Horror Encounter: वह क्या था, कोई साया या फिर बच्चे के मन का वहम?

प्रस्तावना: ‘इन हिमाचल’ पिछले दो सालों से ‘हॉरर एनकाउंटर’ सीरीज़ के माध्यम से भूत-प्रेत के रोमांचक किस्सों को जीवंत रखने की कोशिश कर रहा है। ऐसे ही किस्से हमारे बड़े-बुजुर्ग सुनाया करते थे। हम आमंत्रित करते हैं अपने पाठकों को कि वे अपने अनुभव भेजें। हम आपकी भेजी कहानियों को जज नहीं करेंगे कि वे सच्ची हैं या झूठी। हमारा मकसद अंधविश्वास को बढ़ावा देना नहीं है। हम बस मनोरंजन की दृष्टि से उन्हें पढ़ना-पढ़ाना चाहेंगे और जहां तक संभव होगा, चर्चा भी करेंगे कि अगर ऐसी घटना हुई होगी तो उसके पीछे की वैज्ञानिक वजह क्या हो सकती है। मगर कहानी में मज़ा होना चाहिए। यह स्पष्ट कर दें कि ‘In Himachal’ न भूत-प्रेत आदि पर यकीन रखता है और न ही इन्हें बढ़ावा देता है। हॉरर एनकाउंटर के सीज़न-3 की छठी कहानी विवेक पराशर (आग्रह पर नाम बदल दिया गया है) की तरफ से, जिन्होंने अपना अनुभव हमें भेजा है-

क्या आपने अपने कमरे में किसी अजीब से साये को चहलकदमी करते देखा है? अगर मैं कहूं कि मैंने देखा है तो शायद आप यकीन नहीं करेंगे। मुझे ठीक-ठीक कुछ भी याद नहीं क्योंकि तब मैं बहुत छोटा था। मगर मेरे बचपन की बहुत सी यादें ऐसी हैं, जो मुझे याद हैं। मुझे कुछ किस्से तो तबके भी याद हैं, जब मैं दो-तीन साल का था।

जिस डरावने अनुभव के बारे में आपको मैं बताने जा रहा हूं, वह भी उसी दौरान का है। मैं शायद साढ़े तीन या चार साल का रहा होऊंगा। पापा प्राइमरी स्कूल में अध्यापक थे और उनका तबादला शिमला के अंदरूनी इलाकों में हुआ था। मैं जगह का नाम भी जानता हूं मगर वहां का नाम बताऊंगा तो शायद मेरी पहचान उजागर हो जाएगी और मैं ऐसा नहीं चाहता।

तो बस दो टाइम जाती थी एक कच्ची सी सड़क पर, सुबह और शाम। फिर वहां गांव से ऊपर की तरफ ढाई किलोमीटर की चढ़ाई करनी पड़ती थी। वहां मैं, पापा और मम्मी रहा करते थे। गांव में ही स्कूल से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर पापा ने एक मकान किराये पर लिया था। नीचे दुकान थी और ऊपर मकान के दो हिस्से। एक में बूढ़ी मकान मालकिन खुद रहा करती और दूसरे हिस्से में हम रहते थे।

मैं बच्चा था, इसलिए ज्यादातर समय पहले मेरा घर में बीता। उस समय दिन में घर पर मैं और मम्मी अकेले रहा करते थे, कभी-कभार बीच में मकान मालकिन बूढ़ी आंटी बातें करने आ जाया करती थीं। नीचे की दुकान पर भी कभी-कभी लोगों का आना-जाना लगा रहता था।

ऐसे ही एक बार मैं दिन में बैठा था। खिलौनों के साथ खेल रहा था कि मुझे खिड़की के बार कोई आवाज़ आई। बच्चा सा था तो कौतूहल वश झांकने लग गया। सामने दिखा कि जंगल की तरफ कोई महिला खड़ी है दूसरी तरफ मुंह करके, जिसके लंबे से बाल थे। मगर मेरे मन में डर जैसी कोई बात नहीं आई क्योंकि भूत-प्रेत का न तो पता था न किसी ने बताया था।

मगर समस्या की बात यह है कि एक बार मैं रात को सोया हुआ था। मम्मी-पापा के बीच सोया हुआ था। मुझे उसी महिला जैसा कुछ साया कमरे में एक किनारे में खड़ा नजर आया। डरावना सा चेहरा, चुपके से झांकता और घूरता हुआ। मुझे तब पहली बार डर लगा था और मैं आंखें बंद करके सो गया था। सुबह तक वह बात मेरे दिमाग से निकल गई।

प्रतीकात्मक तस्वीर

उसके बाद कई दिन तक मुझे वह साया सा कभी घर के इस कोने में दिन को दिखाई देता कभी रात को। मगर वह तभी दिखता जब मेरे आसपास उस कमरे में कोई न हो। न तो उसका चेहरा साफ दिखता न कुछ। जैसे ही मुझे लगता कि वह साया कमरे में है, मैं आंखें भींचकर बंद कर लेता।

कई बार मेरे मम्मी-पापा आते तो मुझे देखते तो पूछते कि आंखें बंद क्यों की हैं और क्यों मैं पसीना-पसीन हुआ हूं। घरवालों को मैं बताता नहीं कुछ। मगर फिर भी ऐसा नहीं हुआ कि डर मेरे मन में बैठ गया हो और मैं हमेशा ही डरा हुआ रहता हूं।

जब मैं चार साल का हुआ तो पापा ने मेरा दाखिला स्कूल में पहली क्लास में कर दिया। पापा के साथ सकूल जाता और उनके साथ वापस आता। हम बच्चों को कई बार जल्दी छुट्टी हो जाती तो पापा पांचवीं क्लास के बच्चों के साथ मुझे घर भेज देते, जिनके घर का रास्ता हमारे किराये के मकान के पास से होकर जाता था।

एक दिन भी मैं ऐसे ही जा रहा था। बीच रास्ते में घने पेड़ों की झुरमुट से होकर गुजरता था रास्ता। बांस के पेड़ थे जो हवाओं में चरचराते रहते थे। यहां पर बच्चों ने बताया कि सामने दिखने वाली चट्टान के नीचे भूत रहते हैं।

यहां मेरा पहली बार भूत शब्द से परिचय हुआ। मैं जानना चाहता था कि भूत क्या होते हैं। फिर बच्चे भूतों की कहानियां सुनाने लगे। अब मुझे लगने लगा कि क्या जो महिला का साया मुझे दिखता है, वह भूत तो नहीं। मैंने पहली बार घर जाकर अपने मम्मी-पापा से कहा कि मुझे भूत दिखता है। कभी यहां, कभी वहां।

वे परेशान हुए कि बच्चा है, कहानियां बना रहा है और डर रहा है। उन्हें ये भी पता चला कि मैंने भूत की कहानियां बच्चों से ही सुनी है। मगर मैं उन्हें समझा नहीं पाया कि भूत की कहानियां सुनने से पहले से ही मैं उस औरत के साये को देखता हूं।

उस रात को फिर मैं सोया था। मैं पक्के तौर पर नहीं कह सकता कि वह मुझे सपना आया था या वाकई मेरे साथ हुआ था, मगर यादें धुंधली हो चुकी हैं। मगर शायद एकदम असली जैसा लगा था।

रात को मैंने खुद को जंगल के बीचोबीच पाया। चारों तरफ अंधेरा और सामने की तरफ वही महिला पेड़ के साथ खड़ी हुई थी और पेड़ पर दौड़ लगाकर कभी चढ़ रही थी, कभी उतर रही थी। बहुत तेजी से। बंदर भी ऐसा न कर सकते हों। ऐसा करते समय वह कुछ बोल रही थी जो समझ नहीं आ रहा था।

यह देखकर मैं बेहोश हो गया। होश आया तो मैं बिस्तर पर था। जगा तो देखा मानो कुछ हुआ ही न हो। क्या ये बुरा सपना था। मगर अब ऐसा अक्सर होने लगा। रोज रात को मैं बियाबान में अकेला होता, कभी अकेला ही भटक रहा होता अंधेरे में और रास्ता नहीं मिलता। वह महिला नहीं दिखती। मगर अजीब घटनाएं होतीं। कभी कोई चमकती हुई चीज़ जाती तो कभी कुछ अजीब जानवर दिखते।

फिर एक दिन तबादला हुआ पापा का और हम उस गांव को छोड़कर शिमला शहर आ गए। उस दिन के बाद से न तो कभी मुझे वो रहस्यमयी साया दिखा, न ही कभी वैसे सपने आए। फिर जब मैं 20-21 साल का था, मेरा मन किया कि क्यों एक बार वहां जाऊं जहां मेरा बचपन बीता।

छुट्टियों में मैं गाड़ी लेकर उसी गांव में गया। सड़क ठीक उस मकान से होकर गुजरी थी, जहां हम किराये पर रहते थे। पता चला कि बूढ़ी मालनिक कुछ साल पहले चल बसी हैं, दुकान अभी भी वहीं हैं और आसपास कुछ घर बस गए हैं। जहां हम रहा करते थे, वे कमरे बंद हैं, ताले लगे थे। मगर मैं बरामदे से होकर गुजरा तो फिर वही स्मृतियां ताज़ा हो गईं। आगे बढ़ा तो लगा कि फिर किनारे पर कोई साया खड़ा है। चौंककर उस तरफ नजर घुमाई तो देखा कि साया नहीं, बल्कि किसी ने पुरानी बरसाती टांगी हुई है कील से।

जान में जान आई और वहां से चला आया। न जाने बचपन में वह क्या घटना थी। क्या मेरे बाल मन के सपने थे जो मुझे आज स्मृतियों की रूप में याद आते हों। कहीं ऐसा तो नहीं कि मैं इमैजिन किया करता था।

वैसे ये भी कहते हैं कि हमारे बचपन की ज्यादातर यादें जो हमें याद रहती हैं, उनमें से ज्यादातर झूठ होती हैं। क्योंकि उस दौर में हमारे दिमाग का विकास हो रहा होता है। इसलिए उस दौरान के सपने और हकीकत आज हमें यादों के रूप में याद आते हैं। इसलिए हो सकता है कि मेरी कल्पनाएं आज मुझे यादों के रूप में स्मरण आती हों। जो भी हो, बचपन के बाद न तो मुझे कभी कोई भूत दिखा न साया न कभी डर लगा। बस ये अनुभव था जो आप सभी के साथ साझा करना चाहता था।

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DISCLAIMER: इन हिमाचल का मकसद अंधविश्वास को बढ़ावा देना नहीं है। हम लोगों की आपबीती को प्रकाशित कर रहे हैं, ताकि अन्य लोग उसे कम से कम मनोरंजन के तौर पर ही ले सकें और उनके पीछे की वैज्ञानिक वजहों पर चर्चा कर सकें। आप इस कहानी पर कॉमेंट करके राय दे सकते हैं। अपनी कहानियां आप [email protected] पर भेज सकते हैं।

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