
1893 में जापान के केमिस्ट नगाइ नगायोशी ने मेथ डिवेलप किया था। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान जर्मनी में ये टैबलेट के तौर पर बिकने लगा था। जर्मन सैनिक परफॉर्मेंस बढ़ाने के लिए इसे इस्तेमाल करते थे। मगर इतिहासकारों ने लिखा है कि वे सैनिक जॉम्बी जैसी हरकतें करते थे। उनका दिमाग सुन्न सा हो जाता था। दो-तीन इसी के नशे में रहते थे। कई बार आम नागरिकों को मार देते तो कई बार अपने ऑफिसरों पर हमला कर देते।

बीच में इसे दवा के तौर पर भी इस्तेमाल किया गया मगर देखा गया कि फायदे के बजाय नुकसान ज्यादा हैं, इसका इस्तेमाल बंद कर दिया गया या सीमित कर दिया गया। लेकिन आज यही मेथ पंजाब और हिमाचल को अपनी गिरफ्त में ले चुका है। आए दिन ऐसी खबरें छप रही हैं जिसमें मेथ की लत के शिकार बच्चे अपने माता-पिता से मारपीट कर रहे हैं या घर का सामान तक बेच रहे हैं।

ड्रग्स की इस समस्या के लिए कौन जिम्मेदार है और इससे कैसे निपटा जा सकता है, इस पर जल्द बात करेंगे। तब तक आप In Himachal से जुड़िए रहिए, हमारे फेसबुक पेज को लाइक कीजिए। इस आर्टिकल को शेयर कीजिए और युवाओं को पढ़ाइए।

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